09/01/2011 - 10/01/2011 - रूबरू

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Monday, September 19, 2011

संकटों के भँवर में फँसा पूँजीवाद

September 19, 2011 0
संकटों के भँवर में फँसा पूँजीवाद

                सितंबर 01 याद रहा सितंबर 07 भूल गए

इंग्लैंड के युवाओं का आक्रोश दंगों के रूप में फूट रहा है तो ग्रीस, स्पेन, पुर्तगाल, आयरलैंड, इटली की सरकारें और अर्थव्यवस्थायें संकट के इस अंधड़ में अस्थिर हो रही हैं। खुद अमरीका को अपनी रोजमर्रा की अदायगियों के लायक पैसा जुटाने में दिक्कत हो रही है। डैमोक्रेट राष्ट्रपति ओबामा को रिपब्लिकन पार्टी के आगे घुटने टेककर ऐसी शर्तें कबूल करनी पड़ी हैं जिनकी वजह से खुद उनके शब्दों में च्च्अमरीका का घरेलू खर्च आइजनहावर के 1950 के जमाने के निम्रतम स्तर तक पहुंच जायेगा।
पंकज मेघ
अमरीकी मीडिया और उसके समूह गायकों ने 11 सितंबर के आतंकी हमले की 10वीं सालगिरह जिस शोकमग्र आक्रामकता से भरे वृंदगान के रूप में गाई, उसे लेकर खुद यूरोप के अनेक अखबारों ने याद दिलाया है कि इसमें कहीं उन लाखों (इस बीच अकेले ईराक में अमरीकी हमले से एक लाख नागरिकों की मौतें हुई है) निर्दोषों का भी जिक्र किया जाना चाहिए था, जो आतंक के खिलाफ युद्ध के बहाने हुई अमरीकी प्रतिहिंसा में बिना किसी कसूर के मारे गए।
यूं तो भारत नहीं तो कम से कम म0प्र0 के अखबारों को कहीं न कहीं भोपाल गैस कांड का उल्लेख करना चाहिए था। यहां अमरीकी कंपनी के अपराध का शिकार हुए लोगों की तादाद न्यूयॉर्क के वल्र्ड ट्रेड सेंटर टावर्स में मारे गए लोगों की तीन हजार की संख्या से कहीं अधिक है। कई अखबारों की राय में 11 सितंबर 2001 के बाद अमरीका अब पहले जैसा अविजयी, निश्चिंत, धनाढ्य, आत्ममुग्ध, बौराया अमरीका नहीं रहा। एक डरा हुआ, घबराया सा असुरक्षित अमरीका बनकर रह गया है।
11 सितंबर के इस कोरस में मीडिया ने उस असली व ज्यादा गहरे संकट का जिक्र तक नहीं किया, जिसके कारण सर्वशक्ति संपन्न अमरीका और उसके शक्तिशाली यूरोपीय क्षत्रप सूखे पत्तों की तरह कांप रहे हैं। क्या यह सिर्फ भूल से हुई अनदेखी या चूक थी? या आर्थिक विफलता के हाथी को श्रद्धांजलि के फूलों से ढांपने की बचकानी कोशिश? चार साल पहले 2007 में इसी सितंबर के महीने में अमरीका की बैंक, बीमा कंपनियां और बड़े उद्योग समूह भरभरा कर गिर पड़े थे। एक के बाद एक पिटे दिवालों की श्रंखला ने सिर्फ अमरीका ही नहीं पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को अब तक के सबसे जटिल व विराट आर्थिक संकट की भंवर में फंसा दिया था। यह संकट इस दौरान काबू में आना तो दूर अपने नए आयामों के साथ पूरे यूरोप पर मंडरा रहा है। शुतुरमुर्ग की तरह आंख मूंद लेने से खतरे नहीं टलते। मगर जिस तरह इस संकट के शुरू होने के एक वर्ष बाद तक अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष (आई एम एफ) ने ऐसे किसी संकट की संभावना तक से इन्कार करना जारी रखा था। अमरीकी वित्तमंत्री व अमरीकी संघीय बैंक के प्रमुख एक साल बाद तक सिर्फ च्च्थोड़ी सी समस्याओंज्ज् की बात कर रहे थे। ठीक उसी तरह सितंबर 2011 में भी, चार साल बाद भी, इनमें से कोई भी इस आर्थिक झमेले के बारे में मुंह खोलने को तैयार नहीं है।
