06/01/2012 - 07/01/2012 - रूबरू

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Saturday, June 16, 2012

राज्य कर रहा है अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों का हनन

June 16, 2012 0
राज्य कर रहा है अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों का हनन

मासूमों पर निशाना
-राम पुनियानी
 कल्याण में पिछले (मई 2012) माह भिलाल शेख नामक एक मुस्लिम युवक पर गैर-जमानती धाराओं के तहत अपराध दर्ज कर लिया गया। सड़क पर लाल सिग्नल को पार करने के छोटे से अपराध के लिए उस पर भारतीय दण्ड संहिता की धारा 333 के अंतर्गत मुकदमा कायम किया गया। पुलिसकर्मियों से बहस करने पर उसकी जमकर पिटाई की गई। उसके दाहिने हाथ की हड्डी टूट गई और उसे आठ दिन जेल में बिताने पड़े। जिन पुलिसकर्मियों ने उसकी पिटाई की थी उन पर मामूली धाराएं लगाईं गईं और वे बहुत जल्द जेल से बाहर आ गए।

मोहम्मद आमिर खान जब 18 वर्ष का था और अपनी स्कूल की परीक्षा की तैयारी में व्यस्त था तब उसे पुलिस ने उसके घर से उठा लिया। उस पर आरोप था कि वह दिल्ली श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों का मास्टरमाईंड था। उस पर दर्जनों धाराओं के तहत मुकदमें लाद दिए गए। वह 14 साल तक जेल में रहा, जिस दौरान उसे घोर शारीरिक यंत्रणा भोगनी पड़ी। अंततः, वह सन् 2012 में जेल से बाहर आ सका जब अदालत ने उसे निर्दोष घोषित कर बरी कर दिया।

मालेगांव और हैदाराबाद की मक्का मस्जिद में हुए बम धमाकों-जिनके लिए बाद में असीमानंद, प्रज्ञा सिंह ठाकुर एण्ड कंपनी को जिम्मेदार पाया गया-के बाद दर्जनों मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार कर जेलों में डाल दिया गया। अजमेर और समझौता एक्सप्रेस धमाकों के बाद भी यही हुआ। इन सभी मामलों में मुस्लिम युवकों को पुलिस को बाद में छोड़ना पड़ा क्योंकि उनके खिलाफ कोई सुबूत नहीं थे। परंतु उनकी जेल यात्रा ने उनका जीवन बर्बाद कर दिया। कईयों की पढ़ाई बीच में ही छूट गई और उनका एक अच्छा कैरियर बनाने का स्वप्न ध्वस्त हो गया।

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साईसिंज, मुंबई द्वारा किए गए सर्वेक्षण की हालिया (जून 2012) जारी रपट में कहा गया है कि महाराष्ट्र की जेलों में बंद कैदियों में मुसलमानों का प्रतिशत 36 है जबकि महाराष्ट्र की कुल आबादी का वे मात्र 10.60 प्रतिशत हैं। यह सर्वेक्षण महाराष्ट्र राज्य अल्पसंख्यक आयोगद्वारा प्रायोजित  था। यह रपट, सच्चर समिति के निष्कर्षों की पुष्टि करती है और इससे साफ हो जाता है कि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा इस बाबद समय-समय पर व्यक्त की जाती रहीं आशंकाएं निर्मूल नहीं हैं।

