Tuesday, September 19, 2017

निष्कासित रोहिंग्या जाएं तो कहां?


समस्या का हल ढूंढना आवश्यक..



एल.एस. हरदेनिया

म्यांमार से रोहिंग्यमुसलमानों के निष्कासन ने अनेक महत्वपूर्ण प्रश्नों को जन्म दिया है। इस संदर्भ मेसबसे बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि किसी देश की सरकार मनमाने ढंग से यदि वहां बरसोसे बसे नागरिकों को देश निकाला कर दे तो वे कहां जाएं? कुछ मामलों में इस तरह के निष्कासित लोगों को वह देश स्वीकार कर लेगा जिसकबहुसंख्यक नागरिकों का धर्म वही है जो निष्कासित लोगों का है। जैसे आज भी पाकिस्तासे भगाए जाने वाले हिन्दुओं को हम अपने देश में बसा लेते हैं। परंतु यदि किन्हीं कारणोसे भारत में रहने वाले कुछ हिन्दुओं को निष्कासित किया जाता है तो उन्हें कौन स्वीकाकरेगा। इसी तरह यदि पाकिस्तान के शासकों से परेशान होकर यदि कोई मुसलमान हमारे देमें शरण लेना चाहे तो उसे शरण नहीं देंगे। कभी-कभी राजनीतिक कारणों से भी अन्य देशोसे निष्कासित लोगों को शरण देते हैं। जैसे हमने वर्षों पहले दलाई लामा को शरण दी हैबर्मा से निष्कासित वहां के पूर्व प्रधानमंत्री यू थाकिन नू को हमने भारत में शरण थी। इस दरम्यान उन्हें भोपाल में रखा गया था

परंतु अभी हाल में यूरोप के कुछ देशों ने सीरिया और अन्य मुस्लिम देशों से आए लोगों को शरण दी है। परंतु यह सब कुछ उन देशों की सरकारों के उदार रवैये के कारण हुआ था।
इसी तरह की उदारता हमने बांग्लादेश के आजादी के आंदोलन के दौरान दिखाई थी। पाकिस्तान के तानाशाह ने बांग्लादेश के निवासियों पर तरह-तरह के जुल्म किए तो उस दरम्यान बांग्लादेश के अनेक मुसलमानों ने हमारे देश में शरण ली थी। उनमें से कुछ अभी भी रह रहे हैं। उनको हमारे देश से भगाने की मांग समय-समय पर उठती रहती है। असम में यदि भाजपा सत्ता में आई है तो उसका मुख्य कारण उसके द्वारा दिया गया यह नारा है कि बांग्लादेशियों को भगाओ। इस नारे ने असम को साम्प्रदायिक आधार पर बुरी तरह से विभाजित कर दिया है। इतिहास इस बात का गवाह है कि अनेक देश की सरकारों ने अपने देश में बसे लोगों को निष्कासित करने का फैसला किया है। यदि इस तरह के लोग अपनी मर्जी से नहीं जाते हैं तो फिर उन्हें भगाने के लिए हिंसा का सहारा लिया जाता है। हिटलर की जर्मनी में बसे यहूदियों का तो नरसंहार ही कर दिया गया था।

आखिर यदि एक देश से निष्कासित लोगों को कोई भी देश शरण न दे तो वे कहां जाएं? इस प्रश्न का उत्तर ढूंढना आवश्यक है। क्या ऐसे लोगों के लिए एक नया देश बनाया जाए? वैसे ही जैसे यहूदियों के लिए इज़रायल बनाया गया था। परंतु दुःख की बात है कि यहूदियों ने अपना घर बसाने की प्रक्रिया में दूसरों (फिलस्तीनियों) के घर जलाना प्रारंभ कर दिए। शरणार्थियों की समस्या दिन प्रति दिन गंभीर होती जा रही है। दुनिया के राष्ट्रों को विशेषकर संयुक्त राष्ट्र संघ को इस समस्या का हल ढूंढना पड़ेगा।