सिर्फ याद ताजा करने के लिए बता दें कि इस संकट की शुरूआत, जिनके बारे में सोचा तक नहीं जा सकता था उन महाकाय कंपनियों के दिवालिया हो जाने से हुई थी। बीयर स्टर्न, फ्रैडी मैक, फैनी मेई, लेहमान ब्रदर्स, सिटी बैंक जैसी कई कई देशों के इकट्ठा वार्षिक बजटों से ज्यादा बजट वाली कंपनियों का दिवाला पिट गया था। इन्हें बचाने के लिए अमरीकी सरकार ने अपने खजाने को उड़ेल कर रख दिया था। तुरत फुरत 160 अरब डॉलर इनके घाटे के समुद्र को पाटने के लिए डाले गए। कुछ ही महीने बाद अमरीकी प्रशासन 750 अरब डालर का बेल आउट पैकेज लेकर आया। अकेले ए आई जी नाम की निजी बीमा कंपनी के कोष में 350 अरब डालर उडेल दिए गए। मगर क्या कोई निर्णायक फर्क पड़ा? नहीं। उस वक्त खुद अमरीकी राष्ट्रपति ने इन कंपनियों के डायरेक्टरों के लालच को कोसा था और अफसोस जताया था कि बेल आउट पैकेज के पैसे से कंपनियों का पुनरोद्धार करने की बजाय इन डायरैक्टरों ने बोनस और बढ़े हुए भत्तो के नाम पर लाखों डालर खुद हड़प लिए।
मामला सिर्फ डायरैक्टरों (या पूंजीपतियों) के लालच या कुप्रबंध का नहीं था। समस्या खुद पूंजीवाद की थी। संकट व्यवस्थापकों की अदूरदर्शिता के कारण नहीं जन्मा था-इसे खुद व्यवस्था ने जन्म दिया था। लिहाजा अरबों खरबों डालर सरकारी पैसा (असल में जनता का पैसा) उड़ेलने के बाद भी तलहटी सूखी की सूखी रही, व्यवस्था का धरातल चटकता रहा, रोजगार और इंसानियत को निगल लेने वाला दलदल फैलता रहा।
इंग्लैंड के युवाओं का आक्रोश दंगों के रूप में फूट रहा है तो ग्रीस, स्पेन, पुर्तगाल, आयरलैंड, इटली की सरकारें और अर्थव्यवस्थायें संकट के इस अंधड़ में अस्थिर हो रही हैं। खुद अमरीका को अपनी रोजमर्रा की अदायगियों के लायक पैसा जुटाने में दिक्कत हो रही है। डैमोक्रेट राष्ट्रपति ओबामा को रिपब्लिकन पार्टी के आगे घुटने टेककर ऐसी शर्तें कबूल करनी पड़ी हैं जिनकी वजह से खुद उनके शब्दों में च्च्अमरीका का घरेलू खर्च आइजनहावर के 1950 के जमाने के निम्रतम स्तर तक पहुंच जायेगा।ज्ज्
जो निदान ढूंढे जा रहे हैं वे मौजूदा रोग से ज्यादा खतरनाक हैं। इस संकट से बाहर निकलने के ये कथित उपाय और कुछ नहीं, एक नए और ज्यादा बड़े संकट को न्यौता देना है। सिर्फ दो उदाहरणों (अमरीका व ग्रीस) से इसे समझा जा सकता है। हाल के भुगतान संकट से उबरने के लिए राष्ट्रपति ओबामा ने टी पार्टी गिरोह के एजेंडे पर चलने वाली रिपब्लिकन पार्टी के साथ जो सौदा किया है, उसके मुताबिक अगली 10 वर्षों में सरकारी खर्च (जन सुविधाओं के लिए किए जाने वाले खर्च) में करीब ढाई ट्रिलियन डॉलर (ढाई लाख करोड़ डालर) की कटौती की जायेगी। नौ सौ अरब डालर सीधे जनता के खर्च (सामाजिक सुरक्षा व मेडिकल सहायता) में से काटे जायेंगे। इसी के साथ अगले 10 वर्षों तक रईसों पर किसी भी तरह का टैक्स नहीं लगाया जायेगा। इसका अर्थ यह है कि इस घाटे की पूर्ति के लिए डेढ़ लाख करोड़ डालर और जुटाने होंगे। अब चूंकि रईसों पर टैक्स नहीं लगना है लिहाजा जनता से ही इन्हें वसूला जायेगा। दूबरे के लिए दो दो आषाढ़। यह भारी कटौतियां आर्थिक गतिविधियों का और संकुचन करेंगी। जरा सोचिए, जिस अमरीका में बेरोजगारी 9.2 प्रतिशत की ऊंचाई और विकास दर 1.3 प्रतिशत की नीचाई पर हो-वहां इस समाधान के क्या असर होने वाले हैं!!
लगभग दीवालिया हो जाने की कगार पर जा पहुंचे ग्रीस को आई एम एफ ने कुल 110 अरब डालर का बेल आउट पैकेज देने की जो कीमत वसूली है उसे देखकर निर्मम से निर्मम सूदखोर शरमा जाये। इस पैकेज के मुताबिक फिलहाल ग्रीस को 17 अरब डालर मिलेंगे। जिसकी एवज में उसे अपने खर्च में 14 अरब डालर की कटौती करनी पड़ेगी, 14 अरब डालर के नए टैक्स (रईसों पर नहीं) लगाने होंगे और अगली 4 वर्षों में सरकारी संपत्ति बेचकर 50 अरीब डालर जुटाने होंगे। यह कड़वी जानलेवा खुराक उस ग्रीस को दी जा रही है जहां कुल 110 लाख की आबादी है और इसमें से 855,719 बेरोजगार हैं।
