10/01/2011 - 11/01/2011 - रूबरू

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Friday, October 28, 2011

बग़ावतों की अमीन - किश्वर नाहीद

October 28, 2011 1
बग़ावतों की अमीन - किश्वर नाहीद


डा. रिज़वानुल हक़
फ़रहंगे आसिफि़या में बग़ावत शब्द का मतलब नाफ़रमानी और सरकशी दर्ज है। यानी जब कोई इन्सान हाकिम और ताक़तवर लोगों के हुक्म की नाफ़रमानी और अपनी मनमानी करे तो ये बात बगा़वत कहलाती है। इसीलिए औरतों ने जब-जब मर्दों के बनाए उसूलों को शब्द: मानने से इन्कार किया है और जि़न्दगी को अपने तरीके से देखने और जीने की कोशिश  की है तो पुरुष प्रधान समाज ने उसे बाग़ी कहा है।

            इस तरह देखा जाये तो साहित्य अपने स्वभाव से ही बागी होता है, क्योंकि साहित्य का स्वभाव है कि वह जीवन की उन परिसिथतियों और अनुभवों को बख़ूबी बयान करे, जो जीवन की सच्चा तो हो लेकिन लेकिन आम नज़रों से ओझल हों। औरत यूँ तो पहले भी साहित्य में केन्द्र में थी, औरत की ये तस्वीर मर्दों के दृषिटकोण से बनार्इ गर्इ थी। लेकिन जब औरतों ने अपने बारे में खुद बयान किया तो अब जो औरत की तस्वीर उभरी तो ये तस्वीर मर्दों के द्वारा बयान की गयी औरतों की तस्वीर से काफ़ी अलग  थी। इसलिए औरत की इस स्वनिर्मित तस्वीर को बग़ावत का नाम दिया गया, यह बात पुरुष प्रधान समाज को बहुत नागवार  करने वाली थी कि औरत उस पहचान से बाहर आए जो उसे मर्दों ने दी है।

शुरू -शुरू  में जब औरतें साहित्य में दाखि़ल हुईं तो कुछ शहज़ादियों और अमीर घर की लड़कियों के अलावा उनमें से ज्यादातर तवायफें थीं। कुलीन घरों की लड़कियाँ और शहज़ादियों ने जब लिखना शुरू  किया तो वह पिता, पति, भाई  या बेटे के हवाले से जैसे फ़लां की बेटी, फलां की बहन वगै़रा या फिर नाम को छुपाकर जैसे-महजबीं फ़ातिमा को म. फ़ा. लिखती थीं। जबकि उसी कुलीन वर्ग के मर्द जब तवायफ़ के कोठे पर जाकर उसकी शायरी  सुनते थे तो वह तवायफ़े अपने असली नाम से लिखते थे और कुलीन वर्ग के यह मर्द दिल खोलकर उन तवायफ़ो को उनके नाम के साथ दाद देते थे, चाहे वह शायरी  दाद के लायक हो या न हो।

शायरी  में चूंकि बात इशारों, प्रताकों और रूपकों में कही जाती है इसलिए शायरी  के द्वारा औरतों की बग़ावत इतनी स्पष्ट न थी। औरतों ने जब गद्य में लिखना शुरू किया तो ये बग़ावत ज़्यादा तेज़ी के साथ नज़र आयी। उर्दू  में जिन पहली औरतों ने अपने नाम पर खुलकर लिखना शुरू किया उनमें रुक़य्या सख़ावत हुसैन, नज़र सज्जाद हैदर यल्द्रम और हिजाब इमितयाज़ अली ताज नाम बहुत महत्वपूर्ण हैं।

  आज के समाज के अनुसार अगर देखा जाये तो उर्दू  की पहली स्त्रीवादी साहित्यकार रशीद  जहाँ थीं। जिनकी एक कहानी "दिल्ली की सैर" एक इन्क़लाबी संग्रह "अंगारे" में शामिल थी। जिससे बाग़ी या स्त्रीवादी साहित्य का प्रारम्भ होता है। इसके बाद इस्मत चुगताई  ने कर्इ ऐसी कहानी और नाविल लिखे जिन पर काफ़ी बहसें हुईं ,और उन पर अश्लीलता और बग़ावत के इल्ज़ाम भी लगे। लेकिन वह जि़न्दगी भर इन सबसे लड़ती रहीं और उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा।   

