07/01/2013 - 08/01/2013 - रूबरू

सरोकारों और बदलाव को समर्पित ब्लॉग

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Wednesday, July 31, 2013

कविता - इस व्योपारी को प्यास बहुत है

July 31, 2013 0
कविता - इस व्योपारी को प्यास बहुत है
पहाड़ के जल, जंगल और जमीन के सरोकारों को लेकर अपनी कविताओं के जरिए जन-जन से संवाद करने की ताकत रखने वाले मशहूर जनकवि गिरीश तिवारी 'गिरदा' को याद करते हुए हम यहाँ उनका एक गीत प्रुस्तुत कर रहे हैं !  'गिरदा' जी  का जन्म 10 सितंबर, 1942 को अल्मोड़ा के एक गांव में हुआ था. अपने ओज और अक्खड़पन के कारण वो 'गिरदा' नाम से लोकप्रिय हुए.बहुमुखी प्रतिभा के धनी 'गिरदा' लोकधुनों और लोकमंच के तो जानकार थे ही, उनके गीत चिपको आंदोलन, वन आंदोलन, नशा विरोधी आंदोलन, अलग राज्य के उत्तराखंड आंदोलन और नदी बचाओ आंदोलन की पहचान थे.पहले का लिखा उनका यह गीतपूँजी और मुनाफे  के रथ पर स्वर विनाशकारी विकास पर सवाल उठाता है 



एक तरफ बर्बाद बस्तियाँ – एक तरफ हो तुम।
एक तरफ डूबती कश्तियाँ – एक तरफ हो तुम।
एक तरफ हैं सूखी नदियाँ – एक तरफ हो तुम।
एक तरफ है प्यासी दुनियाँ – एक तरफ हो तुम।

अजी वाह ! क्या बात तुम्हारी,
तुम तो पानी के व्योपारी,
खेल तुम्हारा, तुम्हीं खिलाड़ी,
बिछी हुई ये बिसात तुम्हारी,

सारा पानी चूस रहे हो, 
नदी-समन्दर लूट रहे हो,
गंगा-यमुना की छाती पर
कंकड़-पत्थर कूट रहे हो,

उफ!! तुम्हारी ये खुदगर्जी,
चलेगी कब तक ये मनमर्जी,
जिस दिन डोलगी ये धरती,
सर से निकलेगी सब मस्ती,

महल-चौबारे बह जायेंगे
खाली रौखड़ रह जायेंगे
बूँद-बूँद को तरसोगे जब -
बोल व्योपारी – तब क्या होगा ?
नगद – उधारी – तब क्या होगा ??

आज भले ही मौज उड़ा लो,
नदियों को प्यासा तड़पा लो,
गंगा को कीचड़ कर डालो,

लेकिन डोलेगी जब धरती – बोल व्योपारी – तब क्या होगा ?
वर्ल्ड बैंक के टोकनधारी – तब क्या होगा ?
योजनकारी – तब क्या होगा ?
नगद-उधारी तब क्या होगा ?
एक तरफ हैं सूखी नदियाँ – एक तरफ हो तुम।
एक तरफ है प्यासी दुनियाँ – एक तरफ हो तुम।

Sunday, July 28, 2013

नरेन्द्र मोदी का सरदार पटेल के प्रति प्रेम

July 28, 2013 0
नरेन्द्र मोदी का सरदार पटेल के प्रति प्रेम
झूठ और दुष्प्रचार में हिटलर के साथी गोएबल्स को भी मात दे रहे है मोदी

शमसुल इस्लाम

गुजरात के मुख्यमंत्री और हिंदुत्व आइकन नरेंद्र मोदी ने 11 जून, 2013 को गांधीनगर में पशुधन और दुग्ध विकास पर आयोजित एक अखिल भारतीय सम्मेलन का उद्धाटन करते हुए किसानों से लोहे के छोटे-छोटे टुकड़ों को इकट्ठा करने के राष्ट्रव्यापी अभियान की घोषणा की जिन्हे इकट्ठा करने के बाद उनसे सरदार पटेल की स्मृति में ''एकता की प्रतिमा'' बनाई जायेगी जो नेहरू के मंत्रिमंडल में स्वतंत्र भारत के प्रथम गृह मंत्री थे।

उन्होंने घोषणा की: ''31 अक्टूबर, 2013 को सरदार पटेल की जयंती के अवसर पर हम प्रत्येक गांव के किसानों द्वारा उपयोग किये गये किसी भी उपकरण के लोहे के छोटे टुकड़ों को इकट्ठा करने के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान प्रारंभ करेंगे जिसमें पूरे देश के पांच लाख से अधिक गॉव शामिल होंगें। इस लोहे को प्रतिमा के निर्माण में इस्तेमाल किया जाएगा।'' यह प्रतिमा ''एकता की मूर्ति'' 182 मीटर (392 फुट) ऊॅंची होगी जिसे दुनियाँ में सबसे ऊंची मूर्ति होने का श्रेय प्राप्त होगा। सरदार वल्लभभाई पटेल की यह मूर्ति दक्षिण गुजरात में नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बाँधा के सामने बनाई जायेगी। मोदी ने यह कहते हुये दु:ख जताया कि ''आधुनिक भारत के निर्माता सरदार पटेल ने देश को जोड़ा है किन्तु धीरे-धीरे उनकी यादें धुंधाली पड़ती जा रही है।'' उन्होने घोषणा की कि उनकी स्मृति को पुनर्जीवित करने के लिए और भारत के लौह पुरुष के लिए एक उपयुक्त श्रध्दांजलि के रूप में हम यह मूर्ति बना रहे है जो न्यूयार्क में बनी स्वतंत्रता की मूर्ति (Statue of Liberty) से ऊंचाई में दुगनी होगी। उन्होंने याद दिलाते हुये यह भी कहा कि सरदार पटेल भी एक किसान थे जिन्होने आजादी की लड़ाई में किसानों को साथ लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
                 
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी जो आर.एस.एस. के पूर्णकालिक सदस्य है की इस भव्य परियोजना से कुछ प्रासंगिक सवाल पैदा होते है। वे पशुधन और डेयरी पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्धाटन कर रहे थे, जो दोनों ही अकाल, कृषि भूमि के औद्योगिकीकरण और उच्च लागत के कारण बहुत खराब दौर से गुजर रहे हैं। पशुधान और डेयरी उद्योग की खुशहाली अनिवार्य रूप से किसानों की खुशहाली के साथ जुड़ी हुई है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में कर्ज, घटिया बीज/खाद, उच्च लागत और पानी की कमी जैसी अंतहीन समस्याओं के कारण प्रत्येक 40मिनिट में एक भारतीय किसान ने आत्महत्या की है। इसी दशक में अकाल,चरनोई भूमि के सीमित हो जाने और उपजाऊ भूमि को औद्योगिक घरानों और माफिया बिल्डरों को सौंप दिये जाने से लाखों पशु मर गये है। डेयरी उत्पाद विलासिता की वस्तु बन गये है एवं आम भारतीय की पहुंच से बाहर हो गये है। भारत कुपोषित बच्चों और महिलाओं की सबसे ज्यादा संख्या के साथ दुनिया में सबसे आगे है। यह चौंकाने वाली बात है कि मोदी ने इस बिगड़ते परिदृश्य पर कोई टिप्पणी नही की।
               
मोदी का सरदार पटेल के प्रति प्रेम कई कारणों से दिलचस्प है। पटेल कांग्रेस के एक नेता थे जो गांधी के अहिंसा के सिध्दांत से प्रेरित थे। उन्होने 1928 में बारदोली में किसानों के एक बहुत बड़े और शक्तिशाली आंदोलन का नेतृत्व किया था जिसे बारदोली सत्याग्रह के नाम से जाना जाता है। ब्रिटिश समर्थक अंग्रेजी प्रेस ने इसे बारदोली में ''साम्यवाद'' तथा पटेल को उसके ''लेनिन'' के रूप में वर्णित किया।
              
 पटेल को इस वीरतापूर्ण संघर्ष के बाद ''सरदार'' की उपाधि से सम्मानित किया गया था। किसानों का यह आंदोलन ब्रिटिश शासकों और जमीदारों द्वारा उन पर भारी लगान थोप देने तथा बंबई के दौलतमंदों को कृषि भूमि का बहुत बड़ा भाग बेच देने के विरोधा में प्रारंभ हुआ था। सरदार पटेल ने आंदोलन का नेतृत्व किया लेकिन उन्होने कांग्रेस के सभी महिला एवं पुरूष कार्यकर्ताओं को चाहे वे हिन्दू हो या मुसलमान, इस आंदोलन में संलग्न कर दिया था। इसमें इमाम साहेब अब्दुल कादिर, उत्तमचंद दीपचंद शाह, मोहनलाल कामेश्वर पंडया, भक्तिबा देसाई, दरबार गोपालदास देसाई, मीठूबेन पेटिट, जुगतरामभाई दवे, सूरजबेन मेहता, उमर सोबानी और फूलचंद कवि जैसे लोग शामिल थे जिन्होने औपनिवेशिक शासक और उनके चाटुकारों को जमीनी स्तर पर चुनौती दी थी।
               
एक महत्वपूर्ण तथ्य जिस पर ध्यान देना आवश्यक है वह यह है कि इस अवधि में तत्कालीन हिंदू महासभा और आर.एस.एस. ने इस ऐतिहासिक संघर्ष से स्वयं को अलग रखा। अंग्रेजों के विरूध्द स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले प्रमुख कांग्रेसी नेता सरदार पटेल के नाम का मोदी द्वारा उपयोग करना हिंदुत्व केम्प की एक चाल है जिससे कि लोग इस कैम्प के लोगों को भी स्वतंत्रता आंदोलन के एक भाग के रूप में देखें जबकि उन्होने स्वतंत्रता आंदोलन को धोखा दिया है। हो सकता है कि सरदार पटेल के नाम को लेकर चलने वाला यह खेल सफल हो जाये क्योंकि एक पार्टी के रूप में कांग्रेस अपनी उपनिवेशिकता विरोधी विरासत के प्रति उदासीन हो गई है।
              
मृत व्यक्ति बोलते नही है, और सरदार पटेल सच्चाई को सामने रखने के लिये प्रकट नही हो सकते। हालांकि,समकालीन दस्तावेज दर्शाते है कि सरदार पटेल के लिए मोदी और हिंदुत्व कैम्प का प्रेम झूठ पर आधारित है। सरदार पटेल हिंदुत्व की राजनीति से घृणा करते थे है और आर.एस.एस.पर प्रतिबंध लगाने वाले पहले व्यक्ति थे। सरदार पटेल के अधीन गृह मंत्रालय द्वारा 4 फरवरी 1948 को जारी सरकारी विज्ञप्ति जिसमें आर.एस.एस. पर प्रतिबंध लगाया गया था को पढ़ने से सब कुछ स्पष्ट हो जाता है जो इस प्रकार है:-
              
 ''भारत सरकार ने 2 फरवरी 1948 को पारित अपने संकल्प में देश में कार्य कर रही घृणा और हिंसा फैलाने वाली उन ताकतों को समूल नष्ट करने के लिये दृढ़ निश्चय घोषित किया था जो हमारे देश की स्वतंत्र को खतरे में डाल रही है और उसके अच्छे नाम को बदनाम कर रही है। इस नीति का अनुसरण करते हुये भारत सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को गैर कानूनी घोषित करने का निर्णय किया है।''
        
इस विज्ञप्ति में आगे यह भी कहा गया था कि आर.एस.एस. पर प्रतिबंध इसलिये लगाया गया है क्योंकि संघ के सदस्यों द्वारा अवांछित और खतरनाक गतिविधियों को संचालित किया गया जा रहा है। यह पाया गया है कि देश के अनेक भागों में आर.एस.एस. के सदस्य हिंसक गतिविधियों जिनमें आगजनी, लूट, डकैती और हत्या सहित अवैधा हथियार और गोला बारूद एकत्रित करना शामिल है, में लिप्त पाये गये है। वे लोगों को आतंकी तरीके अपनाने, आग्नेयात्रों को एकत्रित करने, सरकार के खिलाफ असंतोष पैदा करने और पुलिस तथा सेना को गलत काम के लिये उकसाने के लिये लघु पुस्तिकाएँ और पर्चे बांटते हुये पाये गये है।
               
वे सरदार पटेल ही थे जिन्होने गृह मंत्री रहते हुये आर.एस.एस. के तत्कालीन प्रमुख गुरु गोलवलकर को यह कहने में जरा भी संकोच नही किया कि उनका संगठन गांधी की हत्या करवाने और हिंसा भड़काने के लिए जिम्मेदार था। गोलवलकर को 11 सितंबर 1948 को लिखे एक पत्र में सरदार पटेल ने कहा था-
              