अमरीका और यूरोप में इस संकट से उबरने के समाधान जिस नुस्खे पर आधारित हैं वह सार्वजनिक खर्च में कटौती, वेतन जाम, वेतन में कटौतियां, रिटायरमेंट की उम्र बढ़ाने पर टिका है। इसका मतलब है जनता की खरीदने की ताकत का और सिकुडऩा, रोजगार का घटना। नए रोजगार पैदा न हो और आर्थिक अस्थिरता के चलते निजी निवेशों का ठहर जाना। इस तरह यह चौबे जी का छब्बै बनने के लिए निकलना है और निर्वेदी होकर लौट आना।
कोई और समझे या न समझे इस अवश्यंभावी तूफान की भयानकता को पूंजीपतियों का एक हिस्सा जरूर समझ रहा है। यही वजह है कि दुनिया के सबसे रईस व्यक्ति वारेन बफेट ने खुद अपने सहित रईसों से ज्यादा टैक्स वसूलने की पेशकश करके एक नई ध्यान बंटाऊ बहस छेड़ दी है। फ्रांस के निजी उद्योगों के महासंघ के अध्यक्ष लेवी सहित फ्रांस के 16 सबसे धनी व्यक्तियों ने संयुक्त हस्ताक्षर के साथ इसी तरह की अपील जारी की है। जर्मनी के 50 सबसे धनाढ्य लोगों और इटली में फैरारी कंपनी के मुखिया ने इस पेशकश की हिमायत की है। यह खैरात ऐसे ही नहीं बंट रही है। इसके पीछे एक बड़ा कारण है। आर्थिक अस्थिरता के चलते चूंकि निजी निवेश रूका हुआ सा है इसलिए बाजार में जान डालने का एक ही रास्ता सरकारी निवेश बढ़ाये जाने का बचता है। सरकारी निवेश की फायर ब्रिगेड में अपने टैक्सों की दो दो बाल्टियां डालकर चंद पूंजीपति इस फैलती आग को बुझाने या काबू में रखने का मंसूबा साध रहे हैं। मगर क्या इससे समस्या सुलझेगी?
भारत के पूंजीपति इस दिखावटी आहुति के लिए भी तैयार नहीं हैं? जी डी पी के अनुपात में दुनिया में सबसे कम प्रत्यक्ष कर भारत में है। बमुश्किल 3 फीसदी लोग इन्कम टैक्स रिटर्न फाइल करते हैं। इनमें से भी बहुतेरे वेतन भोगी कर्मचारी हैं। भारतीय कारपोरेट घराने जो आबादी का 0.1 प्रतिशत भी नहीं है 20 प्रतिशत राष्ट्रीय आमदनी पर कब्जा किए बैठे हैं।
आधी से ज्यादा देश की आबादी की कुल आमदनी से ज्यादा उनकी आमदनी है। इन पर टैक्स कितना है? एक बड़ी कंपनी का एम डी या मालिक वेतन भत्तों के रूप में यदि 30 करोड़ रूपये लेता है तो डिविडेंड्स के रूप में उसकी आमदनी एक हजार करोड़ रूपये होती है। डिविडेंड्स की आय पर कोई टैक्स नहीं है। लिहाजा 1030 करोड़ रूपये की आमदनी के बाद इस भद्र पुरूष को मात्र 10 करोड़ रूपये (0.01 प्रतिशत) ही टैक्स चुकाना पड़ता है। यह भी कागजी हिसाब किताब है। असल में तो इसकी भी चोरी होती है। तकरीबन ढाई लाख करोड़ रूपयों की टैक्स अदायगियां दाबे बैठा है भारतीय कारपोरेट कुनबा। इसके अलावा किसी न किसी बहाने कुल 5 लाख करोड़ रूपये की टैक्स रियायतें अलग हैं। इसमें काला धन और जोड़ दीजिए और फिर अंदाजा लगाइये कि कितना पैसा हुआ?
जड़ की बीमारी की दवा पत्तों और कोंपलों में तलाशने से काम नहीं चलने वाला। सदिच्छाओं और सद्वचनों का कलमा पढऩे से जिबह करने वाली छुरी फूल में नहीं बदलती। जनता की बात अलग रही, पूंजीवाद के पास खुद अपनी हिफाजत करने का कोई समाधान नहीं है।
यही वजह है कि अमरीकोन्मुखी मीडिया को 11 सितंबर 2001 तो याद रहता है, सितंबर 2007 को भूलना ही उसे श्रेयकर लगता है।
 http://www.lokjatan.com से साभार 

