11/01/2011 - 12/01/2011 - रूबरू

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Saturday, November 26, 2011

मौलाना अबुल कलाम आजाद

November 26, 2011 1
मौलाना अबुल कलाम आजाद

आजादी के दीवाने और सांप्रदायिक सद्भाव के सिपाही


-डा. असगर अली इंजीनियर

मौलाना अबुल कलाम आजाद एक अनूठी इस्लामिक शख्सियत थे। वे इस्लाम के अनन्य अध्येता, महान देश भक्त और सांप्रदायिक सद्भाव के अथक सिपाही थे। यह खेदजनक है कि देश  के प्रति उनकी सेवाओं को भुला दिया गया है। आज की पीढ़ी के स्कूली व कालेज विद्यार्थियों में से शायद एक प्रतिशत भी उनके या उनकी उपलब्धियों के बारे में कुछ विशेष नहीं जानते होंगे।  

इस पृष्ठभूमि में, शिमला स्थित इंस्टीट्यूट आफ एडवांस स्टडीजकी साधारण सभा की हालिया बैठक में संस्थान के अध्यक्ष प्रोफेसर मुंगेकर - जो कि राज्यसभा के सदस्य भी हैं - के इस सुझाव का मैंने स्वागत किया कि अंबेडकर की तरह, मौलाना आजाद पर भी कालेज शिक्षकों के लिए समर स्कूलआयोजित किए जाने चाहिए, जिससे शिक्षकों को मौलाना के व्यक्तित्व व कृतित्व से परिचित करवाया जा सके। सच तो यह है कि मौलाना आजाद के अलावा खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे कई नेताओं पर समर स्कूलोंकी दरकार है। मौलाना आजाद के बारे में देशवासियों को बताया जाना आवष्यक है। देश  की आजादी  के लिए उनका बलिदान किसी से कम नहीं था। 
नवंबर माह की 11 तारीख को मौलाना आजाद का जन्मदिन पड़ता है और इस साल, भारत सरकार ने मौलाना को उनके जन्मदिन पर याद किया। स्कूलों से कहा गया कि वे मौलाना का जन्मदिन - जो कि शिक्षा दिवस भी कहलाता है - मनाएं। परंतु अधिकांश  शिक्षणिक संस्थाओं में विद्यार्थियों के दीवाली की छुट्टियों के बाद अपने गृह नगरों से न लौटने के कारण यह दिन उतने अच्छे से न मनाया जा सका, जितना कि मनाया जाना था।  

मौलाना के पिता मौलाना खैरूद्दीन कलकत्ता के जाने-माने आलिम थे और उनके शिष्यों की संख्या हजारों में थी। मौलाना खैरूद्दीन ने मक्का की रहने वाली एक अरब महिला से विवाह किया था और मौलाना का जन्म मक्का में हुआ, जहाँ उनके माता-पिता उन दिनों रूके हुए थे। इस तरह, एक अर्थ में, अरबी, मौलाना की मातृभाषा थी और अरबी पर मौलाना का असाधारण अधिकार था। उनका लालन-पालन पारंपरिक इस्लामिक माहौल में हुआ और उनके पिता की इच्छा थी कि वे उनकी ही तरह आलिम बनें। अगर मौलाना ने अपने पिता की बात मान ली होती तो उनके भी हजारों शिष्य होते और वे भी अपने पिता की तरह प्रभावशाली इस्लामिक धार्मिक नेता होते। 

मौलाना, सर सैय्यद अहमद खान के प्रभाव में आ गए और सर सैय्यद के संपूर्ण लेखन को उन्होंने पूरे ध्यान से पढ़ डाला। परंतु वे स्वतंत्र सोच वाले व्यक्ति थे और जल्दी ही उनके सर सैय्यद से मतभेद हो गए।  यद्यपि वे सर सैय्यद के आधुनिक सोच व आधुनिक शिक्षा अपनाने के विचार से सहमत थे तथापि वे यह स्वीकार करने को तैयार नहीं थे कि मुसलमानों को अंग्रेज सरकार के प्रति वफादार रहना चाहिए। मौलाना की भारत की आजादी के प्रति संपूर्ण प्रतिबद्धता थी। उन्होंने बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन में शामिल होने का प्रयास भी किया परंतु भूमिगत क्रांतिकारी दलों ने मुस्लिम होने के नाते उन्हें अपने साथ लेने से इंकार कर दिया। 

मौलाना के लिए, देश भक्ति एक इस्लामिक कर्तव्य था। कहा जाता है कि पैगंबर साहब ने फरमाया था कि अपने देश  से प्यार, हमारे ईमान का भाग है और देश  के प्रति प्यार का यह तकाजा था कि देश  को विदेशियों की गुलामी से मुक्त कराया जावे। अतः वे स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े। मौलाना आजाद बहुत कम उम्र में काँग्रेस के अध्यक्ष चुन लिए गए। वे शायद काँग्रेस के सबसे युवा अध्यक्ष थे। 

गाँधीजी की तरह, मौलाना आजाद की भी यह मान्यता थी कि हिन्दू-मुस्लिम एकता के बगैर, भारत का स्वाधीन होना कठिन है। काँग्रेस के रामगढ़ अधिवेशन में पार्टी का अध्यक्ष चुने जाने के बाद, अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कहा, “अगर स्वर्ग से कोई देवदूत भी उतर कर मुझसे यह कहे कि अल्लाह ने मेरे लिए भारत की स्वतंत्रता का उपहार भेजा है तब भी मैं उसे तब तक स्वीकार नहीं करूंगा जब तक हिंदुओं और मुसलमानों में एकता स्थापित नहीं हो जाती क्योकि भारत को स्वतंत्रता नहीं मिलने से केवल भारत का नुकसान होगा परंतु यदि हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित नहीं होती तो इससे संपूर्ण मानवता को क्षति पहॅुचेगी

ये बहुत गंभीर निहितार्थ वाले शब्द हैं। मौलाना के लिए हिन्दू-मुस्लिम एकता केवल एक नारा नहीं था। वे उसके प्रति गंभीर रूप से प्रतिबद्ध थे और यह प्रतिबद्धता, कुरआन की उनकी गहरी समझ पर आधारित थी। उन्होंने राँची में जेल में रहने के दौरान कुरआन की तफसीर“ (टीका) लिखी थी। सन् 1920 के दशक  में लिखी गई इस तफसीर ने भारतीय उपमहाद्वीप के तफसीर साहित्य को समृद्ध किया। 

उन्होंने अपनी तफसीर के पहले खंड को वहदत-ए-दीन“ (धर्मों की एकता) को समर्पित किया है। इस पुस्तक के पहले ख्ंड को उन्हें दो बार लिखना पड़ा क्योंकि उसकी मूल पांडुलिपि को ब्रिटिष पुलिस ने नष्ट कर दिया था। अंततः अपनी राजनैतिक व्यस्तताओं के चलते, वे इस पुस्तक को पूरा न कर सके। उनकी तफसीर से जाहिर होता है कि सभी धर्मों की मूल एकता में उनका दृढ विश्वास था और उन्होंने अपनी असाधारण 
मेधा का इस्तेमाल, इस विचार को पुष्ट करने के लिए किया। उनके लिए विभिन्न धर्मों की एकता, धार्मिक  विश्वास था न कि राजनैतिक नारा या अवसरवाद।

मौलाना महान जननायक थे। वे खिलाफत आंदोलन के पक्के समर्थक थे परंतु कमाल पाशा  के तुर्की में क्रांति के रास्ते खलीफा को अपदस्थ करने और खिलाफत की संस्था को  अनावश्यक करार दे दिए जाने के बाद, मौलाना ने खिलाफत के प्रति अपनी वफादारी को त्यागने में जरा देरी नहीं की। उन्होंने अतातुर्क के आधुनिक सुधारों का स्वागत किया और मुसलमानों को सलाह दी कि वे खिलाफत की संस्था को बचाने का प्रयास छोड़ दें क्योंकि तुर्की नेताओं ने ही उससे किनारा कर लिया था। 

काँग्रेस के सन् 1928 के अधिवेशन में, नेहरू समिति की रपट पर चर्चा के दौरान, मौलाना ने जिन्ना की इस माँग का विरोध किया कि संसद में मुसलमानों को एक-तिहाई प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। उनका तर्क था कि प्रजातंत्र में किसी समुदाय को गैर-अनुपातिक प्रतिनिधित्व नहीं दिया जा सकता। जहां तक, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा का प्रश्न  है उसके लिए संविधान में  विशेष प्रावधान किए जा सकते हैं, जैसे कि अंततः भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25-30 में किए गए। मौलाना एक दूरदृष्टा थे और सस्ती लोकप्रियता की खातिर उन्होंने कुछ नहीं किया।

उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के सन् 1937 में उत्तर प्रदेश  में चुनाव के बाद मुस्लिम लीग को, वायदे के अनुसार, केबिनेट में दो स्थान नहीं देने के निर्णय का भी विरोध किया। नेहरू का कहना था कि चूंकि चुनाव  में लीग की बुरी तरह हार हुई है इसलिए वह मंत्रिमंडल में स्थान पाने के योग्य नहीं है। मौलाना ने नेहरू को पत्र लिखकर यह सलाह दी कि वे लीग द्वारा नामांकित दोनों व्यक्तियों को मंत्री बनाएं क्योंकि ऐसा न करने के दूरगामी प्रतिकूल प्रभाव होंगे। मौलाना की चेतावनी सही साबित हुई। जिन्ना आगबबूला हो गए और यह कहने लगे कि काँगे्रस सरकार, “हिन्दू सरकारहै जो मुसलमानों के साथ न्याय नहीं करेगी। 

अगर नेहरू ने मौलाना की सलाह मान ली होती तो शायद देश  का विभाजन रोका जा सकता था। वैसे नेहरू की इस निर्णय के पीछे अलग सोच थी। वे चाहते थे कि मुस्लिम लीग के नेताओं की जगह कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं को सरकार में अधिक प्रतिनिधित्व दिया जाए। परंतु मौलाना के विचार अलग थे। किसी भी निर्णय या घटना के दूरगामी प्रभावों को आंकने की मौलाना में अद्भुत क्षमता थी। 

नेहरू और मौलाना केवल अच्छे दोस्त ही नहीं थे बल्कि वे एक-दूसरे का बहुत सम्मान भी करते थे। नेहरू ने मौलाना की विद्वता और कई भाषाओं पर उनके अधिकार की जमकर प्रशसा की है। मौलाना आजाद सिर्फ इस्लाम ही नहीं बल्कि अन्य धर्मों का भी गहरा ज्ञान रखते थे। महिला अधिकारों के बारे में उनके विचारों को पढ़कर तो ऐसा लगता है मानो हम 21वीं सदी के किसी व्यक्ति के विचार पढ़ रहे हों। यह सर्वज्ञात है कि मुस्लिम धर्मशास्त्री लैंगिक समानता का समर्थन नहीं करते और चाहते हैं कि महिलाएं घर की चहारदीवारी तक सीमित रहें। मौलाना इसके अपवाद थे। उन्होंने मिस्त्र में अरबी भाषा में प्रकाशित  एक पुस्तक अल मीरात् अल मुस्लिमांअर्थात वे मुस्लिम महिलाएं जो लैंगिक समानता की हामी हैंका अनुवाद किया था।  इस पुस्तक में तत्कालीन मिस्त्र में महिला अधिकारों पर चल रही राष्ट्रव्यापी बहस के प्रमुख मुद्दों को संकलित किया गया था। उन्होंने इस पुस्तक को अनुवाद के लिए इसलिए चुना क्योंकि वे लैंगिक समानता के पक्षधर थे। कुरान की आयत 2.228 के बारे में वे लिखते हैं यह लैंगिक समानता का, 1300 साल पुराना घोषणापत्र है।
“ 
भारतीय उपमहाद्वीप के केवल दो अन्य धर्मशास्त्री लैंगिक समानता के हामी थे। वे थे मौलाना मुमताज अली खान जो सर सैय्यद अहमद खान के साथी थे और मौलाना उमर अहमद उस्मानी जिनकी हाल में करांची में मौत हुई। दोनों जाने-माने विद्वान थे और लैंगिक समानता के मुद्दे पर वे कोई समझौता करने को तैयार नहीं थे। मौलाना मुमताज अली खान ने एक पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक  था हकूक अल् निस्वान“ (महिलाओं के अधिकार) और मौलाना उमर अहमद उस्मानी ने आठ खंडों में फिक्-अल्-कुरान“ (कुरान का विधिशास्त्र) लिखा है जिसमें उन्होंने अनेक तर्क देकर यह साबित किया है कि कुरान, लैंगिक समानता की पक्षधर है। 

मौलाना अबुल कलाम आजाद ने पाकिस्तान के जन्म के बहुत पहले उस घटनाक्रम की भविष्यवाणी की थी जिससे आज का पाकिस्तान गुजर रहा है। मौलाना आजाद का जितना जोर हिन्दू-मुस्लिम एकता पर था उतना ही इस बात पर भी था कि भारत को धार्मिक आधार पर विभाजित नहीं किया जाना चाहिए। जो अपने देश से प्यार करता है वह भला उसे बंटते हुए कैसे देख सकता है? उन्हें यह अच्छी तरह मालूम था कि किसी भी प्रजातंत्र को अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करनी ही पड़ती है और फिर, मुसलमान कोई छोटे-मोटे अल्पसंख्यक नहीं थे। विभाजन के पूर्व वे आबादी का 25 प्रतिशत थे और यदि विभाजन नहीं हुआ होता तो आज वे कुल जनसंख्या का लगभग 33 प्रतिशत होते। 

मौलाना ने स्वतंत्रता के पूर्व कहा था कि आज के मुसलमान यह सोचते हैं कि हिन्दू उनके  दुश्मन  हैं परंतु कल, जब पाकिस्तान बन जाएगा और हिन्दू न होंगे तब मुसलमान ही आपस में क्षेत्रीय, भाषाई और जातीय आधारों पर लड़ाई-झगड़े करेंगे। उन्होंने यह बात साफ-साफ शब्दों में मुस्लिम लीग के एक प्रतिनिधिमंडल से कही थी। आज पाकिस्तान में यही हो रहा है। 

