12/01/2012 - 01/01/2013 - रूबरू

सरोकारों और बदलाव को समर्पित ब्लॉग

About

test

Tuesday, December 25, 2012

महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी चाहिए

December 25, 2012 0
 महिलाओं की सुरक्षा की गारंटी चाहिए
-- अंजलि सिन्हा



दिल्ली गैंगरेप की घटना के विरोध में लोगों का गुस्सा चौतरफा देखा जा रहा है। न केवल सत्ता के शिखर तक उसकी आग पहुंची है, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों में भी लोग, जिनमें स्त्रियां और पुरुष, दोनों शामिल हैं, प्रदर्शन कर रहे हैं। यह सरगर्मी गली-मुहल्ले में भी देखी जा रही है, जहां लोग लड़कियों-स्त्रियों की सुरक्षा के स्थायी उपाय खोजने की मांग कर रहे हैं।

हमारे समाज में अकसर बलात्कार की घटना के बाद पीड़िता को ही दोषी ठहराने की मानसिकता का बोलबाला है। लोग पीड़िता के पहनावे पर सवाल उठाते हैं या फिर यह बताने लगते हैं कि लड़कियों को क्या पहनना चाहिए और क्या नहीं। इसके विपरीत, इस बार यह एक सकारात्मक बात दिख रही है कि लोग खुद कह रहे हैं कि हम अपनी लड़कियों को घर में कैद नहीं कर सकते और न ही हर सार्वजनिक स्थल पर या लड़की जहां जाए, वहां उसे परिवार की निगरानी में रख सकते हैं।

आखिर, लड़की होने का खामियाजा लड़कियां कब तक भुगतती रहेंगी, इसलिए सुरक्षित समाज तो अब चाहिए ही है। इस गुस्से का फूटना एकदम जायज है और इसे और व्यापक बनाया जाना चाहिए। खास बात यह है कि यह लड़ाई बिना नेता के लड़ी जा रही है। यह अन्ना हजारे या रामदेव का आंदोलन नहीं है। जनता अपनी लड़ाई स्वयं लड़ रही है। जनता की लड़ाई रणनीति बनाकर किए गए आंदोलन के मुकाबले ज्यादा कारगार होती ही है। यह बात अलग है कि सरकार जनता की सुन नहीं रही। फिर भी, इसको आगे बढ़ाना होगा। इसे तब तक जारी रखना होगा, जब तक सुरक्षित समाज गढ़ा नहीं जाता।

आईसीयू में जिंदगी और मौत से जूझ रही पीड़िता से मिलने के लिए अस्पताल प्रशासन ने सिर्फ दो मिनट के लिए अंदर जाने की इजाजत दी थी। होश में आते ही पीड़िता ने पूछा-उन्हें पकड़ लिया क्या?’ दूसरी बात उसने एक चिट पर लिखकर मां से कही-मां मैं जीना चाहती हूं।’ लगातार पांचवें ऑपरेशन के बाद भी लड़की का पाचनतंत्र काम नहीं कर रहा है व अंदरूनी कई अंग बुरी तरह जख्मी हैं। लड़की के हौसले को सलाम करना पड़ेगा।

मगर, गौरतलब यह भी है कि देशव्यापी आक्रोश के बावजूद लड़कियां स्वयं को सुरक्षित मानने की गलती नहीं कर सकतीं। इस घटना के दो दिन बाद ही गाजियाबाद के विजयनगर डिवाइडर पर एक लड़की गंभीर स्थिति में सुबह पांच बजे पुलिस को मिली। लड़की को किसी वाहन से वहां फेंका गया था। उसकी हालत गंभीर बनी हुई है। आशंका जताई जा रही है कि उसके साथ बलात्कार हुआ है, उसके शरीर के कई हिस्सों पर चोटों के निशान हैं तथा उसे कोई जहरीला पदार्थ भी पिलाया गया है।

उधर, इसी समय सिलीगुढ़ी के बागडोरा थाना क्षेत्र में एक 18 वर्षीय लड़की को बलात्कार के बाद बलात्कारियों ने आग के हवाले कर दिया। बुरी तरह जली लड़की अस्पताल में जिंदगी के लिए जूझ रही है, जिसके बचने की संभावना कम बताई जा रही है। इसी दौरान मुगलसराय (उत्तरप्रदेश) में भी एक 16 वर्षीय लड़की को उसके मामा द्वारा हवस का शिकार बनाने या सुदूर दक्षिण के बेंगलुरू में एक जनरल स्टोर के मालिक द्वारा 14 वर्षीय बच्ची के साथ किए गए अत्याचार की खबर आई है। मध्यप्रदेश से तो रोज दो-तीन खबरें आ ही रही हैं।

इन खबरों को पढ़कर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि वातावरण कितना दहशत भरा होता जा रहा है। लड़कियां या तो घर से बाहर निकलने में डरें और अगर वे निकल जाएं, तो माता-पिता अपनी बेटी की चिंता में परेशान रहें। यहां सवाल यह उठता है कि अपराधी तत्व इतने बर्बर कैसे हो गए हैं कि वे किसी लड़की-महिला को इंसान तक नहीं मानते? वे उसके साथ वैसा व्यवहार करने में भी नहीं झिझकते, जैसा व्यवहार कोई सभ्य व्यक्ति पशु के साथ भी नहीं कर सकता।

सवाल सरकार से भी है कि आखिर घटना घट जाने के बाद ही उसे सख्ती क्यों याद आती है? वह ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं कर पाती है, ताकि यह दरिंदगी हो ही न पाए? अभी तक कानूनों को सख्त बनाकर उन पर अमल का इंतजाम क्यों नहीं हुआ और फास्ट ट्रैक कोर्ट को स्वीकृति मिलने के बाद भी वह क्यों नहीं बन सके?