Saturday, September 17, 2011

शेर और बकरी (लधु कथा )

September 17, 2011 0
शेर और बकरी (लधु कथा )

अशोक भाटिया

हा जाता है कि हमारे देश में कभी शेर और बकरी एक घाट पर पानी पीते थे। इसमें हालांकि कई पेच हैं। एक सवाल यह उठता है कि जिस घाट पर वे इकट्ठा पानी पीते थे वहॉ दोनों में से पहले कौन आता था ?

यह सवाल मैने अपने एक साथी से पूछा, तो वह बोला तुम भी अजीब हो। पहले तो बकरी आयेगी, तभी तो उसे देखकर शेर आयेगा?’

प्रश्न यह है कि ऐसी क्या मजबूरी थी कि शेर और बकरी एक घाट पर पानी पीते थे ? इन्सानों ने अपनी जाति के हिसाब से अलग अलग कुंओं की सुविधा बना रखी थी पर पशु जगत के साथ यह अन्याय क्यों? क्योंकि पशु समाज मनुष्य जगत की नकल नही करता।

भरपेट मांस खाकर शेर पानी की तलाश में निकल पड़ा। भटकता हुआ वह जंगल से बाहर निकल आया। थोड़ी दूर पर एक कस्बा था, शेर उधर ही चल पड़ा। कस्बे के बाहर कुछ बकरियॉ एक घाट पर पानी पी रही थी। शेर ने कुछ देर प्रतीक्षा करना ठीक समझा। पानी पीकर सारी बकरियॉ तो चल पड़ी सिर्फ एक बकरी रह गई।
शेर चुपके से उसके निकट आकर बोला थोड़ा सा पानी मै भी पी लूं ?’

बकरी ने सोचा मुझे इतना महत्व दे रहा है। इतना तो चुनावों में उम्मीदवार भी जनता को नही देता।उसने आंख झपकाकर स्वीकृति दे दी, हालांकि घाट उसका नही था। इस प्रकार शेर ने शिकार  के लिए नये घाट पर अपनी जगह बनाई।

आखिरकार युग बदला। केबल संस्कृति ने पाव पसारे। एक लोकप्रिय चैनल का एक फोटोग्राफर उस दृष्य की खोज में निकल पड़ा,जिसमें शेर और बकरी एक घाट पर पानी पीते हों। कई दिन तक वह मारा मारा फिरता रहा।
आखिरकार वह एक छोटे से कस्बे के बाहर पहुंचा। वहॉ एक बकरी एक घाट पर पानी पी रही थी और  एक शेर घाट के निकट पहुंच रहा था। ज्योंही शेर ने अपना मुंह पानी में डाला, फोटोग्राफर ने तुरंत फोटो खींच ली। 

मौका पा कर बकरी तो वहॉ से खिसक ली पर फोटोग्राफर से नही रहा गया। उसने शेर से पूछा बकरी
को इतने निकट पा कर भी आपने उसका शिकार  क्यों नही किया?’