हर अपराध के सिलसिले में मुसलमानों की बड़ी संख्या में गिरफ्तारी के पीछे है यह मान्यता कि मुसलमान अपराधी और आतंकवादी हैं। मुसलमानों के संबंध में ये पूर्वाग्रह समाज में तो व्याप्त हैं ही, नौकरशाही, पुलिस और गुप्तचर सेवाओं के अधिकारी भी इन पूर्वाग्रहों से गहरे तक ग्रस्त हैं। अधिकांश पुलिसकर्मियों की सोच घोर साम्प्रदायिक है और इसलिए वे मुसलमानों को प्रताड़ित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते। समाज के साम्प्रदायिकीकरण और विशेषकर अल्कायदा ब्रांड आतंकवाद के उदय के बाद, मुसलमानों के संबंध में पूर्वाग्रह और गहरे हुए हैं। यहां यह महत्वपूर्ण है कि अल्कायदा आतंकवाद का जनक अमरीका था जिसने तेल के कुओं पर कब्जा करने के अपने राजनैतिक लक्ष्य की पूर्ति के लिए इन तत्वों को प्रोत्साहन और मदद दी। हमारे देश का तंत्र काफी हद तक अल्पसंख्यक-विरोधी है और इसके कारण उसकी कार्यप्रणाली में तार्किकता और वस्तुपरकता का अभाव है। कानून की बजाए पूर्वाग्रह हमारे अधिकारियों और पुलिसकर्मियों के पथप्रदर्शक बन गए हैं।
राज्यतंत्र द्वारा मुस्लिम युवकों को निशाना बनाए जाने के कई कारण हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि घोर निर्धनता के कारण कुछ मुस्लिम युवक अपराध की दुनिया में दाखिल हो जाते हैं और इसका फल वे भोगते भी हैं परंतु मुसलमानों को जिस बड़ी संख्या में पुलिस के हाथों प्रताड़ना झेलनी पड़ती है उसके पीछे हैं उनके बारे में फैलाए गए मिथक।

साम्प्रदायिक दंगों को भड़काने में हमेशा से बहुसंख्यकवादी साम्प्रदायिक ताकतों की प्रमुख भूमिका रही है। विभिन्न दंगा आयोगों की जांच रपटों के तीस्ता सीतलवाड द्वारा किए गए अध्ययन (कम्यूनलिज्म काम्बेट, मार्च 1998) बताता है कि अधिकतर दंगों को भड़काने के लिए आरएसएस से जुड़े संगठन उत्तरदायी थे। इनमें से कुछ ऐसे थे जो पूर्व से ही अस्तित्व में थे और कुछ का गठन विषेष रूप से दंगा भड़काने के लिए किया गया था। मुंबई में सन् 1992-93 के दंगों के लिए श्रीकृष्ण जांच आयोग ने मुख्यतः शिवसेना को दोषी ठहराया था। यद्यपि मुसलमानों का देश की आबादी में प्रतिशत 13.4 है (जनगणना 2001) तथापि दंगों में मारे जाने वालों में से नब्बे प्रतिषत मुसलमान होते हैं। पुलिस और कई बार राजनैतिक नेतृत्व के व्यवहार और दृष्टिकोण से मुसलमानों में असुरक्षा का भाव उपजता है।

इस संबंध में सबसे व्यथित करने वाली बात यह है कि आमतौर पर यह माना जाता है कि मुसलमान ही दंगे शुरू करते हैं। डाक्टर व्ही. एन. राय, जिन्होंने देश में साम्प्रदायिक हिंसा का विशद अध्ययन किया  है, का मत है कि अधिकांशतः ऐसी परिस्थितियां बना दी जाती हैं जिनके चलते अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों को पहला पत्थर फेंकने पर मजबूर होना पड़ता है। इसके बाद, वे हिंसा के शिकार तो होते ही हैं उन्हें हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार भी कर लिया जाता है।