''हिन्दुओं को संगठित करना और उनकी मदद करना एक बात है किन्तु अपनी तकलीफों के कारण निर्दोष और असहाय पुरुषों, महिलाओं और बच्चों से बदला लेना एकदम अलग है... इसके अलावा, कांग्रेस से उग्र विरोध के कारण व्यक्तित्व,शालीनता या मर्यादा की अनदेखी कर उन्होने लोगों के बीच अशांति फैलाई है। उनके सभी भाषण सांप्रदायिकता के जहर से भरे हुये थे। हिंदुओं के उत्साह और उनकी सुरक्षा के लिए उन्हे संगठित करने हेतु यह जहर फैलाना आवश्यक नही था। इस जहर के अंतिम परिणामस्वरूप ही गांधीजी के अमूल्य जीवन का बलिदान देश को सहना पड़ा। अब सरकार या जनता की रत्ती भर सहानुभूति भी आर.एस.एस. के साथ नही बची है बल्कि वास्तव में उसके प्रति विरोध बढ़ गया है। यह विरोध तब और गंभीर हो गया जब गांधीजी की मृत्यु के बाद आर.एस.एस. के लोगों ने खुशियाँ मनाई और मिठाइयाँ बाँटी। इन परिस्थितियों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खिलाफ कार्रवाई करना सरकार के लिये आवश्यक हो गया है ...तब से आज तक छह महीने बीत चुके हैं। हमे आशा थी कि इतना समय बीत जाने के बाद आर.एस.एस.के लोग भली भॉति सोच-समझकर ठीक रास्ते पर आ जायेंगे। किन्तु मुझे जो सूचनाएँ प्राप्त हुई है वे इस बात का प्रमाण है कि वे अपनी उन्ही पुरानी गतिविधियों में नई जान डालने का प्रयास कर रहे है।''
             
सरदार पटेल इस बात की निरंतर आलोचना करते रहे कि गाँधीजी की हत्या के लिये हिंदुत्व ब्रिगेड ही संयुक्त रूप से जिम्मेदार थी। 27 फरवरी 1948 को नेहरू को लिखे एक पत्र में उन्होने कहा था-
               
 ''वह हिन्दू महासभा की कट्टर शाखा थी जो सीधो सावरकर के अधीन थी जिसने यह साजिश रची और उसे अंजाम दिया। यह बात भी सामने आती है कि यह षड़यंत्र सिर्फ 10 लोगों तक सीमित था..... निश्चय ही उनकी (गाँधीजी की) हत्या का आर.एस.एस. और हिन्दू महासभा के उन लोगों ने स्वागत किया जो उनके सोचने के तरीके और उनकी नीतियों का घोर विरोध करते थे।''
            
 सरदार पटेल ने हिंदू महासभा के जाने-माने नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी को 18 जुलाई 1948 को लिखे एक पत्र में फिर इसी तथ्य पर जोर दिया:
              
 ''जहाँ तक आर.एस.एस. और हिंदू महासभा का गांधीजी की हत्या से संबन्ध होने की बात है, यह मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है और मैं इन दोनों संगठनों की इसमें भूमिका पर कुछ नही कहना चाहता,किन्तु हमारी सूचनाएँ यह पुष्टि करती है कि इन दो संगठनों की गतिविधियों के ही परिणामस्वरूप विशेषकर आर.एस.एस. के कारण देश में ऐसा वातावरण निर्मित हो गया था जिसमें यह भयानक घटना संभव हुई। मेरे मन मे कोई संदेह नही है कि हिन्दू महासभा की कट्टरपंथी शाखा षड़यंत्र में शामिल थी। आर.एस.एस. की गतिविधियों ने सरकार और राज्य के अस्तित्व के लिए एक स्पष्ट खतरा पैदा कर दिया है। हमारी सूचनाएँ बताती है कि वे गतिविधियाँ प्रतिबंध के बावजूद समाप्त नही हुई है। वास्तव में, जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है आर.एस.एस. के वर्ग अधिक आक्रामक होते जा रहे है और अधिक संख्या में विधवंसक गतिविधियों में लिप्त हो रहे है।''
               
 इन सब तथ्यों के बावजूद नरेंद्र मोदी सरदार पटेल के प्रति प्रेम करने का दावा करते है। यह सिर्फ इतना दर्शाता है कि मोदी को स्वार्थपूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए झूठ का सहारा लेने से कोई परहेज नहीं है। सरदार पटेल तो पहले से ही एक वीर महापुरूष है। मोदी को उनका निर्माण करने की जरूरत नही है। उन्हे और आर.एस.एस. को तो सिर्फ यह तथ्य छुपाना है कि सरदार पटेल उनके संगठन के विरोधी थे और उन्होने उनके विरूध्द कार्यवाही की थी। अब इसे तो सिर्फ चोरी ही कहा जा सकता है कि जो उनके नही है वे उन्हें अपना बनाने में लगे हुये है। ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ करना हिन्दुत्व कैंप की रणनीति की विशेषता है। गोएबल्स तो मर गया, लेकिन मोदी चिरायु हों।    


(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती महाविद्यालय में राजनीतिशास्त्र के व्याख्याता तथा एक सक्रिय रंगमंचकमी जिन्होने राष्ट्रवाद तथा द्वि-राष्ट्र के सिध्दान्त पर गहन शोधकार्य किया है)

Wednesday, July 24, 2013

मोदी: तिलिस्म एवम यथार्थ

July 24, 2013 0
मोदी: तिलिस्म एवम यथार्थ
-सुभाष गाताडे

जुल्म , तशद्दुद , झूठ ,बग़ावत , आगजनी ,खूं  , कर्फ्यू  ,फायर .... हमने इन्हें बिरसे में दिए हैं  ,ये बच्चे  ,क्या देंगे हमको ???

 (कविता: बच्चे - मुसाफ़िर पालनपुरी, ‘कुछ तो कहो यारों !’ सम्पादन, आयशा खान )


I
नूरा कुश्ती की समाप्ति के बाद

सियासत में आपसी सत्तासंघर्ष अक्सर व्यक्तियों के इर्दगिर्द सिमटते दिखते हैं। 

भाजपा के अन्दर भी मोदी बनाम आडवाणी का जो संक्षिप्त सा विवाद खड़ा हुआ दिखता था, उस पर अब आधिकारिक तौर पर पटाक्षेप हो चुका है। अब कमसे कम भाजपा के अन्दर नमो नाम का गुणगान शुरू हो चुका है। मालूम हो कि मुल्क की प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा ने 2014 के आसन्न चुनावों के मद्देनज़र गुजरात के मुख्यमंत्री जनाब नरेन्द्र मोदी को चुनावी अभियान समिति का मुखिया बना कर एक तरह से अपना बिगुल फूंका है। 

यह अलग बात है कि खुद भाजपा अपने अन्दर की तमाम दरारों को पाटने में बुरी तरह असफल हुई दिखती है। फिर चाहे जनाब आडवाणी के इस्तीफे का प्रसंग हो, मोदी की इस ‘ताजपोशी’ के वक्त़ गोवा की बैठक में तमाम अन्य वरिष्ठ नेताओं की गैरमौजूदगी का मसला हो, या सत्रह साल से गठबन्धन में साथ रहे जनता दल यू की बिदाई हो। नीतिश कुमार के खिलाफ विश्वासमत को लेकर वोट डालने के बजाय सदन का बहिष्कार करके उसने फिलवक्त अपनी लाज बचा ली है, मगर दरारें अधिक स्पष्ट हुई है ; क्योंकि उसे डर था कि भाजपा के अपने विधायक नीतिश का साथ दे सकते हैं।

वैसे इस पूरी आपाधापी में इस खेल के असली विजेता की तरफ बहुत कम लोगों का ध्यान गया है, वही जिसने न केवल कोपभवन में पहुंचे आडवाणी को ‘सलाह’ दी की, वह अपना इस्तीफा वापस ले, वही जिसने पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेताओं की असहमति, विरोध, नाराजगी को किनारे लगाते हुए यशस्वी कहे जानेवाले मुख्यमंत्री मोदी को इस अहम जिम्मेदारी सौंपने में अहम भूमिका निभायी, वही जो विगत कई सालों से इस कोशिश में मुब्तिला था कि पार्टी का नियंत्राण उसके विश्वासपात्रों के हाथ में रहे। 



दुनिया के इतिहास में ऐसी दूसरी मिसाल मिलना मुश्किल है जबकि अपने आप को सांस्कृतिक कहलाने वाला एक संगठन - जिसकी जनता के प्रति प्रत्यक्ष कोई जवाबदेही नहीं हो - वह एक ऐसे संगठन को निर्देश देता फिरे, जिसे अपनी वैधता जनता से हासिल करनी होती है ; नियत समय में चुनावों में उतरना होता हो। 2005 का वह प्रसंग कौन भूल सकता है, जब अपनी पार्टी को दो सीटों से सत्ताधारी पार्टी बनाने की नीति के शिल्पकार कहे जानेवाले आडवाणी पाकिस्तान यात्रा से लौटे थे, जहां जिन्ना को लेकर उन्होंने दिए बयानों से विवाद खड़ा हुआ था और पार्टी के अध्यक्षपद से अब उनकी छुट्टी की ‘सलाह’ के साथ उनसे उम्र में लगभग तीस साल छोटे (इस वक्त संघ के सुप्रीमो) पहुंचे थे और ‘लौहपुरूष’ के तौर पर अपने अनुयायियों में शुमार किए जाने वाले आडवाणी ने भी बिना किसी हिलाहवाली के पदत्याग किया था।

फिलवक्त आक्रामक हिन्दुत्व के प्रतीक समझे जा रहे जनाब मोदी के पीछे संघ खड़ा है। स्पष्ट है कि मोदी की निरंकुश कही जाने वाली शैली को लेकर उसे कोई गुरेज नहीं है, न वह गौर करना चाहता है कि किस तरह मोदी ने संघ-भाजपा के संगठन में -कमसे कम सूबे के स्तर पर - उन तमाम लोगों को हाशिये पर डाला है, जिनसे उनकी बनती नहीं थी ; संजय जोशी जैसे प्रचारक की किस तरह दुर्गत करायी या किस तरह संघ के तमाम आनुषंगिक संगठनों को असरहीन बना दिया, राज्य में संगठन का ‘मोदीकरण’ किया है।
संघ परिवार के हिसाब से देखें तो 2001 में केशुभाई पटेल को मुख्यमंत्री पद से हटा कर मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद उनकी उपलब्धियां बहुत हैं। कहॉं तो 2001 के उस उत्तरार्द्ध में भाजपा की सत्ता पर पकड़ ढिली पड़ रही थी, वह कई नगरपालिकाओं के चुनाव हार रही थी और फिर गोधरा काण्ड के नाम पर प्रायोजित किए गए दंगों ने भाजपा की किस्मत इस कदर चमकी कि बाकी सभी पार्टियों को लगातार हाशिये पर डाल कर वह जीत की हैट्रिक वहां कायम कर सकी है। यह अलग बात है कि आज़ाद भारत में मुसलमानों के सबसे बड़े जनसंहार में राज्य सरकार की संलिप्तता या उसकी अकर्मण्यता के चलते देश विदेश में उसने इतनी बदनामी झेली है कि आज भी पश्चिम के कई अहम मुल्कों में संघ के इस लाड़ले मुख्यमंत्री का प्रवेश वर्जित है।

स्पष्ट है कि भाजपा के अन्दर अटल-आडवाणी दौर की समाप्ति के बाद मोदीयुग की शुरूआत की अहमियत महज उसके अल्पसंख्यक विरोध तक सीमित नहीं है, मोदी का शासन बड़े पूंजीपतियों एवं कारोबारियों के लिए उपलब्ध की जा रही तमाम सेवाओं के लिए भी चर्चित है। तमाम बड़े घरानों को गुजरात में अतिरिक्त फायदा मुहैया कराया गया है, जमीन तथा अन्य सभी संसाधनों को उनकी सेवा में समर्पित किया गया है। चन्द माह पहले आयी कन्ट्रोलर एण्ड आडिटर जनरल की रिपोर्ट ने कार्पोरेट समूहों को दिखायी गयी इसी ‘गैरवाजिब’ दरियादिली के लिए उसकी तीखी आलोचना की थी (CAG indicts Narender Modi Govt for 'undue' favours to corporates, PTI Apr 4, 2013, 05.52 AM IST) अपनी रिपोर्ट में कैग ने बताया था कि किस तरह गुजरात सरकार एंव राज्य सार्वजनिक क्षेत्र निगमों को इसके चलते 580 करोड़ रूपए का नुकसान उठाना पड़ा। फिर चाहे जमीन देने के नियमों को ठेंगा दिखाते हुए फोर्ड इण्डिया एवं लार्सन एण्ड टुब्रो को दी गयी जमीन हो या दोनों अम्बानी बन्धुओं, एस्सार स्टील और अडानी पावर लिमिटेड जैसी कम्पनियों को पहुंचाया गया फायदा हो। कुल मिला कर, जनाब मोदी कट्टर हिन्दुत्व और बड़ी पूंजी के इस खतरनाक संयोग की नुमाइन्दगी करते हैं। और आए दिन ‘स्वदेशी’ का राग अलापनेवाले संघ को निश्चित ही उससे गुरेज नहीं है।