हिन्दुस्तान के बंटवारे के बाद पाकिस्तान में मज़हबी जकड़बन्दी ज्यादा बढ़ गयी । ऐसे माहौल में उन औरतों का दम घुटने लगा जो अपने असितत्व की तलाश  में थीं, पढ़ी-लिखी और चिन्तनशील  थीं। ऐसे में पाकिस्तान में एक साथ कर्इ महिला शायरों ने अपनी आवाज़ बुलन्द की। उन महिला शायरों में कुछ अहम नाम हैं-परवीन शाकिर, फ़हमीदा रियाज़, सारा शगुफ़्ता, ज़ोहरा निगाह और  किश्वर नाहीद। इन महिला शायरों ने अपनी-अपनी शैली में शायरी के ज़रिये औरतों के अधिकार की बात की।

किश्वर नाहीद की शायरी  के कर्इ संग्रह आ चुके है। जिनमें लबे-गोया 1969, बेनाम मुसाफ़त 1971, गलियां धुप  दरवाज़े 1978, मलामतों  के दरम्यान 1981, स्याह हाशिये में गुलाबी रंग 1984, दायरों में फैली लकीर 1987, प्रमुख हैं। उनकी शायरी  में ग़ज़ल,  छंदबध और गध नज्में भी  मौजूद हैं। इन तीनों विधाओं  में उनका बाग़ी रवैय्या नज़र आता है लेकिन उनकी शायरी  में बगा़वत की ये लय कभी शायराना  लय से अलग नहीं होती है। उनकी गज़लें शैली के एतबार से तो क्लासीकी शायरी की पाबन्दी करती हैं लेकिन विचारों के एतबार से बहुत नयी हैं। यहाँ कुछ शेर पेश हैं, जिनमें बग़ावत की लय भी  है और ग़ज़ल का संगीत भी -

जब न सुनता हो कोई  बोलना क्या
क़ब्र  में  शोर   बपा   क्या  करना
घर के धंधे कि निमटते ही नहीं हैं नाहीद
मै निकलना भी  अगर शाम को घर से चाहूँ
सुलगती रेत पे आँखें भी ज़ेरे-पा  रखना
नहीं है सहल हवा से मुक़ाबला करना
वो जिसका शौक है खिलते गुलाब मल देना
गले मिलो तो उसे भी  उदास कर देना
अपना  नाम  भी  अब  तो  भूल गर्इ  नाहीद
कोर्इ  पुकारे   तो   हैरत   से   तकती  हूँ

इन शेरों में दुनिया की असंवेदनशीलता को दिखाया गया है कि जैसे क़ब्र में कोई व्यकित किसी की नहीं सुनता उसी तरह ये दुनिया हो गयी  है। सब अपने में खोए हुए हैं। औरत की मजबूरियों  को दिखाया गया है कि औरत घर के काम काज में इस तरह व्यस्त रखी जाती है कि वो घर से बाहर निकल कर कुछ करना चाहे तो उसके लिए वक्त ही न निकल सके। पुरुष प्रधान समाज में औरत का अपना कोई  असितत्व नहीं है। उसे सिर्फ उसके पति, पिता या बेटे के नाम से जाना जाता है।किश्वर नाहीद की ग़ज़लों में इन सब परिसिथतियों के खि़लाफ़ एक ख़ामोश विरोध है।

      किश्वर  नाहीद की नज्मों में उनके स्त्रीवादी विचार और भावनाएं ग़ज़लों के मुक़ाबले ज्यादा साफ़ उभर कर आते हैं। औरत के आगे बढ़ने की फि़तरत पर जिस तरह पाबनिदयां लगार्इ जाती हैं, उनकी इच्छाओं का जिस तरह दमन किया जाता है, किश्वर  नाहीद ने उन भावनाओं को बहुत गहरार्इ से महसूस किया और उसकी अभिव्यकित बहुत ही रचनात्मक ढंग से की है। उनकी नज्मों के कुछ हिस्से पेश  हैं-
मोम महल