पिछले कुछ सालों में हुए आतंकी हमलों और उनके संबंध में पुलिस का दृष्टिकोण इस तथ्य की पुष्टि करता है। मालेगांव, अजमेर, जयपुर व समझौता एक्सप्रेस धमाकों के लिए मुस्लिम युवकों को दोषी ठहराकर उन्हें सलाखों के पीछे धकेल दिया गया था। पुलिस ने उनके विरूद्ध झूठे सुबूत गढ़ लिए थे और उनका संबंध पाकिस्तानी आतंकी गुटों से जोड़ दिया गया था। इस मामले में सिमी, पुलिस का पसंदीदा संगठन था। हर आतंकी हमले के लिए सिमी कार्यकर्ताओं को दोषी ठहरा दिया जाता था। उस समय भी कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और अन्यों ने यह आशंका व्यक्त की थी कि पुलिस की जांच प्रक्रिया और उसके निष्कर्ष ठीक नहीं हैं परंतु पुलिस हर बम धमाके के बाद मुसलमानों को गिरफ्तार करने से बाज नहीं आई। उन्हें लश्कर-ए-तैय्यबा, इंडियन मुजाहीदीन, सिमी या किसी अन्य संगठन का सदस्य बताकर आतंकी हमलों का दोष उनके सिर मढ़ दिया जाना आम था। उस समय कई सामाजिक संगठनों ने परोक्ष और प्रत्यक्ष रूप से यह कहा था कि इन हमलों के पीछे किन्हीं दूसरी ताकतों का हाथ होने के संकेत हैं। परंतु पूर्वाग्रहों का चश्मा पहने पुलिसकर्मियों को कुछ नजर नहीं आया।

यह सिलसिला तब बंद हुआ जब हेमन्त करकरे ने सूक्ष्म जांच के बाद, मालेगांव धमाकों के तार साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर से जुड़े होने के पक्के सुबूत खोज निकाले। इसके बाद स्वामी दयानंद पाण्डे, ले. कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित, पूर्व मेजर उपाध्याय, स्वामी असीमानंद व अन्य कई हिन्दुत्ववादी नेताओं का ऐसा गुट सामने आया जो आतंकी हमले करवाता रहा था। तब जाकर यह साफ हुआ कि पुलिस एकदम उल्टी दिशा में काम कर रही थी। इस पर्दाफाश के बाद मानवाधिकार संगठन अनहदने बलि के बकरे और पवित्र गायेंनामक जनसुनवाई का हैदराबाद में आयोजन किया। इस सुनवाई की रपट में जांच एजेन्सियों और राज्य की कुत्सित भूमिका सामने आई। भगवा आतंकी संगठनों के मुखियाओं की गिरफ्तारी के बाद देश में बम धमाकों का सिलसिला थम गया।

इसके बाद भी पुलिस के दृष्टिकोण में कोई विषेष बदलाव नहीं आया है और आज भी सड़कों और थानों में उनके व्यवहार में अल्पसंख्यकों के प्रति उनके पूर्वाग्रह साफ झलकते हैं। राज्यतंत्र, पुलिस और गुप्तचर एजेन्सियों के पूर्वाग्रहग्रस्त दृष्टिकोण के कारण कई मुसलमान युवकों के जीवन और कैरियर  बर्बाद हो गए हैं। इससे अल्पसंख्यक समुदाय की प्रगति बाधित हुई है। कई मौकों पर मुसलमानों ने ही आतंकी हमलों के लिए दोषी ठहराए गए अपने समुदाय के सदस्यों का सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार किया। इससे उन मासूमों के दिलों पर क्या गुजरी होगी, यह समझना मुश्किल नहीं है। अब समय आ गया है कि मानवाधिकार संगठन, मासूम मुस्लिम युवकों को जबरन आपराधिक मामलों में फंसाए जाने के खिलाफ मज़बूत अभियान चलाएं। पुलिस की मनमानी पर रोक ज़रूरी है। यह जरूरी है कि पुलिस और गुप्तचर एजेन्सियां मुसलमानों के संबंध में अपनी गलत धारणाएं त्यागें और अपना काम निष्पक्षता से करें। जितनी जल्दी सरकार इस मामले में प्रभावी कदम उठाएगी, उतना ही बेहतर होगा।

मुसलमानों को कानून के हाथों प्रताड़ित होने से बचाने के अतिरिक्त उनके विरूद्ध समाज में फैले मिथकों से मुकाबला भी बहुत ज़रूरी है। ऐतिहासिक और समकालीन मुद्दों को लेकर मुसलमानों के खिलाफ जमकर दुष्प्रचार किया जाता रहा है। इस दुष्प्रचार का प्रभावी मुकाबला होना चाहिए और सच को समाज के सामने लाया जाना चाहिए। सरकार के साथ-साथ सामाजिक संगठनों का भी यह कर्तव्य है कि वे व्याख्यानों, कार्यशालाओं, छोटी-छोटी पुस्तिकाओं और मीडिया के जरिए इस मुद्दे पर जनजागृति अभियान चलाएं। 

