Monday, October 16, 2017

“न्यूटन” भारतीय सिनेमा का काला हास्य


जावेद अनीस



भारतीय सिनेमा के लिये “न्यूटन” एक नये मिजाज की फ़िल्म है बिलकुल ताजी, साबूत और एक ही साथ गंभीर और मजेदार. इसमें सादगी और भव्यता का विलक्ष्ण संयोग है. न्यूटन का विषयवस्तु भारी-भरकम है लेकिन इसका ट्रीटमेंट बहुत ही सीधा और सरल है बिलकुल मक्खन की तरह. सिनेमा का यह मक्खन आपको बिलकुल इसी दुनिया का सैर कराता है जिसमें हमारी जिंदगी की सारी खुरदरी हकीकतें दिखाई पड़ती हैं लेकिन इसी के साथ ही यह सिनेमा के बुनियादी नियम मनोरंजन को भी नहीं भूलती है. यह एक क्लास विषय पर मास फिल्म है. नक्‍सल प्रभावित इलाके में चुनाव जैसे भारी भरकम विषय वाली किसी सिताराविहीन फिल्म से आप मनोरंजन की उम्मीद नहीं करते हैं. ऐसा भी नहीं है कि इस विषय पर पहले भी फिल्में ना बनी हों लेकिन न्‍यूटन का मनोरंजक होना इसे अलग और ख़ास बना देता है. यह अपने समय से उलटी धारा की फिल्म है. आदर्शहीनता के इस दौर में इसका नायक घनघोर आदर्शवादी है और ऐसा करते हुए वो अजूबा दिखाई पड़ता है यही इस फिल्म का काला हास्य है.
 ‘न्‍यूटन एक राजनीतक फिल्म है जिसे बहुत ही सशक्त तरीके से सिनेमा की भाषा में गढ़ा गया है. यह सिनेमा के ताकत का एहसास कराती है. इस फिल्म की कई परतें है लेकिन अगर आप एक जागरूक नागरिक नहीं हैं तो इन्हें पकड़ने में चूक कर सकते हैं. न्‍यूटनएक ऐसे विषय पर आधारित है जिसपर बात करने से आम तौर पर लोग कतराते हैं. ये हमें देश के एक ऐसे दुर्गम इलाके की यात्रा पर ले जाती है जिसको लेकर हम सिर्फ कहानियां और फ़साने ही सुन पाते हैं. प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इस इलाके में आदिवासी रहते हैं जो नक्सलियों और व्यवस्था के बीच जी रहे हैं. दंड्यकारंण्य के जंगल दुनिया से कटे हुए है और यहाँ सिर्फ नक्सलवाद और उदासीन सिस्‍टम की प्रेतछाया की दिखाई पड़ती है.

फिल्म का हर किरदार एक प्रतीक है जिसका सीधा जुड़ाव हकीकत की दुनिया से है. ये कहानी नूतन उर्फ न्‍यूटन कुमार (राजकुमार राव) की है जो एक सरकारी कलर्क है. वो पागलपन की हद तक ईमानदार और आदर्शवादी है. उनकी ड्यूटी छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित जंगली इलाके में चुनाव के लिये लगायी जाती है. यह एक ऐसा इलाका है जहाँ नक्सलियों ने चुनाव का बहिष्कार कर रखा है. जाहिर है किसी के लिए भी यहाँ चुनाव कराना जोखिम और चुनौती भरा काम है. न्‍यूटन अपने साथियों लोकनाथ(रघुवीर यादव) और स्थानीय शिक्षिका माल्को (अंजली पाटिल) उस इलाके में जाता है. सिक्योरिटी हेड आत्मा सिंह (पंकज त्रिपाठी) और उसके साथी इस काम में उन्हें सुरक्षा देते हैं लेकिन आत्मा सिंह और न्‍यूटन के बीच टकराव की स्थिति बन जाती है, जहाँ आत्मा सिंह मतदान के इस काम को बिलकुल टालने और खानापूर्ति वाले अंदाज में करना चाहता है वहीँ न्‍यूटन का नजरिया बिलकुल उल्टा है, वो काम के प्रति आस्था और बेहतरी की उम्मीद से लबरेज है और किसी भी तरीके से निष्पक्ष मतदान प्रक्रिया को अंजाम देना चाहता है और इसके लिये वो हर तरह के खतरे और रिस्क को उठाने को तैयार है.