उस दिन मेरी नींद उड़ गयी
मैं दूसरे सहन में आ गयी
अब मैं और मेरी माँ दोनो ख्वाब में चीखें  मारते हैं
और जब कोई पूछे
तो कह देते हैं
हमें ख्वाब याद नहीं रहते

मैं कौन हूँ

मैं  तो वही हूँ जिसको तुमने डोली बिठा के
अपने सर से बोझ उतारा
ये नहीं जाना
जे़हन  ग़ुलाम अगर है क़ौम उभर नहीं सकती
पहले तुमने मेरी शर्म ओ हया के नाम पे खूब तिजारत की थी
मेरी ममता, मेरी वफ़ा के नाम पे खूब तिजारत की थी
अब गोदों में और जे़हनों में फूलों के खिलने का मौसम है
पोस्टरों पे नीम-बरहना
मोज़े बेचती, जूते बेचती औरत मेरा नाम नहीं

जारूब कश

सूरज मुखी की तरह
घर के हाकिम की रजा़  पर
गरदन घुमाते-घुमाते
मेरी रीढ़ की हडडी चटख़ गयी है
जिस्म का सारा बोझ सहने वाली हडडी
चटख़ गयी है

घास तू मुझ जैसी है

घास भी  मुझ जैसी है
ज़रा सर उठाने के का़बिल हो
तो काटने वाली मशीन
उसे मख़मल बनाने का सौदा  लिये
हमवार  करती रहती है

       किश्वर  नाहीद की आत्मकथा "बुरी औरत  की आत्मकथा "में उनका बाग़ी रवैया ज्यादा गहराई  के साथ सामने आता है। आत्मकथा में साहित्य की अन्य विधाओं के मुक़ाबले में ज्यादा सच्चा  से काम लिया जाता है। यहाँ इशारों का उतना महत्व नहीं होता जितना दूसरी विधाओं ख़ासकर शायरी  में होता है। आत्मकथा का सौन्दर्य तो यही है कि सच्चा  को खुले रूप में प्रस्तुत किया जाए, न कम न ज्यादा और उस पर किसी प्रकार का आवरण न चढ़ाया जाए। ''बुरी औरत की आत्मकथा'' आत्मकथा की इन शर्तों को बखूबी  पूरा करती है, इसलिए यह आत्मकथा ज्यादा विवादों में रही और इसमें बग़ावत के तेवर ज्यादा तेज़ नज़र आते हैं। इस आत्मकथा के कुछ अंश  प्रस्तुत हैं जिनसे उनके बागी़ तेवर को समझा जा सकता है-

      "हमारी गली आगे से बन्द थी। हम सब मिलकर आँख मिचौली खेलते थे। घर वाले बेफि़क्र थे कि यहाँ बाहर से कोई  नहीं आ सकता। चलो ज़रा घड़ी भर  बचिचयाँ सब साथ खेल रही हैं। एक दिन चोर लड़की ने चीख़ मारी, उई  ये क्या है?'' सारी लड़कियां चोर लड़की के पीछे पड़ी थी - बोलो ना क्या हुआ था? बाबा जी ने कुछ कहा? और वो चोर लड़की जो मैं थी, बस उँगली उठाए, घिघियाते कँपकँपाते होठों  और तरबतर बदन के साथ, सामने देखे जा रही थी। दो-चार घरों की बूढ़ी-बूढ़ी औरतों ने मौके़ की नज़ाकत और बात को कुछ समझते हुए सब लड़कियो को अपने-अपने घरों में धकेल दिया।''

       ''पिछले चौदह वर्षों  में 1979 से अब 1993 तक शौहरों ने बीवियों को व्यभिचार के जुर्म में जेल भिजवा दिया जिससे वो सुकून से दूसरी शादी कर सकें, भाइयों ने बहनों पर इल्ज़ाम लगाया और उनकी पैतृक संपति हड़प लेने में मर्दानगी महसूस की। बेटियों को बापों ने व्यभिचार का मुजरिम ठहराया कि वो अपनी मर्जी की शादी न कर सकें। बेटियों को बापों ने व्यभिचार का मुजरिम माना जिससे वह अपनी मर्जी  से शादी न कर सकें, और बाप उसे बेचकर वह दौलत हासिल कर सकें, जिसके बदले उनकी जि़न्दगी में ख़ुशहाली आ सके। ''