शेर ने मीड़िया को महत्व देते हुए कहा, ‘ यह बकरी अभी जाकर अपनी सहेलियों से मेरी उदारता का गुणगान करेगी। इस प्रकार ये बकरियॉ मेरी एफ-डी (फिक्स डिपाजिट) हो गई हैं।

फोटोग्राफर चलते चलते इस सच्चे इतिहास पर चिंतन करने लगा। उसने कैमरे से वह रील निकालकर फेंक दी। 

Monday, September 5, 2011

The Politics of the Anna Hazare Anti-Corruption Movement

September 05, 2011 0
The Politics of the Anna Hazare Anti-Corruption Movement



The Politics of the Anna Hazare Anti-Corruption Movement
                                                                              -Sanjay Kumar

Sonia Gandhi Hinsak Hai
Rahul Gandhi Napunsak Hai
(palcard displayed by a young man on Barakhamba road crossing, during anti-corruption march on 21st August, Delhi)

Rahul Bhaiyya! Why don’t you get married so that Bhabhi can take care of Sonia Aunty, and you do not have to spend so much (black) money to get her treated outside the country? (placard carried by a three year old girl child)

Manuvadi Krantikari Morcha supports Anna Hazare
(a banner heading for a group of 20-30 middle aged men)

Bihari Nahin Ham Jaat hain
Ham Anna ke saath hain
(shout of youth in open jeep in Darya Ganj, after the 21st Aug march)

Gems like these in public space are not likely to be reported by the media. But they graced the rally, and its aftermath, on the 21st August in support of Anna Hazare fast, without anyone in the crowd showing visible displeasure against them. Signs and slogans of this ilk were in minority, and the claim here is certainly not that these represent the core of Anna movement. It was obvious during the rally that a virulent, sexist, castiest and openly patriarchal fringe was trying to make its presence felt in the Anna gathering, which undoubtedly attained a mass character. It is true that the movement against corruption led by Anna Hazare and associates has exploded much beyond expectations of its leadership. The Anna Team has been too preoccupied by its confrontation with the government to put its mind to the desirability of any limits to the permissibility for the open mass it has galvanized. Movement’s spontaneity and open character is its strength. It is snow balling because many social groups are joining it without feeling inhibited by its agenda. Further, the leadership of the movement is on record, in numerous interviews after Sadhvi Rithambra had addressed the anti-black money protest of Baba Ramdev, that as long any one agrees with their anti-corruption stand they do not mind them in their movement. Is the presence of sexist, and castiest elements merely a reflection of the openness of the Anna movement? The question can as well be turned around. Why do such elements feel emboldened enough to come out openly in the Anna movement? Or, why there are no slogans or posters from trade unions and other oppositional progressive groups, and no picture of Ambedkar, which graces the public presence of almost all Dalit groups? Anna Hazare movement resonates deeply with the ‘soul’ of its core constituency of upper caste Hindu middle classes. That is the reason of its phenomenal success. It flows so smoothly into, and draws out these sections so wholesomely, that the deeply ingrained castiesm, communalism, and sexism of these classes is bound to manifest itself now and then, even though the espoused agenda of the movement has no connection with these.

The theme of Anna’s speech on 21st August was sacrifice. He asked his followers to be ready for sacrifice. With the self assurance of a well meaning patriarch he told the crowd that having no immediate family he can sacrifice more, and will not hesitate to even sacrifice his life, but they too should sacrifice, a little bit, for reforming the country. The discourse was mildly (Hindu) religious, demonstrators at houses of MPs were asked to sing bhajans, the Janmashtami next day was also brought in to remind people of Krishna’s fight against evil. Anna sits in front of a giant image of Gandhi, alone on a snow white stage. Symbolism is perfect for a clean image. His tone is sufficiently aggressive, but not shrill, when it comes to warn the government with a deadline, which predictably elicits a thunderous applause. Anna calls his followers to be fighters to get the government to pass the Jan Lok Pal Bill. Messianism of the call is not in the person, but in the message. He has declared that the Jan Lok Pal bill will eradicate 60% to 65% of the corruption. Why this figure, and no others? The hint perhaps is in the fact that in earlier times 60% of marks in an examination stood for the much tried for first class. And, one can’t miss the demeanour of a well meaning school master of yore in Anna. Crowd’s sloganeering demanding Jan Lok Pal bill is hysterical. Magic wand is the image many commentators have used while questioning such calls. That appears far from the reality. Anna’s followers want JLPBill, but realistically only few of them are likely to share the optimism of a glowing corruption free India after its passage. It is a means to protest. It is a lathi to browbeat a government whose legitimacy has hit rock bottom after series of scams. Further, the entire discourse around and conception of the JLPBill accords with the crowd’s sense of right and wrong.  More on it momentarily.