(मूल अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद: अमरीश हरदेनिया)  
 (लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे, और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।) 

Thursday, June 7, 2012

प्रेस-विज्ञप्ति- मध्य प्रदेश मैं अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासियों के साथ हिंसा अत्याचार की लेकर केन्द्रीय गृहमंत्री को ज्ञापन

June 07, 2012 0
प्रेस-विज्ञप्ति- मध्य प्रदेश मैं अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासियों के साथ हिंसा अत्याचार की लेकर केन्द्रीय गृहमंत्री को ज्ञापन



प्रेस-विज्ञप्ति
भोपाल 05 जून 2012 राष्ट्रीय सेक्युलर मंच एवं अन्य संस्थाओं ने केन्द्रीय गृहमंत्री श्री पी. चिदम्बरम से अनुरोध किया है कि केन्द्र सरकार साम्प्रदायिक दंगे नियंत्रित करने के लिए प्रस्तावित कानून को शीघ्रातिषीघ्र संसद से पारित करवाए। सन् 2004 से यह कानून बनाने की चर्चा चल रही है परन्तु दुःख की बात है कि अभी तक यह प्रस्तावित कानून संसद से पारित नहीं हो पाया है। 
इन संस्थाओं की ओर से श्री चिदम्बरम को एक ज्ञापन सौंपा गया। इस ज्ञापन में गृहमंत्री को यह सूचित किया गया कि मध्यप्रदेष सरकार ने शासकीय सेवकों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस की गतिविधियों में भाग लेने की इजाजत दे दी है। यह एक अत्यधिक खतरनाक निर्णय है जिसके दूरगामी परिणाम होंगे। मंच ने गृहमंत्री से इस निर्णय को निरस्त करवाने में हस्तक्षेप की मांग की है।
यहां जारी एक विज्ञप्ति में मंच के संयोजक एल एस हरदेनिया ने बताया कि ज्ञापन में प्रदेष के दलितों की दयनीय स्थिति की ओर भी गृहमंत्री का ध्यान आकर्षित किया गया है। प्रदेष में छोटे-छोटे मुद्दों को लेकर दलितों पर ज्यादती की जाती है। यह अफसोस की बात है कि दलितों की स्थिति की ओर तो शासन ध्यान दे रहा है और ही राजनैतिक दल उन्हें संरक्षण दे रहे हैं। 
यह ज्ञापन राष्ट्रीय सेक्युलर मंच,युवा संवाद और नागरिक अधिकार मंच द्वारा संयुक्त रूप से दिया गया। 

PRESS RELEASE

Bhopal June 06 2012. Rashtriya Secular Manch has sought Union Home Minister’s. intervention in restoring the ban on Government servants participation in the activities of Rashtriya Swaymsevak Sangh (RSS). In a memorandum submitted to Shri P. Chidambaram during his visit to Bhopal the Manch informed him that the Madhya Pradesh Government has lifted the ban on RSS which was in force for several decades. The Manch said that participation of Government servants in the RSS activities may have serious implication. It has a potential to culminate in the subversion of democracy.
According to a press note issued by L. S. Herdenia, Convener of the Manch the memorandum also drew Home Minister’s attention to socio-economic boycott of Dalits in many villages of the state. It is regrettable that neither the Government nor the political parties have extended protection to them .
The memorandum which was also supported by Yuva Samvad and Nagrik Adhikar Manch, urged the Minister to take urgent steps to enact the proposed law to control virus of communal riots. 