इसी संदर्भ में म्यांमार में जो कुछ हो रहा है उसके बारे में चिंतन करना होगा। वहां की सरकार का यह दावा है कि रोहिंग्या मुसलमान वहां के निवासी नहीं हैं, इसलिए उन्हें म्यांमार छोड़ना पड़ेगा। म्यांमार में उठी मांग ने इस समय अत्यधिक हिंसक रूप ले लिया है। वहां की सरकार विशेषकर सेना, ऐसी गतिविधियां कर रही है जिसके चलते रोहिंग्या मुसलमान म्यांमार से भाग रहे हैं। रोहिंग्या मुसलमानों के घरों में आग लगाई जा रही है, अनेक स्थानों पर उनकी हत्याएं की गई हैं, महिलाओं के साथ ज्यादती की जा रही है। इस सबके चलते ये लोग बांग्लादेश की तरफ भाग रहे हैं। इस तरह के हज़ारों लोगों को बांग्लादेश ने शरण दी है। उनके लिए अस्थायी कैंप बना दिए गए हैं। बांग्लादेश की आबादी पहले से घनी है। वह कितने दिन तक इन्हें झेल सकेगी।

हां, यह विचारणीय प्रश्न है क्या रोहिंग्या मुसलमान म्यांमार के नागरिक नहीं हैं? क्या वे चंद बरसों पहले वहां जाकर बसे हैं?

रोहिंग्या मुसलमानों का दावा है कि वे म्यांमार में, जिसे पहले बर्मा कहते थे, 15वीं शताब्दी से रहे हैं। एक तथ्य यह है कि इनमें से बहुसंख्यकों को ईस्ट इंडिया कंपनी ने यहां बसाया था। 1828 में अंग्रेज़ों ने वहां के राजा को हराया और उनने बंगाल के मुसलमानों को यहां बसाया। इसके आधार पर म्यांमार में नागरिकों संबंधी कानून 1948 और 1982 में बने। रोहिंग्या मुसलमानों के अतिरिक्त म्यांमार में चीनी, मलाय और थाई मुसलमान भी यहां रह रहे हैं।
रोहिंग्यों की ओर से यह दावा किया जाता है कि उनके पास ऐसे लिखित प्रमाण हैं कि 1948 के बाद उन्हें म्यांमार के नागरिक के रूप में स्वीकार किया गया था। यहां तक कि म्यांमार के प्रथम राष्ट्रपति यू नू ने एक अवसर पर कहा था कि रोहिंग्या बर्मा में सजातीय हैं। इसी तरह से कई वर्षों तक बर्मा ब्राडकास्टिंग द्वारा रोहिंग्या की भाषा में सप्ताह में तीन बार प्रसारण किया जाता था। इसी तरह रंगून विश्वविद्यालय में रोहिंग्या विद्यार्थियों की यूनियन लंबे समय तक अस्तित्व में थी।

यहां तक कि म्यांमार में सैनिक शासन आने के बाद भी इनके पृथक अस्तित्व को नहीं नकारा गया। अस्थायी स्क्रूटिनी कार्ड के आधार पर रोहिंग्या मुसलमानों ने 1948 से लेकर 2010 तक चुनावों में मतदान किया था। 1989 मे नया स्क्रूटिनी कार्ड लागू किया गया और यह कार्ड उन्हें नहीं दिया गया। यह कार्ड उन्हें इसलिए नहीं दिया गया क्योंकि 1982 में बने नागरिकता कानून के अनुसार वे नागरिक नहीं रहे। इसके बावजूद उन्हें अस्थायी कार्ड दिया गया और यह घोषणा की गई कि उन्हें शीघ्र ही स्थायी कार्ड जारी किया जाएगा। अनेक बार दिए गए आश्वासनों के बावजूद उन्हें राष्ट्रीय कार्ड जारी नहीं किया गया।

वर्ष 2010 में संपन्न चुनाव (जो सैनिक शासन के दौरान हुआ आखिरी चुनाव था) रोहिंग्या राजनीतिक दलों ने भाग लिया। यद्यपि उनका एक भी उम्मीदवार नहीं जीता परंतु एक अन्य पार्टी ने उम्मीदवार के रूप में तीन रोहिंग्या संसद में चुन कर भेजे गए। परंतु 2015 में रोहिंग्याओं से वोट का अधिकार छीन लिया गया। यद्यपि 2015 में हुआ चुनाव वास्तव में लोकतंत्रात्मक था।