आई आई टी बम्बई में अपने हालिया व्याख्यान में अमर्त्य सेन ने आर्थिक बढ़ोत्तरी के मोदी के दावों के खोखलेपन को उजागर किया था और बताया था कि उत्तराखण्ड, बिहार एवं महाराष्ट्र जैसे राज्य उससे आगे हैं। सामाजिक सूचकांकों - प्रति व्यक्ति आय, गरीबी रेखा के नीचे आबादी का प्रतिशत, बाल मृत्यु दर आदि मामलों में - गुजरात हिमाचल, तमिल नाडु और केरल से पीछे है। ‘विकास पुरूष’ के तौर पर मोदी की नयी छवि गढ़ने में मुब्तिला लोग आखिर इस बात पर क्यों गौर करना चाहंगे कि उसी गुजरात में आबादी का 32 फीसदी हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे है और प्रति एक हजार बच्चों में 61 बच्चे पांच साल की कम उम्र में मरने के लिए अभिशप्त है।

इन दिनों मोदी भले संघ के आंखों की पुतली बने हों, मगर अभी ज्यादा समय नहीं बीता जब यही दर्जा आडवाणी को हासिल था, जो अटल बिहारी वाजपेयी के बरअक्स संघ के आदर्श स्वयंसेवक में शुमार किए जाते थे। इस बात को कैसे कोई भूल सकता है कि अस्सी एवं नब्बे के दशक में वह आडवाणी ही थे जिन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस आन्दोलन की अगुआई की थी और धर्मनिरपेक्षता को लेकर जारी विमर्श को एक ऐसी दिशा दी थी कि ‘अल्पसंख्यक विरोध’ मुख्यधारा में लोकप्रिय हुआ था। अपने आलेख ‘बिंग क्लीअर अबाउट आडवाणी’ में चर्चित पत्राकार सुश्री ज्योति पुनवानी लिखती हैं।  "तब तक जारी राजनीति में फिर भी एक लक्ष्मण रेखा का पालन किया जाता था, एक वंचित अल्पमत के तौर पर मुसलमानों की वास्तविकता पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं उठाता था। मगर आडवाणी ने मुस्लिमविरोध को लोकप्रियता दिलायी। ‘मुसलमानों का तुष्टीकरण’ कांग्रेस के लिए स्वीकृत गाली बनी.. यह आडवाणी का ही कमाल था कि देश का वातावरण कलुषित हुआ।..संघ हमेशा ही जहर उगलता रहता था, मगर अंग्रेजी प्रेस उसकी उपेक्षा करता था। शाहबानो के मसले ने हवा बदल दी, मगर हिन्दुराष्ट्र की उनकी संकल्पना के साथ आडवाणी नहीं होते, जहां अल्पसंख्यक दोयम दर्जे के नागरिक थे, तब तक इन विचारों की इतनी स्वीकार्यता नहीं बनती। 92-93 के मुंबई दंगों में जांच करनेवाले श्रीकृष्ण आयोग ने आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या तक यात्रा को ही देश के वातावरण को कलुषित करने का जिम्मेदार माना था।’ यह अकारण नहीं था कि 1984 में दो सीटों तक सिमटी भाजपा 1989 के चुनावों में 89 सीटें हासिल कर सकी थी और नब्बे के दशक के उत्तरार्द्धै में आजादी के बाद पहली दफा सत्ता के गलियारों तक पहुंची थी।

वर्ष 2002 में जबकि दंगों में प्रदर्शित अकर्मण्यता/संलिप्तता के आरोपों के चलते तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने जनाब मोदी को राजधर्म निभाने की सलाह दी थी, मोदी को पद से हटाने की भी मांग की थी। उन्हीं दिनों जनाब आडवाणी अपने इस ‘शिष्य’ के जबरदस्त हिमायती के तौर पर सामने आए थे। वक्त का फेर देखिए, जिस शख्स को उन्होंने राजनीति में आगे बढ़ाया था वह पार्टी के केन्द्र में है और उनकी तमाम शिकायतों को दरकिनार करते हुए उन्हें वानपस्थाश्रम या संन्यासाश्रम अपनाने की सलाह दी जा रही है।

वैसे ‘गुरू’ एवं ‘शिष्य’ की इस टकराहट को एक किस्म की नूराकुश्ती के तौर पर भी सम्बोधित किया जा सकता है क्योंकि दोनों में से किसी ने हिन्दुराष्ट्र निर्माण की परियोजना को - जो एक समावेशी, सहिष्णु, प्रगतिउन्मुख, धर्मनिरपेक्ष मुल्क के बुनियादी स्वरूप को आमूलचूल बदलना चाहती है - (जिसकी थोड़ी झलक हम जनाब आडवाणी की अगुआई में चले बाबरी मस्जिद विध्वंस आन्दोलन के बाद पूरे मुल्क में हुए साम्प्रदायिक दंगों एवं हजारों बेगुनाहों की मौत में देख चुके हैं या 2002 में गुजरात जनसंहार - जिसे ‘परिवारजनों’ ने ‘सफल प्रयोग’ घोषित किया था - में देख चुके हैं) को प्रश्नांकित नहीं किया है। भाजपा के मातृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ‘मुखपत्र’ आर्गनायजर के हिसाब से 2014 की अहमियत भारत की राजनीति में उसी किस्म की होनेवाली है जैसी 1757 की प्लासी की लड़ाई की थी या 1857 के महासमर की थी। प्रश्न उठता है कि ‘विकासपुरूष’ मोदी की अगुआई में क्या संघ-भाजपा वाकई कोई करिश्मा कर सकेंगे या 2014 भी 2004 की एक और पुनरावृत्ति साबित होगा ?

II

नमो: असली फेकू : एक इलाकाई नेता की मुल्की हसरतें

मोदी की इस ‘ताज़पोशी’ के पहले सम्पन्न कर्नाटक चुनाव को उनके इस जादू का लिटमस टेस्ट माना जा सकता है। नतीजों ने उजागर कर दिया है कि वह इस टेस्ट में बुरी तरह फेल हो गए। वैसे जनाब मोदी को जबसे कार्पोरेट सम्राटों एवं गेरूआधारी स्वामियों के एक हिस्से ने - जिनमें शामिल सभी किसी न किसी विवादों में लिप्त बताए जाते हैं - प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे लायक व्यक्ति घोषित किया है, उसके बाद यह पहला मौका था कि उनकी इस कथित लियाकत का इम्तिहान होता।

मालूम हो कि कर्नाटक चुनाव में मोदी की तीन रैली उन जगहों पर रखी गयी थीं जो भाजपा का मजबूत गढ़ हुआ करते थे। पहली रैली बंगलुरू में थी, जहां कुल 28 सीटें हैं, जिनमें से 17 भाजपा ने पिछले चुनाव में जीती थीं, इस बार दहाई भी पार नहीं हो सका। दो अन्य सभाए कोस्टल कर्नाटक में हुई, जिनमें से एक उड़ुपी और दूसरी बेलगाम में हुई। दक्षिण कन्नड जिले की कुल 8 में से एक भी सीट भाजपा के खाते में नहीं आयी और उडुपी की पांच में से भाजपा को महज एक पर कामयाबी मिली अर्थात 13 सीटों में से महज एक सीट भाजपा के खाते में। यह थी स्टार प्रचारक की उपलब्धि। गौरतलब था कि सभाओं में लोग काफी आए थे, कई जगहों पर स्थानीय नेताओं को बोलने तक नहीं दिया था, मगर जब वोट डालने की बारी आयी, तो भाजपा का डिब्बा गोल करने में लोगों ने संकोच नहीं किया। यही किस्सा हिमाचल प्रदेश में दोहराया गया था। रैली में भीड जबरदस्त मगर वोटिंग में नदारद।

कार्पोरेट जगत के एक हिस्से या मीडिया का उनके प्रति सम्मोहन देखिए कि कर्नाटक की शिकस्त को किसी ने मोदी की शिकस्त नहीं कहा था। कल्पना करें कि अगर उलटा हुआ होता अर्थात किसी करिश्मे से भाजपा जीत जाती तो वही मीडिया मोदी की ताजपोशी करा देता, जिसकी वजह भी समझ में आती है ; मोदी ने अपने मुख्यमंत्री पद काल में कार्पोरेट घरानों केा जबरदस्त छूट दी है। इतनाही नहीं वहां अपने बुनियादी अधिकारों के लिए संघर्षरत टेªड यूनियनों पर भी काफी अंकुश रखे हैं।

वैसे क्या यह पहली दफा था कि अपने राज्य के बाहर मोदी चूके हुए कारतूस की तरह नज़र आए थे। उल्टे इसके पहले का रेकार्ड भी देखें तो जब जब वह गुजरात के बाहर गए हैं या पार्टी ने उन्हें इसका जिम्मा सौंपा है, वह बिल्कुल प्रभावहीन नज़र आए हैं। गुजरात के पहले पिछले लोकसभा चुनाव में उन्हें महाराष्ट्र, गोवा, दमन-दीव की जिम्मेदारी दी गई थी; भाजपा को यहां उम्मीद के हिसाब से सफलता नहीं मिली। खुद गुजरात के अन्दर भी 2009 के चुनाव में कांग्रेस की तुलना में भाजपा महज दो सीटों पर आगे थी। गुजरात की तुलना में मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में - जहां मोदी नहीं गए - वहां पार्टी को बेहतर सफलता मिली थी।

पिछले साल उत्तराखण्ड के चुनाव को भी देखें, जब मोदी ने केन्द्रीय नेतृत्व के प्रति अपनी असहमति प्रगट करने के लिए, कोई बहाना बना कर चुनाव में न जाने का निर्णय लिया था। मोदी की अनुपस्थिति के बावजूद भाजपा ने कांग्रेस को कांटे की टक्कर दी और वह महज दो सीटों से कांग्रेस से पिछड़ गयी। ऐसा नहीं कि पांच साल पार्टी की हालत वहां बहुत बेहतर थी। इस अन्तराल में उसे तीन बार मुख्यमंत्री बदलने पड़े थे। जानकार बता सकते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में बिहार ने भाजपा को काफी सीटें दिलायी हैं। यहां मोदी चुनाव प्रचार में नहीं गए थे, दरअसल उन्हें बुलाया नहीं गया था। एक तो नीतिश कुमार के मोदी विरोध के प्रति भाजपा सचेत थी, दूसरे, इन्हीं चुनावों की तैयारी के दौरान खुद सुषमा स्वराज्य ने यह कह कर सभी को चौका दिया था कि ‘मोदी का मैजिक हर जगह नहीं चलता है।’

2011 मे सम्पन्न असम चुनावों में भी मोदी की मौजूदगी ने पार्टी को नए रसातल तक पहुंचा दिया था। कहां तत्कालीन पार्टी अध्यक्ष ने असम में अपने बलबूते सरकार बनाने का सपना देखा था (पंजाब केसरी, 16 मई 2011) और कहां तो आलम था कि उसकी सीटें पहले से आधी (अब 5सीटें )हो चुकी थीं। यह शायद संघ के एजेण्डा का ही प्रभाव था कि असम में ऐसे ही लोगों को चुनाव प्रभारी के तौर पर या स्टार प्रचारक के तौर भेजा गया जिनकी छवि मॉडरेट किस्म की नहीं बल्कि उग्र हिन्दुत्व की रही है। स्पष्ट था कि संघ भाजपा की पूरी कोशिश थी कि सूबा असम में साम्प्प्रदायिक सदभाव की राजनीति पलीता लगा दिया जाए ताकि होने वाला ध्रा्रुवीकरण उसके फायदे में रहे। चुनाव में स्टार कम्पेनर के तौर पर हिन्दुत्व के पोस्टर ब्वॉय नरेन्द्र मोदी की डयूटी लगा दी गयी थी, जिन्होंने कई स्थानों पर सभाओं को सम्बोधित किया था। मोदी की इस असफलता बरबस ने 2007 के उत्तर प्रदेश चुनावों की याद ताजा कर दी थी, जिसमें उन्हें स्टार प्रचारक के तौर पर उतारा गया था। याद रहे कि यह वही चुनाव थे जब भाजपा के चौथे नम्बर पर पहुंची थी। और वे अधिकतर स्थान जहां मोदी ने अपनी तकरीर दी थी, वहां पर भाजपा को शिकस्त मिली थी।