Religion in the current Indian public life is a surrogate for a near absent liberal and secular public morality. Anna’s folksy religious discourse reeks of morality, it presents a straight and easy choice in a good vs evil contest.  It is also apt for his politics of ‘nothing but the JLPBill’. The moral over dose compromises objectivity, and quite simply leads to hyperbole. Claims in the name of 125 crore Indians are rampant. ‘Doosri Azadi’ is another catchy phrase. Hindu public religion in the times of Baba Ramdevs, after the success of cultural nationalist project of the RSS with Hindu upper and middle castes, has become virulent and hatred filled. Notice how many times Ramdev asks for fhansi (hanging) for Afzal Guru and M Ajmal Kasab in his sermons. Anna’s discourse and politics is different from Ramdev, which to an extent explains the difference between the fate of movements led by the two. However, school children protesting for JLPBill in Mumbai, still demand ‘phansi’ for the corrupt. Absolutist morality of a religious kind with a violent and vindictive mindset is called Taliban in another context.  Are Anna’s followers in the so called Indian civil society even aware of such dangers?

A sunshine argument doing the rounds is that Anna’s anti-corruption movement will prove to be healthy for Indian democracy since it has brought the youth and urban middle classes to the politics of the country. Nothing could be further from the truth. Youth in many parts of India, in Kashmir, North-East, Telangana, or in Maoist affected areas, are already in the thick of politics, a politics of the kind that has had, and will have, far deeper affects on their lives, than the politics of the JLKBill gathering at the Ramlila ground of Delhi. The youth of urban middle classes too has often agitated. Just three years ago these youth were on streets against Central Govt proposal to extend reservations to OBC students in institutions of higher learning. Brightest stars of this youth group, students of Delhi IIT had then come on road with brooms, with the aim to tell everybody the shape of their future under reservations. (That protest reconfirmed the common sense of oppressed castes in India that the so called upper castes just do not get what it means to be devalued in caste’s name.) Music bands and film stars had joined anti-reservation protests at Jantar Mantar. Media and internet everyday make a political public of urban middle classes. These are the classes which get to air their opinions on programmes like ‘We the People’. If participation in state politics is meant as access to, and influence over state policies, then the upper caste, urban propertied sections are the most influential of Indian population groups. With the open connivance of University administrations and judiciary upper caste students for the past three years have been garnering seats meant for OBC students. Hence, state money given in the name OBC students has actually facilitated access of upper caste students to higher studies. Only last week did the Supreme Court disallow this flagrant violation of law. Access to all institutions of governance in democratic India, the bureaucratic arm of the executive, the judiciary, the media, except elected bodies, is mediated through money power and social capital, which obviously favours urban middle classes. Elected bodies are the only institutions in whose formation, at least formally, access follows the first democratic principle of equality. Here, urban middle classes have increasingly lost their status as leaders of the nation, the status they enjoyed during the freedom struggle and decades after that. Local processes and social churnings beyond these classes have taken over the electoral politics, failing ambitions of these classes to have ‘people like them’ elected. This failure partially explains the venal disregard of elected politicians by these classes. On the other hand, the rest of Indians keep on electing from the same bunch of corrupt netas¸ often rotating them, but finally from the same bunch, election after election in full gusto. Obviously, electoral politics carries very different, and in fact contradictory, significance for different groups of Indians. For the majority of rural folk and urban poor, elections are mostly the only means to access state, unlike influential classes which use other institutions of governance and public opinion.