अब जाकर दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर अनुरोध किया कि वे दिल्ली में फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने की प्रक्रिया तेज करें। गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने भी संसद में कहा कि वे सुनिश्चित करेंगे कि इस मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में हो। यानी, ऐसे सभी मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में नहीं होगी, सिर्फ इसी मामले की सुनवाई होगी, जबकि देश यह चाहता है कि बलात्कार के सभी मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक अदालतों में ही हो।

सरकार यदि दृढ़-इच्छाशक्ति दिखाए, तो जल्द सुनवाई और अपराधियों को सजा कैसे संभव है, इसका उदाहरण राजस्थान में मिलता है, जहां एक विदेशी पर्यटक के साथ हुए दुराचार के मामले में घटना के महज 15 दिन के अंदर सारी सुनवाई पूरी करके आरोपियों को सजा सुना दी गई थी। ऐसी त्वरित कार्रवाई अन्य सभी मामलों में हो, ताकि पीड़िताओं का न्याय-व्यवस्था पर भरोसा बन सके और वह मामले को भूलकर अपनी नई जिंदगी शुरू कर सके। अभी तो यही होता है कि मामला अदालतों में पंद्रह-बीस साल तक लंबित रहता है और तब तक पीड़िता की जिंदगी का वह दुखद अध्याय खुला ही रहता है।

यह पूछा जाना भी जरूरी है कि थानों का जेंडर बैलेंस क्यों नहीं ठीक किया गया, ताकि वहां का वातावरण महिलानुकूल (वूमेन फ्रेंडली) बन सके और लड़कियां अपनी शिकायतें लेकर वहां आसानी से जा सकें? यदि दिल्ली की पुलिस में महिलाओं का प्रतिशत पांच से आगे नहीं बढ़ सका है, तो हम बाकी राज्यों की कल्पना ही कर सकते हैं। सभी सार्वजनिक दायरों में अगर महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा मिलता, तो बड़ी संख्या में उनकी उपस्थिति पुरुष वर्चस्व वाले वातावरण को बदलती, साथ ही अपराधी तत्वों पर अंकुश का माहौल बनता।

इस घटना के बाद मीडिया में यह समाचार भी आया है कि देश के विभिन्न महानगरों की 92 फीसदी महिलाएं स्वयं को असुरक्षित महसूस करती हैं। वाणिज्य एवं उद्योग मंडल (एसोचैम) के सामाजिक विकास संस्थान की ओर से जारी रिपोर्ट से जुड़ा यह सर्वेक्षण दिल्ली, मुंबई, पुणो, कोलकाता, बेंगलुरू, हैदराबाद, अहमदाबाद, देहरादून, भोपाल सहित अनेक शहरों में किया गया।

रिपोर्ट में बताया गया है कि हर 40 मिनट में एक महिला का अपहरण होता है। शहरों की सड़कों पर हर घंटे एक महिला छेड़खानी की शिकार होती है। देश में हर 24-25 मिनट में एक बलात्कार की घटना होती है। प्रश्न है कि स्त्रियों को इस असुरक्षा से मुक्ति कैसे और कब मिलेगी? बेशक, शासन-प्रशासन दोषी है, मगर समाज भी अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। आखिर, बलात्कारी किसी पेड़ से नहीं टपकते। इन दरिंदों ने कहां से सीखा कि मौज मस्ती के लिए किसी के साथ जोर जबर्दस्ती की जा सकती है, जैसे कि राजधानी की घटना के आरोपियों ने पुलिस के सामने स्वीकार किया कि वे मस्ती के मूड में थे।

उन्होंने क्यों नहीं दूसरों का सम्मान करना सीखा और उनकी नजरों में लड़कियां उपभोग की वस्तु कैसे बन गईं? कानून, थाने या अदालत की भूमिका तो अपराध की घटना घटने के बाद बनती है, पर उससे पहले ऐसी मानसिकता तैयार करने का जिम्मेदार तो हमारा पूरा समाज है। जब कोई एक गुट या समूह एक साथ किसी आपराधिक घटना में शामिल होता है, तब उनमें से कोई एक भी प्रतिरोध क्यों नहीं करता कि हमें ऐसा नहीं करना चाहिए?