वर्ष 2012 में एक बुद्धिस्ट महिला के साथ बलात्कार हुआ। बलात्कार का आरोप दो रोहिंग्या पुरूषों पर लगाया गया। इसके बाद रोहिंग्या मुसलमानों के ऊपर हिंसक हमले हुए। उनके अनेक गांव जला दिए गए। उसके बाद हज़ारों रोहिंग्या मुसलमान बांग्लादेश की तरफ भागे। इस बीच संयुक्त राष्ट्र संघ की देखरेख में मुसलमानों के लिए कैम्प बना दिए गए। अभी भी लगभग डेढ़ लाख रोहिंग्या मुसलमान इन कैंपों में रह रहे हैं। इसी दौरान इन कैंपों में अराकान रोहिंग्या सालवेशन आर्मी का गठन हुआ। इसी बीच अक्टूबर 2016 में म्यांमार पुलिस के 9 जवानों की हत्या हुई। उन हत्याओं का जिम्मा सालवेशन आर्मी ने लिया। इस घटना के बाद रोहिंग्या मुसलमानों पर मुसीबतों और ज्यादतियों का कहर टूट पड़ा। इस सबके पीछे म्यांमार की सेना का हाथ था। इस बीच संयुक्त राष्ट्र संघ ने वास्तविकता जानने के लिए जांच आयोग भेजना चाहा, पर आयोग को म्यांमार की सरकार ने अनुमति नहीं दी। इस बीच रोहिंग्या मुसलमानों पर ज्यादतियों का सिलसिला बढ़ता गया और म्यांमार की फौज ने ढाई लाख मुसलमानों को बांग्लादेश की तरफ खदेड़ दिया। इस दरम्यान म्यांमार की सरकार ने संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव कोफी अन्नान के नेतृत्व में एक परामर्शदाता आयोग का गठन किया। आयोग ने अपनी रिपोर्ट आंग सान सू की को सौंप दी। वे इस समय विदेश मंत्री का डिफेक्टो चार्ज लिए हुए हैं। आयोग ने कहा कि 1982 में बने नागरिकता संबंधी कानून का पुनर्मूल्यांकन किया जाए।

इस बीच सू की के रवैये की सारी दुनिया में आलोचना हो रही है। यहां तक कि यह मांग उठ रही है कि उन्हें दिया गया नोबेल पुरस्कार वापस लिया जाए।

म्यांमार के रोहिंग्या मुसलमानों के अतिरिक्त भारत में बसे रोहिंग्या मुसलमानों की भी समस्या गंभीर है। ये समय-समय पर आकर भारत में बसे हैं। एक अधिकृत अनुमान के अनुसार इनकी संख्या लगभग 40,000 है। भारत सरकार चाहती है कि इन्हें भारत से बहिष्कृत कर दिया जाए। इस मुद्दे को लेकर हमारे देश में भी विभिन्न मत हैं। एक मत के अनुसार यह सोच है कि यदि एक अरब पच्चीस करोड़ की आबादी वाले देश में 40,000 शरणार्थी रह रहे हैं तो उससे कौन सी मुसीबत हो सकती है? परंतु भारत सरकार का यही रवैया है कि इन्हें हर हालत में हमारे देश से बाहर जाना पड़ेगा। ये अत्यधिक गरीब हैं, उन्हें मानव जीवन की कोई भी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। इसके बावजूद उन्हें हमारी देश की सुरक्षा के लिए खतरा समझा जा रहा है। वैसे भी इस समय हमारे देश में लगभग बीस करोड़ मुसलमान रह रहे हैं। यदि उनमें 40,000 और जोड़ दिए जाएंगे तो मैं नहीं समझता की इससे देश की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।

देश की सुरक्षा अनेक कारणों से खतरों में पड़ती है। अभी हाल में मध्यप्रदेश में कुछ ऐसे हिन्दुओं को गिरफ्तार किया गया जो पाकिस्तान को समय-समय पर गुप्त सूचनाएं भेजते थे। इस तरह के लोगों में भाजपा से भी जुड़े लोग थे। यदि इन 40,000 मुसलमानों को भारत से भगाया जाता है तो शायद उन्हें दुनिया का कोई देश स्वीकार नहीं करेगा। इस संदर्भ में यह बात भी चिंता की है कि दुनिया में अनेक ऐसे राष्ट्र हैं जिनके बहुसंख्यक नागरिक मुसलमान हैं। परंतु उनमें से एक-दो को छोड़ें तो किसी मुस्लिम राष्ट्र ने रोहिंग्या मुसलमानों की स्थिति पर चिंता प्रकट नहीं की है। ज्ञात हुआ है कि तुर्की ने रोहिंग्या मुसलमानों के लिए एक बड़ी सहायता भेजी है। एक सुखद समाचार यह भी है कि भारत सरकार ने भी बर्मा से बहिष्कृत मुसलमानों के लिए सहायता भेजी है।