Urban middle classes have joined Anna’s anti-corruption movement, not as pure while lilies. Their politics in the anti-corruption campaign is not an empty signifier. Nor is their an alternative form of politics, as some commentators are claiming. They are not a spontaneous agitated mass, all good intentioned, but only now waking from slumber to find their bearing in the morass of Indian politics. Their agitation is of a different kind than the others, mainly from the oppressed groups, we are used to seeing in India. Theirs is actually an agitation of a hegemonic block, which has always enjoyed a ‘passive’ access to state power in democratic India. Anna’s anti-corruption campaign has come at the right moment to address a limited, but very serious crisis of the legitimacy of an elected government. Legitimacy of the hegemonic block of classes ruling India is not in crisis; nor is the state authority being directly challenged. Such crises and challenges are dealt with entirely different set of political tools and tactics. The issue here is not individual choices; nor are possible resolutions to crises like these affected by conspiracies. Anna certainly did not start his campaign with the aim of resolving the legitimacy crisis of government. Nor was it inevitable that crisis will unfold the way it did, with Anna’s campaign enjoying the central space. The legal form of the tool he chose to confront the government with, the JLPBill, and his tatics, eschewing mass mobilization and keeping himself as the main fist of attack, fitted the political needs of urban middle classes well. Even the geographical sense of his assault, rooting himself at a place (Jantar Mantar in April and Ramlila Maidan in August) rather than a roving agitation like a padyatra, fitted the life style of these classes well. You could visit to show your support at your convenience. Anna’s fast was a twenty four hour convenience. The largest rally in Anna’s support on 21st August, one of the largest Delhi has seen in recent history, had many participants driving in their SUVs, widows rolled up, with full AC. Once Anna’s campaign got support of the urban middle classes, the government had to be conciliatory. The contrast with response to Irom Sharmila’s ten year old hunger strike could not me more telling. Anna’s consistency with his demand (some may call it his stubbornness, but credit must be given where it is due ), humiliating an incompetent, and a government too clever for its own good, in one round after another, received increased cheerleading from the crowd. More was the government humiliated, louder were the claps. Government was in no position to call off the bluff, the nature of its rule was such that it sought approval of very classes that bayed for its blood. The game could go on and on, till the crisis of government’s legitimacy worsened to the crisis of state power (government did well in this regard to not use its police force after the first folly of arresting Anna), or the real threats, the riff raffs, the traffic stoppers, usual participants of other kinds of rallies, were not on the scene.

Framing Corruption: The ‘Anna’ Way

Corruption and injustice are both ethically loaded terms. Injustice frames the wrong in a wider canvas, calling deeper ethical concerns. Corruption restricts its framework to the legal. There can be unjust laws, but not corrupt laws. Discourses on injustice often call for changes in social structures which make injustice possible, and inevitable. Their image of just society is often utopian. Anti-corruption discourses on the other hand, move along the safety of a legal scaffolding, their aim is to establish a legal status quo, against a reality vitiated by corruption. In an unjust and corrupt society struggles against corruption and injustice are liberatory . The point however is that, classes with larger stake in the existing social system are more likely to seek change and mobilisation through anti-corruption discourses, than those on injustice. Corruption is a matter of social power, when those holding office use the authority which comes with the office for personal gain against law. What makes corruption ubiquitous like now in India is not just the desire on the part of the corrupt to gain personally, but also absence of a public morality, or rather presences of a public (a)moralty which accepts corruption as a way of life. A comprehensive framing of corruption would include an understanding of the nature of the power of public office in a given society, including techniques of governance, which makes corruption possible, and a critical appraisal of public amorality which accepts it as permissible. Very interestingly, the JLPBill campaign avoids both these in its framework. It over-emphasises the punitive part, i.e public institutions meant to contain and punish law breaking under corruption. It starts by asking why the corrupt are not punished, with an underlying assumption that only if the corrupt could suitably be punished, the problem would be solved. Anna’s claims about the golden arrival of a corruption free India after the enactment of his JLPBill are based on this simplistic understanding. The Lokpal leviathan imagined in JLPBill that rolls in three functions of investigation, prosecution and judicial in one institution, comes out of the desire to create a ‘fool-proof’ system from which no corrupt could escape. A simple counter akin to emperor’s clothes; who will address the corruption within the anti-corruption institution (which is obvious if social power base and public amorality about corruption is not lost sight off) has been dismissed by Anna and his team as irrelevant. Urban middle classes prefer such framing of corruption. It avoids addressing uncomfortable questions about the nature of social power in India (Why is a police constable so easily able to extract hafta from a hawker? Any sensible answer has to recognize the absence citizenship rights of not just the poor but also of privileged in our democracy. The rich use non-open, non-public access avenues to get what they want.). It shields their own complicity in corruption (how many of professionals, lawyers, doctors, tradesmen supporting the anti-corruption movement pay their taxes?). The call for punitive measures resonates with an illiberal and vindictive mindset of classes of social order. All these factors explain why urban middle classes in India lapped up the Anna campaign when it appeared at the conjuncture of the legitimacy crisis of the government.          

As the anti-corruption movement has expanded, i.e, as it has acquired a mass character beyond its core support base of upper caste, urban middle classes, and it has become the process determining the character of government and state in the perception of hegemonic block, a number of diverse engagements with corruption and the anti-corruption movement have emerged in diverse quarters. For instance a dominant argument from left seeks to explain the explosion of corruption in the past two decades as a direct consequence of neo-liberal economic regime. Neo-liberalism allows for, and in fact encourages, new arenas of corruption from collusion of state functionaries and private capital. But it also diminishes the controlling powers of these functionaries, which in the earlier regime of state led capital accumulation was one of the main social power base of corruption. In a society with deeply anti-democratic ethos, with no liberal and secular public morality, with a very narrow base of public rationality (that too limited to state institutions), it is inevitable that any positions of authority will degenerate into corruption. There will be opposition to corruption, because the liberal framework of political governance allows sufficient lee way for it to emerge. But opposition movements will not be able to remove corruption unless the question of a modern public sphere is directly addressed. Let us be clear, even transparency and accountability are very modern notions. Pre modern social powers based on divine rights or strength of arms, had no need to be transparent and accountable for legitimacy.

If  the above argument from the left restricts the social base of corruption, another argument coming from popular struggles tends to expand the notion of corruption. Hence, the forcible displacement, starvation, caste discrimination, etc., i.e. all issues of lond drawn out struggles are called instances of corruption. This is surprising, because these have so far been seen from the perspective of much more robust frameworks involving injustice, exploitation, castiesm, etc. How will calling these also corruption help struggles against them? Besides calling them corruption is factually incorrect. For instance, displacement due to Narmada dams in not result of corruption. It is a legal displacement, it has occurred with the concurrence of the highest court of the land. But it remains unjust, and that is still the ground on which to struggle against it. AFSPA in Kashmir and North-East is not corruption. It is a logical fall-out of armed aggression against people.

Another argument has implored the left to join anti-corruption movement, lest it be taken over by the rightwing. This argument presents the current movement as an eruption of popular anger against corruption of state functionaries. It assumes this eruption to be a pure questioning of nature of governance, with no presumed answers. This argument does not recognize interests of upper caste urban middle classes in supporting the anti-corruption movement, and how these interests have already fashioned, not absolutely, but yet in a way, the discursive and political terrain of this movement. It is not that leftists and other social groups, say Dalits, do not understand importance of anti-corruption struggles. But they find the support base of Anna Hazare movement, its discourse and politics so against their own other interests, that they think it wise to not to join it, lest they end up gifting it a wider legitimacy than it deserves.

Now that on 27th August, the current crisis has ended with the government agreeing to most of the demands of Anna Hazare, it becomes possible to speculate on the future of corruption in India. A central govt Lokpal, broadly on the lines demanded by Anna Hazare, is likely to see the light of the day, sooner rather than later. Formally it will be a deepening of the association of the people with the state, as it will give an avenue to people to place their grievances before a state institution not directly under the control of government of the day. In a democracy people are expected to be associated with the state, as only people ultimately give it legitimacy. But, is India a democracy? If so, then of what kind? The formally liberal democracy in India has proved itself to be more nimble and creative than even its most ardent fans would have imagined. And that too, in an essentially illiberal society. Past few decades have seen a number of state institutions that have brought people closer into its fold as agents, rather than as mere targets. Panchayati Raj institutions, Right to Information Act, Forest Rights Act, etc. are the most important. Even MNREGA has done the same for the poorest of Indians to a limited extent. However, have any of these dented corruption, or instead have provided new state channels for corruption? There are many liberal capitalist societies that have little corruption. What distinguishes them is a very deep and wide practice of citizenship, and an evolved sphere of public morality. Will the institution of Lokpal usher India in that direction? One can not be very optimistic on this point, particularly after looking at the politics of the movement that is bringing Lokpal into being.