जाहिर है कि परिवार में लड़कों को महिलाओं का सम्मान करना नहीं सिखाया जा रहा है। यानी, हम अपने समाज को क्लीनचिट नहीं दे सकते। दिल्ली की घटना के बाद वह आक्रोशित है। अब उसे दो काम करने होंगे। एक यही कि वह सरकार को फास्ट ट्रैक अदालतें बनाने के लिए मजबूर करे ही, तो दूसरा यह कि लड़कों को लड़कियों का सम्मान करना सिखाया जाए। जागरूक समाज यह दोनों काम कर सकता है, इसमें कोई शक नहीं है।

courtesy-http://www.rajexpress.in

Thursday, December 20, 2012

एक तस्वीर ने बर्बाद की ज़िंदगी

December 20, 2012 0
एक तस्वीर ने बर्बाद की ज़िंदगी

जून 2009 में तेहरान में हुए प्रदर्शनों में एक महिला की गोली मार कर हत्या कर दी गई और जल्द ही निदा आग़ा सुल्तान तेहरान में हुए इन प्रदर्शनों का चेहरा बन गईं.
फर्क सिर्फ इतना है कि जिस चेहरे को लेकर लोगों का गुस्सा और उनकी सहानुभूतियां उमड़ीं वो चेहरा निदा आग़ा सुल्तान का नहीं बल्कि एक विश्वविद्यालय की प्राध्यापक निदा सुल्तानी का था.




निदा सुल्तानी की ज़बानी..उनकी आपबीती:

निदा आगा सुल्तान के लिए प्रोफेसर निदा की तस्वीर के साथ मार्च करते लोग.
''इक्कीस जून 2009 को सुबह जब मैं अपने दफ्तर पहुंची और अपना ईमेल खोलकर देखा तो पाया कि मेरे फेसबुक अकाउंट पर दोस्ती के 67 प्रस्ताव आए हुए थे. अगले कुछ घंटों में इनकी संख्या बढ़कर 300 हो गई.मुझे नहीं मालूम था कि मेरी तस्वीर और मेरा नाम दुनिया भर की वेबसाइटों और टीवी प्रसारणों में आ चुका था।
दरअसल जिस विश्वविद्यालय में मैं कार्यरत थी, वहां के छात्र परिसर में धरना दे रहे थे और चूंकि मैं दाखिला बोर्ड में थी, इसलिए रोजाना के समय पर घर नहीं पहुंच पाई। मैं उस शाम काम में ही लगी रही, जब मुझे किसी अनजान शख्स ने एक ईमेल भेजा। ईमेल में मैंने प़ढ़ा कि निदा आगा सुल्तानी- जो कि मेरा नाम भी है- नाम की एक और लड़की एक दिन पहले तेहरान की सड़कों पर मारी गई थी। चूंकि उसके बारे में कहीं कोई जानकारी उपलब्ध नहीं थी, तो यह शख्स फेसबुक पर ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा था, साइट की दूसरी निदा सुल्तानों को एक-एक कर छांटते हुए।
घर पहुंचने पर मैंने पाया कि मेरे पास छात्रों, सहकर्मियों, दोस्तों और रिश्तेदारों के फोन आ रहे थे, `हमने तुम्हें सीएनएन पर देखा, हमने तुम्हें बीबीसी पर देखा, हमने तुम्हें फॉक्स न्यूज पर देखा, हमने तुम्हें फारसी-ईरानी चैनलों पर देखा।अंतरराष्ट्रीय मीडिया मेरे फेसबुक खाते की एक तस्वीर को निदा आगा सुल्तान की मृत्यु के फुटेज के साथ जोड़कर इस्तेमाल कर रहा था।

जिन लोगों ने मुझे पिछले दिनों फेसबुक पर अनुरोध भेजे थे, मैंने ऐसे तमाम लोगों की दोस्ती मंजूर कर ली थी, इनमें कई अंतरराष्ट्रीय पत्रकार और ब्लॉगर थे। मैंने उन्हें बताया कि यह एक चूक है। मैं वह शख्स नहीं हूं जिसे एक दिन पहले गोली मारी गई है।

कुछ ब्लॉगर्स ने इसके बाद अपडेट लगा दिए, लेकिन पत्रकारों ने मेरा संदेश मिलने के बावजूद कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई। मेरी तस्वीर बाजाब्ता इस्तेमाल की जाती रही।

मुझे ढेर सारे नफरत भरे संदेश मिले। लोगों ने मुझ पर ईरान के इस्लामी गणराज्य की एजेंट होने का आरोप लगाया, जिसने निदा के फेसबुक अकाउंट तक पहुंच बना ली थी और अब मैं विरोध और प्रतिरोध की प्रतीक बन चुकी, उनकी नायिका का चेहरा बिगाड़ना चाहती थी।


खुद निदा आगा सुल्तान के परिवार ने भी निदा की प्रामाणिक तस्वीरें जारी कीं। आप स्वयं कल्पना कर सकते हैं कि वह परिवार किस त्रासद हाल में रहा होगा और निदा की तस्वीर लगाने में उन्हें कुछ समय लग गया- करीब ४८ घंटे बाद उन्होंने पहली तस्वीरें जारी कीं।

तब तक मेरी तस्वीर पूरे विरोध आंदोलन और उस शहीद के चेहरे के तौर पर खूब स्थापित और प्रचारित हो चुकी थी। मीडिया इसे असली शहीद, असली निदा की मृत्यु की तस्वीरों के साथ-साथ चला रहा था। यह देखना बेहद हास्यास्पद था कि किस तरह फेसबुक की एक साधारण-सी तस्वीर इतनी बड़ी भूल का सबब बन सकती थी।


