04/01/2014 - 05/01/2014 - रूबरू

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Tuesday, April 29, 2014

एन.जी.ओ. कामगार -: अधिकारों के लिए लड़ते अधिकारविहीन

April 29, 2014 0
एन.जी.ओ. कामगार -: अधिकारों के लिए लड़ते अधिकारविहीन
मजदूर दिवस विशेष   
जावेद अनीस

पिछले दो-तीन दशकों के दौरान भारत के  एन.जी.ओ.( स्वंसेवी संस्थाऐं ) सेक्टर में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज हुई है।  1990 के दशक में सरकार की खुली आर्थिक नीतियॉ लागू होने के बाद से एन.जी.ओ. की भूमिका और कार्यप्रणाली में भी परिर्वतन देखने को मिलता है। इस दौरान एन.जी.ओ. की कार्यप्रणाली बदली है। वह ज्यादा प्रोफेशनल’ हुए है साथ ही साथ इनमें नौकरशाही कार्यप्रणाली का भी विकास हुआ है। दूसरा परिर्वतन यह देखने को मिलता है कि सरकारें अपनी बहुत सारी कल्याणकारी योजनाऐं एन.जी.ओ. द्वारा संचालित करने लगी है। जिनमें शिक्षा स्वास्थसेनिटेशनवाटर शेड जैसे महत्वपूर्ण और बुनियादी क्षेत्र की योजनाऐं शामिल हैं।

सम्भवतः दुनिया में सबसे ज्यादा सक्रिय एन.जी.ओ. भारत में ही है। इस साल के शुरुवात में सीबीआई द्वारा सुप्रीमकोर्ट में एक रिपोर्ट पेश की गयी थी जिसके मुताबिक देश में सक्रिय एन.जी.ओ. की संख्या 20 लाख से भी अधिक है  जिसका मतलब है कि लगभग हर  600 भारतीय  पर एक एन.जी.ओ. हैं। जबकि इसके बरअक्स देश में 943 व्यक्तियों पर एक ही पुलिसकर्मी उपलब्ध है । राज्यों की बात करें तो सबसे से ज्यादा साढ़े पांच लाख एन.जी.ओ. उत्तरप्रदेश में है जबकि केरल तीन लाख सत्तर हज़ार के साथ दुसरे  तथा मध्य प्रदेश एक लाख चालीस हजार एन.जी.ओ. के साथ तीसरे नंबर पर है, इनके बाद महाराष्ट्र और गुजरात जैसे राज्य है ।

इस दौरान एन.जी.ओ सेक्टर को  विभिन्न श्रोतों से मिलने वाली “फंडिंग”  में  काफी बृद्धि हुई है। 2002 से 2009 के  दौरान केंद्र और राज्य सरकारों की तरफ से करीब 650 हजार करोड़ दिए जाने का अनुमान है जी प्रतिवर्ष 950 करोड़ के आसपास बेठता है । इसी तरह से  संस्थाओं को मिलने  देशी -विदेशी  फंडिग में भी उल्लेखनीय बृद्धि हुई है। वर्ष 2007-2008 में एन.जी.ओ. को प्राप्त होने वाला विदेशी अनुदान 9700 करोड़ रुपये था। जबकि वर्ष 2010-11 के दौरान करीब दो लाख अरब डालर का विदेशी अनुदान मिला है । उपरोक्त आंकड़ों पर नजर डालने से यह बाद यह अंदाजा लगाया जा सकता है की किस तरह से भारत में स्वमं-सेविता का पुराना क्षेत्र एक विशाल “सेक्टर” के रूप में आकर ले चूका  है। 