इस बीच संयुक्त राष्ट्र संघ ने अंतिम बार सू की से कह दिया है कि वे रोहिंग्या मुसलमानों के संबंध में अपना रवैया स्पष्ट करें। ज्ञात हुआ है कि वे कल अर्थात 19 सितंबर को म्यांमार के नाम अपना संदेश प्रसारित करने वाली हैं। आशा है कि इस संदेश में वे इन मुसलमानों के घावों पर मरहम लगाने की पहल करेंगी। सू की का स्वयं एक संघर्ष का लंबा इतिहास है। वे लगभग दो दशकों तक गिरफ्तार रहीं। यहां तक कि जब उनके पति की मृत्यु लंदन में हुई तो म्यांमार की सरकार ने उन्हें लंदन जाने की इजाजत दे दी थी। परंतु उन्होंने जाने से इंकार कर दिया यह कहते हुए कि यदि मैं म्यांमार से वापस जाउंगी तो वहां के सैनिक शासक उन्हें म्यांमार में प्रवेश नहीं करने देंगे। आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि उनके हृदय में इन लोगों के प्रति एक मां का स्नेह जागृत होगा। 


Monday, September 18, 2017

मध्यप्रदेश- बच्चों के साथ त्रासदियों का पुराना सिलसिला

जावेद अनीस



गोरखपुर में करीब साठ बच्चों की मौत ने देश के हर संवेदनशील नागरिक को झकझोर दिया है , दरअसल यह कोई आतंकी नहीं बल्कि एक अस्पताल में घटी घटना है जिसका काम लोगों की जान लेना नहीं बल्कि जिंदगी देना है. यह घटना तब घटी जब देश आजादी की 71वीं सालगिरह मनाने की तैयारी कर रहा था. इससे शर्मनाक स्थिति  और क्या हो सकती है कि मुख्यमंत्री के गढ़ गोरखपुर स्थिति बाबा राघवदास मेडिकल कॉलेज में बीमार बच्चों की ऑक्सीजन सप्लाई  रोक देने की वजह से मौत हो जाती है. दरअसल  आक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी ने भुगतान ना होने की वजह से सप्लाई रोक दिया था. जाहिर है कंपनी के लिए बच्चों की जान की कोई कीमत ही नहीं थी उनके लिए पहला और अंतिम सत्य पैसा ही था. सत्ताधारी नेताओं द्वारा इस घटना कोई जवाबदेही करने के बजाये इसे बहुत ही घृणित तरीके से साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश की गयी उनकी तरह से “पहली बार ऐसा हादसा नहीं हुआ है" और अगस्त में तो बच्चे मरते ही हैं जैसे बयान आते हैं. यह घटना स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण की वकालत करने वालों के लिए भी एक सवाल छोड़ते हुए एकबार फिर चेताती है कि स्वास्थ्य जैसी जीवन से जुडी सेवाओं को मुनाफाखोर कंपनियों के हवाले करने के कितने गंभीर खामियाजे भुगतने पड़ सकते हैं.

दुर्भाग्य से गोरखपुर की घटना कोई इकलौती घटना नहीं है इससे पहले भी देश के अनेक हिस्सों में इस तरह की घटनायें होती रही हैं . पूर्व में हुई घटनाओं से हम सीख हासिल सकते थे लेकिन हमने  कभी भी ऐसा नहीं किया है. हमने तो  जवाबदेही को एक दुसरे पर थोपने और हर नये मामले को किसी हिसाब से रफा दफा करने का काम किया है. पूरी व्यवस्था संवेदनहीनता और निकम्मेपन की शिकार है.

मध्यप्रदेश भी पिछले कई दशकों से बच्चों के लिए कब्रगाह बना हुआ है एक तरफ तो बीच-बीच में गोरखपुर की तरह होने वाली घटनायें है तो दूसरी तरह भूख और कुपोषण से होने वाली मौतों का अंतहीन सिलसिला ,तमाम ढोंगों और ढकोसलो के बावजूद इसकी प्रेतछाया दूर होने का नाम ही नहीं ले रही है.

इसी साल 21 जून को इंदौर के शासकीय महाराजा यशवंतराव चिकित्सालय (एमवाय हॉस्पिटल) में भी कुछ इसी तरह की घटना हुई थी जहाँ चौबीस घंटे में 17 लोगों की मौत हो गई थी इसमें  चार नवजात बच्चे भी शामिल थे, यहाँ भी मामला ऑक्सीजन सप्लाई ठप होने का ही था. हैरानी की बात यह है कि हॉस्पिटल में जिस प्लान्ट से 350 मरीजों तक ऑक्सीजन सप्लाई की की कमान 24 घंटे सिर्फ एक व्यक्ति के हाथ में रहती है. यानी वह कहीं चला जाए या रात में सो जाए और इस बीच ऑक्सीजन खत्म हो जाए तो सप्लाई रुक जाने का खतरा बना रहता है. जैसा की हमेशा से होता आया है यहाँ भी  स्पताल प्रशासन और मध्यप्रदेश सरकार ने इन मौतों को सामान्य बताया था और पूरी तरह से घटना को दबाने और पूरे मामले की लीपापोती में जुट गये थे. अखबारों में प्रकाशित ख़बरों के अनुसार उस रात एमवाय अस्पताल की मेडिकल गहन चिकित्सा इकाई, ट्रॉमा सेंटर और शिशु गहन चिकित्सा इकाई ऑक्सीजन की आपूर्त कुछ देर के लिए बंद हो गयी थी जिसकी वजह से यह मौतें हुयीं. प्रशासन इस इन मौतों को सामान्य बताता रहा और बहुत ही संवेदनहीनता के साथ कुतर्क देता रहा कि एमवाय अस्पताल में तो  हर रोज औसतन 10-15 मौतें होती ही हैं.
महाराजा यशवंतराव चिकित्सालय (एमवाईएच) का ही एक दूसरा मामला मई 2016 है जब ऑपरेशन थियेटर में ऑक्सीजन की जगह एनिस्थीसिया (निश्चेतना) के लिए इस्तेमाल की जाने वाली नाइट्रस आक्साइड गैस दे दिया गया था जिसकी वजह से दो बच्चों की मौत हो गई थी. बाद में अस्पताल प्रशासन की गयी जांच में पता चला कि ऑपरेशन थिएटर में जिस पाइप से ऑक्सीजन आनी चाहिए, उससे नाइट्रस ऑक्साइड की आपूर्ति की जा रही थी. ऑपरेशन थिएटर में गैसों की आपूर्ति और इनके पाइप जोड़ने का काम करने वाली एक निजी कम्पनी के हवाले था जिसके खिलाफ भारतीय दंड विधान की धारा 304-ए (लापरवाही से जान लेना) के तहत मामला दर्ज करके पूरे मामले को दबाने की कोशिश की गयी. बाद में स्वास्थ्य अधिकार मंचने इस मामले में गठित जांच समिति पर सवाल उठाते हुए आशंका जताई थी कि चूंकि इस मामले की जांच करने के लिए गठित जांच समिति के सभी पांच डॉक्टर एमवाईएच से जुड़े हैं इसलिए वे अस्पताल के दोषी स्टाफ को बचाने के लिए जांच के नाम पर लीपापोती कर सकते हैं. खैर जांच के लिए गठित समिति ने पाया था कि कि पाइप लाइन में लीकेज भी है जिसका  मेंटेनेंस किया जाना चाहिये  लेकिन लापरवाही की हद देखिये एक साल से ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद यह काम भी पूरा नहीं किया जा सका है जबकि इसी की वजह से पिछले साल हादसा हुआ था .