लेकिन यह देखना और भी अफसोसनाक था कि मेरी तस्वीर निदा आगा सुल्तान के वीडियो के साथ-साथ चल रही है। जब मैंने देखा कि दुनिया भर में लोग मेरी तस्वीर के साथ प्रदर्शन कर रहे हैं, दरगाहें खड़ी कर रहे हैं, मोमबत्तियां जला रहे हैं, तो ये बैठकर अपनी ही मय्यत देखने के बराबर था। बेशक, मैं जानती थी कि यह मैं भी हो सकती थी- उस बेचारी, मासूम लड़की की नियति मेरी नियति भी हो सकती थी। निदा सुल्तान की मौत ने जिस तरह बाहरवालों का ध्यान ईरान की तरफ खींचा था, उससे ईरानी हुकूमत परेशान थी। तीन दिन के भीतर खुफिया मंत्रालय के एजेंट मेरे घर आ धमके और उन्होंने मुझे एक मुलाकात के लिए बुलाया।

वे चाहते थे, कोई रास्ता निकले, जिससे निदा आगा सुल्तान के खून का दाग उनके हाथ से धुल जाए। मेरा नाम और चेहरा इस पहेली का इकलौता हिस्सा था, जिसे वे अपने फायदे में इस्तेमाल कर सकते थे।

वे यह जताना चाहते थे कि निदा आगा सुल्तान की मौत हुई ही नहीं है, बल्कि वह ईरान के खिलाफ प्रचार का एक हिस्सा है और यह फोटो मेरे फेसबुक पेज से नहीं लिया गया है। इसे यूरोपीय संघ ने जारी किया है। वे यूरोपीय संघ पर, इंग्लैंड और बेशक, अमेरिका पर आरोप लगा रहे थे।

मैंने उनके साथ सहयोग करने से मना कर दिया। जब वे समझ गए कि मैं तैयार नहीं हूं तो वे मेरे खिलाफ हो गए। मुझे याद है, एक एजेंट ने मुझसे कहा, `एक जाती शख्स के तौर पर तुम हमारे लिए अहमियत नहीं रखती हो। फिलहाल हमारी इस्लामी पितृभूमि की राष्ट्रीय सुरक्षा पर सवाल है।


मेरी स्थिति बेहद जटिल होती जा रही थी। मेरे मित्रों और सहकर्मियों ने तय किया कि मेरे संपर्क में रहने से उन्हें खतरा हो सकता है। मेरा ब्वायफ्रेंड भी इन लोगों में एक था। मेरा उससे संपर्क टूट गया।

दूसरे दोस्तों ने कोशिश की कि मैं उस पर ध्यान दूं, जो मुझे करना चाहिए। उन्होंने कहा, तुम्हें एक प्लान बी की जरूरत है। लेकिन मैं इतनी डरी हुई और हताश थी कि मैंने उनकी बात नहीं सुनी। मैं कल्पना तक नहीं कर सकती थी कि एक फोटो से मेरा पूरा जीवन बरबाद हो सकता है।

आखिरी बार एजेंट्स मेरे घर आए और मुझे अपने साथ ले गए। उन्होंने मुझे किसी और को या कोई और चीज साथ लेने से मना कर दिया। उन्होंने मुझ पर अपने मुल्क की राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगाया। मुझ पर सीआइए का जासूस होने का इल्जाम लगाया गया और कहा गया कि मैं एक इकबालनामे पर दस्तखत कर दूं। मुझे अच्छी तरह मालूम था कि ऐसे इलजाम का मतलब ईरान में मेरे लिए सजा-ए-मौत भी हो सकता है।


यह सब कुछ बस १२ दिन के अंदर हो गया। दो हफ्ते के अंदर, एक बहुत ही सामान्य जीवन जी रही अंग्रेजी साहित्य की प्राध्यापिका बनने वाली महिला से मैं ऐसी शख्स हो गई थी, जिसे अपनी मातृभूमि छोड़कर भागने को मजबूर होना पड़ा। मेरे दोस्तों ने इसका इंतजाम किया। उनकी मदद से मैंने हवाई अड्डे के एक सुरक्षा अधिकारी को घूस दी और ईरान से निकल गई। मुझे ११,००० यूरो देने पड़े। पहले मैं तुर्की गई, और वहीं पहली बार मेरे सामने राजनीतिक शरण लेने का खयाल रखा गया। इसके बाद मैं यूनान गई और अंत में जर्मनी। जर्मन सरकार ने मुझे एक शरणार्थी शिविर में भेज दिया, जहां मुझे खाने और रहने की जगह मिले और शरण की मेरी अर्जी मंजूर कर ली।

एक शरणार्थी की जिंदगी बिताना हवा में उड़ते पत्ते जैसा होता है। आप बस हवा में टंगे रहते हैं, किसी जुड़ाव का एहसास नहीं बचता। आप उखड़ चुके हैं और आपको वहां जाने की इजाजत नहीं है जहां से आप आते हैं।


मुड़कर देखती हूं तो जिन लोगों से मुझे सबसे ज्यादा नाराजगी है, वह पश्चिमी मीडिया है। वे मेरी तस्वीर इस्तेमाल करते रहे, यह जानते हुए भी कि यह उस ट्रैजिक वीडियो में दिखने वाली असली पीड़ित की तस्वीर नहीं है। उन्होंने जानबूझ कर मुझे बेइंतिहा खतरे में डाला।