सोशल नेटवर्क पर बहुत सक्रिय रहनेवाले मोदी के मुरीद कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी के लिए ‘पप्पू’ नाम का इस्तेमाल करते हैं और कांग्रेस के हिमायती मोदी के लिए ‘फेंकू’ शब्द का प्रयोग करते हैं। गुजरात के बाहर मोदी के जादू की वास्तविकता के मद्देनज़र उनका यह नामकरण ‘फेंकू’ कितना मुफीद जान पड़ता है।

इधर बीच उनके नए पुराने मुरीदों की तरफ से एक और शिगूफा छोड़ा गया है कि उन्हें घांची नामक पिछड़ी जाति में जनमा बता कर सामाजिक न्याय के एजेण्डे पर भी अपना हक जताया जाए। यह अलग बात है कि जनाब मोदी किस कदर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मनुवादी चिन्तन के वाहक एवं हिमायती है, यह बार बार उजागर होता रहता है।


III

मोदी की सोशल इंजिनीयरिंग: मिथक एवम यथार्थ

अस्पृश्यता की प्रणाली हिन्दुओं के लिए सोने की खान है। इस व्यवस्था के तहत 24 करोड़ हिन्दुओं का मैला ढोने और सफाई करने के लिए 6 करोड अस्पृश्यों को तैनात किया जाता है, जिन्होंने ऐसा गन्दा काम करने से उनका धर्म रोकता है। मगर चूंकि यह गन्दा काम किया ही जाना है और फिर उसके लिए अस्पृश्यों से बेहतर कौन होगा ?
- डा अम्बेडकर

वर्णाश्रम व्यवस्था के अन्तर्गत दलितों को उच्चवर्णीय हिन्दुओं का मैला ढोने और उन्हें ताउम्र सफाई करने के लिए मजबूर करने वाली सामाजिक प्रणाली को बेपर्द करनेवाले डा अम्बेडकर के उपरोक्त वक्तव्य की प्रासंगिकता पिछले दिनों नए सिरेसे सूबा गुजरात में जान पड़ी, जब सामाजिक समरसता के नाम पर मोदी सरकार ने कुछ समय पहले अपने बजट में सफाई कर्मचारियों के लिए एक नयी योजना का ऐलान किया। इसके अन्तर्गत बजट में लगभग 22.50 लाख रूपयों का प्रावधान इसलिए रखा गया है ताकि सफाई कर्मचारियों को कर्मकाण्ड का प्रशिक्षण दिया जा सके। गौरतलब था कि जिन दिनों गुजरात सरकार इस योजना का ऐलान कर रही थी, उन्ही दिनों सूबे की हुकूमत के दलितद्रोही रवैये को उजागर करती दो घटनाएं सामने आयीं थीं। पहली थी अहमदाबाद से महज सौ किलोमीटर दूर धान्डुका तहसील के गलसाना ग्राम के पांच सौ दलितों पर कई माह से जारी सामाजिक बहिष्कार की ख़बर। गांव के उंची जातियों ने गांव में बने पांच मन्दिरों में से किसी में भी दलितों के प्रवेश पर पाबन्दी लगा रखी है। राज्य के सामाजिक न्याय महकमे के अधिकारियों द्वारा पिछले दिनों किए गए गांव के दौरे के बाद उनकी पूरी कोशिश इस मामले को दबाने को लेकर थी। दूसरी ख़बर थी थानगढ़ में दलितों के कतलेआम के दोषी पुलिसकर्मियों की चार माह बाद गिरफ्तारी।

मालूम हो कि सितम्बर माह में गुजरात के सुरेन्द्रनगर के थानगढ़ में पुलिस द्वारा दलितों पर तब गोलीचालन किया गया था, जब वह इलाके में थानगढ नगरपालिका द्वारा आयोजित मेले में स्टाल्स की नीलामी में उनके साथ हुए भेदभाव का विरोध कर रहे थे। इलाके की पिछड़ी जाति भारवाडों द्वारा जब एक दलित युवक की पिटाई की गयी जिसको लेकर उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज की थी। इस शिकायत पर कार्रवाई करने के बजाय पुलिस ने टालमटोल का रवैया अख्तियार किया था और जब दलित उग्र हो उठे तो उन्हें गोलियों से भुना गया था, जिसमें तीन दलित युवाओं की मौत हुई थी। याद रहे दलितों के इस संहार को अंजाम देनेवाले सबइन्स्पेक्टर के पी जाडेजा को बचाने की पुलिस महकमे ने पूरी कोशिश की थी, दलितों पर दंगा करने के केस भी फाइल किए गए थे, अन्ततः जब दलितों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया तभी चार माह से फरार चल रहे तीनों पुलिसकर्मी सलाखों के पीछे भेजे जा सके थे।

सफाई कर्मचारियों को कर्मकाण्ड का प्रशिक्षण देने की चर्चा जब चली तब यह बात भी सामने आयी कि आखिर मोदी उन्हें करने पड़ते इस अमानवीय पेशे को लेकर क्या सोचते हैं ? किस तरह उन्होंने इस पेशे का महिमामण्डन किया है ? याद रहे कि वर्ष 2007 में जनाब मोदी की एक किताब ‘कर्मयोग’ का प्रकाशन हुआ था। आई ए एस अधिकारियों के चिन्तन शिविरों में जनाब मोदी द्वारा दिए गए व्याख्यानों का संकलन इसमें किया गया था। यहां उन्होंने दूसरों का मल ढोने, एवं पाखाना साफ करने के वाल्मिकी समुदाय के ‘पेशे’ को ‘‘आध्यात्मिकता के अनुभव’’ के तौर पर सम्बोधित किया था। उनका कहना था कि ‘‘मैं नहीं मानता कि वे इस काम को महज जीवनयापन के लिए कर रहे हैं। अगर ऐसा होता तो उन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी इस काम को नहीं किया होता ..किसी वक्त उन्हें यह प्रबोधन हुआ होगा कि वाल्मिकी समुदाय का काम है कि समूचे समाज की खुशी के लिए काम करना, इस काम को उन्हें भगवान ने सौंपा है ; और सफाई का यह काम आन्तरिक आध्यात्मिक गतिविधि के तौर पर जारी रहना चाहिए। इस बात पर यकीन नहीं किया जा सकता कि उनके पूर्वजों के पास अन्य कोई उद्यम करने का विकल्प नहीं रहा होगा। ’’गौरतलब है कि जाति प्रथा एवं वर्णाश्रम की अमानवीयता को औचित्य प्रदान करनेवाला उपरोक्त संविधानद्रोही वक्तव्य टाईम्स आफ इण्डिया में नवम्बर मध्य 2007 में प्रकाशित भी हुआ था। यूं तो गुजरात में इस वक्तव्य पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई, मगर जब तमिलनाडु में यह समाचार छपा तो वहां दलितों ने इस बात के खिलाफ उग्र प्रदर्शन किए जिसमें मैला ढोने को ‘‘आध्यात्मिक अनुभव’’ की संज्ञा दी गयी थी। उन्होंने जगह जगह मोदी के पुतलों का दहन किया। अपनी वर्णमानसिकता के उजागर होने के खतरे को देखते हुए जनाब मोदी ने इस किताब की पांच हजार कापियां बाजार से वापस मंगवा लीं, मगर अपनी राय नहीं बदली।

मोदी सरकार के इस शिगूफे को लेकर मानवाधिकार कर्मियों का वक्तव्य बताता है कि किस तरह दो साल बाद सफाई कर्मचारियों की एक सभा को सम्बोधित करते हुए उन्होंने सफाई कर्मचारियों के काम को मंदिर के पुरोहित के काम के समकक्ष रखा था। उन्होंने कहा ‘‘जिस तरह पूजा के पहले पुजारी मन्दिर को साफ करता है, आप भी मन्दिर की ही तरह शहर को साफ करते हैं।’’ अपने वक्तव्य में मानवाधिकार कर्मी लिखते हैं कि अगर जनाब मोदी सफाई कर्मचारियों को इतना सम्मान देते हैं तो उन्होंने इस काम को तीन हजार रूपए की मामूली तनखाह पर ठेके पर देना क्यों शुरू किया है ? क्यों नहीं इन ‘पुजारियों’ को स्थायी आधार पर नौकरियां नहीं दी जातीं। अपने मनुवादी चिन्तन को उजागर करनेवाले ऐसे वक्तव्य देने वाले मोदी आखिर कैसे यह समझ पाएंगे कि गटर में काम करनेवाला आदमी किसी आध्यात्मिक कार्य को अंजाम नहीं दे रहा होता, वह अपनी पेट की आग बुझाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाला रहता है।

दलित आदिवासियों पर अत्याचार की रोकथाम के लिए बने प्रभावशाली कानून ‘अनुसूचित जाति और जनजाति(अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के अन्तर्गत यह इलाके के पुलिस अधीक्षक की जिम्मेदारी बनती है कि वह अनुसूचित तबके पर हुए अत्याचार की जांच के लिए कमसे कम पुलिस उपाधीक्षक के स्तर के अधिकारी को तैनात करे। दलित-आदिवासियों पर अत्याचार के मामलों में न्याय दिलाने में गुजरात फीसड्डी राज्यों में से एक है, जिसके जड़ में मोदी सरकार की नीतियां एवं चिन्तन साफ झलकता है।

16 अप्रैल 2004 में गुजरात विधानसभा पटल पर जनाब मोदी से यह प्रश्न पूछा गया था कि क्या यह प्रावधान सही है या नहीं ? जनाब मोदी का जवाब सदन को चौंकानेवाला था। उनका कहना था कि ‘‘इस अधिनियम के नियम 7(1) के अन्तर्गत पुलिस उपाधीक्षक स्तर तक के अधिकारी के तैनाती की बात कही गयी है और जिसके लिए पुलिस अधीक्षक की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती।’ इसके मायने यही निकलते हैं वह पुलिस सबइन्स्पेक्टर या इन्स्पेक्टर हो सकता है। याद रहे कि इसी लापरवाही के चलते, जिसमें दलित-आदिवासियों पर अत्याचार का मामला पुलिस सबइन्स्पेक्टर को सौंपा गया, तमाम मामले अदालत में खारिज होते हैं। गुजरात के सेन्टर फार सोशल जस्टिस ने 150 ऐसे मामलों का अध्ययन कर बताया था कि ऐसे 95 फीसदी मामलों में अभियुक्त सिर्फ इसी वजह से छूटे हैं क्योंकि अधिकारियों ने मुकदमा दर्ज करने में, जाति प्रमाणपत्रा जमा करने में लापरवाही बरती। कई सारे ऐसे मामलों में जहां अभियुक्तों को भारतीय दण्ड विधान के अन्तर्गत दण्डित किया गया, मगर अत्याचार के मामले में वह बेदाग छूटे।

पिछले दिनों जब गुजरात में पंचायत चुनाव सम्पन्न हो रहे थे तो नाथु वाडला नामक गांव सूर्खियों आया, जिसकी आबादी बमुश्किल एक हजार थी। लगभग 100 दलितों की आबादी वाले इस गांव के चुनाव 2001 के जनगणना रिपोर्ट पर आधारित संचालित होनेवाले थे, जिसमें दलितों की आबादी शून्य दिखाई गयी थी। लाजिम था पंचायत में एक भी सीट आरक्षित नहीं रखी गयी थी। इलाके के दलितों ने इस अन्याय के खिलाफ आवाज़ बुलन्द की, वह मोदी सरकार के नुमाइन्दों से भी मिले ; मगर किसी के कान पर जूं नहीं रेंगी कि गांव की दस फीसदी आबादी को अपने जनतांत्रिक अधिकारों से भी वंचित किया जा रहा है। अन्ततः गुजरात की उच्च अदालत ने ‘जनतंत्र के इस माखौल’ के खिलाफ हस्तक्षेप कर चुनाव पर स्थगनादेश जारी किया; तभी प्रक्रिया रूक सकी।