राजकुमार राव, पंकज त्रिपाठी, अंजलि पाटिल, रघुबीर यादव जैसे अव्वल दर्जे के कलाकारों से सजी यह फिल्म आपको किसी स्टार की कमी महसूस नहीं होने देती है. राजकुमार राव के पास अब कुछ भी साबित करने को नहीं बचा है इसके बावजूद भी वो हर बार अपने अभिनय से हमें चौंकाते हैं, वे अपने किरदारों में इस कदर समां जाते हैं कि कोई फर्क नहीं बचता है. यहाँ भी उन्होंने ठीक यही काम किया है.रघुवीर यादव पुराने और मंजे हुए कलाकार हैं जो की इस फिल्म में साफ़ नजर आता है. पंकज त्रिपाठी के लिए यह साल गोल्डन साल साबित हो रहा है, उनके अभिनय की सहजता आकर्षित करती है. इन सबके बीच अंजलि पाटिल स्मिता पाटिल की याद दिला जाती हैं.   

क भारी भरकम विषय को बेहद हलके फुलके अंदाज में पेश करना एक अद्भुत कला है. यह विलक्षण संतुलन की मांग करता है. निर्देशक अमित मसुरकर ने यह काम कर दिखाया है. अपने इस दूसरी फिल्म से ही उन्होंने बता दिया है कि वे यहाँ किसी बने बनाये लीक पर चलने नहीं आये हैं बल्कि नये रास्ते खोजने आये हैं जिसपर दूसरे निर्देशकों को चलना है. वे उम्मीदें जागते है जिसपर आने वाले समय में उन्हें खरा उतरना है.

प्रोपगंडा भरे इस दौर में बिना किसी एजेंडे के सामने आना दुर्लभ है. दरअसल इस तरह के विषयों पर बनने वाली ज्यादातर फिल्में अपना एक पक्ष चुन लेती है और फिर सही या गलत का फैसला सुनाने लगती हैं.लेकिन न्‍यूटन में इसकी जरूरत ही नहीं महसूस की गयी हैं. इसमें बिना किसी एक पक्ष को चुने हुए कहानी को बयान किया गया है और तथ्यों को सामने रखने की कोशिश की गयी है. सिनेमा की बारीकी देखिए कि न्यूटन  किसी भी तरह से ना आपको भड़काती है और ना ही उकसाती है और ना ही कोई  सवाल उठाती हुई ही दिखाई पड़ती है लेकिन बतौर दर्शकों आप इन सवालों को महसूस करने लगते हैं और कई पक्षों में अपना भी एक पक्ष चुनने लगते हैं. फिल्म का हर दृश्य बोलता है जो कि कमाल है. न्यूटन एक परिपक्व सिनेमा है जो कहानी को नये ढंग से बयान करती है, उम्मीद की जानी चाहिए कि भारतीय सिनेमा का यह काला हास्य दुर्लभ बन कर नहीं रह जायेगा.