अब मैं वह शख्स कभी नहीं हो सकती, जो इन चीजों के घटने से पहले थी। मैं अब भी अवसाद से गुजर रही हूं। मैं अब भी दु:स्वप्नों से गुजर रही हूं। बहरहाल, मैंने एक नई, अच्छी जिंदगी की लड़ाई लड़ने का फैसला किया है- ऐसी जिंदगी, जो मैं मानती हूं कि किसी इंसान को जीने का हक है। मुझे उम्मीद है कि वक्त गुजरने के साथ मेरे हालात बेहतर होंगे।

(निदा सुल्तानी अब ३५ साल की हैं, फिलहाल एक अमेरिकी विश्वविद्यालय की फेलोशिप पर हैं। ईरान छोड़ने के बाद उन्होंने अपने परिवार से मुलाकात नहीं की है। कुछ ईरानी अधिकारी अब भी आरोप लगाते हैं कि वे निदा आगा सुल्तान हैं और उन्होंने ही अपनी मृत्यु प्रचारित करवाई। उन्होंने अपनी मुश्किलों पर एक किताब लिखी है- माई स्टोलेन फेस)


दूसरी निदा आगा सुल्तान

वह २६ साल की थी, जब उसे तेहरान की एक सड़क पर प्रदर्शन के दौरान दिल में गोली लगी, हालांकि वह राजनीतिक सक्रियता के लिए नहीं जानी जाती थी। उसकी मृत्यु की तस्वीरें इंटरनेट के जरिए सारी दुनिया में फैल गर्इं। `द टाइम' ने इसे `इतिहास की शायद सबसे ज्यादा देखी गई मौत' बताया। उसके परिवार को सार्वजनिक शोकसभा करने से रोक दिया गया। उसकी कब्र को नापाक किया गया।

(बीबीसी से साभार। अनुवाद : प्रियदर्शन)

courtesy-http://www.shukrawar.net















Friday, December 7, 2012

हज-ईद अल अधाह (बकर ईद): एक आलोचनात्मक अध्ययन

December 07, 2012 0
हज-ईद अल अधाह (बकर ईद): एक आलोचनात्मक अध्ययन

शमशाद इलाही अंसारी-टोरोंटोकनैडा  

इस्लाम धर्म के पांच स्थायी फ़र्ज़ों में अंतिम फ़र्ज़ (धार्मिक कर्तव्य)है हज जो इस वर्ष २०११ के ६ नवंबर को सऊदी में मनाया जायेगा और ७ नवंबर को भारत सहित अन्य दक्षिणी ऐशियाई देशों मेंयह दिन सालाना हज का अंतिम दिन होता हैइसे ईद -अलअधाह,ज़ुहाबड़ी ईद भी कहा जाता है यानि कुर्बानी का त्यौहारबलिदान पर्व६३१ में पैगंबर मौहम्मद के नेतृत्व में दसियों हजार मुसलमानों ने मदीने से मक्का की यात्रा कर हज किया थाइस सफ़लहिंसा रहित हज का इस्लामी इतिहास में अपना एक महत्व हैइसी दिन पैगंबर साहब की हिजरत खत्म हुई थीइसी हज के दौरान मक्का के परिसर की सफ़ाई की गयी कोई ३०० बुतों को निकाल फ़ेका गया इस संदेश के साथ कि अल्लाह एक हैइस हिसाब से यह १३८० वां हज है (कुछ एक सालों को छोड़कर जब हज सम्पन्न न हो सका),जाहिर है यह सफ़र कोई नया नहीं एक लंबा समय गुजर चुका है और बीता हुआ हर लम्हा अपने अच्छे बुरे असर पीछे छोड़ जाता है.कोई भी आंदोलन और उसका स्वरुप वही नहीं रहता जैसा  वह अपने प्रारंभ में होइस्लाम भी उससे अछूता नहीं है जिसमें आज की तारीख तक कोई ३८० मत जन्म ले चुके हैंआज हम सिर्फ़ हज और उससे जुडी विद्रूपताओं पर ही चर्चा करेंगे.