एन.जी.ओ. कार्यकर्ता संस्था की रीढ़ होते हैं। इस दौरान एन.जी.ओ. की संख्या, दायरेकार्यप्रणाली, फंडिंग, के साथ  इस सेक्टर में काम कर रहे कामगारों (कार्यकर्ताओं ) की संख्या में भी भारी बढ़ोतरी हुई है। मोटे तौर पर हम एन.जी.ओ. के इन कार्यकत्ताओं को तीन प्रकार से श्रेणीबध किया जा सकता है  -पहले प्रकार के कार्यकर्ता या कर्मचारी ऐसे होते हैं जो इस क्षेत्र में कैरियर के हिसाब से आते हैं। फिलहाल अनेक शिक्षण संस्थानों द्वारा “समाजकार्य” के  विभिन्न कोर्सस चलाये जाने के कारण इस क्षेत्र में ऐसे लोगों की संख्या काफी बढ़ रही है। दूसरे में ऐसे कर्मचारी आते हैं जो समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं इसलिए एन.जी.ओ. सेक्टर में आते है। हालांकि हाल के दिनों मैं ऐसे लोगों की संख्या कम होती जा रही है। तीसरी  प्रकार के ऐसे कर्मचारी है जो ज्यादा शिक्षित नहीं है और एन.जी.ओ.में जमीनी स्तर पर काम करते है, ऐसे कार्यकर्ताओं या कामगारों की संख्या सबसे ज्यादा है।

एन.जी.ओ. सेक्टर के अधिकांश  कामगारों की स्थिति अच्छी नहीं है  और इनमें भी सबसे बुरी स्थिति जमीनी स्तर पर काम कर रहे कार्यकर्ताओं की ही है। इन कार्यकर्ताओं को अपने सेवा के बदले मिनिमम वेजेस (न्यूनतम मजदूरी दर) भी नहीं मिलती है। अपवाद स्वरुप कुछ एक एन.जी.ओ. ऐसे जरुर है जिनकी एच. आर. पालीसी है। परन्तु ज्यादातर एन.जी.ओ. के कामगारों की कोई सामाजिक सुरक्षा- जैसे बीमास्वास्थपी.एफ. आदि नहीं होती है। पद भी सुरक्षित नहीं है और कभी भी नौकरी से निकाल बाहर करने का खतरा मडराता रहता है। छुटटीयॉ भी बहुत कम दी जाती हैं। काम करने के घन्टे भी तय नही होते है और औसतन कम से कम  से 10 घन्टे काम करना पड़ता है। कभी-कभी तो साप्ताहिक छुट्टी के दिन भी काम करना पड़ता है और ज्यादतर मामलों में इसके बदले कोई अतिरिक्त मेंहनताना भी नहीं मिलता है ।

दूसरी तरफ बड़ी एन.जी.ओ. या वित्तपोषक ऐजेन्सीयों में कार्यरत कामगारों की स्थिति भी वेतन के मामले को छोड़कर बाकि सारे मामलों में बदद्तर ही कही जायेगी । और इनकी स्थिति कमोबेश मल्टीनेशनल कम्पनीयों या आई.टी. सेक्टर में काम कर रहे मजदूरों जैसी है। जो अपनी मोटी तनख्वाओं की वजह से खुद को मजदूर नही मानते लेकिन काम के घन्टोंओवर टाइम आदि मामलों में उनकी स्थिति दयनीय है।

उदारीकरण की प्रक्रिया ने एन.जी.ओ. सेक्टर की दिशा  और दशा  दोनों बदली है। एन.जी.ओ. के दायरेसंख्याकामगारों आदि में तो व्यापकता आयी है परन्तु इनके ढ़ाचे में अन्दरुनी लोकतंत्रकामगारों की स्थिति और पारदर्शिता  में कमी ही देखने को मिलती है। कुछ अपवादों को छोड़कर ज्यादातर एन.जी.ओ. किसी व्यक्ति द्वारा निजी सम्पति की तरह संचालित किया जाता है। बात-बात पर लोकतंत्र की दुहाई देने वाले एन.जी.ओ. खुद अपने ढ़ाचे में गैर-लोकतांत्रिक बने हुए है।  