Monday, October 2, 2017

“रागदेश” जिसे अनसुना कर दिया गया


जावेद अनीस



उग्र राष्ट्रवाद के इस कानफाडू दौर में राज्यसभा टेलीविजन ने “राग देश” फिल्म बनायी है जो पिछले 28 जुलाई को रिलीज हुई और जल्दी ही परदे से उतर भी गयी. वैसे तो यह एक इतिहास की फिल्म है लेकिन अपने विषयवस्तु और ट्रीटमेंट की वजह से यह मौजूदा समय को भी संबोधित करती है.यह दक्षिणपंथी राष्ट्रवाद के एकांगी संस्करण के बरक्स उस राष्ट्रवाद के तस्वीर को पेश करती है जो समावेशी, सहनशील और एक दूसरे को बर्दाश्त करने वाला है और इसकी जड़ें भारत के स्वाधीनता आन्दोलन में हैं, दुर्भाग्य से आज यह निशाने पर है. कुछ अपनी सीमाओं और दर्शकों के उदासीनता के चलते “राग देश” बॉक्स आफिस पर खास असर नहीं दिखा सकी. लेकिन “राग देश” जैसी फिल्म का बनना और उसका देशभर के सिनेमाघरों में रिलीज होना ही अपने आप में कम महत्वपूर्ण नहीं है. फिल्म के मूल विषयवस्तु देशभक्ति है इसके बावजूद भी यह कोई शोर-शराबे वाली प्रोपेगेंडा फिल्म नहीं है. यह हमारे सामने देशभक्ति और राष्ट्रवाद का बहुत ही सीधे और सरल तरीके पेश करती है और निष्पक्ष तरीके से इतिहास का पाठ पढ़ाती है.

राज्य सभा टीवी इससे पहले ‘भारतीय संविधान’ के निर्माण को लेकर एक सीरिज बना चूका है जो हमारा संविधान कैसे बना और इसको लेकर किस तरह के बहस-मुहाबसे हुए को बहुत खूबसूरती के साथ बयान करता है. इस सीरिज का निर्देशन श्याम बेनेगल ने किया था. राज्य सभा टीवी ने इस बार हमारी आजादी के आन्दोलन के एक ऐसे अध्याय को फिल्म के रूप में पेश किया है जिसका जिक्र अपेक्षाकृत कम होता रहा है. “रागदेश” आजाद हिन्द फौज और इसके तीन जाबांज अफसरों कर्नल प्रेम सहगल, कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लन और मेजर जनरल शाह नवाज खान के लाल किले में हुए मशहूर ट्रायल की कहानी है. फिल्म के शुरुआत में परदे पर लिखा आता है कि यह फिल्म सत्य घटनाओं पर आधरित है. अफवाहों और सोशल मीडिया पर एंटी सोशल झूट फ़ैलाने वाले इस दौर में यह एक ऐसी फिल्म है जो इतिहास का सबक देती है. फिल्म का निर्देशन तिग्मांशु धूलिया ने किया है. जो इससे पहले हासिल और पान सिंह तोमर जैसी फिल्मों के लिये चर्चित रहे हैं.

हिन्दुस्तानी की आजादी में लालकिले का प्रतीकात्मक महत्त्व है. 15 अगस्त 1947 को लालकिले पर तिरंगा लहराकर की हमने अपनी आजादी का ऐलान किया था और पीछे सत्तर सालों से हम यही दोहराते आ रहे हैं. आम हिन्दुस्तानी आज़ाद हिन्द फौज और लालक़िले में इसके तीन महानायकों के ख़िलाफ़ चलाये गये मुक़दमे के बारे में कम ही जानता है.

दरअसल दूसरे विश्व युद्ध के समय अंग्रेज सरकार की फौज में शामिल हजारों हिन्दुस्तानी सिपाहियों को अंग्रेजों ने जापान के सामने हार मानते हुए सरेंडर कर दिया था. बाद में इन्हीं में से बड़ी संख्या में सैनिक आजाद हिन्द फौज में शामिल होकर अंग्रेज सेना के खिलाफ लड़े और बाद में पकड़े गए. इन सैनिकों पर इंग्लैंड के राजा के खिलाफ लड़ने का आरोप लगाया गया. कैप्टन शाहनवाज़, कर्नल ढिल्लन और कर्नल प्रेम सहगल ऐसे ही तीन फौजी अफसरों थे जिनपर दिल्ली में मुकदमा चलाया गया था जो इतिहास में “रेड फोर्ट ट्रायल” नाम से दर्ज है. इस मुक़दमे की वजह से ही नेता जी की नीतियों और आजाद हिन्द फ़ौज की बहादुरी के किस्से देश के कोने कोने में फैला था. 2 घंटा 17 मिनट की यह फिल्म इतिहास के पन्नों को खोलते हुये इसी कहानी को बयां करती है और साथ में हमें मौजूदा समय के लिए कुछ जरूरी सबक भी देती जाती है.