Sunday, June 3, 2012

ASIAN HUMAN RIGHTS COMMISSION Urgent Appeal

June 03, 2012 0
ASIAN HUMAN RIGHTS COMMISSION  Urgent Appeal


Caste-based discrimination against ‘untouchable’ Ahirwar in Madhya Pradesh





Dear friends,

The Asian Human Rights Commission (AHRC) has received information concerning caste-based discrimination in the implementation of the Mid-Day-Meal scheme in Maregaon Village of Tehsil Gadarwara, Narshingpur, Madhya Pradesh. The monstrous failure of provincial authorities to distribute such welfare to those most in need is believed to be a reaction to a specific decision by the Ahirwar community to abandon the oppressive practice of carrying the carcasses of dead beasts imposed on them by the varna (upper) castes. Instead of actively resisting pervasive stereotypes of caste, the local government itself perpetuates parochial prejudices long rendered unconstitutional and commits acts of discrimination punishable by law.

The deprivation of adequate food, water and employment necessary to a person’s health and well-being, to a person’s right to life and to his or her inherent dignity is a crime against humanity. The provision of such is a responsibility that falls to the state. We urge you to write in to appeal to the relevant authorities to take actions against the officers responsible for these crimes against Ahirwar community and to restore to these victims their rights and access to water, food and employment. In so doing, we hope to not only assist these victims but countless others by stirring up compassion and a sense of duty in the central government. In so doing, we urge the government to strengthen rule of law throughout the land, which will win them the hearts of their people and bring about a lasting peace.

CASE NARRATIVE:

Yuva Samvad, Nagrik Adhikar Manch and National Secular Forum conducted an investigation on 2 May 2012 in Maregaon Village of Gadarwara Tehsil of Narsinghpur district and uncovered the following details:

Maregoan Village has a population of approximately 2000 individuals. Out of these, 100 families are of the Ahirwar community. Dalits make up most of the agricultural labourers in this area, where Ahirwars (Chamars) compose a majority of the Dalits. The Ahirwar are classified as a Scheduled Caste in India. Ahirwar are spread across Gadarwara and in nearly all adjoining villages, playing an important role in the socioeconomic activities of the region. The Lodhi community in Maregaon village belong to what is termed in India as the ‘Other Backward Class’ (OBC). They own farmland and generally hire Ahirwar to cultivate their fields.

Division of labour in the community has resulted in the imposition of certain menial and lowly occupations upon the Ahirwar. For centuries, the Ahirwar have been tasked to do “dirty” jobs such as carrying the carcasses of animals. Despite the necessity of such workers, and for forcing them to take up such jobs, the Ahirwar are seen as being polluted by death and greatly despised. The Ahirwar are made to live in a hamlet separated from the main village.

In 2009, the Ahirwar Samaj Mahaparishad built a consensus among the Ahirwar community to abandon the practice of carrying the carcasses of animals and shake off the label of “untouchable” imposed by the dominant castes. This decision was first acted upon by three or four individuals and was soon claimed by other Ahirwar. In response, individuals from dominant castes began a social and economic boycott against the Ahirwar. The Ahirwar were not permitted to pass through the village and were forced to take a longer route in order to travel to other villages. The Ahirwar were prohibited from taking rations from the local shopkeeper; even the local milk vendor was intimidated by the Lodhi into not selling milk to the Ahirwar. The Ahirwar were even more cruelly persecuted through the denial of water from the hand pump located near the village temple. Prior to their decision to abandon the practice of carrying animal carcasses, the Ahirwar were still permitted to use this hand pump because there had been two at the time and the villagers were not facing a shortage of water. Today, the Lodhi have fenced in and put wire around the temple and areas surrounding it – this includes the hand pump the Ahirwar depended on for their water. In addition to such mistreatment and deprivation, the Ahirwar were further prohibited from using water from a communal water tank. This tank was also fenced in with wire by the Lodhi. The Ahirwar’s cattle were also not permitted to partake of water from the tank. The Ahirwar face a severe shortage of water at this present time.