पाकिस्तान में न केवल इस्लाम के अलग-अलग पंथों में विश्वास  करने वालों के बीच खूनी संघर्ष चल रहा है बल्कि वहां धार्मिक कट्टरता में भी तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। निर्दोषों का खून बहना रोजाना की बात हो गई है। सभी धर्मों का इतिहास यह बताता है कि जब भी धर्म और राजनीति का घालमेल होता है तब सत्ता पाना और उसे बचाए रखना, धर्म और धार्मिक मूल्यों से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। सत्ता साध्य बन जाती है और धर्म, साधन। मौलाना इस बात को अच्छी तरह समझते थे इसलिए वे धर्म आधारित राज्य की बजाए धर्मनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक राष्ट्र की स्थापना के पक्षधर थे। 

दुर्भाग्यवश , मौलाना की किसी ने नहीं सुनी और वे देश  को बंटने से नहीं रोक सके। शक्तिशाली निहित स्वार्थ, जिनमें शामिल थे उत्तरप्रदेश  और बिहार के बडे़ मुस्लिम जमींदार और मुस्लिम मध्यमवर्ग (जिसे यह डर था कि उसे नौकरियां नहीं मिलेंगी)। और इन लोगों की भरपूर सहायता की अंग्रेज साम्राज्यवादियों ने जो भारत को एशिया  की महाशक्ति बनते देखना नहीं चाहते थे।


(लेखक मुंबई स्थित सेंटर फार स्टडी आफ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म के संयोजक हैं, जाने-माने इस्लामिक विद्वान हैं  और कई दशकों से साम्प्रदायिकता व संकीर्णता के खिलाफ संघर्ष करते रहे हैं।) 

Monday, November 21, 2011

पुस्‍तक समीक्षा गोडसेज़ चिल्‍ड्रेन हिंदुत्‍व टेरर इन इंडिया

November 21, 2011 0
पुस्‍तक समीक्षा   गोडसेज़ चिल्‍ड्रेन  हिंदुत्‍व टेरर इन इंडिया
पुस्‍तक समीक्षा

गोडसेज़ चिल्‍ड्रेन



हिंदुत्‍व टेरर इन इंडिया


सुभाष गाताड़े
फ़रोज़ मीडिया, नई दिल्‍ली
400 पृष्‍ठ / रु 360

 

यह पुस्‍तक भगवा आतंक के प्रमाण को बखूबी पेश करती है


 ए जी नूरानी

(साभार : फ्रंटलाइन)

  
सं परिवार की तमाम करतूतों में आतंक कभी भी अनुपस्थित नहीं रहा है। सांप्रदायिक दंगों में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की लिप्तता को जांच आयोगों ने बारंबार चिन्हित किया है। भगवा आतंक के हालिया उभार के बाद भारतीय जनता पार्टी द्वारा की गयी बचाव की कोशिशों ने उसे पूरी तरह नंगा कर दिया है।

प्रशिक्षण से एक इंजीनियर और स्वतंत्र पत्रकार सुभाष गाताड़े ने सांप्रदायिकता और दलित मुक्ति के मुद्दों पर काफी कुछ लिखा है। उन्होंने भगवा आतंक के प्रमाण को एक किताब में समेटकर एक सेवा की है।


दस जनवरी को संघ के मुखिया मोहन भागवत ने सफाई देते हुए कहा कि ‘‘सरकार ने जिन लोगों पर आरोप लगाये हैं (विभिन्‍न बम विस्‍फोटों के मामलों में) उनमें से कुछ तो स्‍वयं संघ को छोड़कर चले गये थे और कुछ को संघ ने यह कहकर निकाल दिया था कि उनके चरमपंथी विचार संघ में नहीं चलेंगे।’’ ऐसे में यह उनका कानूनी दायित्‍व बन जाता है कि वह उन लोगों के नाम बतायें जिन्‍होंने या तो अपनी मर्जी से संघ को छोड़ा या जिनको संघ से चले जाने को कहा गया। इससे हम य‍ह जान सकते हैं कि पुलिस द्वारा दायर किये गये किन मुकदमों में इन ‘’पूर्व’’ संघ कर्मियों का नाम आता है।


लेखक इस पुस्‍तक के केंद्र‍ीय बिंदु को बताते हुए कहते हैं, ‘‘ इस पुस्‍तक के अच्‍छे खासे हिस्‍से में हिंदुत्‍ववादी संगठनों द्वारा देश के विभिन्‍न हिस्‍सों में की गयी आतंकी कार्रवाहियों की चर्चा की गयी है। यह बहुसंख्‍यकवादी आतंकी गिरोहों के व्‍यापक फैलाव के बारे में इंगित करती है जो किसी भी स्‍थान पर मनचाहे तरीके से हमला करने में सक्षम हैं और साथ ही साथ य‍ह पुस्‍तक यह भी स्‍पष्‍ट करती है कि यह अब महज़ क्षेत्रीय परिघटना नहीं रही है। दूसरे यह इन आतंकी गिरोहों की कार्रवाहियों में समानताओं को भी उजागर करती है। तीसरे यह जांच एजेंसियों के सामने आने वाली अत्‍यन्‍त चुनौतीपूर्ण जिम्‍मेदारियों को भी रेखांकित करती है क्‍योंकि उन्‍होंने अब तक अपने आप को बम रखने वाले व्‍यक्तियों और उनको शरण देने वाले और उनको वित्‍तीय व अन्‍य मदद करने वाले स्‍थानीय लोगों की धरपकड़ तक ही सीमित रखा है, जबकि इस आतंकी परियोजना के किसी भी मास्‍टरमाइंड, योजनाकर्ता, वित्‍तीय सहायककर्ता  और विचारक को पकड़ने में अभी तक नाकाम रही है’’


दो अध्‍यायों को छोड़कर जिनमें हिंदुत्‍व आतंक के वैश्विक आयाम और ‘मोस्‍सादपरिघटना की चर्चा है, पुस्‍तक का केंद्र बिंदु मुख्‍य तौर पर भारत तक ही सीमित है। ऐसे में जब विभिन्‍न हिंदुत्‍ववादी गिरोहों ने अन्‍तर्राष्‍ट्रीय नेटवर्क और संपर्क बना रखे हैं,जिनकी वजह से उनके कामों में कई किस्‍म की मदद मिल जाती है, इस परिघटना के इस पहलू पर और भी ज्‍़यादा ध्‍यान देने की ज़रूरत है। इसके अलावा हमें यह भी समझना होगा कि खुले आम राजनीतिक और सांस्‍कृतिक ग्रुपों के अतिरिक्‍त तमाम आध्‍यात्मिक गुरुओं ने थोक के भाव से अपने अंतर्राष्‍ट्रीय नेटवर्क खोले हैं और यह बात किसी से छुपी नहीं है कि ऐसे ग्रुप सशस्‍त्र हिंदुत्‍व ग्रुपों से करीबी सम्‍बन्‍ध रखते हैं।


यह पुस्‍तक मालेगांव, मक्‍का मस्जिद, अजमेर शरीफ और समझौता एक्‍सप्रेस के आतंकवादी हमलों से सम्‍बंधित तथ्‍यों को उजागर करती है और दोषियों की शिनाख्‍़त करती है तथा उनकी भूमिकाओं के बारे में जानकारी देती है। ‘‘लोगों का ध्‍यान हिंदुत्‍व राजनीति के आतंकी मोड़ की ओर और इसकी वजह से समाज के लिए उतपन्‍न ख़तरे की ओर ले जाने का श्रेय लेखकों, पत्रकारों, सिविल सोसाइटी संगठनों और हाशिये के चंद धर्म‍निरपेक्ष एवं वामपंथी ग्रुपों और व्‍यक्तियों को जाता है। सीमित मानवीय और भौतिक संसाधनों के होने के बावजूद और समाज में एक ऐसा मुद्दा जो ‘सहिष्‍णु’ बहुसंख्‍यक संप्रदाय को बचाव पक्ष में खड़ा करता हो उठाने के ख़ि‍लाफ़ समाज में आम प्रतिरोध के बावजूद ऐसे लोग अपने काम में लगे रहे। हलांकि ये प्रयास बहुत प्र‍भावी नहीं साबित हुए लेकिन उन्होंने हिंदुत्‍व आतंक के मुद्दे को जीवित अवश्‍य रखा।


‘‘स्थिति में नाटकीय मोड़ तब आया जब 2008 में मालेगांव में बम विस्‍फोट हुआ और कांग्रेस और राष्‍ट्रवादी कांग्रेस के गठजोड़ वाली महाराष्‍ट्र सरकार ने राज्‍य के एंटी टेररिज्‍़म स्‍क्‍वाड (ए टी एस) को जांच की जिम्‍मेदारी सौंपी। ए टी एस प्रमुख हेमंत करकरे जिन्‍होंने कुछ महीनों पहले (अप्रैल 2008) थाणे और पनवेल में हुए बम विस्‍फोटों के सिलसिले में सनातन संस्‍था के कुछ आतंकवादियों को पकड़ने में सफलता प्राप्‍त की थी, ने मामले को उसी उत्‍साह से लिया। एक जद्दोजहद भरी जांच के बाद उन्‍होंने यह सनसनीखेज खुलासा किया कि आर एस एस और सहयोगी हिंदुत्‍ववादी संगठनों के सदस्‍य देश के अलग-अलग हिस्‍सों में आतंकी मॉड्यूल चला रहे हैं और यहां तक कि उन्‍होंने सेना में भी अपनी पैठ बना ली है।’’


भाजपा और संघ ने उनको बदनाम करने की साजिशों का राग अलापना शुरू किया। इस पुस्‍तक में उनके झू्ठों के साथ-साथ और भी खुलासे किये गये हैं। इस प्रक्रिया में लेखक नें कुछ महत्‍वपूर्ण बिन्‍दु उठाये हैं। ‘‘कोई कह सकता है कि धर्मनिरपेक्षवादियों का एप्रोच राज्‍य केंद्रित है, यह न सिर्फ सांप्रदायिकता से लड़ने में राज्‍य की भूमिका पर ज़ोर देता है बल्कि राज्‍य के सम्‍मुख कुछ मांगें भी रखता है , यह राज्‍य से सांप्रदायिक संगठनों पर पाबंदी लगाने और संवैधानिक अधिकारों के हनन के खिलाफ़ सख्‍़त कार्रवाही करने और वैज्ञानिक सोच को प्रचारित करने आदि की गुहार लगाता है।  यह एप्रोच राजनीति के धर्मनिरपेक्षीकरण के सवाल को नहीं उठाता है। हलांकि यह मुखर शब्‍दों में कहा नहीं जाता लेकिन प्रभावी रूप से होता यह है कि सामाजिक निर्वात धार्मिक तथा सांप्र‍दायिक संगठनों और गैर सरकारी संगठनों और यथास्थितिवादी संगठनों के लिए खुला छोड़ दिया जाता है। स्‍पष्‍ट है कि यह एप्रोच इस संभावना की कल्‍पना भी नहीं करता कि राज्‍य सांप्रदायिक शक्तियों के हाथों में आ सकता है (तब उन्‍हें कानून बनाने, और नियमों को तोड़ मरोड़ कर हिंदुत्‍व को ही एक प्रकार का लोकतंत्र बनाने की खुली छूट होगी।)

(अनुवाद : आनंद)

Tuesday, November 8, 2011

तुम्‍हें शर्मिन्‍दा नहीं होना है ‘शांति की देवी’ शर्मिला

November 08, 2011 1
तुम्‍हें शर्मिन्‍दा नहीं होना है ‘शांति की देवी’ शर्मिला

















इरोम शर्मिला के अन्न-जल त्याग की अवधि इस नवम्बर में ११ साल की होने जा रही है. अब वह राज्य की हिंसा के खिलाफ जन आंदोलनों की प्रतीक हैं. खुद कवयित्री हैं और उन पर विश्व भर से कविताएँ लिखी जा रही हैं.
राकेश श्रीमाल ने मणिपुर की संस्कृति के बीच इरोम को देखा है. सभ्यता के सातत्य में इरोम के लौह-संघर्ष को रख कर परखा है. गहरे जुड़ाव और तथ्यों के साथ इसे लिखा गया है. एक जरूरी पाठ.
साथ में इरोम पर लिखी उनकी पांच कविताएँ भी दी जा रही हैं. 
http://samalochan.blogspot.com से साभार 



राकेश श्रीमाल 

देह को मैंने अपने इस जीवन में कई दृष्टिकोणों से देखा-समझा है. खुद की देह से अनुभूत होकर और दूसरे की देह के माध्‍यम से. मुझे अक्‍सर अपनी देह से कम, दूसरों की देह से अधिक बहुआयामी अनुभव-अर्थ मिले हैं. मुझे इसीलिए रूपंकर कला की अपेक्षा प्रदर्शनकारी कलाओं में गहरी रूचि रही है. कथक मेरा सबसे प्रिय नृत्‍य है. लखन घराने के लच्‍छू महाराज (बिरजू महाराज के चाचा) के साथ तबला संगत करने वाले उस्‍ताद आफाक हुसैनकी महफिलों में लखन कथक घराने पर कई सारी शामें कथक की इसी दुनिया के वैचारिक भ्रमण पर गुजारी हैं. मेरी कविताओं में अगर कहीं सौन्‍दर्य होता है तो वह बेशक कथक के ही समय-असमय अनुभूत हुए प्रभाव-प्रवाह ही हैं. कथक की अपनी अमूर्तता की तरह कविता का अमूर्त भाव मुझे सबसे अधिक खींचता है. दमयंती जोशी और सितारा देवी मेरी अपनी मनपसंद देह-उपस्थिति रही हैं. इन दोनों वरिष्‍ठ नृत्‍यांगनाओं के साथ कई बैठकों में हुई लंबी-लंबी औपचारिक-अनौपचारिक बातचीत मेरे अनुभव संसार का दुर्लभ खजाना है.

देह को लेकर गरिमामय सम्‍मान सहित धैर्य हमेशा मेरा संगी रहा है. अस्‍ताद देबू की अमूर्त नृत्‍य-संरचनाओं से लेकर कोलकाता के पेन्‍टोमाइम आर्टिस्‍ट निरंजन गोस्‍वामी औरचंद्रलेखा की देह-शोध पर आधारित नृत्‍य प्रस्‍तुतियों को देखना-समझना मेरे अपने जीवन का वैभव रहा है. सौभाग्‍य से इस मामले में मैंने अपने आप को कभी निर्धन नहीं समझा.ब.व.कारंतफ्रिट्ज बेनेविट्स और अलखनंदन के रंग-निर्देशन में मुझे आंगिक पक्ष सबसे प्रिय रहा है. इस दुनिया का सारा वजूद, उसका इतिहास और उसकी समकालीन उपस्थिति मुझे इसी देह में बंधी दिखती है. विचारधाराओं, क्रांतियों और दौर-बदलाव को मैं इसी देह की उपज समझता हूं. अपने इसी यथार्थवादी भ्रम से मुझे सुख भी मिलता है.

मेरे लिए देह अपने आकार से अधिक निराकार में बसती है. यही देह मेरे लिए कभी शब्‍दों में ठिठकी खडी रहती है, कभी अपने आंगिक-वाचिक अभिनय में, तो कभी बेहद उल्‍लसित हो नृत्‍य-मुद्राओं में. तितली की देह तो मुझे जादू की तरह ही लगती रही है. किसी एक्‍वेरियम में मछलियों को देखते हुए मुझे देह की शास्‍त्रीय लयकारी से हर बार नया मृदुल परिचय मिलता रहा है. पूर्णिमा के बाद अपने ही आकार में मंथर गति से सकुचाती चंद्रमा की देह आज भी मेरे नितांत निजी अकेलेपन को अपने साथ बांटने में ना-नुकुर नहीं करती.

गांधी ने अपनी देह पर जितना प्रयोग किया है, क्‍या आज वैसा कोई करने का सोच सकता है.....मेरे अपने ही पास इसका उत्‍तर हाँ में है. इस 5 नवंबर 2011 को इस आत्‍म प्रयोग के लंबे 11 बरस पूरे हो रहे हैं. इरोम शर्मिला नामक वह अकेली देह अपने साथ जो प्रयोग कर रही है, वह अचम्भित कर देने वाला है. इरोम शर्मिला ने ये साबित कर दिया है कि एक अकेली देह किस तरह व्‍यापक जनसमाज की, उसकी संस्‍कृति की और उसकी अस्मिता की मूक अभिव्‍यक्ति बन सकती है. 21 वी सदी का यह समूचा शैशव अपने दिक्-काल की उस अविस्‍मरित कर देने वाली नृत्‍य-शिराओं को इरोम की देह में स्‍पंदित कर रहा है. इरोम की देह नैसर्गिक संपदा से भरी मणिपुर की जमीन बन गई है. उसी जमीन पर मणिपुर अपनी भोली-भाली और मातृभूमि से प्रेम करती जीवन की गति को बचाने में लगा हुआ है.

इतिहास बताता है कि लाइमा लाइस्‍ना ने अपने पूर्ववर्ती राजा-रानियों की तरह मणिपुर में अपना राज्‍य स्‍थापित किया था. लाइमा और उनके भाई चिंगखुंग पौइरेथौन अपने स्‍वजातीय समुदाय के साथ पूरब के एक भूमिगत इलाके से आये थे. यह पौइरेथौन मणिपुर में अपने साथ पहली बार अग्नि लाए थे. वह अग्नि विषम परिस्थितियों में आज भी इंफाल घाटी के गांव आंद्रो में प्रज्‍जवलित है.

अग्नि के अपने चारित्रिक गुणों को चकमा देती इसी अग्नि की एक नन्‍हीं लौ इरोम शर्मिला की समूची देह में अपनी नीरवता के साथ उपस्थित है. अपने होने की तरफ ध्‍यान देने का विनम्र आग्रह करती हुई. अपनी बित्‍ते भर की रोशनी के चलते दुनिया-जहान को यह संदेश फैलाती हुई कि भरी-पूरी शांत जीवन शैली के साथ अमानवीयता हो रही है. भूमंडलीकरण में सिमट चुके ओर नित-नई तकनीकी से अपने आपको गर्वित करते समय में एक अकेली देह एक बडी लड़ाई लड रही है. उसकी देह में बसी जीभ की स्‍वाद ग्रंथि भी अपने कर्तव्‍य से निष्क्रिय होकर इस लड़ाई का दिशा-निर्देश कर रही है. उसकी देह की देखने की शक्ति ने तितलियों, हरी-भरी जलवायु और अपनी मातृभूमि के विशाल प्राकृतिक वैभव को देखे जाने की सहज इच्‍छा को फिलहाल बेरहमी से ठुकरा दिया है. ग्‍यारह वर्ष पहले का देखा हुआ संचित दृश्‍य-अनुभव ही उस देह की स्‍मृति में किसी बावली उपस्थिति बनकर वास करता है. स्‍त्री देह की प्रकृति का अपना मौसम, अपनी इच्‍छाएं और अपना ही नियंत्रण होता है. लेकिन उस अकेली देह में जिद से भरा एक तपस्‍या जैसा पवित्र नियंत्रण ही शेष बचा है. अपने जन-समाज की समवेत सहज जायज इच्‍छाओं को अपने में समेटे. इसे अन्‍ना हजारे के संक्षिप्‍त अनशन से तुलना करना नाइंसाफी होगा. अपने गहरे और गहन अर्थों में यह अन्‍न-जल त्‍याग का अनशन मात्र नहीं है. यह एक देह का आत्‍मीय उत्‍सर्ग है, अपनी इसी क्षणभंगुर देह के अध्‍यात्‍म के सहारे किया जा रहा पवित्र संघर्ष है. यह मणिपुर का समकालीन स्‍त्री युध्‍द है. स्‍त्री युध्‍द को मणिपुर में नूपीलोन कहा जाता है. वहां दो नूपीलोन बहुत प्रसिध्‍द हुए हैं. इसे संयोग ही कहा जाएगा कि मणिपुर के दूसरे नूपीलोन को वर्ष 1939 में शर्मिला की दादी ने देखा भी था. मणिपुरी महिलाओं के जुझारूपन पर मणिपुरी संस्‍कृति को भी गर्व है.

शर्मिला को सगेम पोम्‍बा बहुत पसंद रही है. यह एक खास किस्‍म का व्‍यंजन होता है जो पानी में पैदा होने वाले पौधों, उनकी जड़ों, सोयाबीन, फलियों ओर खमीर से बनाया जाता है. लेकिन जैसा कि शर्मिला ने अपनी एक कविता की पंक्ति में लिखा है- मेरा मन मेरे शरीर के प्रति लापरवाह है. समझा जा सकता है कि उस शरीर ने ही उस मन को लापरवाह बनाया है.
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मैं केवल आत्‍मा नहीं हूं. मेरा भी अपना शरीर है और उसकी अपनी हलचल है. इरोम

निश्चित तौर पर इरोम शर्मिला की देह उसकी आत्‍मा का सुरक्षा कवच नहीं है. अगर आत्‍मा कहीं होती है तो इरोम शर्मिला की आत्‍मा मणिपुर के समस्‍त फूलों, धान और शब्जियों के खेतों और दुब के हर एक तिनके में समाकर सहज-सरल जीवन जीते हुए सुरक्षित जीवन जीने की आकांक्षी है. कभी सना लाइबेक (स्‍वर्ण देश) कहा जाने वाला मणिपुर आज अपनी ही नाभि (यानी लांबा किला) से अपना ही गणतांत्रिक पुर्नजन्‍म लेने को अधीर है. मणिपुर की अधिकांश पहाड़ी जमीन पर ढलानों पर उतरती चढती हवाएं भी गोया अपना चैन सुकून पाने के लिए करबध्‍द प्रार्थना कर रही हैं.

अतीत की सिहरती हवाओं से पता चलता है कि 17 वी शताब्‍दी तक मणिपुर आत्‍मनिर्भर और सुदृढ राष्‍ट्र था. इतिहास की अनिवार्यता समझे जाने वाले युध्‍द तत्‍व का दंश भी इस देश ने सहा है. बर्मा के साथ इसके कई बार युध्‍द हुए. अठाहरवी सदी के पूर्वाध्‍द में इसके काफी बडे हिस्‍से पर बर्मा ने कब्‍जा कर लिया था. तब ईस्‍ट इंडिया कंपनी की मदद सेमहाराजा गंभीर सिंह ने घमासान लड़ाई लड़ते हुए अपने देश के हिस्‍से को बर्मा से छुडाया था. यहीं से ईस्‍ट इंडिया कंपनी की बुरी नजर इस पर लग गई. अंतत: 18 वीं शताब्‍दी के अंतिम दशक में एंग्‍लो-मणिपुर संग्राम में अंग्रेजों ने जीत हासिल कर ली. संक्षिप्‍त में यह जान लेना जरूरी है कि 19 अगस्‍त 1947 को गवर्नर-जनरल माउंटबेटन और तात्‍कालिकमहाराज बोधचंद्र के दरमियांन स्‍टैंड-स्टिल एंग्रीमेंट हुआ जिसमें मणिपुर को डोमेनियन दर्जा दिया गया. भारत और पाकिस्‍तान के बटंवारे के साथ 15 अगस्‍त 1947 को मणिपुर एक स्‍वतंत्र देश घोषित कर दिया गया. तब बडे उत्‍साह के साथ कांग्‍ला फोर्ट में यूनियन जैक को हटाकर पाखांग्‍बा के चित्रवाला मणिपुरी ध्‍वज फहरा दिया गया.

आज जिन दुरूह आंतरिक परिस्‍थतियों से मणिपुर जूझ रहा है दरअसल इसकी शुरूआत 21 सितम्‍बर 1949 को मणिपुर महाराज और भारत सरकार के साथ मणिपुर विलय समझोतेपर हुए परस्‍पर हस्‍ताक्षरों के पीछे अदृश्‍य पार्श्‍व भूमिकाओं के साथ शुरू हो गई थी. इसमें भारत में सम्मिलित होने के प्रस्‍ताव की मंजूरी थी. 15 अक्‍तूबर 1949 से यह समझोता लागू होना था. मणिपुर के जनामानस को इसमें षडयंत्र की बू नजर आई और यह विलय अपने होने के पहले से ही विवादस्‍पद हो गया. अपनी जमीन को अपना देश मानने वाली भावनाओं के साथ यह किसी खिलवाड से कम नहीं था. एक व्‍यापक जन भावना की लगभग अनदेखी करते हुए 26 जनवरी 1950 को मणिपुर भारत का प्रदेश घोषित कर दिया गया.

अपनी ही जमीन, अपना ही पर्यावरण और अपनी ही संस्‍कृति के साथ रहते हुए वहां के जन-मानस के लिए यह किसी निर्वासन से कम हादसा नहीं था. भारत राष्‍ट्र और मणिपुर प्रदेश को एक दूसरे को समझने में लंबा समय लगना ही था. जाहिर है एक बडा जन आक्रोश इन सबके साथ पनप रहा था, जो अपनी पूर्ण स्‍वतंत्रता चाहता था. दो विश्‍वयुध्‍द देख चुका विश्‍व को नक्‍शा अपने इस छोटे भौगोलिक अंश को यह समझाने में नाकाम था कि उसे भारत जैसे राष्‍ट्र की सुरक्षा मे अपना अस्तित्‍व बचाए रखना है. जन-मानस का अपनी ही जमीन के प्रति प्रेम एक अरसे बाद कितना विषाक्‍त हो सकता है यह मणिपुर के प्रदेश बनने के बाद के दशकों में खोजा जा सकता है.

यह एक निर्विवाद कटु सत्‍य है कि मणिपुर से आर्म्‍ड फोर्सेज स्‍पेशल पावर्स एक्‍ट को हटा लेना मात्र ही मणिपुर में शांति बहाल करने के लिए पर्याप्‍त नहीं है. तेजी से बदलते स्‍थानीय आंतरिक परिदृश्‍य ने प्रदेश बनने के चार दशकों में ही भूमिगत विद्रोहों की अच्‍छी-खासी संस्‍थागत श्रृंखलाओं की शुरूआत कर दी थी जो आज भी बदस्‍तूर जारी है. हालात इतने बदतर हैं कि सुरक्षाकर्मियों और विद्रोही भूमिगत संगठनों के आपसी घमासान में आम जन-मानस ही निशाने पर है. यह सुरक्षा प्रदान करने और स्‍वतंत्र होने की दबी इच्‍छा की इकलौती पतली झुलती रस्‍सी पर खेला जा रहा युध्‍द है जिसमें रक्‍त केवल और केवल मानवीयता का ही बह रहा है. शांति पाने की यह अदम्‍य इच्‍छा उस कस्‍तूरी मृग की तरह ही है जो कस्‍तूरी की चाह में इधर उधर कुलांचे मार रहा है, शायद यह जानते या नहीं जानते हुए कि वह तो उसकी नाभि में ही है.