यह बात सही है कि एन.जी.ओ. सेक्टर की तुलना अन्य मुनाफे वाली सेक्टर से सीधे तौर पर नहीं की जा सकती है क्योकिं यह क्षेत्र गैर व्यवसायिकता और स्वंयसेविता की भावना से जुड़ी हुई है। परन्तु इससे भी इन्कार नहीं किया जा सकता है कि है कि एन.जी.ओ. सेक्टर को अपने खुद के ढ़ॉचे में लोकतंत्रिक प्रक्रियापारदर्शिता,कामगारों की सामाजिक सुरक्षाकामगारों के अधिकारों को लेकर बहस-मुहाबसे और सकारात्मक बदलावों की जरुरत है। 

देश के सरकारों की नीतियों और रवैयों से यह स्पष्ट है कि भविष्य में एन.जी.ओ. की भूमिकासंख्या में व्यापकता आयेगी। सरकारें जिस तरह से पब्लिक-प्रायवेट पाट्नरशिप दुहाई देते हुए मूलभूत सुविधाओं को अपने नागरिकों को मुहैय्या कराने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी से अपनी पीछा छुडाना चाह रही हैउससे स्पष्ट है कि भविष्य में सरकारें अपने आप को केवल धन उपलब्ध कराने तक सीमित करेंगीं  और सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों का संचालन निजी क्षेत्र एवं एन.जी.ओ. के हाथों में और बड़े पैमाने पर सौपा जाने वाला है। इससे सरकारें जनता के प्रति अपनी सीधी जवाबदेही से बच जायेगी दूसरी तरफ  एन.जी.ओ. सेक्टर और निजी क्षेत्र की कोई जवाबदेही जनता से होती ही नहीं है। भविष्य में एन.जी.ओ. की संख्या  बृद्धि तय है ,ऐसे में जरूरत इस बात की है कि वे एन.जी.ओ. जो खुद को समाज परिर्वतन के आलम्बरदार और जनता के पक्ष मेंजनता के लिए खड़ा बताते हैं वे अपनी भूमिका सुनिष्चत करें। “सेक्टर” यह तय करना पड़ेगा कि क्या वे सरकार द्वारा निजीकरण को बढ़ाने के उपकरण बनेंगे या फिर वास्तव में लोगों के जनतांत्रिक अधिकारों के साथ खड़े होंगे?

वर्तमान में समाज सेवा एक व्यवसायिक रुप में स्थापित हो चुका है। ऐसे में सवाल बड़ी संख्या में काम कर रहे  एन.जी.ओ. कामगारों  का है जो जनता के “मानव अधिकारों” और हक-हकुक की लड़ाई के  काम में लगे हैपर वे खुद ही अधिकार विहीनता की स्थिति में दिखाई दे रहे है। 
इस स्थिति एक प्रमुख कारण इन संगठनों में काम करने वाले कामगारों को रोजगार, की नियुक्ति  ठेका पद्वति (संविदा) के आधार पर किया  जाना है। प्रतिस्पर्धा और रोजगार की कमी के इस दौर में कामगारों को संस्था के शर्तो के हिसाब से काम स्वीकार करना पड़ता है। 


ऐसी स्थिति में जरूरी हो जाता है कि एन.जी.ओ. सेक्टर में काम कर रहे कामगारों संगठीत हो कर अपने अधिकारों व सामाजिक सुरक्षा जैसे मसलों  गभीरता से विचार करें । एन.जी.ओ. संचालोकों / मैनेजमेंट और दानदाता एजेंसियों को भी कामगारों के मसलों को लेकर गंभीरता दिखानी होगी   नहीं तो अधिकारों की बात करने वाले एन.जी.ओ. कामगार खुद ही अधिकार विहीन बने रहेंगें  

Friday, April 25, 2014

कविता- काफ़िर हूं सिरफिरा, मुझे मार दीजिये

April 25, 2014 0
कविता- काफ़िर हूं सिरफिरा, मुझे मार दीजिये
पाकिस्तान  के शायर "अमीर हसन " की एक नजम