हज यात्रा दुनिया भर से शुरु हो कर मक्का में ख़त्म होती हैमक्का में शुरु होने वाले कर्मकाण्ड इस्लामी कलेंण्डर के अंतिम माह दुह अल हिजाह के ८ वें दिन से शुरु होकर १२वें दिन को समाप्त होते हैंअधिकतर मुसलमानों को यह भ्रांति है कि हज सिर्फ़ इस्लामी पर्व हैयह सालाना समारोह मक्का में इस्लाम के उदभव पूर्व हजारों साल से होता आ रहा है जिसमें इसाई और विभिन्न पगान अरब समुदाय अपने-अपने ईष्ट देवता की मूर्ति समक्ष शिरकत करते आ रहे थेइसी धार्मिक जमावडे के चलते न केवल मक्का उक्त भूभाग का एक प्रमुख व्यवसाय केन्द्र बना बल्कि चढ़ावे के रुप में भारी रकम हर साल मक्का में जमा होती जिस पर पैगंबर मौहम्मद के कबीले का पुश्तैनी कब्ज़ा थाहज से जुडी एक पुरानी कथा हैजिसे इस्लाम में बडे कायदे से सजा लिया गया हैकथा के मुताबिक ईसा से २००० पूर्व पैगंबर इब्राहम की खुदा ने परीक्षा ली और उनके इकलौते बेटे इस्माईल को भेंट में मांग लिया,इब्राहीम अपने इकलौते बेटे को कुर्बान करने को तैय्यार हो गये और उसका गला काटने ही वाले थे कि उन्हें तत्कालीन परमात्मा ने बता दिया कि यह एक परीक्षा थी जिसमें वह उत्तीर्ण हो गये है लिहाजा उन्हें भेड़बकरी,मेंढे इत्यादि जैसे विकल्प दिये गये कि बेटे की जगह आप इन पशुओं का वध करके बलिदान कर सकते हैंयह सिलसिला तभी से चला आ रहा है न कि ६३१ ई० सेएक अन्य कथा के मुताबिक इब्राहीम के इसी नवजात पुत्र इस्माईल द्वारा अपनी ऐढी जमीन पर पटकने के कारण मक्का में जल स्रोत बना जिसे आबे ज़मज़म के नाम से जाना जाता हैइन घटनाओं का जिक्र यहूदी और इसाई धर्म ग्रंथो में है जिसे कुरान शरीफ़ में भी दोहरा दिया गया है.

ईष्ट देव को खुश करने के लिये पशुओं का वध करना सिर्फ़ इस्लाम तक महदूद नहीं हैग्रीकरोमन,यहूदीईसाई और अन्य ओरियटल धर्मों में पशुवध सामान्य रुप से प्रचलित हैमुसलमानों में इसे कुर्बानी कहा जाता हैयह शब्द हीब्रू भाषा के शब्द कोर्बान से आया है जिसका अर्थ है चढावायहूदियों के धर्मस्थल पर बाकायदा कुबार्नी दी जाती थीविडंबना यह है कि इस्लाम अपने समय से पहले के समय को दौरे जाहिलिया घोषित करता है लेकिन इसी जहालत के दौर की हज जैसी न जाने और कितने किस्से कहानियां नये सिरे से गढ़ कर जनता को परोसने से नहीं चूकताजाहिर है इस्लाम के इस अंतिम फ़र्ज को लागू करने में राजनीतिक और आर्थिक कारण अधिक प्रभावी थे और है जिन्हें मात्र धर्म और कर्मकाण्ड की चादर तले ढक दिया गया हैइस सालाना मेले के बूते मक्का और मदीने की अर्थव्यवस्था  पिछले १४०० साल से चल रही है इन शहरों को भूख से मुक्ति का यह पैगंबर मुहम्मद द्वारा दिया गया सबसे बडा वरदान हैइन दोनों जगह के ऊपर नियंत्रण करने के संघर्षों को देख कर यही स्थापित होता है कि यह प्रसंग शुद्ध रूप से आर्थिक राजनैतिक था और आज भी हैआज राजा सऊद खानदान ने इसे एक बेहतर पर्यटन उद्योग की तरह विकसित किया है और अरबों डालर खर्च करके इन धार्मिक स्थलों का आधुनिकीकरण भी किया हैकई ऐतिहासिक धरोहरों (तुर्की किलाको गिरा कर सात सितारे होटल और चकाचौंध कर देने वाले शापिंग माल खोल दिये गये हैं,होटलों में हर  नस्ल की लडकियों द्वारा वैश्यावृति की सेवायें उपलब्ध हैंखास लोगों को शराब भी मिल जाती है.

उपरोक्त भूमिका के मद्देनज़र अब मुख्य प्रश्न पर चर्चा करना सरल होगाक्योंकि पाठकगण इसके बिना इस मौजू पर कोई राय बनाने में थोड़ा समय लेतेहज के अंतिम पडाव पर हर व्यक्ति को कुर्बानी देना अनिवार्य हैजिसे वह वहां भेड़बकरीमेंढे़ऊँट,गायभैंस आदि खरीद कर देताइस वर्ष दुनिया भर से कोई ३० लाख लोगों द्वारा हज करने के इमकान हैंइस संख्या से आप वहां होने वाले रक्तपात का अनुमान लगा सकते हैंव्यवहारिक कर्मकाण्ड की विद्रूपता यह है कि मक्का में कुर्बानी करने वाला हाजी इस पशु का गोश्त खा ही नही पाताबस सुन्नत के नाम पर गुर्देकलेजी निकाल कर पका ली जाती हैं और बाकी गोश्त सरकार की चैरिटी को दान कर दिया जाता है जिसे कहा जाता है कि गरीब मुल्कों में भेजा जाता हैध्यान रहे यह व्यवस्था ८-१० साल पहले तक नहीं थी..तब यह तमाम गोश्त रेगिस्तान में दफ़ना दिया जाता था.