Children of the oppressed castes are forced to clean the school while children from dominant castes are not. The school also discriminates through seating arrangements in class. To exacerbate the situation, the cook engaged in preparing the Mid-Day-Meal in Maregaon Village is a Lodhi. Despite efforts by authorities to relieve malnutrition in the area by implementing a Mid-Day-Meal scheme, the Ahirwar children who most require the sustenance are discriminated against. They are served only leftovers, if there are any, and the food is given to them from a distance. The Ahirwar children are also forced to bring their own plates while other students from the dominant castes are served from plates provided by the school. The children from the Ahirwar community are also fed insufficient amounts of food and punished for asking for more. Instead of the social, economic and intellectual progress thatmight be expected in the world’s largest democracy, Madhya Pradesh looks increasingly like Dickensian London. “Please, sir, I want some more” – will the authorities intervene, or participate in the silencing of such cries for help by refusing to?

Finally, the report exposes shockingly poor implementation of the Apex Court’s orders concerning the Government Food, Employment and Welfare Schemes to prevent hunger and malnutrition among the people of Maregaon Village. Central to this failure has been the wrong identification of Below Poverty Line (BPL) families. Of the more than 100 Ahirwar families who conduct manual labour for a living, only 20-25 families have been issues the PBL card. Many live in terrible conditions and should also be included on the BPL list but have not been. Most Ahirwar are deprived of the benefits of the government scheme that targets BPL families. The Ahirwar have job cards but only two to three individuals have found employment under the NREGA scheme while the rest languish, unemployed and “unemployable” due to their caste affiliation. So far local officials have not acted to discipline such blatant acts of discrimination and assure the Ahirwar of protection against future abuses.

Although plans and efforts by the government to alleviate hunger and malnutrition are commendable, the government should also pursue the goal of correct implementation of such schemes. To foolproof the programme would be the only responsible thing to do, especially in light of the recent reports made against abuses in the system. While the government may not actively discriminate against the Ahirwar, to passively watch other actors do so – to refuse to act – is a betrayal of a common humanity; it means to be complicit in such acts of violence and inhuman, degrading treatment. This is unforgivable for an administration powerful enough to carry out punitive actions against perpetrators and practically assist this neglected and long-oppressed segment of society.

Entire paradigms must be radically altered for real and sustainable change. Human beings have to recognise above all things the equality and inherent dignity of fellow human. Only by acknowledging a common humanity can we hope to evade the violence that proceeds from other exclusive and necessarily reductive identities (religious, ethnic, linguistic, gender, national, political affiliations). The residents of Maregaon Village can begin to mend the rifts in their community’s social fabric by permitting the Ahirwar occupations of their own choosing, by paying the Ahirwar for services rendered and by learning to dissociate the derogatory label of “untouchable” from menial but freely chosen jobs. Such critical re-evaluation of their beliefs would not only restore the dignity of the Ahirwar but serve the dominant class by freeing them to participate in free market systems, to have healthy and peaceable relationships with their neighbours. As with all social reform, this will take effort and time. Yet the state bears a more immediate obligation to its people, to the Ahirwar. The state must release the Ahirwar from their servitude, inhuman and degrading treatment, poor standards of living and oppression at the hands of the Lodhi. Without urgent intervention, the Ahirwar and their children face continued caste-based discrimination and an uncertain future.

ADDITIONAL INFORMATION:

Rights are not merely privileges; they are entitlements. And the Ahirwar have been robbed of these entitlements.

The 1948 Universal Declaration of Human Rights (UDHR) laid out some guidelines concerning the protection of the protection of individuals’ fundamental rights. By virtue of being human, the Ahirwar are, ”without distinction”, fully entitled to enjoy such rights and liberties as set forth in the Declaration, and the Indian state is expected to bear the responsibility of providing access to and protection of such rights (Article 2). Relevant to this case of discrimination are Articles 3, 4, 5, 23 and 25, which collectively assert that every human has a right to life, liberty and security of person, work, free choice of employment, just and favorable conditions of work, protection against unemployment, equal pay for equal work, just remuneration for an existence worthy of human dignity, a standard of living adequate for health and well-being, including food, housing, medical care, social services and security in the event of unemployment or lack of livelihood in circumstances beyond his control. Children are entitled to special care and assistance. The Ahirwar also have rights against servitude and cruel, inhuman or degrading treatment.