काफ़िर  हूँ , सिर फिरा हूँ मुझे मार दीजिये
मैं सोचने लगा हूँ मुझे मार  दीजिये

है एहतराम हज़रते-इंसान मेरा दिन
बेदीन हो गया हूँ मुझे मार दीजिये

मे पूछने लगा हूँ सबब अपने क़तल का
मे हद से बड गया हूँ मुझे मार दीजिये

करता हु मुल्लाओ से मे ये सवाल
गुस्‍ताक हो गया हूँ मुझे मार दीजिये

खशबु से मेरा रब्त है जुगनू से मेरा काम
कितना भटक गया हु मुझे मार दीजिये

बे दीन हूँ मगर हैं जमाने में जितने धर्म
मे सब को मानता हु मुझे मार दीजिये

ये जुल्म है के जुल्म को कहता हु सॉफ जुल्म
क्या जुल्म कर रहा हूँ मुझे मार दीजिये

जिंदा रहा तो करता राहु गा हमेशा प्यार
मे साफ कह रहा हूँ मुझे मार दीजिये

है अमन मेरी शरीयत तो मुहब्बत मेरा जेहाद
बागी बहुत बड़ा हूँ मुझे मार दीजिये

बारूद का नही मेरा मसलक दारुद है
मे खैर मानता हूँ मुझे मार दीजिये.

Monday, April 21, 2014

फासीवाद का मर्ज

April 21, 2014 0
फासीवाद का मर्ज
अपूर्वानंद

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 क्या फासिस्ट का हृदय परिवर्तन नहीं हो सकता? क्या उसे इसका मौका नहीं दिया जाना चाहिए? पिछले कुछ दिनों से ये सवाल अंगरेजी के कुछ बौद्धिक अलग-अलग तरीकों से पूछ रहे हैं। बल्कि कहना चाहिए, 2002 के बाद से ही उस व्यक्ति को, जिसे 2002 के दस साल पहले प्रख्यात सामाजिक मनोवैज्ञानिक आशीष नंदी ने खांटी फासिस्टकहा था, बार-बार सलाह दी जा रही है कि 2002 की प्रेत-बाधा से वे मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं, अगर सिर्फ एक बार सच्चे दिल से माफी मांग लें। क्या यह ताज्जुब की बात है कि यह सलाह या प्रार्थना अब तक मानी नहीं गई है? सबसे ताजा बातचीत में भी, जो फासिस्ट के मानवीकरण की एक और कोशिश थी, माफी मांगने से इनकार किया गया। कहा गया कि अपराध सिद्ध हो तो बीच चौराहे पर फांसी पर लटका दो, पर माफी की बात न करो।

माफी पर कभी और बात की जाएगी। माफी हवा में तो नहीं मांगी जाती। कौन माफी मांग सकता है? उसके पहले यह सवाल किया जाना जरूरी है: माफी किससे? माफी मांगने के पहले माफ करने वाले का होना और उसका इसके लिए तैयार होना जरूरी है। क्या माफ करने वाला माफी मांगने वाले की बराबर की हैसियत का है? या माफ करना उसकी मजबूरी है? माफी सच्चे दिल से मांगी जा रही है, इसका प्रमाण यह है कि वह निष्प्रयोजन हो। अगर वह सजा से बचने या किसी लाभ के लिए है या सौदा है, यानी माफी के बदले कुछ तुरत मिलने की उम्मीद है, तो वह धोखा है। यह प्रकरण इतना सरल नहीं।

पर सबसे दिलचस्प है कि इस पूरे प्रसंग में माफी में दिलचस्पी अपराधीसे ज्यादा दूसरों की है। वे जो उससे या उसके बल पर धंधाकरने को व्यग्र हैं। यह व्यग्रता अब इतनी बढ़ गई है कि वे माफी को भी गैर-जरूरी कह रहे हैं। वे माफी की बात करने वाले नरमपंथी धर्मनिरपेक्षतावादियों को जिद्दी और अयथार्थवादी कह रहे हैं। उनका कहना है कि राष्ट्रहित के समक्ष इस तरह के भावुकतापूर्ण दुराग्रह की कोई जगह नहीं। देश का एक ही धर्म है, आर्थिक वृद्धि और उसके लिए एक दृढ़निश्चयी नायक अनिवार्य है।