पैगंबर के ज़मानें में पशुवध इस लिये जायज़ हो सकता था कि इस पर्व के दौरान हजारों गरीब गुर्बों को इस बहाने खाने को गोश्त मिल जाता (दूसरे पशुपालन का काम करने वाली जातियों के पशु हर साल अच्छी कीमतों में बिक जातेजो आज भी चालू हैक्योंकि कुल गोश्त को तीन हिस्सों में बाँटतेएक हिस्सा घरदूसरा खानदान और तीसरा हिस्सा गरीबों कालेकिन जब कर्मकाण्ड चेतना पर कब्ज़ा कर ले तब कोई कूढमगज़ ही पशु की कुर्बानी उसके गोश्त को दबाने के लिये करेगाहाजियों की बडी संख्या कुर्बानी के इस कर्मकाण्ड को बजाये मक्का के अपने गृह राज्य में भी करने लगी हैंलेकिन फ़िर भीमक्का में होने वाले इस विश्व के सबसे बडे पशुवध मेले को आज की परिस्थितियों में स्वीकार किया जाना एक मुजरिमाना कार्यवाही हैन केवल संवेदना के स्तर पर बल्कि दुनिया भर में इतनी बडी खाद्य सामग्री के अपमान के कारण भी इस पर तत्काल प्रतिबंध लगे और कुर्बानी करने वाले धर्मभीरुओं को दुनिया का वह हिस्सा दिखाया जाना चाहिये जहां अकाल पडा है और अरबों लोगों के पास खाना ही नहीं पीने का पानी भी नसीब नहीं है,जब एक अरब इंसान इस पृथ्वी पर भूखा हो तब ३० लाख आदमी मक्का में कुर्बानी कर के अपने गुनाहों की माफ़ी मांगता हैहै न विडंबना..इंसान की भी और उसके इश्वर की भीधर्म अगर एक घंधा न बन गया होता तो यही हाजी और उनका हज संचालन करवाने वाले राजाक्या इस गोश्त का निर्यात पिछले ४०-५० साल से इथियोपियासोमालियासूडानकांगोंबांगलादेश जैसे देशों में नहीं कर सकतेक्या अब तक सऊदी अरब के आस पास के देशों की भूख की समस्या हल नहीं हो गयी होतीक्या यह जरुरी है कि पशुओं की कुर्बानी दी जाये...क्या इस पशु के मूल्य के बराबर पानी,दवाखाद्यान्न आदि नहीं भेजा जा सकताआज दुनिया इतनी छोटी बन चुकी है अगर इच्छा शक्ति होसंवेदना होपरोपकार की भावना हो तो बहुत से विकल्प हैं लेकिन कुरान शरीफ़ के अंतिम सत्य से आगे देखने का साहस कौन करे?

मक्का में हज के अतिरिक्त पूरी दुनिया के करीब १.५ अरब मुसलमान इस पर्व पर अपनी हैसियत के मुताबिक कुर्बानी जरुर करते हैभारत जैसे मुल्क में इस कुर्बानी का न कोई धार्मिक अर्थ रह गया है न गरीबों के प्रति किसी संवेदना कातीन दिन तक जी भर कर जानवर काटे जाते और कुर्बानी करने वाले घरों में गोश्त इतना इकट्ठा हो जाता कि उसे रखने की जगह न रहतीकुर्बानी करने वाले परिवार ही आपस में एक दूसरे के घरों से आने वाले गोश्त का विनिमय करते रहते और जिन्हें इस गोश्त की वाकई जरुरत होती वह फ़िर भी इससे महरुम ही रहतेबलि दिये गये जानवरों की खालों को आमतौर पर मदरसों-मस्जिदों को दान कर दिया जाता जिसे वह बाज़ार भावों के मुताबिक बेच कर पैसा कमातेहफ़्ते दस दिन तक मुल्लाह-इमाम-हाफ़िज की दाढि़याँ सालन की चिकनाई में तर रहतीउन्हें लगता कि देखों इस्लाम अपने उरुज़ की तरफ़ किस कदर तेज़ी से बढ़ रहा हैनव धनाढ्य मुस्लिम कई लाख-लाख रुपये का बकरा खरीद कर उसकी कुर्बानी करके समाज में अपने रुतबे का फ़ाहशी दिखावा करेंगे और न कोई मुल्लाह बोलेगा न कोई इमाम.