यह अलगअलग सुरों के राग बनाने की भी कहानी है. दरअसल फिल्म के तीनों मुख्य किरदार भारत की विविधता का प्रतिनिधित्व है जिनकी “देश” की एक सामूहिक परिकल्पना है जिसके लिये वे सांझी लड़ाई लड़ते हैं. इनमें एक हिन्दू, दूसरा मुस्लिम और तीसरा सिख है. कर्नल प्रेम सेहगल, मेजर जनरल शाह नवाज खान और लेफ्टिनेंट कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों की लड़ाई विविधताओं से भरे भारत की सामूहिक लड़ाई है, वे सांझे भविष्य के लिये लड़ते हैं. फिल्म के अंत में एक सीन है जिसमें दिखाया गया है लोगों के हाथ में हरा, भगवा कई तरह के झंड़े है लेकिन इनमें एक झंडा सबसे बड़ा और ऊँचा है यह तिरंगा है जिसके साए में सभी आस्थायें और विचार फल फूल रहे हैं.

फिल्म में रिसर्च वर्क बेहतरीन है और इसपर मेहनत की गयी है, तथ्यों को बहुत बारीकी से समेटा गया है. लेकिन एक फिल्म के लिये सिर्फ जानकारियाँ ही काफी नहीं है. सिनेमा की अपनी अलग भाषा होती है जो यहाँ कमजोर है. इसके चलते फिल्म कई जगह सुस्त और सपाट नजर आती है. कहानी को और बेहतर तरीके से कहा जा सकता था. यह एक बेहतरीन फिल्म हो सकती थी अगर इसकी तारतम्यता पर भी ध्यान दिया जाता. इन कमजोरियों के बावजूद अपने अनछुए विषय और मिजाज की वजह से यह फिल्म देखने लायक है. यह हमें ना सिर्फ इतिहास का सबक देती है बल्कि इतिहास को प्रस्तुत करने और राष्ट्रवाद व देशभक्ति को समझने का नजरिया भी देती है जो मौजूदा समय में हमारे लिए बड़े काम का हो सकता है.



Saturday, September 23, 2017

आजाद भारत में सामजिक भेद


जावेद अनीस



अपने आजादी के 71वें साल में जून की एक आधी रात को संसद के सेंट्रल हॉल में बुलाये गये एक  विशेष सत्र में इस बात की आधिकारिक घोषणा कर दी गयी है कि भारत “एक बाजार” हो गया है,वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) की लॉन्चिंग के दौरान दिये गये अपने भाषण में प्रधानमंत्री ने दावा किया कि “जीएसटीए केवल कर सुधार नहीं बल्कि आर्थिक सुधार के साथ सामाजिक सुधार का भी प्लेटफॉर्म है”. यह अलग से बहस का मुद्दा हो सकता है कि जीएसटी से कौन सा सुधार और किसका भला होने वाला है लेकिन इस बात में कोई सन्देह नहीं है कि आजादी के करीब सात दशक बीत जाने के बावजूद जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न की जड़ें अभी भी बदस्तूर कायम हैं. इस दौरान इस देश ने कई अमूलचूल परिवर्तन देखे हैं, राज्य,समाज और अर्थव्यवस्था का पूरा नक्शा ही बदल चूका है, लेकिन जाति व्यवस्था एक ऐसी बला है जिस पर इन तमाम परिवर्तनों के कोई खास असर देखने को नहीं मिलता है, जाति संरचना ने इन तमाम  बदलावों के साथ सामंजस्य बैठाते हुए अपने मूल प्रकृति को कायम रखा है और आज भी पूरे भारतीय समाज पर हावी है. दरअसल भारत में दलितों के उत्पीड़न का सदियों पुराना इतिहास है और यही वर्तमान भी है.