परेशानी लेकिन फासिस्ट शब्द से है। कहा जा रहा है कि इस शब्द का प्रयोग नए नायक के लिए न किया जाए। इस शब्द से परेशानी इसे लेकर अंतरराष्ट्रीय दुविधा से है। संसार में अगर किसी एक चिह्न का प्रयोग असभ्य माना जाता है तो वह स्वस्तिक का है। इसलिए अंगरेजी दुनिया के हमारे बौद्धिक मित्र दरअसल उस भाषा के जरिए हमसे ज्यादा बाहरी विश्व को बताना चाहते हैं कि यह नायक फासिस्ट नहीं है और कुछ पुराणपंथी, जो इतिहास में कहीं अटक गए हैं, इस शब्द का असंगत प्रयोग कर रहे हैं। यह यूरोपीय इतिहास के एक खास दौर की परिघटना है, न तो पूंजीवाद उस दौर में है और न भारतीय लोकतंत्र। संजय श्रीवास्तव ने ठीक कहा है कि इस तर्क से लोकतंत्र जैसा सार्वभौम शब्द भी भारतीय संदर्भ में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह भी ठेठ यूरोपीय इतिहास की उपज है।

आशीष नंदी ने कहा कि फासिस्ट शब्द का इस्तेमाल गाली की तरह नहीं, बल्कि एक विशेष प्रकार के व्यक्तित्व की पहचान करते हुए उसमें कतिपय लक्षणों के पाए जाने पर चिकित्सकीय, निदानात्मक अर्थ में किया जाना चाहिए। उसमें विचारधारात्मक झुकाव की ही नहीं, उस झुकाव को संदर्भ प्रदान करने वाले उसके अपने व्यक्तित्व की विशेषताओं और उसे अपने निर्णय लेने के लिए प्रेरित करने वाले तत्त्वों की योजना की पहचान शामिल है। आशीष आगे कहते हैं कि पूरी दुनिया में मनोवैज्ञानिकों ने ऐसे व्यक्तित्वों पर जो शोध किया है, उसमें पाया गया है कि इनमें पवित्रतावादी संकीर्णता, भावनात्मक संकुचन, अपने ही आवेगों से इनकार, भय और हिंसा की फैंटेसी का अजीब मिश्रण होता है। यह दरअसल, एक असुरक्षित व्यक्तित्व है और उसकी भरपाई अपने अहं के जबर्दस्त प्रक्षेपण से की जाती है।

जब कोई व्यक्ति कहे कि उसकी जिंदगी काम के अलावा और कुछ नहीं। वह अकेला है और उसे कोई आत्मीयता दूषित नहीं कर सकती। वह राष्ट्र, धर्म या विचारधारा के प्रति पूर्णत: समर्पित है। उसे कोई सांसारिक आकर्षण अपने पथ से विचलित नहीं कर सकता, तो मानना चाहिए कि वह चिकित्सीय या निदानात्मक अर्थ में फासिस्ट है।
मसला इसलिए सिर्फ विचारधारा का नहीं है, जैसा कुछ लोग समझते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी उस विचारधारा के बावजूद आशीष की निदानात्मक कोटियों में सच्चे फासिस्ट की कसौटी पर खरे नहीं उतरते और न सुषमा स्वराज ही फासिस्ट की सारी शर्तों को पूरा करती हैं। आशीष अपने साक्षात्कार से अगर पूरी तरह सदमे में बाहर आए तो इसलिए कि उनका ज्ञान और विद्या यह बता रही थी कि अभी-अभी उन्होंने एक खालिस फासिस्ट का सामना किया है। तब वह व्यक्ति एक साधारण संघ प्रचारक था। उन्होंने विचलित अवस्था में अच्युत याज्ञिक को कहा कि वे एक भावी हत्यारे, यहां तक कि भावी जनसंहारक से मिल कर आए हैं।