सूबे की राजधानी भोपाल गैस काण्ड जैसी त्रासदी के लिए तो कुख्यात है ही, यह एक ऐसी त्रासदी है जिसके  33 साल होने को है लेकिन इसका असर आज भी  देखा जा सकता है. यह दुनिया की उन त्रासदियों में शामिल है जिसका असर कई पीढ़ियों पर पड़ा है. आज भी यहां जन्म लेने वाले बच्चों में इसकी वजह से विकृति देखी जा सकती है. भोपाल स्थिति यूनियन कार्बाइड कंपनी के कारखाने से मिथाइल आइसोसाइनेट के रिसाव से दुनिया का सबसे भयावह औद्योगिक हादसों में से एक है ,इस हादसे में 15 हजार से अधिक लोगों की मौत हो गई थी और कई हजार लोग बीमार हो गए. गैस के विनाशकारी प्रभाव आज की पीढ़ियों तक में देखे जा सकते  हैं. गैस प्रभावित इलाकों में अभी भी  बच्‍चे कई असामान्‍यताओं के साथ पैदा हो रहे हैं. पिछले साल गैस पीड़ितों के स्वास्थ्य के लिए काम रही संस्था संभावना ट्रस्ट द्वारा एक अध्ययन किया गया था इस अध्ययन में करीब एक लाख से गैस पीड़ित शामिल थे, अध्ययन के दौरान चिकित्सक द्वारा प्रमाणित टीबी, कैंसर, लकवा, महिलाओं का प्रजनन स्वास्थ्य तथा शिशुओं और बच्चों की शारीरिक, मानसिक व सामाजिक विकास की जानकारी इकट्ठा की गयी. अध्यनन में पाया गया कि गैस पीड़ितों की चौथी पीढ़ी भी इसके दुष्परिणामों को भोग भोगने के लिये अभिशप्त है, 1700 से अधिक बच्चों को जन्मजात विकृति से ग्रस्त पाया गया.


इसी तरह से चंद सालों पहले भोपाल गैस त्रासदी का महिलाओं और बच्चों पर पड़े प्रभावों को लेकर स्वाति तिवारी जी की सवाल आज भी जिन्दा हैनाम से एक किताब आई थी. इस किताब में बताया गया है कि कैसे इस हादसे की वजह कुल 2698 गर्भावस्थाओं में से 436 महिलाओं के गर्भपात के मामले सामने आये थे, 52 बच्चे मरे हुए पैदा हुए थे और अधिकांश बच्चे जो पैदा हुए थे वे बाद में जन्मजात विकृति के साथ जीने को मजबूर हुये थे.


मध्य प्रदेश के लिये कुपोषण कई दशकों से एक ऐसा कलंक बना हुआ है जो पानी कि तरह पैसा बहा देने के बाद भी नहीं धुला है.दरअसल कुपोषण अपने आप में कोई बीमारी नहीं हैं यह एक लक्षण है दरअसल बीमारी तो उस व्यवस्था में है जिसके तहत रहने वाले नागरिकों को कुपोषण का शिकार होना पड़ता है कुपोषण की जड़ें गरीबी, बीमारी, भूखमरी और जीवन के बुनियादी जरूरतों के अभाव में है. इन अभाव और भूखमरी की मार सबसे ज्यादा बच्चों और गर्भवती महिलाओं पर पड़ती है.आवश्यक भोजन नही मिलने की वजह से बड़ों का शरीर तो फिर भी कम प्रभावित होता है लेकिन बच्चों पर इसका असर तुरंत पड़ता है. गर्भवती महिलाओं को जरुरी पोषण नही मिल पाने के कारण उनके बच्चे तय मानक से कम वजन के होते ही है, जन्म के बाद अभाव और गरीबी उन्हें भरपेट भोजन भी नसीब नही होने देती है, नतीजा कुपोषण होता है, जिसकी मार या तो दुखद रुप से जान ही ले लेती है या इसका असर ताजिंदगी दिखता है.

आकड़ों के सामने विकासके तथाकथित मध्यप्रदेश मॉडल के दावे खोखले साबित हो रहे हैं जमीनी हालात चुगली करते हैं कि  कि मध्यप्रदेश ‘‘बीमारु प्रदेश’’ के तमगे से बहुत आगे नहीं बढ़ सका है. विडम्बना देखिये पिछले साल मध्यप्रदेश सरकार ने ‘‘आनंद मंत्रालय’’ खोलने की घोषणा की थी, मंत्रालय खुल भी गया लेकिन इसके कुछ दिनों बाद ही यही मध्यप्रदेश की सरकार ‘‘कुपोषण की स्थिति’’ को लेकर श्वेत पत्र लाने की घोषणा भी करती है. तमाम योजनाओं और बजट के बावजूद मध्यप्रदेश शिशु मृत्यु दर में पहले और कुपोषण में दूसरे नंबर पर बना हुआ है. कुपोषण का सबसे ज्यादा प्रभाव आदिवासी बाहुल्य जिलों में देखने को मिलता है इसकी वजह यह है कि आदिवासी समाज पर ही आधुनिक विकास कि मार सबसे ज्यादा पड़ती है वे लगातार अपने परम्परागत संसाधनों से दूर होते गए हैं. भारत सरकार द्वारा जारी ‘‘रिर्पोट आफ द हाई लेबल कमेटी आन सोशियो इकोनामिक, हैल्थ एंड एजुकेशनल स्टेटस आफ ट्राइबल कम्यूनिटी’’ 2014 के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर आदिवसी समुदाय में शिशु मृत्यु दर 88 है जबकि मध्यप्रदेश में यह दर113 है, इसी तरह से राष्ट्रीय स्तर पर 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 129 है वही प्रदेश में यह दर 175 है.

यहाँ भी सूबे का सरकारी अमला इस तल्ख हकीकत को स्वीकार करके उसका हल खोजने के  बजाये आंकड़ों की बाजीगरी या कुतर्कों से  जमीनी स्थिति को झुठलाने में ज्यादा रूचि लेता दिखाई पड़ता है पूरा जोर इस बात पर रहता है कि कैसे आंकड़ों के जरिए कुपोषण की स्थिति को कमतर दिखाया जाये. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 (एनएफएचएस -2015-16) के अनुसार मध्यप्रदेश में  42.8 प्रतिशत प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं. एनुअल हेल्थ सर्वे 2014 के अनुसार शिशु मृत्यु दर (आईएमआर) के मामले में मध्यप्रदेश पूरे देश में पहले स्थान पर है जहाँ 1000 नवजातों में से 52 अपना पहला जन्मदिन नहीं मना पाते हैं. जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह दर आधा यानी 26 ही है. यह हाल तब है जब कि इस अभिशाप से मुक्ति के लिए पिछले 12 सालों से पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है , पिछले पांच सालों में ही कुपोषण मिटाने के लिये 2089 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं. सवाल उठता है कि इतनी बड़ी राशि खर्च करने के बाद भी हालात सुधर क्यों नहीं रहे हैं?  

इसके जवाब को पोषण आहार में हो रहे खेल से समझा जा सकता है. पिछले साल सूबे के  महिला बाल विकास विभाग कि ओर से यह  दावा किया गया था कि 2015-16 में 1.05 करोड़ बच्चों को पोषाहार बांटा गया जबकि पूरे मध्यप्रदेश की आबादी ही करीब सात करोड़ है अगर विभाग के दावे को सही माना जाए तो राज्य का हर सातवां शख्स पोषाहार पा रहा है. राज्य में आंगनवाड़ियों के जरिए कुपोषित बच्चों और गर्भवती महिलाओं को दी जाने वाली पोषणाहार व्यवस्था को लेकर लम्बे समय से सवाल उठते रहे हैं. जाहिर है तमाम योजनाओं,कार्यक्रमों और पानी की तरह पैसा खर्च करने के बावजूद दस साल पहले और आज की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है. कुपोषण की स्थितिपर मध्यप्रदेश सरकार ने  श्वेतपत्र लाने कि जो घोषणा की थी उसका भी कुछ आता-पता नहीं है.


मामला चाहए गोरखपुर का हो,इंदौर का या फिर भोपाल का इसके लिए जिम्मेदार लोगों की पहली कोशिश यही रहती है कि किसी भी तरह से इसे नकार दिया जाए. यह महज लापरवाही या अपनी खाल बचा लेने का मामला नहीं है बल्कि इसका सम्बन्ध उस राजसत्ता और व्यवस्था की प्रकृति से है जो अपने आपको "जनता द्वाराजनता के लिएजनता का शासन होने का दावा करता है. सबसे बुनियादी बात तो यह है कि इन त्रासदियों के लिए जिम्मेदार उन लोगों की जवाबदेही सीधे तौर पर तय हो जिनके पास सब कुछ तय करने का अधिकार है और जब एक बार जवाबदेही तय हो जाए तो उसे कड़ाई से लागू किया जाये फिर वो चाहे कोई, योगी, फ़कीर हों या फिर कोई स्वयंभू मामा.