मुस्लिम मज़हबी नेतृत्व अपनी आत्ममुग्धता और सर्वश्रेठवादी विचार के चलते लगभग अंधा हो चुका हैजिस वर्ग के विश्वास को संचालित करने की डोर १४०० वर्ष पुरानी सोच हो उससे भला यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि मुसमानों के इस व्यवहार का इस पृथ्वी के पर्यावरण और अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड रहा है?एक अनुमान के मुताबिक बंगलादेश जैसे गरीब देश से धनपति एक लाख मुसलमान इस वर्ष हज और कुर्बानी करने के लिये लगभब ५० करोड अमेरिकी डालर खर्च कर के अपने देश के अमूल्य संसाधनों को नष्ट कर के और गरीबी की दलदल में धंस जायेगाहर वर्ष २ से ३ अरब डालर हज पर खर्च किये जाते हैं..अभी वक्त आ गया है कि मुस्लिम समाज इन सभी सवालों पर कोई वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन करेआखिर इन पंक्तियों के लेखक ने अपने अल्प जीवन में ही १९७५-७६ में दस रुपये प्रति किलो बकरे के गोश्त५ रु० किलो भैंस/कटडे का२०-२५ रु० की मुर्गी खरीदी है जो आज क्रमश:३००.००/१००.००/१५०.०० प्रति किलो पहुंच गया है क्योंक्या सिर्फ़ इसके लिये मुद्रा स्फ़ीति ही जिम्मेदार है२५ साल पहले मुर्गी का गोश्त सबसे मंहगा था जो आज उसी अनुपात के अनुसार सबसे महंगा होना चाहिये थालेकिन ऐसा इसलिये नहीं हुआ क्योंकि पोल्ट्री फ़ार्म्स के आने से उसकी सप्लाई बढ गयी...आज पशुपालन के क्षेत्र में भारत बहुत पिछडता जा रहा है जिसका प्रमुख कारण है कि इसे खाने वालों का अनुपातपालने वालों से अधिक बढाइसी कारण दूध के मूल्यों में भी बेहताशा वृद्धि पिछले २० वर्षों में ही हुई हैक्यों नहीं आज कोई फ़तवा दिया जाता कि एक बकरा वही काटे जो पहले पांच बकरे पालेभैंस को पालने वाला ही उसके कटडे को कुर्बानी दे सकने का हकदार होक्यों नहीं कुर्बानी के बराबर धनराशी का इस्तेमाल शिक्षा फ़ण्ड बना कर किया जा सकताक्यों नहीं एक इमाम हर  साल इसी एकत्रित धन से कोई इंजीनियरिंग अथवा वोकेशनल कालेज का उदघाटन कर सकताआठ-आठ,दस-दस बार उमरा और हज करने वाले अपनी मुक्ति के लिये जितने आतुर दिखाई देते हैं,वह अपने आस-पास के समाज और उनसे जुडी समस्यायें के प्रति उतने ही अंधे क्यों हैंक्यों धार्मिक नेतृत्व उन पर प्रतिबंध लगाताक्यों न यह हर साल बर्बाद होने वाला पैसा समाज से गरीबी और अशिक्षा मिटाने के लिये किया जायेक्या परलोकवादी इस्लाम से इस लोक के प्रश्न और उनके समाधान प्रस्तुत करने की दिशा में कोई उम्मीद की जानी चाहिये?क्या उन्हें यह बताने की जरुरत है कि इस त्यौहार के सात दिनों के बाद कोई गैर मुस्लिम मुसलमानों के गली मौहल्लों से बिना मुंह पर कपडा बांधे नहीं गुजर सकताक्या इस त्यौहार पर जिस तरह गलियों मेंनालियों में पशुओं का खून बहाया जाता है वह किसी शिष्ट संस्कृति का परिचायक हैक्या छोटे-छोटे मासूम बच्चों के सामने उसके बाप द्वारा बकरे,गायभैंस के गले पर छुरी फ़ेरना,उनका अनुकूलन करना नहीं हैक्या इस महीमा मंडित हिंसा को देखने वाले बाल ह्र्दय में हम कूट-कूट कर हिंसा नहीं भर देतेक्या यही धर्म हैयही आध्यात्मवाद हैहो सकता है इसकी जरुरत १४०० वर्ष पहले होलेकिन क्या आज भी इस मानसिक अत्याचार की कोई आवश्यकता है?

अभी समय आ गया है कि मुस्लिम समाज बलिदान को वास्तविक अर्थों में समझ लेबलिदान दें अपने आडंबरों काबलिदान दें अपनी मूढ़ता को त्याग करबलिदान करें अपने समाज में व्याप्त जातिवाद को त्याग करकुर्बानी ही देनी है तो दहेज न लेन दें जिसका कैंसर पूरे समाज को खा रहा है...नेता भी चुप है और मुल्लाह भीबलिदान करें- गरीब घरों में अपने बच्चों की शादी करकेबलिदान करें..किसी गरीब के बच्चे को शिक्षा दिला कर,बलिदान करें किसी चलते हुए शिक्षण संस्थान में दान करके,बलिदान करेंअपने पर्यावरण की हिफ़ाज़त करकेबलिदान करें अपने आस पडौस में सफ़ाई करकेकुर्बादी देनी है तब पशु की कीमत के बराबर अपने आस पडौस में पेड़ लगा दें/किसी बीमार को दवा ला दें/किसी अनाथालय अथवा वृद्धाश्रम में दान दे देंबलिदान करें इस समाज को शोषण से मुक्त करकेबलिदान करें अमन,भाई चारे को कायम करके..करने के लिये इतना कुछ है कि कई जीवन चाहियेंलेकिन जिन्हें सिर्फ़ जन्नत और हूरों के ख्वाब का चश्मा जन्म से मृत्यु तक चढा दिया जाता होवह इन सब मूल्यों के प्रति न केवल निष्पृह जो जाते है बल्कि अपने आने वाली पीढियों को भी एक अभूतपूर्व अंधकार में वह ढकेल जाते हैं.. जाते जाते सिर्फ़ कर्मकाण्ड और दिखावे की चुस्की उनके मुंह में लगी छोड़ देते हैंइसी चुस्की को जाने वाला स्वंय जीवन भर चूसता रहता और इसी को आने वाले के मुंह में छोड़ जाता है...क्या यह सिलसिला कभी टूटेगाक्या सिर्फ़ अपनी मुक्ति चाहने वाला  यह समाज  लगातार बढ़ रहे  विद्रूपताओं के कोढ़ से खुद को और समाज को मुक्त कर पायेगा