थियोडोर अडोर्नो और उनके साथियों ने यूरोप में फासीवादी अनुभव को समझने के लिए अधिनायकवादी व्यक्तित्व की बनावट पर शोध किया। उसके साथ उन्होंने एक मैनिप्यूलेटिवव्यक्तित्व की एक दूसरी कोटि भी प्रस्तावित की। वह अतीव यथार्थवादी होता है, अतिसक्रियता को महत्त्व देता और वस्तुओं के आकर्षण से ग्रस्त रहता है। उसे टेक्नोलॉजी अपनी ओर खींचती है।

अधिनायकवादी और मैनिप्यूलेटिव व्यक्तित्व मिल कर फासिस्ट व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। एरिक फ्रॉम जैसे मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि इनमें प्रेम की क्षमता का अभाव होता है और उसकी भरपाई वे उस प्रेम का अमूर्त सत्ता में निवेश करते हैं। प्रेम के जरिए संबंधों या नए जीवन का सृजन करने की जगह वह टेक्नोलॉजी के जरिए अधिकाधिक वस्तुओं के उत्पादन का नारा देता और लोगों को कुशलता तथा निपुणता के नारे के बल पर अपनी ओर खींचने की कोशिश करता है। इसे लेकर बहस है कि क्या ऐसे व्यक्तित्व प्रेम के वास्तविक अनुभव से बचपन में वंचित रह जाने के कारण बनते हैं? प्रेम की कमी या उसकी असमर्थता क्या उस व्यक्ति में है या उसके सामाजिक स्रोत में?

चूंकि फासिस्ट व्यक्तित्व प्रेम या कोमलता की भावना से वंचित या उसके लिए नितांत असमर्थ होते हैं, उनके इर्द-गिर्द एक प्रगीतात्मक, मोहक वातावरण बनाने का प्रचारात्मक कार्य करना पड़ता है। इसीलिए फासिज्म के बारे में यह भी कहा गया है कि वह बाहरी तौर पर प्रेमिलहोता है। हाथ पर कबूतर बैठा कर उसे उड़ाना, पतंग उड़ाना या उसके बचपन को लेकर मिथकों का निर्माण आवश्यक होता है। वह या तो वायलिन बजाता है या कविता लिखता है। लेकिन यह सब कुछ कलात्मकता से बिल्कुल खाली होता है और लोगों को यह भरोसा दिलाने के लिए होता है कि यह व्यक्ति मानवीय संवेदनशीलता से युक्त है।

फासिस्ट व्यक्तित्व को इसलिए भारी प्रचारतंत्र के सहारे जनमानस में प्रतिष्ठित किया और स्वीकार्य बनाया जाता है। वह किले की तरह अभेद्य दीखना चाहता है। उसका हंसना, उसे आंसू आना, सब सार्वजनिक और राष्ट्रीय घटनाएं होती हैं, प्राय: अपवाद, जो उसे उसके अनुयायियों के करीब लाती हैं और इनके लिए उसकी जनता कृतज्ञ और धन्य महसूस करती है। अतिरेक उसके स्वभाव को परिभाषित करता है। वह चारों ओर से आईनों से घिरा हुआ ही जी सकता है।

ऐसे व्यक्तित्व हमारे आसपास होते हैं और अक्सर अत्यंत मामूली मालूम पड़ते हैं। एक बार ताकत के हाथ लग जाने पर या सत्ता के करीब आ जाने पर उनकी घातक प्रवृत्ति उजागर होती है। अपनी कठोरता और शुष्कता के कारण वे लोगों को अपनी ओर खींचते हैं और फिर उनकी पूरी वफादारी लेकर उनके जीवन पर अधिकार कर लेते हैं। एक बार ऐसे लोगों के हाथ खुद को सौंप देने के बाद उनसे मुक्ति असंभव हो जाती है। फिर वे उसके अनुरूप ढलने की प्रतियोगिता में लग जाते हैं। आशीष नंदी ने कोई बीस साल पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक साधारण प्रचारक में इन सभी लक्षणों को देखा था और डर गए थे। 2002 में उनकी आशंका सच निकली। अत्यंत व्यथित स्वर में उन्होंने कहा था कि वह व्यक्ति एक राज्य का मुख्यमंत्री हो सकता है, यह देख कर अपनी राजनीति के स्वास्थ्य को लेकर चिंता होती है।

अब वह संघ-प्रचारक प्रधानमंत्री बनने की कगार पर है। हमें कहा जा रहा है कि न डरो, न उसके अतीत को लेकर औरों को उसे अपनाने से रोको। क्या न डरना बुद्धिमत्तापूर्ण विकल्प है?
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साभार – जनसत्ता 20 अप्रैल, 2014

Friday, April 11, 2014

Bombers For A Cause?

April 11, 2014 0
Bombers For A Cause?

 Subhash Gatade

Bombs always make news - even when they do not explode.

Terrorists of various stripes as well as criminals know it very well. And they time their actions accordingly.

Bombs - even if they do not explode - or even when they cause symbolic damage have an added traction for the politicos of the right. They pay rich dividends.

It is one of the easiest thing to stigmatise, terrorise a community, a people. In an ambience where all such anti-human acts are projected as handiwork of the 'other' it takes very less time to polarise the 'us'. It is common knowledge that the vitiation of atmosphere is so immediate and complete that all talk of harmony and composite heritage can just evaporate in a fraction of a second and the saner elements within can suddenly find themselves on the margins.

Kagal, a town in Kolhapur district, was witness to such an incident, where the police discovered a bomb making factory in the Lakshmi Hill near MIDC area. The culprits involved in this action could be nabbed before they could 'operationalise their bomb'.

The gravity of the situation could be understood by the fact that police could bust this criminal module on the eve of Narendra Modi's proposed rally in that area. It has arrested four youths who were involved in the operation. While Ajinkya Manohar Bhopade(22) and Aniket Bhivaji Mali(22) belong to Chokak village in Hatkananagale, Nilesh Babanrao Patil (20) is from Male Mudshingi, in Hatkanangale and Anil Popat Kharase (26) hail from Kabnur-Ichalkaranji in Hatkanangale. Patil and Kharase supplied material for bomb making and Bhopade - who has a diploma in electronics and Mali - who works as wireman have been arrested for making bombs.

Apart from diagram notes police have confiscated material including gelatin sticks, remotely handled switches, remote control devices, five screw drivers, steel clips, wire-cutters, hacksaws, scissors, hammers, buzzers, door bells, six battery cells, power control equipment, energy circuit wiring, switch cord and paper pieces with diagram notes, among others. It has also confiscated four live bombs and equipment worth Rs 25,69,575. The bombs confiscated were ones that could be detonated with a remote control.

According to newspaper reports the police has 'refuted '[a]ny political or extremist hand behind the bombs the four made.Kolhapur district superintendent of police Manojkumar Sharma said that the youths were "trying to make easy money". (http://timesofindia.indiatimes.com/city/kolhapur/Four-arrested-in-Kagal-for-making-bombs/articleshow/33350186.cms). The FIR registered by the police states that

"[i]t had received a tip-off that some persons were going to bring bombs in the MIDC area. Acting on the tip-off, a trap was laid on the Kagal town and the four accused persons were nabbed on the Saturday night. The arrested were carrying the four bombs and other explosive materials on two bikes."

It is possible that the police - with good intentions - is in a hurry to individualise the incident and localise the act and does not want to aggravate further tension in an already surcharged atmosphere.

But it's claim that no political or extremist hand was visible behind these bombers and they were 'trying to make easy money' sounds unconvincing.

One can look at the enormous amount of money involved - the equipment cost itself was more than Rs. 25 lakhs - and it is difficult to comprehend how a group of these four people, one a wireman, one a diploma holder and other two doing similar odd jobs could raise so much mony on their own to ‘start this business’.

Police's claim that all the four had no previous background of 'criminal activities' is an added reason to think that they were not acting on their own but were merely cogs in some wider conspiracy. It is important to find out the real masterminds, the real planners, financers behind their act. And there have been many such incidents where activists associated with rightwing fanatic groups – most of them without any previous criminal record - have been found to be involved in making bombs, storing explosives and chalking out plans to put it at crowded places to cause maximum damage to the 'other'.