IV

इन पंक्तियों के लिखे जाते वक्त खुद अहमदाबाद में उत्तरी गुजरात के हजारों किसान एकत्रित हैं जो नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा प्रस्तावित स्पेशल इनवेस्टमेण्ट रिजन योजना का विरोध कर रहे हैं, जो उनके हिसाब से बिना किसी उचित मुआवजे से उनकी अच्छी जमीन उनसे छीन लेगी। (देखें, हिन्दुस्तान टाईम्स, 19 जून 2013)। अहमदाबाद, मेहसाणा एवं सुरेन्द्रनगर जिले के 44 गांवों के किसानों ने इस योजना का विरोध करने के लिए राज्य की राजधानी तक ट्रैक्टर रैली निकाली है, और उनकी मांग है कि परियोजना को तत्काल रद्द कर दिया जाए। इन विरोध प्रदर्शनों की अगुआई पूर्व भाजपा विधायक कनु कलसारिया कर रहे हैं, जो जानेमाने सामाजिक कार्यकर्ता हैं। मीडिया पर नमो नाम का सम्मोहन देखिए कि 10 हजार से अधिक किसानों की इस रैली का समाचार अधिकतर अखबारों से गायब है या अन्दर के पन्ने पर मौजूद है।

ऐसी तमाम मिसालें दी जा सकती हैं। मुमकिन है कि आनेवाले दिनों में बार बार हम ऐसे ही मौनों से रूबरू हों। जैसे मोदी के विश्वासपात्रा अमित शाह को जब यूपी का पार्टी का जिम्मा सौंपा गया तब किसी ने इस बात की चर्चा नहीं की किस तरह मोदी के इस गृहमंत्री को पद छोड़ना पड़ा था, और जेल की हवा खानी पड़ी थी जबकि यह पता चला कि सोहराबुद्दिन शेख की फर्जी मुठभेड़ में इन्होंने भी ‘सलाह’ प्रदान की है। इस डर को मद्देनज़र रखते हुए कि गुजरात में रह कर वह जांच को प्रभावित कर सकते हैं, कई माह तक राज्य में घुसने पर भी अदालत द्वारा पाबन्दी लगायी गयी थी। बहुत कम राज्य ऐसे होंगे जिनके मंत्री इस कदर जेल की हवा खा चुके हैं। इसी तरह जनाब मोदी की बेहद विश्वासपात्रा एक अन्य मंत्री रही हैं डा माया कोडनानी, जो खुद कुख्यात बाबू बजरंगी के साथ इन दिनों सलाखों के पीछे हैं। वजह 2002 के जनसंहार मे नरोदा पाटिया इलाके में हुए हत्याकाण्ड में अपनी संलिप्तता के चलते। पिछले दिनों खुद मोदी की ही सरकार ने इस जोड़ी को मौत की सजा सुनाए जाने की सिफारिश की थी, यह अलग बात है कि ‘परिवारजनों’ के दबाव में बदल दी। फिलवक्त एक तीसरे मंत्री हैं, जिन्हें एक अन्य मामले में दोषी करार दिया गया है और उन्हें भी जल्द ही सलाखों के पीछे भेजा जाएगा।

फिलवक्त जनाब मोदी की पूरी कोशिश इसी बात पर केन्द्रित है कि किस तरह माफी मांगे बिना ही 2002 के दंगों के धब्बों से मुक्ति पानी है और ‘विकास पुरूष’ के तौर पर लोगों के सामने आना है। निश्चित ही यह काम आसान नहीं दिखता। साठ साल से अधिक समय से कायम लोकतंत्रा की तमाम खामियां गिनायी जा सकती हैं, मगर यह बात तो उसके विरोधी भी कह सकते हैं कि उसने लाखों करोड़ो लोगों को जुबां प्रदान की है, सदियों से उत्पीड़ित वंचित तबके हाशिये से केन्द्र की तरफ आते दिख रहे हैं। और यह सभी लोग बार बार सवाल पूछेंगे कि 2002 के पीड़ितों को न्याय मिला या नहीं और उसके कातिलों को सज़ा हुई या नहीं। मोदी एवं उनके ‘परिवारजनों’ को यह समझना ही होगा कि करोड़ों करोड़ जनता शाखाओं में बैठनेवाली स्वयंसेवक नहीं होती, जिनके बारे में हिन्दी के प्रख्यात लेखक हरिशंकर परसाई ने कभी कहा था कि ‘जिनके दिमाग के ताले बन्द कर दिए जाते हैं और चाभी नागपुर के गुरूजी के पास भेजी जाती है।’
Modi playing second fiddle to Advani. Surat Riots, 1992. Photo: Dharmesh Joshi