       ''ऐ है, ख़ुद शादी कर रही है? शरह  मना करती है, मैं दूध नहीं बख्षूँगी, मैं उसका चेहरा नहीं देंखूँगी।'' अम्मा ने कर्इ साल तक मेरा चेहरा नहीं देखा, और जब देखा कलेजे से लगाकर प्यार नहीं किया। अधूरा सा हाथ मेरे सर पर था।''
       इस बातचीत से ये बात बहुत साफ़ तौर पर  उभर कर सामने आती है कि उर्दू  साहित्य में बग़ावत मज़बूत और जि़न्दा परम्परा रही है। हमारे यहाँ ऐसी औरतों की कमी नहीं है जिन्होंने मुश्किल  हालात में आत्मसमर्पण नही किया बलिक उन्हें बदलने की कोशिश की। इन बागि़यों की सूची में किश्वर नाहीद का नाम अग्रणी है। उनका व्यकितत्व बहुत संवेदनशील  है। और उन्होंने समाज में, मुख्य रुप से औरतों पर होने वाले जु़ल्म और नाइन्साफ़ी के खि़लाफ़ अपनी आवाज़ बुलन्द की है। इस तरह किश्वेर  नाहीद न सिर्फ  बगा़वतों की अमीन हैं बलिक उन्होंने इस परम्परा को आगे भी बढ़ाया है।
                      
  (उर्दू से हिन्दी अनुवाद अमामा एजाज़)

 [लेखक उर्दू के चर्चित कथाकार हैं और रीजनल कॉलेज, भोपाल में पढ़ाते हैं ]

मायने =    अमीन = परम्परा की रक्षक, बपा =बरपा करना, ज़ेरे-पा  = पैर के नीचे, जे़हन =दिमाग़, नीम-बरहना =अर्ध नग्न, जारूब कश  =झाड़ू लगाने वाली, रजा़ =मंजूरी, सौदा  =इरादा, हमवार  =बराबर, शरह =इस्लामी क़ानून

Tuesday, October 18, 2011

इतना आसान नहीं है कशमीर समस्या का हल,संदर्भ: भूषण पर हमला

October 18, 2011 0
इतना आसान नहीं है कशमीर समस्या का हल,संदर्भ: भूषण पर हमला

-राम पुनियानी

च्चतम न्यायालय के वरिष्ठ वकील और टीम अन्नाके सदस्य प्रशांत भूषण पर 12 अक्टूबर 2011 को हुए नितांत निंदनीय हमले ने कई प्रश्नों को जन्म दिया है। हमले के तुरंत बाद, शिवसेना जैसे अति राष्ट्रवादीसंगठनों ने हमलावरों को बधाई दी। इससे एक बार फिर यह साफ हो गया है कि हमारे समाज में कुछ मुद्दों को लेकर कितनी अधिक असहिष्णुता है। यह बात कश्मीर के मुद्दे के अलावा उन अन्य सभी मुद्दों के बारे में सही है जिन्हें विभाजनकारी राजनीति करने वाली ताकतें समय-समय पर उठाती रहती हैं।

प्रशांत भूषण पर हमला, उनके एक वक्तव्य के बाद हुआ। इस वक्तव्य में उन्होंने कहा था कि संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा दशकों पूर्व कश्मीर में जनमत संग्रह करवाने के प्रस्ताव पर अमल ही कश्मीर समस्या के स्थायी हल का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। भूषण पर कायराना हमले के बाद टीम अन्ना के आपसी मतभेद भी सामने आ गए। टीम के अधिकांश सदस्यों ने न केवल भूषण के वक्तव्य से किनारा कर लिया बल्कि उन्हें टीम से निष्कासित करने की चर्चा भी होने लगी। अन्ना हजारे ने राष्ट्रवाद और इतिहास पर अपनी गहरी पकड़प्रदर्शित करते हुए यह घोषित कर दिया कि कश्मीर, अनादिकाल से भारत का अविभाज्य हिस्सा रहा है। कश्मीर को भारत का अविभाज्य हिस्सा बताने वाले कुछ लोगों ने यह भी फरमाया कि भूषण देषद्रोही हैं क्योंकि उनका मत, भारतीय संविधान के विरूद्ध है।