One can also recall that neighbouring state Goa witnessed two terror incidents in October 2009 which involved activists of Sanatan Sanstha. And when investigations were taken up, police had nabbed one student from this particular area itself with similar technical background for his alleged role in the act. In one particular case two activists of the Sanstha who were carrying explosives died on the spot when the scooter on which they were travelling met with an accident. And in another case explosive put in a truck carrying people could be spotted early and a major tragedy was averted.

Kagal, lies at the border of Karnataka and Maharashtra and has enough presence of Hindutva supremacist organisations there.

And Karnataka itself has been witness to activities of rightwing Hindutva groups who are found to be keen to make the state an experimental lab for furthering their politics and establish its anti-secular agenda. In fact, Karnataka witnessed bomb blasts prior to elections twice in last 5-6 years.

Let us take the case of Malleswaram bomb blast (17 th April 2013) which occurred just two weeks before elections to the present assembly in a lane near the BJP office which left 16 people injured, where the explosives were placed on a motorcycle. Thirteen people were arrested in connection with the blast, including Al-Ummah operative Kichan Buhari, who according to the police, is the mastermind. According to a story in Deccan Chronicle (27 th May 2013) :

“The city police have not yet questioned the RSS activist whose allegedly stolen SIM card was used to trigger the April 17 bomb blast in Malleswaram. It is reliably learnt that even though the cellphone and the SIM belonging to the RSS activist, who is said to be an influential leader, were said to be stolen a day prior to the bomb blast, no police complaint was ever registered about the theft, a senior police officer confirmed.
The RSS leader, whose identity the police have chosen to keep secret, wields considerable influence in the region bordering Kerala and Karnataka. Police are yet to ascertain how this man ‘lost’ his phone and how the alleged plotters came to be in possession of his SIM. Had the matter been reported and the SIM card been cancelled, the perpetrators could not have used it for their nefarious purpose.”

The Malleswaram bomb blast, where the police could immediately find the ‘mastermind’ reminds one of another bomb blast which occurred during last elections in Hubli court. (May 2008) In this case also many innocents belonging to minority community were illegally detained and quite a few among them also were booked for their ’role’ in the blasts. The police had promptly claimed that ’sleeper cells belonging to LeT and SIMI’ had executed the blasts.

And when the BJP government was firmly in the saddle and the accused in the bomb blasts case had already spent months together behind jails, had come the news which was definitely not soothing to the ears of the saffron commanders. The IGP of North Karnataka Ragavendera Auradhkar addressed a press conference telling the media that the mysterious bomb blasts which had struck the Hubli courts were the handiwork of a criminal gang led by one Nagraj Jambagi .

Hindutva terror has struck Karnataka. The Karnataka police arrested nine persons with Sangh Parivar links for allegedly setting off a bomb in the court of the junior first class magistrate in Hubli May 2008. They were also accused of planting a live bomb on the Dharwad-Belgaum road. This points to the presence of Hindutva terror suspects in the state.The police had initially blamed SIMI for both the Hubli court blast and the planting ofthe live bomb.

According to the IGP it was the same team which had planted a bomb on the Belgaum-Hubli highway in the year 2008.However, this bomb failed to explode as it was raining heavily. After high drama, the bomb squad had finally retrieved the bomb. In fact Nagraj had led the gang which was also involved in seven murder cases in North Karnataka and several cases of abduction also. Interestingly the police had stumbled upon this gang while investigating the murder of a Bagalkot businessman.

It is difficult to say what will happen next? Whether Maharashtra police – which has done a commendable job in averting a great human tragedy – would try to unearth the wider conspiracy behind this so called business of bomb making and reach the real masterminds behind this criminal-terrorist plot on the eve of elections or would leave the matter at that level itself .

Subhash Gatade is the author of Pahad Se Uncha Aadmi (2010) Godse's Children: Hindutva Terror in India,(2011) and The Saffron Condition: The Politics of Repression and Exclusion in Neoliberal India(2011). He is also the Convener of New Socialist Initiative (NSI)