बाबा साहेब अम्बेडकर ने बहुत पहले ही बता दिया था कि “जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता नहीं हासिल करलेते,कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है वो आपके लिये बेमानी है”. लेकिन दुर्भाग्य से हमारे समाज में महात्मा फुले और बाबा साहेब अंबेडकर के बाद कोई ऐसा बड़ा समाज सुधारक सामने नहीं आया जो जाति के विनाश की बात करता हो, सामाजिक मुक्ति की सारी लड़ाई “पहचान”, “चुनावी गणित”  और “आरक्षण” जैसे मुद्दों तक सिमट गयी है.  नतीजे के तौर पर हम देखते हैं कि 21वीं सदी में आर्थिक रूप से तेजी से आगे बढ़ रहा भारत सामाजिक रूप से अभी भी सदियों पीछे है. देश की कुल आबादी करीब 17 प्रतिशत दलित आज भी समाज में छुआछूत हर स्तर पर भेदभाव, हिंसा और उत्पीड़न सहने को मजबूर हैं. नये भारत के निर्माण के आहटों के बीच उनकी मायूसी और भय और बढ़ गयी है.

ह्रदय प्रदेश के अभागे

·        सितम्बर 2010 की घटना है मुरैना जिले के मलीकपूर गॉव में एक दलित महिला ने ऊँची जाति के व्यक्ति के कुत्ते को रोटी खिला दी थी जिस पर कुत्ते के मालिक का कहना था कि एक दलित द्वारा रोटी खिलाऐ जाने के कारण उसका कुत्ता अपवित्र हो गया है. बाद में गॉव के पंचायत ने सजा के तौर पर दलित महिला को उसके इस ‘‘जुर्म’’के लिए 15000रु दण्ड़ का फरमान सुना दिया गया.

·        मार्च 2015 की घटना है, शिवपुरी जिले के कुवारपुर गाँव में कुसुम जाटव नाम की दलित महिला अपने गांव की उप सरपंच चुनी गई थीं, एक दलित महिला का उप सरपंच चुना जाना गांव के दबंग जातियों  को अच्छा नहीं लगा और इसके  उन्होंने  ने सिर्फ कुसुम की परिवार को बुरी तरह पीटा बल्कि कुसुम को गोबर खाने के लिए मजबूर भी किया.


·        जुलाई 2016 की घटना, मुरैना ज़िले में एक दलित की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी जाती है क्योंकि उसने एक सांप को मार डाला था.

·        जनवरी 2017 की घटना, मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ में बच्चों ने मिड डे मील खाने से सिर्फ इसलिए इनकार कर दिया क्योंकि खाना बनाने वाली महिला दलित थी.बच्चों का कहना था कि वो किसी नीची बिरादरी की महिला के हाथ का बना खाना नहीं खा सकते.


·        अप्रैल 2017 की घटना, आगर मालवा जिले के माना गांव जहाँ दलितों को बारात का स्वागत करने के लिए सिर्फ ढोलकी अनुमति है. लेकिन आजादी के बाद पहली बार जब एक दलित परिवार की शादी में बैंड बाजे के साथ बारात निकालने की हिम्मत की गयी  तो इसके लिए प्रशासन को तीन थानों की पुलिस लगानी पड़ी. लेकिन बाद में उन्हें इसका खामियाजा भुगतना पड़ा दबंग जाति के लोगों द्वारा दलितों के उस कुंए में मिट्टी का तेल मिला दिया जिसके पानी इस्तेमाल वे पीने के लिये करते थे.

मध्य प्रदेश को अमूमन शांति का टापू कहा जाती है, लेकिन शायद इसकी वजह यहाँ प्रतिरोध का कमजोर होने है. दरअसल मध्यप्रदेश में सामंतवाद और जाति उत्पीड़न की जड़ें बहुत गहरी हैं. यह सूबा वंचित समुदायों के उत्पीड़न के मामलों में कई वर्षों से लगातार देश के शीर्ष राज्यों में शामिल रहा है. नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) और अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ मैरिलैंड द्वारा किये गये एक स्टडी के अनुसार छुआछूत को मानने के मामले में मध्य प्रदेश पूरे देश में शीर्ष पर है. सर्वे के अनुसार मध्य प्रदेश में 53 फीसद लोगों ने कहा कि वे छुआछूत को मानते हैं, चौंकाने वाली बात यह रही की उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे प्रदेश भी इस सूची में मध्य प्रदेश से पीछे है. आज भी सूबे के ग्रामीण क्षेत्रों में बाल काटने से मना कर देना, दुकानदार द्वारा दलितों को अलग गिलास में चाय देना, शादी में घोड़े पर बैठने पर मारपीट करना, मरे हुए मवेशियों को जबरदस्ती उठाने को मजबूर करना आदि जैसी घटनाऐं बहुत आम हैं.

2014 में गैर-सरकारी संगठन दलित अधिकार अभियान द्वारा जारी रिपोर्ट जीने के अधिकार पर काबिज छुआछूतसे अंदाजा लगाया जा सकता है कि मध्यप्रदेश में भेदभाव की जड़ें  कितनी गहरी हैं. मध्यप्रदेश के 10 जिलों के 30 गांवों में किये गये सर्वेक्षण के निष्कर्ष बताते हैं कि इन सभी गावों में लगभग सत्तर प्रकार के छुआछूत का प्रचलन है ,भेदभाव के कारण लगभग 31 प्रतिशत दलित बच्चे स्कूल में अनुपस्थित रहते हैं. इसी तरह से अध्यन किये गये स्कूलों में 92 फीसदी दलित बच्चे खुद पानी लेकर नहीं पी सकते, क्योंकि उन्हें स्कूल के हैंडपंप ओर टंकी छूने की मनाही है जबकि 93 फीसदी अनुसूचित जाति के बच्चों को आगे की लाइन में बैठने नहीं दिया जाता है,42 फीसदी बच्चों को  शिक्षक जातिसूचक नामों से पुकारते हैं,44 फीसदी बच्चों के साथ गैर दलित बच्चे भेदभाव करते हैं,82 फीसदी बच्चों को मध्यान्ह भोजन के दौरान अलग लाइन में बिठाया जाता है.

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के हालिया आकड़ों पर नजर डालें तो 2013 और 2014 के दौरान मध्यप्रदेश दलित उत्पीड़न के दर्ज किये गए मामलों में चौथे स्थान पर था. 2015 में भी यह सूबा  पांचवें  स्थान पर बना रहा. यह तो केवल दर्ज मामले हैं गैरसरकारी संगठन “सामाजिक न्याय एवं समानता केन्द्र” द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार  प्रदेश में दलित उत्पीड़न के कुल मामलों में से 65 प्रतिशत मामलों के एफ.आई.आर ही नहीं दर्ज हो पाते हैं. दूसरी तरह मामलों में से केवल 29 फीसद दर्ज मामलें में ही सजा हो पाती है.  

दूसरी तरफ अगर समुदाय की तरफ से इसका प्रतिरोध होता है तो उसे पूरी ताकत से दबाया जाता है. 2009 में नरसिंहपुर जिले के गाडरवारा में अहिरवार समुदाय के लोगों ने सामूहिक रूप से यह निर्णय लिया था कि वे मरे हुए मवेशी नहीं उठायेंगें क्योंकि इसकी वजह से उनके साथ छुआछूत व भेदभाव का बर्ताव किया जाता है. लेकिन दबंग जातियों को उनका यह फैसला रास नहीं आता है और इसके जवाब में करीब आधा दर्जन गावों में पूरे अहिरवार समुदाय पर सामाजिक और आर्थिक प्रतिबंध लगा दिया जाता है ,उनके साथ मार-पीट की जाती है और उनके सार्वजनिक स्थलों के उपयोग जैसे सार्वजनिक नल, किराना की दुकान से सामान खरीदने, आटा चक्की से अनाज पिसाने, शौचालय जाने के रास्ते और अन्य दूसरी सुविधाओं के उपयोग पर जबर्दस्ती रोक लगा दी गई जाती है.

पिछले फरवरी में ग्वालियर की एक घटना है जहाँ अंबेडकर विचार मंच द्वारा 'बाबा साहेब के सपनों का भारतविषय पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था जिसमें जेएनयू के प्रो.विवेक कुमार भाषण देने के लिए आमंत्रित किये गये थे. इस कार्यक्रम में हिन्दुवाद संगठनों के कार्यकर्ताओं ने अंदर घुस कर हंगामा किया. इस दौरान कई लोग चोटिल भी हुए.

राजनीतिक रूप से कमजोर ताकत  
मध्यप्रदेश देश उत्तर भारत का एक ऐसा राज्य है जहाँ सामाजिक न्याय की राजनीति अपनी जड़ें नहीं जमा सकी हैं .दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों की पर्याप्त आबादी होने के बावजूद उनकी कोई अलग राजनीतिक पहचान नहीं बन सकी है और ना ही यूपी बिहार की तह यहाँ कोई तीसरी धारा ही पनप सकी है. आज भी सूबे पूरी राजनीति कांग्रेस और भाजपा के बीच सिमटी है. इन दोनों पार्टियों ने प्रदेश के दलित और  आदिवासी समुदाय में कभी राजनीतिक नेतृत्व उभरने ही नहीं दिया और अगर कुछ उभरे भी तो उन्हें आत्मसात कर लिया. एक समय फूल सिंह बरैया जरूर अपनी पहचान बना रहे थे लेकिन उनका प्रभाव लगातार कम हुआ है. ओबीसी समुदायों की भी कमोबेश यही स्थिति है यहाँ से सुभाष यादव, शिवराज सिंह चौहान और उमा भारती जैसे नेता निकले जरूर. चौहान व भारती जैसे नेता सूबे की राजनीति में शीर्ष पर भी पहुचे हैं लेकिन यूपी और बिहार की तरह उनके उभार से पिछड़े वर्गों का सशक्तिकरण नहीं हुआ है .इस तरह से प्रदेश में आदिवासी, दलित और ओबीसी की बड़ी आबादी होने के बावजूद यहां की  राजनीति पर पर इन समुदायों का कोई ख़ास प्रभाव देखने को नहीं मिलता है. यही वजह है कि जाति उत्पीड़न की तमाम घटनाओं के बावजूद ये राजनीति के लिए कोई मुद्दा नहीं बनता है.

सामाजिक आजादी का कठिन रास्ता
हम ने जाति उत्पीड़न के खिलाफ कानून तो बहुत पहले बना लिया था लेकिन ये नाकाफी है क्यूंकि इसकी जड़ें तो पूरे समाज में हैं और समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी मनु के बनाये गये कानूनों को बड़ी गंभीरता से अमल कर रहा है और इसके लिये मरने-मारने पर आमादा है. बाबा साहेब अंबेडकर जाति आधारित उत्पीड़न और भेदभाव के लिए जाति व्यवस्था को जिम्मेदार मानते थे, उनका कहना था कि राजनीतिक रूप से आजाद होने के बावजूद भारतीय दो अलग-अलग विचारधाराओं संचालित हैं एक तो राजनीतिक आदर्श है जो संविधान के प्रस्तावना में इंगित हैं और जिसमें स्वतंत्रता, समानता, और भाई -चारे जैसी बातें है और दूसरी तरफ धर्म आधारित सामाजिक आदर्श हैं जिनका इन मूल्यों से टकराहट है.
दुर्भाग्य से आज पूरे भारतीय समाज में ऐसी कोई राजनीतिक-सामाजिक ताकत नहीं है जो जाति-विहीन समाज की बात करती हो. आजादी के सत्तर साल बाद भी हमें ऐसे नेतृत्व का इंतेजार है जो किसी आधी रात को संसद के सेंट्रल हॉल में विशेष सत्र बुलाकर जाति मुक्त भारत का आह्वान करे.