नरेंद्र मोदी के नाम शम्सुल इस्लाम का खुला पत्र

July 24, 2013 1
नरेंद्र मोदी के नाम शम्सुल इस्लाम का खुला पत्र
Courtesy- http://www.behance.net
श्रीमान्!
आशा है आप स्वस्थ होंगे। बीती 22 जुलाई को यूरोपीय न्यूज़ एजेंसी रयूटर्स के दो पत्रकारों, रॉस कोल्विन तथा गोत्तिपति के साथ बात करते हुए आपने स्वयं को “‘हिंदू राष्ट्रवादी’” घोषित किया और आप में एक देशभक्त होने की भावना संचार करने के लिए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को शुक्रिया अदा किया। यह आरएसएस का प्रशिक्षण है कि आप जो भी काम करते हैंआपको लगता है कि आप देश की भलाई के लिए यह कर रहे हैंयह बुनियादी प्रशिक्षण है। अन्य बुनियादी प्रशिक्षण अनुशासन है। आपके जीवन को अनुशासित होना चाहिए। 1″
न्यूज़ एजेंसी का दावा है कि यह आपके आधिकारिक गांधीनगर निवास पर लिया गया एक दुर्लभ साक्षात्कारहै। इस साक्षात्कार को पढ़ कर मैं हैरान रह गया क्योंकि आप एक साधारण भारतीय नागरिक की हैसियत से नहीं बल्कि भारत के लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष संविधान के अंतर्गत आने वाले गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में बात कर रहे थे। चूँकि आप पारदर्शिता में विश्वास रखने का दावा करते हैं इसलिए मैं इस आशा के साथ यह खुला खत लिख रहा हूँ कि आप मेरे द्वारा उठाए गए सवालों के उत्तर अवश्य देंगे।
आरएसएस के एक परिपक्व प्रचारक और पूर्णकालिक कार्यकर्ता होने के नाते आप अपनी जड़ों के बारे में मुझ से बेहतर जानते होंगे। मैं आपका ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित करना चाहूँगा कि हिंदू राष्ट्रवादी शब्द की उत्पत्ति ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक ऐतिहासिक संदर्भ में हुई।
यह स्वतंत्रता संग्राम मुख्य रूप से एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष भारत के लिए कांग्रेस के नेतृत्व में लड़ा गया था। मुस्लिम राष्ट्रवादियों ने मुस्लिम लीग के बैनर तले और हिंदू राष्ट्रवादियोंने हिंदू महासभाऔर आरएसएसके बैनर तले इस स्वतंत्रता संग्राम का यह कहकर विरोध किया कि हिंदू और मुस्लिम दो पृथक् राष्ट्र हैं। स्वतंत्रता संग्राम को विफल करने के लिए इन हिंदू और मुस्लिम राष्ट्रवादियों ने अपने औपनिवेशिक आकाओं से हाथ मिला लिया ताकि वे अपनी पसंद के धार्मिक राज्य हिंदुस्थानया हिंदू राष्ट्रऔर पाकिस्तान या इस्लामी राष्ट्र हासिल कर सकें।
भारत को विभाजित करने में मुस्लिम लीग की भूमिका और इसकी राजनीति के विषय में लोग अच्छी तरह परिचित हैं लेकिन मुझे लगता है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद और स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिंदू राष्ट्रवादियोंने कैसा घटिया और कुटिल रोल अदा किया किया इसके विषय में आपकी याद्दाश्त को ताज़ा करना जरूरी है।
नरेंद्र जी! हिंदू राष्ट्रवादीमुस्लिम लीग की तरह ही द्विराष्ट्र सिद्धांत में यकीन रखते हैं। मैं आपका ध्यान इस तथ्य की ओर आकृष्ट करना चाहूँगा कि हिन्दुत्व के जन्मदाता, वी डी सावरकर और आरएसएस दोनों की द्विराष्ट्र सिद्धांत में साफ-साफ समझ में आने वाली आस्था रही है कि हिंदू और मुस्लिम दो अलग-अलग राष्ट्र हैं। मुहम्मद अली जिन्नाह के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने 1940 में भारत के मुसलमानों के लिए पाकिस्तान की शक्ल में पृथक् होमलैण्ड की माँग का प्रस्ताव पारित किया था, लेकिन सावरकर ने तो उससे काफी पहले, 1937 में ही जब वे अहमदाबाद में हिंदू महासभा के 19वें अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण कर रहे थे, तभी उन्होंने घोषणा कर दी थी कि हिंदू और मुसलमान दो पृथक् राष्ट्र हैं।
फि़लहाल भारत में दो प्रतिद्वंदी राष्ट्र अगल बग़ल रह रहे हैं। कई अपरिपक्व राजनीतिज्ञ यह मान कर गंभीर ग़लती कर बैठते हैं कि हिन्दुस्तान पहले से ही एक सद्भावपूर्ण राष्ट्र के रूप ढल गया है या केवल हमारी इच्छा होने से इस रूप में ढल जाएगा। इस प्रकार के हमारे नेक नीयत वाले पर कच्ची सोच वाले दोस्त मात्र सपनों को सच्चाई में बदलना चाहते हैं। इसलिए वे सांप्रदायिक उलझनों से अधीर हो उठते हैं और इसके लिए सांप्रदायिक संगठनों को जि़म्मेदार ठहराते हैं। लेकिन ठोस तथ्य यह है कि तथाकथित सांप्रदायिक प्रश्न और कुछ नहीं बल्कि सैकड़ों सालों से हिंदू और मुसलमान के बीच सांस्कृतिकधार्मिक और राष्ट्रीय प्रतिद्वंदिता के नतीजे में हम तक पहुंचे हैं। हमें अप्रिय इन तथ्यों का हिम्मत के साथ सामना करना चाहिए। आज यह क़त्तई नहीं माना जा सकता कि हिन्दुस्तान एकता में पिरोया हुआ राष्ट्र हैइसके विपरीत हिन्दुस्तान में मुख्यतः दो राष्ट्र हैंहिंदू और मुसलमान।2
श्रीमान्!, आरएसएस ने हमेशा वीरसावरकर के पद चिन्हों पर चलते हुए इस विचार को खारिज किया कि हिंदू, मुस्लिम, सिख और ईसाईयों ने मिलकर एक साथ एक राष्ट्र का गठन किया है। आजादी की पूर्व संध्या (14 अगस्त 1947) पर प्रकाशित आरएसएस के अंग्रेजी के मुखपत्र ऑर्गनाइजर में किधर’ (‘Whither’) शीर्षक से प्रकाशित संपादकीय में एक बार पुनः द्विराष्ट्र सिद्धांत में इन शब्दों में विश्वास व्यक्त किया है।
राष्ट्रत्व की छदम् धारणाओं से गुमराह होने से हमें बचना चाहिये। बहुत सारे दिमाग़ी विभ्रम और वर्तमान एवं भविष्य की परेशानियों को दूर किया जा सकता है अगर हम इस आसान तथ्य को स्वीकारें कि हिन्दुस्थान में सिर्फ़ हिन्दू ही राष्ट्र का निर्माण करते हैं और राष्ट्र का ढांचा उसी सुरक्षित और उपयुक्त बुनियाद पर खड़ा किया जाना चाहिए।स्वयं राष्ट्र को हिन्दुओं द्वारा हिन्दू परम्पराओंसंस्कृतिविचारों और आकांक्षाओं के आधार पर ही गठित किया जाना चाहिये।
मेरा सेक्युलरिज्मइण्डिया फर्स्ट’ वाला आपका दावा भी समस्यामूलक है। आप स्वयं को भारतीय राष्ट्रवादीनहीं बल्कि हिंदू राष्ट्रवादीमानते हैं। यदि आप हिंदू राष्ट्रवादीहैं, तो निश्चित रूप से फिर तो देश में मुस्लिम राष्ट्रवादी’, ‘सिख राष्ट्रवादी’, ‘ईसाई राष्ट्रवादी’ एवं अन्य राष्ट्रवादीभी होंगे। इस प्रकार आप भारत विभाजन के लिए जमीन तैयार कर रहे हैं। निश्चित रूप से यह आपके संगठन की द्विराष्ट्र सिद्धान्त में अखण्ड विश्वास के कारण है।
हिंदू राष्ट्रवादी’ राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे की निंदा व अपमान करते हैं
श्रीमान मोदी जी! आरएसएस के एक वरिष्ठ और पूर्णकालिक कार्यकर्ता होने के नाते आप अच्छी तरह जानते होंगे कि आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गनाइजरने स्वतंत्रता प्राप्ति की पूर्व संध्या पर राष्ट्रीय ध्वज के लिए इस भाषा का प्रयोग किया था – वे लोग जो किस्मत के दांव से सत्ता तक पहुंचे हैं वे भले ही हमारे हाथों में तिरंगे को थमा देंलेकिन हिंदुओं द्वारा न इसे कभी सम्मानित किया जा सकेगा न अपनाया जा सकेगा। तीन का आंकड़ा अपने आप में अशुभ है और एक ऐसा झण्डा जिसमें तीन रंग हों बेहद खराब मनोवैज्ञानिक असर डालेगा और देश के लिए नुकसानदेय होगा।।‘ 3
हिंदू राष्ट्रवादियों‘ ने 1942-43 में मुस्लिम लीग के साथ मिलकर गठबंधन सरकारें चलाई
सन् 1942 भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में बहुत ही महत्वपूर्ण वर्ष है। अंग्रेजों के खिलाफ एक राष्ट्रव्यापी आव्हान अंग्रेज़ों भारत छोड़ोकिया गया था। इसके प्रत्युत्तर में ब्रिटिश शासकों ने देश को नरक में बदल दिया था। ब्रिटिश सशस्त्र दस्तों ने पूरी तरह से कानून के शासन की अनदेखी करते हुए बड़े पैमाने पर आम भारतीयों को मार डाला। लाखों लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया और हजारों को भयानक दमन व यातना का सामना करना पड़ा। ब्रिटिश भारत के विभिन्न प्रांतों में शासन कर रही काँग्रेसी सरकारें बर्खास्त कर दी गईं। केवल हिंदू महासभा और मुस्लिम लीग ही ऐसे राजनैतिक संगठन थे जिनको अपना कार्य जारी रखने की अनुमति दी गई। इन दोनों संगठनों ने न केवल ब्रिटिश शासकों की सेवा की बल्कि मिलकर गठबंधन सरकारें भी चलाईं। आरएसएस के महाप्रभु वीरसावरकर ने 1942 में कानपुर में हिंदू महासभा के 24वें महाधिवेशन में अपने अध्यक्षीय भाषण में इसकी पुष्टि की कि….. व्यावहारिक राजनीति में भी हिन्दू महासभा जानती है कि हमें तर्कसंगत समझौते करके आगे बढ़ना चाहिए। इस तथ्य पर ध्यान दीजिए कि हाल ही में सिंध हिन्दू महासभा ने निमंत्रण के बाद मुस्लिम लीग के साथ मिली जुली सरकारें चलाने की जिम्मेदारी ली। बंगाल का मामला सर्वविदित है। उदंड लीगियों (मुस्लिम लीग के सदस्य) को कांग्रेस भी अपने दब्बूपन के बावजूद खु़श नहीं रख सकीलेकिन जब वे हिंदू महासभा के संपर्क में आए तो काफ़ी तर्कसंगत समझौतों और सामाजिक व्यवहार के लिए तैयार हो गयेऔर श्री फज़लुल हक़ के प्रधानमंत्रित्व (उन दिनों मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री ही कहा जाता था) और हिन्दू महासभा के क़ाबिल व सम्मान्य नेता डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के काबिल नेतृत्व में ये सरकार दोनों सम्प्रदायों के फ़ायदे के लिए एक साल से भी ज़्यादा चली। और हमारे सम्मानित महासभा नेता डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी  और यह सरकार करीब़ एक साल तक दोनों समुदायों के हित में सफलतापूर्वक चली।“4
जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस देश को आज़ाद कराने के लिए लड़ रहे थे तब ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ ब्रिटिश हुकूमत और ब्रिटिश सेना को ताकतवर बनाने में मदद कर रहे थे।
 श्रीमान्! मैं समझता हूँ कि आप नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के नाम से जरूर परिचित होंगे जिन्होंने जर्मनी और जापान के सैन्य सहयोग से भारत को मुक्त कराने का प्रयास किया था। लेकिन, इस अवधि के दौरान हिंदू राष्ट्रवादियोंने बजाय नेताजी को मदद करने के, नेताजी के मुक्ति संघर्ष को हराने में ब्रिटिश शासकों के हाथ मजबूत किए। हिंदू महासभा ने वीरसावरकर के नेतृत्व में ब्रिटिश फौजों में भर्ती के लिए शिविर लगाए। हिंदुत्ववादियों ने अंग्रेज शासकों के समक्ष मुकम्मल समर्पण कर दिया था जो वीरसावरकर के निम्न वक्तव्य से और भी साफ हो जाता है- जहाँ तक भारत की सुरक्षा का सवाल हैहिंदू समाज को भारत सरकार के युद्ध संबंधी प्रयासों में सहानुभूतिपूर्ण सहयोग की भावना से बेहिचक जुड़ जाना चाहिए जब तक यह हिंदू हितों के फ़ायदे में हो। हिंदुओं को बड़ी संख्या में थल सेनानौसेना और वायुसेना में शामिल होना चाहिए और सभी आयुधगोला-बारूदऔर जंग का सामान बनाने वाले कारख़ानों वगै़रह में प्रवेश करना चाहिएग़ौरतलब है कि युद्ध में जापान के कूदने कारण हम ब्रिटेन के शत्रुओं के हमलों के सीधे निशाने पर आ गए हैं। इसलिए हम चाहें या न चाहेंहमें युद्ध के क़हर से अपने परिवार और घर को बचाना है और यह भारत की सुरक्षा के सरकारी युद्ध प्रयासों को ताक़त पहुँचा कर ही किया जा सकता है। इसलिए हिंदू महासभाइयों को ख़ासकर बंगाल और असम के प्रांतों में,जितना असरदार तरीके़ से संभव होहिंदुओं को अविलंब सेनाओं में भर्ती होने के लिए प्रेरित करना चाहिए।” 5
आरएसएस अपने कार्यकर्ताओं में कैसी भावना भरता है?
श्रीमान्! आपने अपने साक्षात्कार में दावा किया कि आरएसएस अपने कार्यकर्ताओं के मन में देशभक्ति की भावना, राष्ट्र की भलाई के लिए काम करना और अनुशासन की भावना भरता है। जब से आरएसएस हिंदू राष्ट्रके लिए खड़ा हुआ है कोई साधारण व्यक्ति भी समझ सकता है कि आरएसएस के हाथों लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष भारत का क्या भविष्य हो सकता है। आपको संघ के प्रमुख विचारक गोलवरकर के उस वक्तव्य को भी साझा करना चाहिए कि आरएसएस एक स्वयंसेवक से क्या अपेक्षाएं करता है। 16 मार्च 1954 को सिंदी (वर्धा) में संघ के शीर्ष नेतृत्व को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था दि हमने कहा कि हम संगठन के अंग हैंहम उसका अनुशासन मानते हैं तो फिर ‘सिलेक्टीवनेस’ (पसंद) का जीवन में कोई स्थान न हो। जो कहा वही करना। कबड्डी कहा तो कबड्डीबैठक कहातो बैठक जैसे अपने कुछ मित्रों से कहा कि राजनीति में जाकर काम करोतो उसका अर्थ यह नहीं कि उन्हें इसके लिए बड़ी रुचि या प्रेरणा है। वे राजनीतिक कार्य के लिए इस प्रकार नहीं तड़पतेजैसे बिना पानी के मछली। यदि उन्हें राजनीति से वापिस आने को कहा तो भी उसमें कोई आपत्ति नहीं। अपने विवेक की कोई ज़रूरत नहीं। जो काम सौंपा गया उसकी योग्यता प्राप्त करेंगे ऐसा निश्चय कर के यह लोग चलते हैं।6
गुरू गोलकरकर का दूसरा वक्तव्य भी इस बारे में महत्वपूर्ण है
हमें यह भी मालूम हैकि अपने कुछ स्वयं सेवक राजनीति में काम करते हैं। वहां उन्हें उस कार्य की आवश्यकताओं के अनुरूप जलसेजुलूस आदि करने पड़ते हैंनारे लगाने होते हैं। इन सब बातों का हमारे काम में कोई स्थान नहीं है। परन्तु नाटक के पात्र के समान जो भूमिका ली उसका योग्यता से निर्वाह तो करना ही चाहिए। पर इस नट की भूमिका से आगे बढ़कर काम करते-करते कभी-कभी लोगों के मन में उसका अभिनिवेश उत्पन्न हो जाता है। यहां तक कि फिर इस कार्य में आने के लिए वे अपात्र सिद्ध हो जाते हैं। यह तो ठीक नहीं है। अतः हमें अपने संयमपूर्ण कार्य की दृढ़ता का भलीभांति ध्यान रखना होगा। आवश्यकता हुई तो हम आकाश तक भी उछल-कूद कर सकते हैंपरन्तु दक्ष दिया तो दक्ष में ही खड़े होंगे। “7.
श्रीमान् मोदी!
यहाँ हम देखते हैं कि गोलवरकर संघ के राजनैतिक जेबी संगठनों को उधार दिए गए स्वयंसेवकों को एक नटया अभिनेता की संज्ञा देते हैं जो आरएसएस की थाप पर नृत्य करे। यहाँ यह ध्यान देने की आवश्यकता है कि गोलवरकर ने अपने राजनीतिक संगठन को नियंत्रित करने का उपरोक्त डिजाइन मार्च 1960 में भारतीय जनसंघ (भाजपा का पूर्व स्वरूप) के गठन के लगभग नौ साल बाद व्यक्त किया था। मैं आपसे जानना चाहता हूँ कि आप भारत की लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष राजनीति कर रहे हैं या आप एक नटमात्र हैं जो भारत को एक धार्मिक राज्य में बदलने का संघ का एक हथियार मात्र है। सत्यता यह है कि संघ अपने स्वयंसेवकों को रीढ़विहीन बनाता है।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम से आरएसएस की गद्दारी
 श्रीमान्! दस्तावेजों में दर्ज आरएसएस के इतिहास को देखते हुए आपका यह दावा संदेहास्पद है कि आरएसएस ने आपको देशभक्ति का पाठ पढ़ाया। मैं आपके ध्यानार्थ कुछ तथ्य रखना चाहूँगा। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान असहयोग आन्दोलनएवं भारत छोड़ो आन्दोलनमील के दो पत्थर हैं। और यहाँ इन दो महत्वपूर्ण घटनाओं पर महान गोलवलकर की महान थीसिस है- संघर्ष के बुरे परिणाम हुआ ही करते हैं। 1920-21 के आन्दोलन के बाद लड़कों ने उद्दण्ड होना प्रारम्भ कियायह नेताओं पर कीचड़ उछालने का प्रयास नहीं है। परन्तु संघर्ष के उत्पन्न होने वाले ये अनिवार्य परिणाम हैं। बात इतनी ही है कि इन परिणामों को काबू में रखने के लिये हम ठीक व्यवस्था नहीं कर पाये। सन् 1942 के बाद तो क़ानून का विचार करने की ही आवश्यकता नहींऐसा प्रायः लोग सोचने लगे।8
इस तरह गुरू गोलवरकर यह चाहते थे कि हिंदुस्तानी अंग्रेज शासकों द्वारा थोपे गए दमनकारी और तानाशाही कानूनों का सम्मान करें! सन् 1942 के आंदोलन के आंदोलन के बाद उन्होंने फिर स्वीकारा-
सन् 1942 में भी अनेकों के मन में तीव्र आंदोलन था। उस समय भी संघ का नित्य कार्य चलता रहा। प्रत्यक्ष रूप से संघ ने कुछ न करने का संकल्प किया। परन्तु संघ के स्वयं सेवकों के मन में उथल-पुथल चल ही रही थी। संघ यह अकर्मण्य लोगों की संस्था हैइनकी बातों में कुछ अर्थ नहींऐसा केवल बाहर के लोगों ने ही नहींकई अपने स्वयंसेवकों ने भी कहा। वे बड़े रुष्ट भी हुए।“9
 श्रीमान्! हमें बताया गया है कि संघ ने सीधे कुछ नहीं किया। हालांकि, एक भी प्रकाशन या दस्तावेज ऐसा उपलब्ध नहीं है जो यह प्रकाश डाल सके कि आरएसएस ने भारत छोड़ो आंदोलन के लिए परोक्ष रूप से क्या काम किया। वस्तुतः संघ के प्रश्रयदाता वीरसावरकर ने इस दौरान मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन सरकारें चलाईं। दरअसल आरएसएस ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भारत छोड़ो आंदोलन के समर्थन में कुछ भी नहीं किया बल्कि वास्तव में, उसने इस आंदोलन जो एक महान आंदोलन था, के खिलाफ ही काम किया जो आपके और आपके शुभचिंतकों के लिए देशभक्ति के विपरीत था।
आरएसएस स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों का अपमान करता है
 श्रीमान्! मोदी जी, मैं गुरूजी के उस वक्तव्य पर आपकी राय जानना चाहूँगा जो भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और अशफ़ाक़उल्लाह खाँ के बलिदान का अपमान करता है। यहाँ संघ कार्यकर्ताओं और आपके लिए गीता के समान सत्य बँच ऑफ थॉट्ससे बलिदान महान लेकिन आदर्श नहीं” (‘Martyr, Great But Not Ideal’) का एक अंश पेश है-
निःसंदेह ऐसे व्यक्ति जो अपने आप को बलिदान कर देते हैं श्रेष्ठ व्यक्ति हैं और उनका जीवन दर्शन प्रमुखतः पौरुषपूर्ण है। वे सर्वसाधारण व्यक्तियों सेजो कि चुपचाप भाग्य के आगे समर्पण कर देते हैं और भयभीत और अकर्मण्य बने रहते हैंबहुत ऊंचे हैं। फिर भी हमने ऐसे व्यक्तियों को समाज के सामने आदर्श के रूप में नहीं रखा है। हमने बलिदान कोमहानता का सर्वोच्च बिन्दुजिसकी मनुष्य आकांक्षा करेंनहीं माना है। क्योंकिअंततः वे अपना उदे्श्य प्राप्त करने में असफल हुए और असफलता का अर्थ है कि उनमें कोई गंभीर त्रुटि थी।“10