ऐतिहासिक व संवैधानिक दृष्टि से कश्मीर का मुद्दा उतना सीधा नहीं है जितना कि उसे बताया जाता है। हम सभी यह जानते हैं कि कबीलाईयों के भेष में पाकिस्तानी सैनिकों के आक्रमण के बाद, कश्मीर भारत का हिस्सा बना। वहां की जनता पाकिस्तान में शामिल नहीं होना चाहती थी और उसकी इस इच्छा को शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नेशनल कांफ्रेस ने स्वर दिया। इस विकट परिस्थिति में कश्मीर के शासक महाराजा हरिसिंह ने भारत के साथ विलय की संधि पर हस्ताक्षर किए। इस संधि को कश्मीर की जनता द्वारा अनुमोदित कराया जाना था और इसके लिए संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा सुझाया गया जनमत संग्रह प्रस्तावित था। अतः सबसे पहले तो यह साफ-साफ समझ लिया जाना चाहिए कि कश्मीर अनादिकाल से भारत का हिस्सा नहीं था। वह सन् 1948 में भारत का हिस्सा बना। कश्मीर के महाराजा के साथ हुई संधि में यह प्रावधान है कि संचार, मुद्रा, विदेशी मामलों और रक्षा के अतिरिक्त अन्य सभी विषयों में कश्मीर को पूर्ण स्वायत्ता प्राप्त रहेगी।

समस्या तब शुरू हुई जब भारत की साम्प्रदायिक ताकतों, विशेषकर हिन्दू महासभा के शयामाप्रसाद मुकर्जी, ने यह मांग उठाना शुरू की कि कश्मीर को जबरदस्ती भारत के अन्य राज्यों के समकक्ष दर्जा  दिया जाए। इन ताकतों के दबाव में आकर केन्द्र सरकार ने शनैः-शनैः कश्मीर की स्वायत्ता का अतिक्रमण करना शुरू कर दिया और वहां होने वाले चुनावों में धांधलियां की जाने लगीं। इससे कश्मीर के लोगों में भारत के प्रति अलगाव का भाग उत्पन्न हुआ। शेख अब्दुल्ला भी भारत सरकार के बदलते रूख से निराश हो चले और उन्होंने भारत में विलय के अपने निर्णय पर पुनर्विचार करने की बात सार्वजनिक रूप से कह दी। नतीजतन, उन्हें जेल में डाल दिया गया जहां वे सत्रह सालों तक रहे।
 
कश्मीर के युवावर्ग में भारत के प्रति बढ़ते असंतोष व अलगाव का पाकिस्तान के सत्ताधारी वर्ग ने अपने हित साधने के लिए उपयोग करना शुरू कर दिया। कश्मीर घाटी में असंतोष भड़काने के पाकिस्तान के  अभियान को अमरीका का पूरा समर्थन प्राप्त था। अमरीका, कच्चे तेल के संसाधनों पर कब्जा करने की अपनी  महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए पाकिस्तान को प्यादे की तरह इस्तेमाल करता रहा। सन् 1980 के दशक में अल्कायदा घाटी में सक्रिय हो गया और इससे स्थितियां बद से बदतर हो गईं। कश्मीरियत का स्थान साम्प्रदायिकता ने ले लिया। कश्मीरियत दरअसल बौद्ध, वेदांत और सूफी परंपराओं की शिक्षाओं का मिला-जुला स्वरूप है। कश्मीर में बढ़ती हिंसा और अतिवादियों के मजबूत होते जाने का एक असर यह हुआ कि कश्मीरी पंडितों को घाटी से पलायन करना पड़ा। बड़ी संख्या में मुसलमान परिवारों को भी घाटी छोड़नी पड़ी।

केन्द्र की सत्ताधारी पार्टियां व गठबंधन लंबे समय तक कश्मीर के चुनावों को प्रभावित करने व उनमें  धांधलियां करवाने में जुटी रहीं। वहां प्रजातंत्र का गला घोंट दिया गया। कश्मीरियों में व्याप्त असंतोष और उससे जनित हिंसा से मुकाबला करने के लिए भारत सरकार वहां सेना की उपस्थिति बढ़ाती गई। इस समय भी कश्मीर में बहुत बड़ी संख्या में भारतीय सैनिक तैनात हैं। सेना की इतनी भारी मौजूदगी ने नागरिक जीवन को काफी हद तक प्रभावित किया है। कश्मीरी डर और आतंक के साये तले जी रहे हैं। सेना ने वहां कई तरह की ज्यादतियां की हैं। आज कश्मीर के लोग स्थानीय अतिवादियों, अल्कायदा-पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादियों और भारतीय सेना की ज्यादतियों- तीनों से पीडि़त हैं। उनका यही गुस्सा और कुंठा, पत्थर फेंकने वाली भीड़ों के रूप में सामने आ रही है।

इस विकट परिस्थिति से मुकाबला करने के लिए कई हलसुझाए जा रहे हैं। अलगाववादी, “आजादीचाहते हैं। महबूबा मुफ्ती की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी स्वराजचाहती है जबकि फारूख अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस की मांग है कि कश्मीर को पुनः स्वायत्ता प्रदान की जाए। कश्मीर में जनमत संग्रह करवाने की मांग भी समय-समय पर उठती रही है परंतु साठ साल बाद जनमत संग्रह से कोई लाभ होगा, ऐसा नहीं लगता। पाकिस्तान अपने कब्जे वाले कश्मीर में अलग खेल खेल रहा है। पाकिस्तान इस इलाके को आजाद कश्मीर कहता है जबकि वहां आजादी नाममात्र की भी नहीं है।

भारत सरकार द्वारा कश्मीर के लिए तीन वार्ताकारों की नियुक्ति को इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। इन वार्ताकारों ने अपनी रपट में क्षेत्र की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं पर जोर दिया है। राजनैतिक मुद्दों की इस रपट में कोई चर्चा नहीं है। रपट में कहा गया है कि कश्मीर में रोजगार सृजन, शिक्षा के प्रसार व सामाजिक-आर्थिक बेहतरी के लिए अन्य योजनाएं लागू की जाएं। भूषण की कश्मीर में जनमत संग्रह करवाने की मांग भी एक तरह की अतिवादिता है यद्यपि घाटी के कई संगठन जनमत संग्रह के पक्ष में हैं। आज कश्मीर की स्थिति को समझने के लिए हमें कई पहलुओं पर ध्यान देना होगा। इनमें शामिल हैं अमरीका और पाकिस्तान के बीच संबंधों में आया बदलाव, कश्मीर में प्रजातांत्रिक प्रक्रिया का जड़ पकड़ना और वहां अतिवादी तत्वों की स्वीकार्यता बनी रहना। कश्मीर में बढ़ती अतिवादिता और वहां के लोगों के भारत के प्रति अलगाव का एक मुख्य कारण है कश्मीर को जबरदस्ती अन्य राज्यों के समकक्ष दर्जा देने का प्रयास। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 370 को रद्द किए जाने की मांग की जाती रही है। यह मात्र संयोग नहीं है कि साम्प्रदायिक ताकतों की मुख्य मांगों में यह मांग भी शामिल है।

हजारे और ठाकरे जैसे लोग या तो भारत के पिछले पांच-छःह दशकों के इतिहास को भूल रहे हैं या शायद वे उसे जानते-समझते ही नहीं हैं। वे राष्ट्रवाद की अपनी परिभाषा पर इतने मोहित हैं कि उन्हें और कुछ दिखलाई ही नहीं दे रहा है। आज ज़रूरत इस बात की है कि कश्मीर समस्या को उसके सही ऐतिहासिक व संवैधानिक परिपेक्ष्य में देखा जाए और सभी संबंधित पक्षों का लक्ष्य व प्रयास यही हो कि आम कश्मीरियों की व्यथा में कमी आए।  वे खुली हवा में सांस ले सकें व सामान्य और खुशहाल जीवन जी सकें। 

(लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)