बात केवल राज्‍य वर्सेस विद्रोही संगठन की ही नहीं, इसमें कई और मुश्किल गांठे लग चुकी हैं. मसलन जल और उर्जा संसाधनों का गलत बटवांरा, सरकार द्वारा सार्वजनिक हित में आम लोगो  की जमीन हड़पना और सबसे बढ़कर स्‍थानीय समुदायों के बीच का व्‍यापक एतिहासिक तनाव. इन सब बड-खाबड विषम परिस्‍थतियों में इरोम शर्मिला की देह उस शांति की मांग कर रही है जो एक विस्‍तृत समाज विज्ञान की दूरबीन से देखने पर ही शायद दिखाई पड सकती है. पिछले तीन दशकों से दो दर्जन से अधिक विद्रोही भूमिगत संगठन इस जमीन पर अपना मोर्चा खोले हुए हैं. इनमें यू एन एल एफ सबसे बडा है. अन्‍य संगठनों में जौनी रिवल्‍यूशनरी आर्मीकुकी लिबरेशन आर्मी, नेशलन सोशलिस्‍ट कांउसिल आफ नागालैंड (आई.एम.), नेशनल सोशलिस्‍ट कांउसिल आफ नागालैंड (के.), खांग्‍लाइपाक कम्‍युनिस्‍ट पार्टी, रिवल्‍यूशनरी पीपुल्‍स फ्रंट, पी एल ए, प्रीपाक, कुकी नेशनल आर्मी और कुकी लिबरेशन आर्गेनाइजेशन मौजूद हैं. एक बडी मांग स्‍वतंत्रनागालिम यानी ग्रेटर नागालैंड की भी है जिसके खिलाफ यूएनएलएफ सक्रिय है. उसका  मानना है कि इस मांग से मणिपुर का लगभग आधा हिस्‍सा नागालैंड में चला जाएगा. पिछली शताब्‍दी के अंतिम दशक से ही मणिपुर स्‍था‍नीय दंगों और त्रासद हिंसक वारदातों के बीच सांस ले रहा है. वहां अक्‍सर ही नागा-कुकी, कुकी-आओगी, कुकी-पाइले, मेइतेइ-पागांल और प्रोइतेइ-नागा संप्रदायों में आपसी मतभेद वहां की स्‍थानीय शांति को विध्‍वंस करते हुए रक्‍तरंजित साबित हुए हैं.

निश्चित ही यह भयावह परिदृश्‍य है. सरकार सुरक्षा प्रदान करने की अपनी सरकारी पेशकश के साथ प्रस्‍तुत है जो यदा-कदा अमानवीय हो जाती है. एक तरह से सुरक्षा के नाम पर एक माफिया का जन्‍म विकराल रूप धारण कर चुका है. विद्रोही संगठन उस व्‍यवस्‍था से आर-पार की असफल लड़ाई लड रहे हैं. ऐसे में इरोम शर्मिला की अकेली देह चुपचाप पवित्र यज्ञ की आहुति की तरह इसी काल चक्र में विनम्रता के साथ उपस्थित है. क्‍या इक्‍कीसवीं सदी में इरोम शर्मिला की शांति पाने की शौरहीन आर्तनाद किसी को सुनाई दे रही है...या वह शांति पाने की इच्‍छा मणिपुर के अपने विशिष्‍ट फूलों, धान और सब्जियों के रूप-गंध मे समाहित होकर अपने तई इसे बचाए रखने का प्रयत्‍न कर रही है.

एक मणिपुरी लोककथा के मुताबिक डजीलो मोसीरो नाम की एक खूबसूरत स्‍त्री  पर ईश्‍वर बादल की तरह मंडराया और अपनी बदलियों से भरी छाया उसके साथ छोड़ गया. फलस्‍वरूप उसके दो पुत्र हुए ओमेई (देवता) और ओकेह (इंसान). उसी ओमेई के तीन बेटे हुए जो मेलेईनागाओ और कोलाइर्म संप्रदायों में बटँकर आज आपस में ही लडाई कर रहे है. तब क्‍या मणिपुर की अशांति ईश्‍वर-प्रदत्‍त है..... 

मणिपुर के अधिकांश देवी-देवता प्रकृति से जुडे हैं. वहां मानव शरीर के विभिन्‍न हिस्‍सों को लेकर मंदिर बने हुए हैं. मणिपुरी संस्‍कृति में नश्‍वर देह अपनी विशिष्‍ट अमरता के साथ लोक जीवन में व्‍याप्‍त है. सोराहेन वहां वर्षा के देवता है. थौंगरेन को मृत्‍युदेव माना जाता है. माइरांग को अग्निदेवता माना जाता है. फाउबी देवी ने मणिपुर में जगह-जगह घूमकर खेती की कला फैलाई थी. एक प्रचलित लोक मान्‍यता है कि वह जहॉं भी जाती थी, अपना एक पति बना लेती थी. फाउबी स्‍वंय अपनी मृत्‍यु के बाद धान का पौधा बन गई. तब से उसे धान की देवी कहा जाता है.

मणिपुर की शांति ओर सौहाद्रता चाहने वाले जन-मानस को अब यह समझ लेना चाहिए कि इरोम शर्मिला की देह अब शांति की देवी बन गई है. एक ऐसी शांति की देवी जो अपने को पूज्‍यनीय नहीं, केवल अपने माध्‍यम से सर्वत्र शांति को समझे जाने का निमित्‍त बनी हुई है. इरोम शर्मिला की देह में बसी उस शांति की देवी को राज्‍य, कानून, बुध्दिजीवी और समाज शास्त्रियों को संवेदनशील होकर समझना होगा. मणिपुर के लिए यह आंदोलन मात्र नहीं है, संस्‍कृति रक्षक आपात आवश्‍यकता है. इसे मणिपुर की स्‍थानीय आंख से ही देखा-समझा जाना चाहिए.

यह सुखद है कि राष्‍ट्रीय-अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर मानवाधिकारों को समर्पित संगठन इरोम शर्मिला के शांति-यज्ञ में शामिल हैं. संयुक्‍त राष्‍ट्र मानवाधिकार समिति, पीपुल्‍स युनियन फॉर सिविल लिबर्टीज, इंडिया सोशल एक्‍शन फोरम जैसी कई संस्‍थाएं इसका समाधान चाहती हैं. लेकिन तब तक मणिपुर का अपना समाज शास्‍त्र अपने साथ कई उथल-पुथल मचा चुका होगा. मणिपुर का सबसे लोकप्रिय पर्व निगोल चौकाबा अपनी अहमियत को ही अंगूठा दिखाने लगा है. यह राखी जैसा ही पर्व होता है. इसमें भाई अपनी बहनों को अपने घर निमंत्रित करते हैं और उन्‍हें यथसंभव सम्‍मान देते हैं. लेकिन अब वहां भाई ही उस कानून के खिलाफ खडे हो गए हैं जिसमें बहनों को भी पैतृक संपति का हिस्‍सेदार बनाए जाने का अधिकार है. यह काल के क्रूर पंजो से निकली विडम्‍बना नहीं तो और क्‍या है....

यह कितना दुखदायी है कि मई 2007 में दक्षिण कोरिया के क्‍वांकतू शहर के नागरिकों ने जब इरोम शर्मिला को प्रतिष्ठित मानवाधिकार पुरस्‍कार दिया तब भारत सरकार ने शर्मिला को खुद वहां जाकर यह पुरस्‍कार स्‍वीकार करने की अनुमति नहीं दी. यह उल्‍लेखनीय है कि यह दक्षिण एशिया का सबसे प्रतिष्ठित मानवाधिकार पुरस्‍कार है. जो इरोम शर्मिला के पूर्व अफगानिस्‍तान की मलालाई जोया, एशियन हयूमन राइट्स कमीशन हागकांग के बेसिल फर्नाडों, श्रीलंका के मान्‍यूमेंट फार दि डिस्‍अपीयर्ड की डांदेनिया गमागे जयंती, इंडोनेशिया के अर्बन पुअर कंसोशिर्यम के वर्दाह हफीदज, पूर्वी तिमोर के क्‍सानाना गुस्‍माओं और म्‍यांमार की आंग सा सू की को मिल चुका है. यह पुरस्‍कार शर्मिला के भाई सिंहजीत ने साहसी मायरा पाइबी के कार्यकर्ताओं और मणिपुर की संघर्षरत जनता के नाम शर्मिला की तरफ से प्राप्‍त किया.

यह अच्‍छी पहल है कि श्रीनगर से इंफाल तक शर्मिला के लिए जनकारवां पिछले दिनों निकाला गया. 10 राज्‍यों को पार करता यह 4500 किलोमीटर यात्रा का कारवां था, जोश्रीनगर से चलकर लुधियाना, पानीपत, करनाल, दिल्‍ली, पटना लखन, कानपुर, गौहाटी होते हुए इंफाल पहुंचा. अपने पडावों पर रूकते हुए इस कारवां ने स्‍थानीय संगठनों के साथ सेमिनार आयोजित किए और शांति की इस पहल को बढाया.

अदूरदर्शी नीति-निर्धारकों और विध्‍वंसकारी ताकतों को समझ लेना चाहिए कि इरोम शर्मिला अब अकेली नहीं है. इरोम शर्मिला की देह की पृथ्‍वी ने अपने होने की उपस्थिति को व्‍यापक संवेदनशील जनमानस तक विस्‍तारित कर दिया है. केंद्र की राजनीति करने वाले और राज्‍य-विशेष तक सीमित क्षेत्रीय दलगत राजनीति  को इसे गंभीरता से लेना होगा. यह उनके लिए केवल मुद्दा मात्र बनकर नहीं रह जाए. इस पर विशेष सजगता की आवश्‍यकता है. ऐसे में जब मानवाधिकार हनन के खिलाफ मणिपुर में चल रहा यह आंदोलन दुनिया के कई हिस्‍सों में फैल चुका है, हमारे राजनीतिक दलों की चुप्‍पी हमें ही शर्मिन्‍दा कर रही है. लेकिन इरोम शर्मिला को हम सब अपनी गीली आंखों लेकिन प्रतिदिन मणिपुर की पहाडियों पर उदय होते सूरज के दृढ विश्‍वास के साथ यह यकीन दिलाते हैं कि तुम्‍हें शर्मिन्‍दा नहीं होना पड़ेगा. तुम्‍हारी देह की प्रत्‍येक शिराओं में हम सबकी ही आवाज प्रवाहित हो रही है. तुम्‍हारी देह की मांस-मज्‍जा और उसके रोम-रोम के स्‍पंदन में शांति की देवी शांति को आहुत करने के लिए प्रतिबध्‍द है. हम सब उसी निराकार शांति की देवी की स्‍तुति में अपने अपने तईं प्रयासरत हैं. आखिरकार इस दुनिया को अब उतने विकास और उतने विज्ञान की आवश्‍यकता नहीं है जितनी शांति की.


और अब कुछ कविताएं

(यह जानते हुए भी कि शब्‍दों की कविता शब्‍दों से बाहर निरर्थक है)


इरोम:एक

कौन है
जो सुन रहा है
इस पृथ्‍वी पर 
अकेला मौन तुम्‍हारा
अकेली चीख तुम्‍हारी.

इरोम:दो

यह हतप्रभ वितान
सुनता है तुम्‍हारी आंखों से कहे जा रहे
उन तमाम दृश्‍य कथाओं को
जो घट रहे हैं उसी के समक्ष
मानवता को शर्मनाक कलंक में बदलते

सुनो इरोम
सब देख सुन रहे हैं
     अपनी क्रूर आंखों और प्रमुदित कानों से
कोई असम्‍मानित कर रहा है अपनी मुस्‍कराहट
कोई जान रहा है केवल समाचार

तुम्‍हारे साथ ही खडे हैं ये समस्‍त शब्‍द
     भाषा और लिपि की वेशभूषा से बाहर
अपने होने की एकमात्र सार्थकता लिए हुए

इसलिए
और इसीलिए
शब्‍दों का सुरक्षा कवच बन गया है यह ब्रम्‍हाण्‍ड
और हम सबके हाथ
पयार्वरण बन अडिग तैनात हैं तुम्‍हारे पास

तुम हो
और केवल तुम ही रहोगी
अनवरत
हम सबकी आर्तनाद करती अबोध आवाज

इरोम: तीन

ग्रह और राशियॉं भी
डरते होंगे तुम्‍हारी देह के निकट आने को
नजर को खुद नजर लग चुकी होगी
     मौसम का चक्र भी खूब समझता होगा
तुम्‍हारी देह के लिए नहीं है बदलना उसका

तुम जहॉं हो
वहाँ तुम्‍हें देखने के लिए
प्रतिबंध लगा होगा तारों पर भी
बिना तुम्‍हारे पुर्णिमा
खुद ही ढ़ल जाती होगी अमावस्‍या में

कितनी चिडियाओं ने बनाए होंगे घर
कि तुम देखोगी एक मर्तबा उन्‍हें
     खेतों में उगी धान की बालियॉं
होड लगाती होंगी अपनी चुहल में
तुम्‍हारी देह में समाहित होने के लिए

तुम्‍हारी देह भी सोचती होगी
     सहेलियों फूलों और बरसात के प्रति
निष्‍ठुरता तुम्‍हारी
चुप हो जाती होगी फिर
तुम्‍हारे अपने बनाए मौसम का साम्राज्‍य देखकर

तुम समय में नहीं जी रही हो इरोम
समय तुम में जी रहा है
अपनी बेबस गिड़गिड़ाहट के साथ
हम सब देख पा रहे हैं
कंपकपाते समय के समक्ष
तुम्‍हारी निश्‍छल अबोध मुस्‍कराहट


     इरोम:चार

     कितना कुछ शेष है अभी
     भला-भला और खूबसूरत सा

     किसी गिलहरी की चपलता जैसा
     गुम हो जाना है समय की क्रूरता

     तर-बतर होना है तुम्‍हें
     खांगलेई की बरसात में
     बचपन की सहेलियों के साथ

     हवाओं की सरपट बहती इच्‍छाओं में
     शामिल हो जाना है तुम्‍हें
     तराइयों में टहलने के लिए
     कांग्‍ला फोर्ट में बैठकर
     पुनर्जन्‍म लेना है
     मणिपुर की शाश्‍वत नाभि से

     इसी जन्‍म में
     गले मिलना है बहुत देर तक
     अपनी माँ से
     सुबकती हुई खुशी के साथ

     बहुत कुछ शेष है अभी
     अशेष हो जाने के लिए

     इरोम:पांच

     एक इरोम शर्मिला है
     एक और मीरा है

     एक मणिपुर है
     एक और कृष्‍ण है

     एक समय है
     एक और बाँसुरी है
     एक विष का प्‍याला है
     एक और साजिश है

     एक कविता है
     केवल यही थोड़े से शब्‍द हैं.

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कवि, कहानीकार,संपादक और संस्कृतिकर्मी


http://samalochan.blogspot.com से साभार