श्रीमान्! क्या इस से अधिक शहीदों के अपमान का कोई बयान हो सकता है? जबकि आरएसएस के संस्थापक डा. हेडगेवार तो और एक कदम आगे चले गये।
‘‘कारागार में जाना ही कोई देशभक्ति नहीं है। ऐसी छिछोरी देशभक्ति में बहना उचित नहीं है।11
श्रीमान्! क्या आपको नहीं लगता कि अगर शहीद भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव, अशफाक उल्लाह खाँ, चंद्रशेखर आज़ाद तत्कालीन संघ नेतृत्व के सम्पर्क में आ गये होते तो उन्हें छिछोरी देशभक्तिके लिए जान देने से बचाया जा सकता था? यकीनन, यही कारण था कि ब्रिटिश शासन के दौरान आरएसएस के नेताओं व कार्यकर्ताओं को किसी भी सरकारी दमन का सामना नहीं करना पड़ा। और संघ ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कोई शहीद पैदा नहीं किया। श्रीमान्! क्या हम वीरसावरकर द्वारा अंग्रेज सरकार को लिखे गये चापलूसी भरे माफीनामों को सच्ची देशभक्ति मानें?
आरएसएस लोकतंत्र से घृणा करता है
 मोदी जी! गुजरात के मुख्यमंत्री और भाजपा के प्रमुख नेता के रूप में आपसे आशा की जाती है कि आप भारत की लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष नीति के अंतर्गत काम करें। लेकिन गुरू गोलवककर के उस आदेश पर आपका क्या रुख है, जो उन्होंने 1940 में संघ के 1350 प्रमुख स्वयंसेवकों के समूह को संबोधित करते हुए दिया था। उनके अनुसार एक ध्वज के नीचेएक नेता के मार्गदर्शन मेंएक ही विचार से अनुप्राणित होकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदुत्व की प्रखर ज्योति इस विशाल भूमि के कोने-कोने में प्रज्जवलित कर रहा है। 12
मैं आपका ध्यान इस ओर दिलाना चाहता हूँ कि बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में, ‘एक झण्डा, एक नेता, एक विचारधारायूरोप की फासिस्ट और नाज़ी पार्टियों का नारा था। सारा विश्व जानता है कि उन्होंने प्रजातंत्र के साथ क्या किया।
आरएसएस संघीय व्यवस्था के विरुद्ध
 आरएसएस संविधान में दिए गए संघीय व्यवस्था, जो भारतीय संवैधानिक ढाँचे का एक मूल सिद्धांत है, के एकदम खिलाफ है। यह 1961 में गुरू गोलवरकर द्वारा राष्ट्रीय एकता परिषद् के प्रथम सम्मेलन को भेजे गए पत्र से स्पष्ट है। इसमें साफ लिखा था आज की संघात्मक (फेडरल) राज्य पद्धति पृथकता की भावनाओं का निर्माण तथा पोषण करने वालीएक राष्ट्र भाव के सत्य को एक प्रकार से अमान्य करने वाली एवं विच्छेद करने वाली है। इसको जड़ से ही हटा कर तदनुसार संविधान शुद्ध कर एकात्मक शासन प्रस्थापित हो। 13
हिंदू राष्ट्रवादी’, जातिवाद और स्त्री विरोधी नीतियों के हामी हैं
 यदि आप आरएसएस और इसके बगलबच्चा संगठन, जो भारत में हिन्दुत्व का शासन चाहते हैं, के अभिलेखों में झाँककर देखें तो तत्काल स्पष्ट हो जाएगा कि वे सब के सब डॉ अंबेडकर के नेतृत्व में प्रारूपित संविधान से घृणा करते हैं। जब भारत की संविधान सभा ने भारतीय संविधान को अंतिम रूप दिया तो आरएसएस खुश नहीं था। 30 नवंबर 1949 के संपादकीय में इसका मुखपत्र ऑर्गनाइज़र शिकायत करता है कि हमारे संविधान में प्राचीन भारत में विलक्षण संवैधानिक विकास का कोई उल्लेख नहीं है। मनु की विधि स्पार्टा के लाइकरगुस या पर्सिया के सोलोन के बहुत पहले लिखी गयी थी। आज तक इस विधि की जो ‘मनुस्मृति’ में उल्लिखित हैविश्वभर में सराहना की जाती रही है और यह स्वतःस्फूर्त धार्मिक नियम-पालन तथा समानुरूपता पैदा करती है। लेकिन हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए उसका कोई अर्थ नहीं है।
वास्तव में आरएसएस वीरसावरकर द्वारा निर्धारित विचारधारा का पालन करता है। श्रीमान्! जी आपको लिए यह कोई राज़ नहीं है कि वीरसावरकर अपने पूरे जीवन में जातिवाद और मनुस्मृति की पूजा के एक बड़े प्रस्तावक बने रहे। हिंदू राष्ट्रवादकी इस प्रेरणा के अनुसार: मनुस्मृति एक ऐसा धर्मग्रंथ है जो हमारे हिन्दू राष्ट्र के लिए वेदों के बाद सर्वाधिक पूजनीय है और जो प्राचीन काल से ही हमारी संस्कृति रीति-रिवाजविचार तथा आचरण का आधार हो गया है। सदियों से इस पुस्तक ने हमारे राष्ट्र के आध्यात्मिक एवं दैविक अभियान को संहिताबद्ध किया है। आज भी करोड़ों हिन्दू अपने जीवन तथा आचरण में जिन नियमों का पालन करते हैंवे मनुस्मृति पर आधारित हैं। आज मनुस्मृति हिन्दू विधि है।“14
हिंदुत्व के एक महान ध्वजवाहक के रूप में आपको पता ही होगा हिंदू राष्ट्रवादीकिस प्रकार का समाज बनाना चाहता है। चूँकि आप बहुत व्यस्त हैं इसलिए मैं दलितों, अछूतों एवं स्त्रियों के लिए मनुस्मृति से उनके निर्देश उद्दृत कर दे रहा हूँ। इसमें निर्देशित अमानवीय और पतित नियम स्वतः स्पष्ट हैं।
दलितों एवं अछूतों के लिए मनु के सिद्धांत
·       अनादि ब्रह्म ने लोक कल्याण एवं समृद्धि के लिए अपने मुख, बांह, जांघ तथा चरणों से क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र वर्णों को उत्पन्न किया।
·       भगवान ने शूद्र वर्ण के लोगों के लिए एक ही कर्तव्य-कर्म निर्धारित किया है- तीनों अन्य वर्णों की निर्विकार भाव से सेवा करना।
·       शूद्र यदि द्विजातियों- ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को गाली देता है तो उसकी जीभ काट लेनी चाहिए क्योंकि नीच जाति का होने से वह इसी सज़ा का अधिकारी है।
·       शूद्र द्वारा अहंकारवश उपेक्षा से द्विजातियों के नाम एवं जाति उच्चारण करने पर उसके मुंह में दस उंगली लोहे की जलती कील ठोक देनी चाहिए।
·       शूद्र द्वारा अहंकारवश ब्राह्मणों को धर्मोपदेश देने का दुस्साहस करने पर राजा को उसके मुंह एवं कान में गरम तेल डाल देना चाहिए।
·       यदि वह द्विजाति के किसी व्यक्ति पर जिस अंग से प्रहार करता है, उसका वह अंग काट डाला जाना चाहिए, यही मनु की शिक्षा है।
·       यदि लाठी उठाकर आक्रमण करता है तो उसका हाथ काट डालना चाहिए और यदि वह क्रुद्ध होकर पैर से प्रहार करता है तो उसका पैर काट डालना चाहिए।
·       उच्च वर्ग के लोगों के साथ बैठने की इच्छा रखने वाले शूद्र की कमर को दाग करके उसे वहां से निकाल भगाना चाहिए अथवा उसके नितम्ब को इस तरह से कटवा देना चाहिए जिससे वह न मरे और न जिये।
·       एक ब्राह्मण का वध अथवा पिटाई नहीं करना चाहिए, भले ही उसने सभी संभव अपराध किए हों। अधिक से अधिक उसे अपने राज्यसे निकाल देना चाहिए। ऐसा करते हुए सारा धन सौंप देना चाहिए तथा चोट नहीं पहुँचानी चाहिए। (राजा को आदेश)
स्त्रियों से सम्बंधित मनु के नियम
·       पुरुषों को अपनी स्त्रियों को सदैव रात-दिन अपने वश में रखना चाहिए।
·       स्त्री की बाल्यावस्था में पिता, युवावस्था में पति तथा वृद्धावस्था में पुत्र रक्षा करते हैं, अर्थात् वह उनके अधीन रहती है और उसे अधीन ही बने रहना चाहिए; एक स्त्री कभी भी स्वतंत्रता के योग्य नहीं है।
·       बिगड़ने के छोटे से अवसर से भी स्त्रियों को प्रयत्नपूर्वक और कठोरता से बचाना चाहिए, क्योंकि न बचाने से बिगड़ी स्त्रियां दोनों (पिता और पति के) कुलों को कलंकित करती हैं। (9/5)
·       सभी जातियों के लोगों के लिए स्त्री पर नियंत्रण रखना उत्तम धर्म के रूप में जरूरी है। यह देखकर दुर्बल पतियों को भी अपनी स्त्रियों को वश में रखने का प्रयत्न करना चाहिए।
·       कोई भी आदमी पूरी तरह से महिलाओं की रक्षा नहीं कर सकता है, लेकिन वे निम्न उपायों से ऐसा कर सकते हैं।
·       पति को अपनी पत्नी को अपनी संपत्ति के संवर्द्धन व संचयन, साफ सफाई, धार्मिक कर्तव्यों, खाना पकाने व घर के बरतनों की साफ सफाई में लगाना होगा।
·       विश्वस्त और आज्ञाकारी नौकरों के भरोसे स्त्रियों की सही सुरक्षा नहीं हो सकती लेकिन जो अपनी सुरक्षा स्वयं करती हैं वे ज्यादा सुरक्षित हैं।
·       ये स्त्रियां न तो पुरुष के रूप का और न ही उसकी आयु का विचार करती हैं। इन्हें तो केवल पुरुष के पुरुष होने से प्रयोजन है। चाहे वो कुरूप हो सुंदर। यही कारण है कि पुरुष को पाते ही ये उससे भोग के लिए प्रस्तुत हो जाती हैं चाहे वे कुरूप हों या सुंदर।
·       पुरुषों के प्रति अपनी चाह, परिवर्तनशील व्यवहार एवं अपनी स्वाभाविक हृदयहीनता के चलते स्त्रियाँ अपने पतियों के प्रति वेवफा हो जाती हैं चाहे उनकी कितनी भी सावधानीपूर्वक देखभाल की जाए।
·       मनु के अनुसार ब्रह्माजी ने निम्नलिखित प्रवृत्तियां सहज स्वभाव के रूप में स्त्रियों को दी हैं-उत्तम शैय्या और अलंकारों के उपभोग का मोह, काम-क्रोध, टेढ़ापन, ईर्ष्या द्रोह और घूमना-फिरना तथा सज-धजकर दूसरों को दिखाना।
·       स्त्रियों के जातकर्म एवं नामकर्म आदि संस्कारों में वेद मंत्रों का उच्चारण नहीं करना चाहिए। यही शास्त्र की मर्यादा है क्योंकि स्त्रियों में ज्ञानेन्द्रियों के प्रयोग की क्षमता का अभाव (अर्थात् सही न देखने, सुनने, बोलने वाली) है।
 मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ कि दिसंबर 1927 में, डॉ. बीआर अंबेडकर की उपस्थिति में ऐतिहासिक महाड़ आंदोलन के दौरान मनुस्मृति की प्रति विरोधस्वरूप जलाई गई थी।
आरएसएस के लिए जातिवाद ‘हिंदू राष्ट्र’ का समानार्थी है
 श्रीमान! आरएसएस के एक अनुशासित और प्रतिबद्ध कार्यकर्ता के नाते आप इस तथ्य से परिचित होंगे कि जातिवाद हिंदू राष्ट्रका सार है। गुरू गोलवरकर ने तो यहाँ तक घोषणा की कि जातिवाद हिंदू राष्ट्रका समानार्थी है। उनके अनुसार हिंदू और कोई नहीं बल्कि विराट पुरुष हैं,
विराट पुरूषख़ुद प्रगट होने वाला परमेश्वर… (‘पुरूष सुक्त’ के मुताबिक़) सूर्य और चंद्रमा उसकी आंखें हैंतारे और आकाश उसकी नाभि से निर्मित होते हैं और ब्राह्मण उसका सर हैराजा हाथ हैवैश्य जांघ है और शूद्र पैर है। इसका अर्थ यही है कि वे लोग जिनके यहां इस किस्म की चार परत वाली व्यवस्था होती है अर्थात् हिन्दू लोगवही हमारे भगवान हैं। ईश्वर के बारे में ऐसी सर्वोच्च धारणा ही ‘राष्ट्र’ की हमारी अवधारणा की अन्तर्वस्तु है और वह हमारे चिन्तन में छा गयी है और उसने हमारी सांस्कृतिक विरासत की विभिन्न अनोखी अवधारणाओं को जन्म दिया है।15
श्रीमान्! कृपया मुझे बताने का कष्ट करें कि आप गुरूजी के साथ हैं या उस लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष राज्यव्यवस्था के साथ हैं जिसने आपको सत्तासीन किया है। यह बहुत गंभीर मसला है क्योंकि इसका संबंध दलितों और स्त्रियों के अधिकारों से है।
मुझे अफसोस है कि मेरा पत्र लम्बा होता जा रहा है। मुझे आशा है कि आप मुझे क्षमा करेंगे क्योंकि आपके रर्यूटर्स को दिए गए साक्षात्कार एवं अन्य कथनों एवं गतिविधियों के एक विस्तृत परिप्रेक्ष्य में मेरे पास और कोई विकल्प नहीं है। आप मेरी इस बात की प्रशंसा करेंगे कि मैं अन्य व्यक्तियों और संगठनों की तरह 2002 गुजरात जनसंहार का मुद्दा नहीं उठा रहा हूँ। मैं दृढ़तापूर्वक महसूस करता हूँ कि मुझे केवल वे मामले उठाने चाहिएं जो सामान्यतः छोड़ दिए जाते हैं। आपका इस देश के हिंदुओं और वर्तमान लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष राजव्यवस्था के लिए क्या एजेण्डा है इस पर प्रकाश डालें?
श्री मान् मैं दो और मुद्दे उठाकर इसे समाप्त करुँगा।
हिंदू राष्ट्रवादी’ गांधी हत्या का जश्न मनाते हैं
नाथूराम गोडसे और उनके सहयोगी जिन्होंने गाँधी जी की हत्या करने का षडयन्त्र रचा, और उसे कार्यान्वित किया वे हिंदू राष्ट्रवादीहोने का दावा करते थे। उन्होंने गाँधी हत्या को प्रभु के आदेशपालन के रूप में बयान किया। आरएसएस ने मिठाई बाँटकर गाँधी जी की हत्या का जश्न मनाया। क्या उनका हिन्दुत्ववादियों द्वारा सम्मान नहीं किया जाता? क्या आप उनमें से एक नहीं हैं? जून 2013 में भाजपा की कार्यकारिणी समिति के लिए जब आप गोवा मे थे तब आपने हिंदू जनजागरण समिति द्वारा आयोजित हिंदू राष्ट्र की स्थापना के लिए अखिल भारतीय हिंदू सम्मेलन के लिए एक संदेश भेजा। जिसमें कह गया यद्यपि प्रत्येक हिंदू ईश्वर के साथ प्रेम, दया, अंतरंगतापूर्वक व्यवहार करता हैअहिंसा सत्य और सात्विकता को महत्व देते हुए राक्षसी प्रवृत्तियों को दूर करना हर हिंदू के भाग्य में है। उत्पीड़न के खिलाफ आवाज़ उठाना और उसके प्रति सतर्क रहना हमारी परंपरा है। हमारी संस्कृति की रक्षा करते हुए ही धर्म ध्वजा व एकता को अखण्ड रखा जा सकता है।राष्ट्रीयता, देशभक्ति एवं राष्ट्र के प्रति समर्पण से प्रेरित संगठन लोकशक्ति का सच्ची अभिव्यक्ति हैं।“ 
आपने हिंदू जनजागरण समिति को अच्छी तरह जानते हुए यह भ्रातृ संदेश भेजा होगा। जिस मंच से आपका बधाई संदेश पढ़ा गया उसी मंच से एक प्रमुख वक्ता, के वी सीतारमैया ने घोषणा की कि गाँधी भयानक दुष्कर्मी और सर्वाधिक पापी था।
महात्मा गाँधी की हत्या पर खुशी मनाते हुए उन्होंने यह तक कह डाला कि – “जैसा कि भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में कहा है- परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे (दुष्टों के विनाश के लिए, अच्छों की रक्षा के लिए और धर्म की स्थापना के लिएमैं हर युग में पैदा हुआ हूँ)… 30 जनवरी 1948 की शामश्रीराम, नाथूराम गोडसे के रूप में आये और गांधी का जीवन समाप्त कर दिया। 17
यहाँ यह बताना भी उचित रहेगा कि केवी सीतारमैया ने गाँधी धर्मद्रोही एवं देशद्रोही शीर्षक से एक पुस्तक भी लिखी है जिसमें पिछले कवर पृष्ठ पर महाकाव्य महाभारत को उद्धृत करते हुए माँग की गई है कि धर्मद्रोही की हत्या की जानी चाहिए। हत्या के अधिकारी को नहीं मारना, मारने से बड़ा पाप है। और जहाँ संसद् सदस्य स्पष्ट रूप से सत्य व धर्म की हत्या की अनुमति देते हैं उन्हें मरा हुआ होना चाहिए।
श्रीमान्! कृपया बताएँ कि क्या यह उन संसद् सदस्यों को खत्म करने का खुला आव्हान नहीं है जो लेखक की धर्म की परिभाषा से सहमत नहीं हैं।
नॉर्वे के नव नाजीवादी सामूहिक हत्यारे ब्रेविक ने ‘हिंदू राष्ट्रवादियों’ का महिमामंडन किया
 अंत में आप मुझे बताने का कष्ट करें कि आप किस प्रकार यूरोपीय देश नॉर्वे के नवनाजीवादी सामूहिक हत्यारे एंडर्स बेहरिंग ब्रेविक का बयान जिसने भारत के हिंदू राष्ट्रवादीआंदोलन को विश्व भर में लोकतांत्रिक व्यवस्था को कुचलने के अभियान में प्रमुख सहयोगी करार दिया है, पर प्रतिक्रिया व्यक्त करेंगे।  नॉर्वे में भयंकर जनसंहार करने से पहले उसने 1518 पृष्ठ का एक मेनीफेस्टो (घोषणापत्र) जारी किया जिसमें 102 पृष्ठों में भारत के हिन्दुत्ववादी आंदोलन की चर्चा और प्रशंसा की गई है। सने सनातन धर्म आंदोलन एवं हिंदू राष्ट्रवादियोंका समर्थन किया है। यह मैनीफेस्टो यूरोप के नवनाजीवादियों और भारत के हिंदू राष्ट्रवादियों के बीच एक रणनीतिक सहयोग की रूपरेखा बताता है। यह मेनीफेस्टो कहता है कि यूरोप के नवनाजीवादियों और भारत के हिंदूराष्ट्रवादियों को एक दूसरे से सीखना एवं जितना मुमकिन सहयोग करना चाहिएक्योंकि दोनों के लक्ष्य कम या ज्यादा एक समान हैं।इस मेनीफेस्टो में प्रमुख रूप से हिंदुत्ववादी संगठनों आरएसएस, भाजपा, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् और विश्व हिंदू परिषद् का उल्लेख किया गया है। महत्वपूर्ण बात यह है कि यह मेनीफेस्टो, मुसलमानों को देश से बाहर निकाल फेंकने के लिए गृह-युद्द में और पश्चिम की समस्त बहुसांस्कृतिक सरकारों को उखाड़ फेंकने के लिए हिंदू राष्ट्रवादियों को, सैन्य सहायता का आश्वासन देता है। दरअसल वास्तव में मैं उन मुद्दों पर आपकी प्रतिक्रिया चाहता हूँ जो रयूटर्स के पत्रकारों द्वारा उठाए जाने चाहिएं थे।
मैं बहुत उत्सुकता के साथ आपके प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। मुझे पूर्ण विश्वास है कि राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध विशाल संसाधनों के मद्देनज़र आपको उत्तर देने में कोई कष्ट नहीं होगा।
साभार
आपका
शम्सुल इस्लाम
17-07-2013
प्रो. शम्सुल इस्लाम जाने-माने राजनीतिशास्त्री हैं। वह दिल्ली विश्वविद्यालय से सम्बद्ध सत्यवती कॉलेज के राजनीतिशास्त्र विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।
 संदर्भ
2 V. D. Savarkar cited in V. D. Savarkar, Samagra Savarkar Wangmaya: Hindu Rashtra Darshan, vol. 6, Maharashtra Prantik Hindusabha, Poona, 1963, p. 296.
3 Organizer, August 14, 1947.
4 V. D. Savarkar cited in V. D. Savarkar, Samagra Savarkar Wangmaya: Hindu Rashtra Darshan, vol. 6, Maharashtra Prantik Hindusabha, Poona, 1963, pp. 479-80
5 V. D. Savarkar cited in V. D. Savarkar, Samagra Savarkar Wangmaya: Hindu Rashtra Darshan, vol. 6, Maharashtra Prantik Hindusabha, Poona, 1963, p. 460. V. D. Savarkar cited in V. D. Savarkar, Samagra Savarkar Wangmaya: Hindu Rashtra Darshan, vol. 6, Maharashtra Prantik Hindusabha, Poona, 1963, pp. 479-80.
6 SGSD, vol. iii, p. 32.
7 SGSD, vol. iv, pp. 4-5. 
8SGSD, volume IV, p. 41.
9 SGSD, Volume IV, p. 40.
10 MS Golwalkar, Bunch of Thoughts, Sahitya Sindhu, Bangalore, 1996, p. 283.
11 CP Bhishikar, Sanghavariksh Ke Beej: Dr. Keshavrao Hedgewar, Suruchi, 1994, p. 21.
 12 Golwalkar, M. S., Shri guruji Samagar Darshan (Collected works of Golwalkar in Hindi), Vol. I (Nagpur: Bhartiya Vichar Sadhna, nd), p. 11.
13 MS Golwalkar, Shri Guruji Samagar Darshan (collected works of Golwalkar in Hindi), Bhartiya Vichar Sadhna, Nagpur, nd., Volume iii, p. 128. Hereafter referred as SGSD.
14 Savarkar, V. D., ‘Women in Manusmriti’ in Savarkar Samagar, Vol. 4 [Collection of Savarkar’s Writings in Hindi] (New Delhi: Prabhat), 416.
15 Golwalkar, M. S., We or Our Nationhood Defined, (Nagpur: Bharat Publications, 1939), p.36.