The 1966 International Covenant on Civil and Political Rights (ICCPR), which India ratified in 1979, reiterate such rights in Articles 6 (right to life, protected by law), 7 (right against cruel, inhuman and degrading treatment), 8 (right against servitude and forced or compulsory labour), 24 (right of the child to protection without discrimination), 26 (all persons are equal before the law and are entitled without discrimination to the equal protection of the law). The Indian state is bound by international law to upholding these rights.

India’s own Constitution, that came into effect in 1950, declaims discrimination on grounds of religion, race, sex, place of birth and caste. Article 15(2) (a) and (b) state that no citizen shall be denied access to the use of wells, tanks, bathing ghats, roads and public places dedicated to the use of the general public. Article 15(3) and (4) go further still to endorse affirmative action and promote special provisions for the most vulnerable sectors of Indian society: women, children, members of socially and educationally backward classes of citizens, Scheduled Castes, Scheduled Tribes. Article 16 stipulates ”equality of opportunity in matters of public employment” and also permits positive discrimination to increase the participation and representation of the same vulnerable groups of individuals in the civil service but also prohibiting discrimination on the grounds already mentioned. Article 17 of the Indian Constitution crucially abolishes “untouchability”, a most extreme form of discrimination wherein the lowest caste in society is deemed “unclean”, shunned and ostracized. Article 17 is not only stating an ideal to be worked towards – it categorically and permanently criminalises such a practice. Yet this label continues to blight the lives of hundreds of thousands in India, and persist as reality for the Ahirwar in Madhya Pradesh. It is an impossible and soul-destroying reality that disgraces India. It is a reality that can and should be fought by the government’s every last ounce of strength and willpower.

Legislations such as the Untouchability (Offences) Act 1955, the the Protection of Civil Rights Act 1955 and the Scheduled Castes and Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 provide the enforcement architecture to constitutional guarantees against caste-based discrimination and other entrenched practices concerning untouchability. However the enforcement of these legislations is a far cry of what it ought to be. Several other factors adversely affect the implementation of affirmative penal laws intended to prevent discrimination; a corrupt and inept policing system, caste-prejudices of police officers, prosecutors and judges further inhibit the enactment of these legislations. Thus the deterrance effect of penal laws like the Scheduled Castes and Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 is diminished and caste-based atrocities continue in India. The case at hand is one such example.

SUGGESTED ACTION:

Please write to the authorities mentioned below demanding a thorough investigation into this case. The suffering of the Ahirwar must be ameliorated and vindicated. The first step may be achieved by officials simply ensuring the proper implementation of existing welfare schemes providing food and employment. The police who wield jurisdiction over the area should exercise their authority and see to the removal of the fences and wires that separate the Ahirwar and their cattle from life-sustaining water. Families living in squalid conditions and obviously below the poverty line should be given their ration cards at the earliest possible moment. Officials should send inspectors at regular intervals to monitor the discrimination faced by Ahirwar children in schools and during mid-day meals. The Ahirwar should also be interviewed to see how many are currently being coerced
into taking up certain jobs or who are not being fairly paid. A long-term educational/publicity effort can also be made to introduce the basic concepts of human and constitutional rights to Maregaon Village. This will allow the Ahirwar to be more assertive in demanding their rights and gradually facilitate a realisation by members of the dominant caste that common humanity should inspire compassion and respect for others, regardless of their gender, occupation and political, religious, linguistic, caste or ethnic affiliations. This will also have the effort of highlighting the government’s resolve to uphold rule of law in India. The international community will also be assured of India’s commitment to international treaties and obligations.

The AHRC is also writing separate letters to the UN Special Rapporteur on the Right to Food, the Special Rapporteur on contemporary forms of racism, racial discrimination, xenophobia and related intolerance, and the Chairperson of the Committee on the Rights of the Child calling for further intervention in this case.


To support this appeal, please click here: