07/01/2016 - 08/01/2016 - रूबरू

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Thursday, July 21, 2016

महिलाओं की बुलंद आवाज थीं कामरेड नुसरत बानो रूही

July 21, 2016 0
महिलाओं  की  बुलंद आवाज थीं कामरेड नुसरत बानो रूही

-एल. एस. हरदेनिया



डॉ. नुसरत बानो रूही हमारे बीच में अब नहीं रहीं। वे एक बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी थीं। वे शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता, वामपंथी विचारों की धनी, लेखक, चिंतक, महिलाओं के अधिकारों की चैम्पियन इन सभी गुणों से संपन्न थीं। उनका पूरा जीवन संघर्षमय रहा। 

जब वे लगभग बच्ची थीं तब उनके पिता लुफ्तुल्ला नज़मी वर्ष 1950 में पाकिस्तान चले गए थे। उस दिन से अपने परिवार को संभालने की पूरी ज़िम्मेदारी उनके कोमल कंधों पर आ गई थी। 12 वर्ष की आयु में उन्होंने पहली नौकरी की। उनकी मां मरियम बी इसमत एक शिक्षिका थीं। परंतु उतनी आय से उनके परिवार का लालनपालन संभव नहीं था इसलिए 12 साल की उम्र में ही नुसरत जी ने एक स्कूल में छोटे बच्चों को पढ़ाने की नौकरी कर ली।

मां के अतिरिक्त उनके परिवार में एक भाई और उन्हें मिलाकर चार बहनें थीं। सभी को उन्होंने पढ़ाया-लिखाया। अपनी सबसे छोटी बहन अनवरी को उन्होंने मेडिकल की शिक्षा दिलवाई। आज भी वे भोपाल में प्रायवेट प्रैक्टिस कर रही हैं और नुसरत जी की सबसे लाड़ली बहन हैं। नुसरत जी की मृत्यु ने उन्हें मानसिक रूप से काफी झकझोर दिया है।

नुसरत जी ने अपनी सारी शिक्षा प्रायवेट विद्यार्थी के रूप में की। उन्होंने न तो स्कूल की चहारदीवारी में कदम रखा और ना ही किसी कालेज में। उन्होंने स्कूल से लेकर एम.ए. तक की षिक्षा एक प्रायवेट छात्रा के रूप में की। राजनीतिक विज्ञान में एम.ए. की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने सेफिया कालेज में शिक्षक के रूप में कार्य करना प्रारंभ किया। वे एक लोकप्रिय शिक्षक थीं और उनके अनुशासन का लोहा उनके सहयोगी शिक्षकों के साथ-साथ विद्यार्थी भी मानते थे। सेफिया कालेज पूरी तरह से लड़कों का कालेज था वहां लड़कियां नहीं पढ़ती थीं। नुसरत जी उस कालेज की पहली महिला शिक्षक थीं। कालेज के तत्कालीन संचालक फकरू भाई ने उन्हें बड़े संकोच के साथ नियुक्ति दी थी। लड़कों के कालेज में महिला शिक्षक कैसे पढ़ाने का काम कर पाएगी इसमें उन्हें शंका थी। परंतु अपने परिश्रम और विद्वता से नुसरत जी ने कालेज के विद्यार्थियों पर अपनी धाक जमाई।

शिक्षण कार्य करते हुए उन्होंने पीएचडी भी हासिल की और बाद में डाॅ. नुसरत बानो रूही कहलाईं। उन्हें अनेक भाषाओं का ज्ञान था। हिंदी अंग्रेज़ी के अतिरिक्त फारसी और उर्दू पर भी उनका अधिकार था। शिक्षक होने के साथ-साथ वे सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में बढ़चढ़कर भाग लेती थीं।

प्रारंभ से उनका साम्यवादी विचारधारा के प्रति झुकाव था। वे कम्युनिस्ट पार्टी की अपने जीवन के अंत तक मेम्बर रहीं। कम्युनिस्ट पार्टी में रहते हुए वे पार्टी के विभिन्न पदों पर रहीं विशेषकर महिलाओं के सवालों से वे जीवनभर जुड़ी रहीं। जब सर्वोच्च न्यायालय ने शाहबानों के मामले में मुस्लिम महिलाओं को अनेक अधिकार प्रदान किए थे विशेषकर तलाक के बाद गुज़ाराभत्ता के मामले में, अत्यधिक उदारतापूर्वक निर्णय दिया था। इस निर्णय का अनेक मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया था। सर्वोच्च न्यायालय के विरोध में भोपाल में लगभग एक लाख पुरूषों ने जुलूस निकाला था। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की तारीफ करते हुए उन्होंने उसे मुस्लिम महिलाओं के हित में उठाया गया सबसे बड़ा कदम निरूपित करते हुए, समाचारपत्रों में लेख भी लिखे थे। इसकी मुस्लिम समाज के एक हिस्से में रोषपूर्ण  प्रतिक्रिया हुई थी और कुछ शरारती तत्वों ने उनके मकान पर पत्थर भी फेंके थे। इसके बावजूद वे अपने रवैये से नहीं हटीं और जब राजीव गांधी ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलटते हुए एक कानून पारित करवाया तो नुसरत जी ने उसकी भी निंदा की। यह अपने आप में एक अद्भुत साहसपूर्ण कदम था।

मुझे नुसरत जी के साथ काम करने का एक लंबा अनुभव रहा है। हम दोनों विश्व शांति परिषद और अफ्रीकी एषियाई एकजुटता संगठन में महामंत्री के रूप में जुड़े हुए थे। वर्ष 1972 में जब भोपाल में एक अखिल भारतीय सांप्रदायिकता विरोधी सम्मेलन हुआ था तब उसकी आयोजन समिति में मेरे साथ वे भी महामंत्री थीं। इस सम्मेलन में देश के अनेक लोग आए थे। इस सम्मेलन का आयोजन श्रीमती सुभद्रा जोषी के नेतृत्व में हुआ था जो स्वयं एक धर्मनिरपेक्षता के प्रति समर्पित महान नेत्री थीं।

नूरमहल में नगमी साहब का घर था। नगमी साहब प्रोफेशन से एक टेलर थे और शायरी भी करते थे। अपने निवास स्थान का एक हिस्सा नगमी साहब ने हमारी संस्थाओं के कार्यालय स्थापित करने के लिए दे दिया था, उसका नाम हमने लिबर्टी हाउस रखा था। सेफिया कालेज से अपना शिक्षण कार्य समाप्त कर नुसरत बानो सीधे लिबर्टी हाउस आ जाया करती थीं और शाम के पांच-छः बजे तक सभी संस्थाओं से जुड़े मसलों पर कार्य करती थीं। दफ्तर में उनकी सतत उपस्थिति हम लोगों के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होती थी।

नुसरत जी ने अनेकों किताबें लिखी हैं जिनमें भोपाल के जंगे आज़ादी का इतिहास’, एक उनकी अदभुत किताब है जिसका नाम विद्यार्थियों के नाम पत्रहै। कुरान शरीफ के अंतर्गत महिलाओं को क्या अधिकार प्राप्त हैं यह उन्होंने किताब के रूप में प्रतिबद्ध किया था। उन्हें सभी धर्मों का ज्ञान था, उन्होंने अनेक विदेश यात्राएं कीं। एक बार सोवियत संघ की यात्रा के दौरान मैं भी उनके साथ था। उन्हें डायबटीज़ की बीमारी ने काफी कमज़ोर कर दिया था। इसके कारण पिछले कुछ वर्षों से उनका घर से निकलना भी संभव नहीं हो पा रहा था। अभी पिछले दो तीन महीने से वे गंभीर रूप से बीमार थीं। अनेक बार उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। अभी कुछ दिन पहले उन्हें भोपाल मेमोरियल अस्पताल में भर्ती कराया गया। जब उन्हें भर्ती कराया गया था तब भी वे बेहोशी की हालत में थीं। भोपाल मेमोरियल अस्पताल के डाक्टरों ने पुरज़ोर कोशिश की कि वे जीवित रहें परंतु उन्हें सफलता नहीं मिली और अंततः 17 जुलाई को अपरान्ह अंतिम श्वास ली।


उन्होंने अपने जीवनकाल में एक बच्ची को गोद लिया। जो अंतिम समय तक अस्पताल में उनके साथ थी। इसके अतिरिक्त डॉ. अनवरी और उनका भतीजा डॉ. नईम आगा ने दिन रात उनकी सेवा की। वे अपने पीछे अपने परिवार के अंतर्गत अपने प्रषंसकों, अपने सहयोगियों का एक विशाल परिवार छोड़ गईं हैं, जिनके लिए वे सदा प्रेरणा की स्रोत बनी रहेंगी।

Wednesday, July 20, 2016

अमेरिकी चुनाव और ट्रम्प परिधटना के निहितार्थ

July 20, 2016 0
अमेरिकी चुनाव और ट्रम्प परिधटना के निहितार्थ

स्वदेश कुमार सिन्हा



7 नवम्बर 2016 में होने जा रहे अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव आज दुनिया भर के अखबारो ,टी0वी0 चैनलो में चर्चाओें में है और चैनलो के टी.आर.पी. बढ़ा रहे हैं । विभिन्न अखबारो में ’’डोनाल्ड ट्रम्प’’ के नस्लवादी बयानों ’’बर्नी सैण्डर्स’’ की खोखली आशाओें और ’’हिलेरी’’ की ’’व्यवहारिक दलीले’’ के बीच होने वाली अन्तहीन बहसों के कारण यह चुनाव दुनियां भर में आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है।

यद्यपि अमेरिकी राजनीति प्रायः विचारधारा विहीन मानी जाती है, तथाकथित उदार और अनुदार राजनीति में आज कोई बड़ा फर्क नही रह गया है। विदेशनीति और अर्थनीति में प्रायः अमेरिकी ’’सत्ता प्रतिष्ठान’’ में आम सहमति रहती है। ’’गृह नीति’’ के  कुछ मुद्दो को छोड़ दिया जाये तो डेमोक्रेट तथा रिपब्लिकन में प्रायः मतभेदो के मुद्दे न्यूनतम ही रहते हैं। राष्ट्रपति कोई भी चुना जाये , परन्तु इस बार लगता है कि इन चुनाव में अमेरिका के राजनीतिक पटल पर उन विचारधारा को सामने ला दिया है जो अभी तक सतह के नीचे ही रहती थी। इन चुनावों में प्रत्याशी के तौर पर डेमोक्रेटिव पक्ष से हिलेरी क्लिटंन और रिपब्लिकन पार्टी के ट्रम्स का आना लगभग तय हो गया है। रिपब्लिकन पार्टी अनुदार अरबपति पूंजीपति उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प मुस्लिम अप्रवासियों से अमेरिका की नागरिक सुरक्षा और सांस्कृतिक अस्मिता पर खतरा बता कर उनपर अमेरिका में रोक लगाने की मांग कर रहे हैं। वे तथाकथित ’’अमेरिकी गौरव’’ की पुर्नस्थापना की बात कर रहे हैं। इन चुनावों में ट्रम्प के नस्लवाद’ ’मुस्लिम विरोधशरणार्थियों के खिलाफ नस्लीय व धार्मिक द्वेष से लेकर राष्ट्र गौरव की पुर्नस्थापना के नारो को एक बड़े श्वेत अमेरिकी मध्यवर्ग तथा कामगारो का जबरजस्त समर्थन मिल रहा है तथा वे आज अमेरिका में राष्ट्रपति पद के सबसे प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं।

ट्रम्प परिघटना की आर्थिक - सामाजिक पृष्ठभूमि 

आज विश्वभर में अगर अनुदार धार्मिक कट्टरता तथा फाॅसीवादी विचारो की हवा चल रही है तो कही न कही इसके लिए अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान कम जिम्मेदार नही है। आज फ्रांस में नेशनल पार्टी फ्रंटऔर उसकी नेता मारीन लेपेननीदरलैण्ड के गीर्ट बिल्डर्स, बेल्जियम के ब्लैम्स ब्लाक , आस्ट्रिया की फ्रीडम पार्टी, स्वीडन के स्वीडन डेमोक्रेट , डेनमार्क की डेनिस पार्टी इसके अलावा पोलेण्ड हंगरी आदि में भी इसी तरह की पार्टियां और राजनेताओ की लोकप्रियता बढ़ रही है। नब्बे के दशक में सोवियत संघ तथा पूर्वी यूरोप के देशो में समाजवादी सत्ताओ का पतन तथा सोवियत संघ के विघटन के बाद तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने बड़े दम्भ के साथ शीतयुद्ध जीत लेने का दावा किया तथा अमेरिका सारे विश्व में ’’एक धु्रवीय महाशक्ति’’ के रूप में उभरा तथा ’’इतिहास का अंत’’ और ’’पूंजीवाद की अन्तिम विजय’’ की घोषणा की जाने लगी। परन्तु यह स्थिति बहुत दिन तक न चल सकी। शीघ्र ही अमेरिका अपने मित्र राष्ट्रो के साथ खाड़ी युद्धो में उलझ गया। दो खाड़ी युद्ध तथा 9/11/2001 की घटना के बाद अफगानिस्तान तथा इराक में सैन्य कार्यवाहियों ने अमेरिका की आर्थिक रूप से कमर तोड़ दी। इन युद्धो के परिणाम स्वरूप समूचे एशिया, अफ्रीका तथा यूरोप में ’’अलकायदा’’ ’’तालिबान’’ ’’बोकोहरम’’ जैसे ढ़ेरो अतिवादी संगठनो का जन्म हुआ। प्रारम्भ में अमेरिका ने ही सोवियत संघ के खिलाफ इन्हे आर्थिक तथा सैनिक सहायता देकर खड़ा किया परन्तु आज यह संगठन खुद अमेरिका तथा सम्पूर्ण विश्व के लिए भारी खतरा बन गये हैं। सीरिया, लीबिया और इराक में सक्रिय (आई0एस0) इस्लामिक स्टेट नामक आतंकवादी ,कट्टरवादी संगठन की गतिविधियों  ने सारे यूरोप ,अमेरिका ,अफ्रीका ,एशिया तक को हिला दिया है। अमेरिका तथा उसके सहयोगी गठबंधन के देश रूस, ब्रिटेन ,फ्रांस आदि बड़े पैमाने पर मानवरहित ड्रोन विमानो से आई.एस. को समाप्त करने के लिए उसके क्षेत्र पर भारी बमबारी कर रहे हैं। जिसने सारी दुनियां में भयानक अस्थिरता पैदा कर दी है। इन युद्धरत देशो से भारी पैमाने पर शरणार्थी यूरोपीय देशो तथा अमेरिका में आ रहे हैं  तथा यहाँ पर भारी सामाजिक, आर्थिक असंतुलन पैदा कर रहे हैं । अगर आज अमेरिका तथा इन देशो में बड़े पैमाने पर शरणार्थी आ रहे हैं  तो इसके लिए कही न कही उसकी युद्ध उन्मादी तथा विश्व वर्चस्व की नीति ही जिम्मेदार है।

अभी हाल में ब्रिटेन की ’’चिलकाॅट रिपोर्ट’’ में यह स्वीकर किया गया है कि खाड़ी युद्ध जिसमें अमेरिका के साथ ब्रिटेन भी शामिल था। एक गलत फैसला था तथा गलत खुफिया सूचनाओें के आधार पर लड़ा गया। जिसमें करीब सात से आठ लाख लोग मारे गये तथा इस सारे क्षेत्र में कट्टरवादी ताकतो को बढ़ावा मिला। जो आज सारे विश्व के लिए समस्या बन गयी है। अमेरिका का आर्थिक ढ़ाचा उच्च श्रेणी की युद्ध सामग्री नाभिकीय तथा मिसाइल टेक्नालाजी के निर्माण तथा विश्व भर में उसके निर्यात पर निर्भर है। यह अमेरिका के हित में है कि दुनियां भर में छोटे -बड़े युद्ध तथा गृह युद्ध हमेशा चलते रहे जिससे सैन्य हथियारो की होड़ बनी रहे तथा उनकी मांग लगातार जारी रहे। आज इस व्यापार में अनेक यूरोपीय देश इग्लैण्ड, फ्रान्स ,जर्मनी के अलावा ,जापान और चीन भी शामिल हो गये हैं  तथा इस क्षेत्र में भी अमेरिकी वर्चस्व टूटता नजर आ रहा है। सैनिक ताकत के बल पर दुनियां पर उसका वर्चस्व जरूर है परन्तु आज अमेरिका विश्व का सबसे कर्जदार मुल्क भी बन गया है। रूस,चीन,भारत ,मैक्सिको ,ब्राजील भी बड़ी अर्थव्यवस्थाओ के रूप में उभर रहे हैं। अफ्रीका ,एशिया तथा लैटिन अमेरिकी देशो की साम्राज्यवादी लूट में अमेरिका के साथ इनकी भी समान भागीदारी है। अमेरिका जैसे महाबली देश को ईरान, क्यूबा ,उत्तरी कोरिया जैसे अनेक छोटे देशो से भी अनेक मुद्दो पर शर्मिन्दगी उठानी पड़ रही है।

अमेरिका में बढ़ता आर्थिक संकट और नस्लवाद ,फांसीवाद का उभार  

इन्ही सब कारणो से अमेरिका में निरंतर आर्थिक और सामाजिक संकठ बढ़ रहा है। जल्दी -जल्दी आने वाली मंदियाॅ उसके आर्थिक तंत्र को संकठ ग्रस्त कर रही हैं । वास्तव में फांसीवाद तथा दक्षिणपंथ का उभार घनीभूत होते आर्थिक संकठो के ही अभिव्यक्ति होते हैं। अगर कोई यह कहे कि आज 1930 जैसा आर्थिक संकट मौजूद नही है , इसलिए फांसीवाद नही आ सकता तो वह यांत्रिकता का शिकार है। आज यदि अमेरिकी पूंजीपति वर्ग को आकस्मिक तौर पर भयानक संकठ का सामना नही करना पड़ रहा है पर 2015 की आखिरी तिमाही में आर्थिक वृद्धिदर मात्र 0.7 ही रह गयी थी। इस संकठ से उबरने के लिए वे ऐसे किसी भी शासक को चुन सकते हैं जो उन्ही की बिरादरी का हो और नग्न तौर पर पूंजीपरस्त नीतियों को लागू कर सके।

सन् 2008 में अमेरिका के ’’सबप्राइम’’ संकट की वजह से लाखो अमेरिकी बेरोजगार हुए। इस महामंदी के कारण जनता का एक बड़ा तबका गरीबी तथा बेरोजगारी से ग्रस्त हुआ। इनका समर्थन ट्रम्प को मिल रहा है। उनके कई जुमले भी लोगो में फांसीवादी उन्माद पैदा कर रहे हैं। चाहे वह चीन से अमेरिकी कम्पनियों को वापस लाने से पैदा होने वाले रोजगार की बात हो ( जो महज एक शगूफा) है। जिन देशो से अमेरिका व्यापार घाटा है उनसे आयात माल पर कर लगाकर पैसा वसूलने की बात हो या मैक्सिको या अमेरिका के बीच एक दरवाजे वाली दीवार खड़े करने की बात हो या मुसलमानो को अमेरिका में आने से रोकने और जो मौजूद  हैं उनके  पंजीकृत करने की बात हो। ट्रम्प के ये मुद्दे गरीब आबादी के एक बड़े हिस्से में एक उन्मादपूर्ण आशा पैदा कर रहे हैं। यदि यह कहा जाये कि निम्न तथा निम्न मध्यवर्ग को उनका एक ’’नायक’’ मिल गया है तो गलत न होगा। ट्रम्प ने पैक्स अमेरिका को याद करते हुए अमेरिका को पुनः महान बनाने की कसम को अपने प्रचार का मुख्य मुद्दा बनाया है। आज अमेरिका का बढ़ता आर्थिक संकठ नस्लवाद ,फांसीवाद को भयानक रूप से बढ़ा रहा है। अमेरिका तथा पश्चिमी दुनियां में आधुनिकता के आने के साथ ही वहां  पर ’’सामुदायिक हिंसा’’ करीब-करीब समाप्त हो गयी है। वहां गुजरात 2002 अथवा बोस्नियाॅ ,रूआण्डा जैसी सामूहिक नरसंहार की घटनाये नही होती। 9/11/2001 के बाद भी वहां मुसलमानो के ,खिलाफ कोई बड़ी हिंसा की घटना नही हुयी थी परन्तु आज भी अमेरिका में नस्लभेद ब्यापक तौर पर जारी है। जेलो में नब्बे प्रतिशत कैदी अश्वेत हैं । अश्वेतो की यह आम शिकायत है कि हर क्षेत्र में उनके साथ ब्यापक भेद भाव होता है। पिछले पांच  सालो में वहाँ नस्लीय हिंसा में करीब 16 फीसदी का इजाफा हुआ। पिछले साल 250 से ज्यादा अश्वेत नस्लीय हिंसा में मारे गये। इसके अलावा एक वर्ष के अन्दर सौ से ज्यादा ’’हेट ग्रुप’’ भी बन गये। शीघ्र ही यह आंकड़ा एक हजार तक होने की आशंका है। इसी वर्ष जुलाई माह में ’’टेक्सास ’’ के ’’डलास’’ में पुलिस द्वारा गोली चला कर एक अश्वेत की हत्या के बाद वहां व्यापक  नस्लीय हिंसा भड़कने से वहां पांच से ज्यादा पुलिस कर्मी भी मारे गये ।इन चुनाव में खतरनाक बात यह है कि इस बार के राष्ट्रपति चुनाव नस्लीय हिंसा के साये में होंगें । अमेरिका के दक्षिणी भागो में अभी भी ब्यापक सामाजिक पिछड़ापन है जहाँ से ट्रम्प को ब्यापक समर्थन मिल रहा है। ट्रम्प के नस्लीय बयानो से अमेरिका में अल्पसंख्यको के खिलाफ नफरत तथा घृणा बढ़ रही है। जो भविष्य में व्यापक सामुदायिक हिंसा का भी कारण बन सकती है। फिलहाल अमेरिका में जमीनी स्तर से कोई बड़ा फांसीवादी संगठन सक्रिय नही है। यद्यपि ’’ओथ कीपर्स’’ जेसे संगठन जो सेना पुलिस और नौकरशाही के बीच काम कर रहे हैं और इनके द्वारा चलाये जा रहे पैट्रियेटिक मूवमेण्ट में आम जनता का बहुत छोटा हिस्सा ही सक्रिय है। ट्रम्प जैसे नेता और ओथ कीपर्स जैसे संगठनो में आज भले उस तरह का सम्पर्क न हो परन्तु भविष्य में यह दोनो धारायें आपस में मिल भी सकती है। ’’डोनाल्ड ट्रम्प ’’ चुनाव जीते या न जीते अमेरिका में दक्षिणी पंथी उभार का खतरा लगातार बना रहेगा।

आज अमेरिका की जमीनी वास्तविकता यह है कि हिलेरी क्लिटंण्न’’ तथा डोनाल्ड ट्रम्प की राजनीति में बड़ा अन्तर नही रह गया है। हिलेरी क्लिण्टन के बारे में अनेक नारीवादी संगठन यह कह रहे हैं कि अगर वे राष्ट्रपति चुनी गयी तो अमेरिकी इतिहास में पहली महिला राष्ट्रपति होंगी। सच्चाई यह है कि सिनेटर के रूप में अपने कार्यकाल में उन्होने सबसे ज्यादा विरोध उन विधेयको का किया जो महिलाओ के संबंध में आर्थिक तथा सामाजिक सुधारो के पक्ष में थे। उनकी ’’व्यवहारिक नीतियां ’’ क्या हैं? उन पर भी गौर करने की जरूरत है। अमेरिका में सरकार का जनसुविधाओ में निवेश कम करना जन आन्दोलनो का दमन करना गन लाबी को समर्थन देना ,इजराईल के साथ खूनी गठजोड़ बनाना ,सीरिया ,इराक, अफगानिस्तान से लेकर ,यूक्रेन ,अफ्रीका तक में अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के खूनी खेल को समर्थन देना भी उनके व्यवहारिक कार्य तथा नीतियां हैं। इस ब्यवहारिकता के मूल में है पूंजीपति वर्ग के मुनाफे की दर को बरकरार रखना जो विश्व भर में घनीभूत हो रहे आर्थिक संकट के कारणा सिकुड़ती जा रही है।


वास्तव में ’’डोनाल्ड ट्रम्प’’ की फाॅसीवादी राजनीति और ’’हिलेरी क्लिंण्टन’’ की व्यवहारिक राजनीति दोनो ही आज किसी दुनियां की जनता के लिए संकट की अभिव्यक्ति है।

Friday, July 15, 2016

अरुणाचल प्रदेश पर मोदी सरकार को सुप्रीम कोर्ट का आईना

July 15, 2016 0
अरुणाचल प्रदेश पर मोदी सरकार  को सुप्रीम कोर्ट का आईना

 एल.एस. हरदेनिया 

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आज़ाद भारत के इतिहास में पहले कभी भी राज्यपाल की भूमिका की इतने सख्त षब्दों में निंदा नहीं की गई जितनी अरूणाचल प्रदेश  के मामले में की गई है। सर्वोच्च न्यायालय ने अरूणाचल प्रदेष की बर्खास्त कांग्रेस सरकार को पुनः सत्ता सौंपते हुए राज्यपाल की भूमिका के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं जिनका दूरगामी प्रभाव हो सकता है।
 दिनांक 13 जुलाई 2016 को दिए गए अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यपाल की भूमिका के संबंध में जो महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए हैं उनमें यह परामर्श शामिल है कि राज्यपाल को राजनीतिक पार्टियों के आंतरिक मतभेद और असंतोष से स्वयं को दूर रखना चाहिए। अरूणाचल प्रदेश में उत्पन्न स्थिति का उल्लेख करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि राज्यपाल को संविधान द्वारा निर्धारित लक्ष्मण रेखा के अंतर्गत ही अपने उत्तरदायित्व निभाना चाहिए।
राज्यपाल को अपने आदेष मुख्यमंत्री के परामर्श से ही जारी करने चाहिए। चूंकि राज्यपाल एक चुना हुआ अधिकारी नहीं है, इसलिए उसे विधायकों को सीधे आदेश देने का अधिकार नहीं है। राज्य की विधानसभा द्वारा लिए गए निर्णयों को निरस्त करने का अधिकार भी राज्यपाल को नहीं है। यदि वह ऐसा करता है तो इससे संविधान में निहित परंपरा को ठेस पहुंचती है। सर्वोच्च न्यायालय ने अरूणाचल प्रदेष के राज्यपाल के उस आदेश की निंदा की है जिसके द्वारा राज्यपाल ने विधानसभा के सत्र की तिथि एक महीना आगे बढ़ा दी थी। राज्यपाल ने यह भी तय कर दिया था कि विधानसभा की कार्यवाही किस ढंग से संपन्न हो। राज्यपाल ने यह भी आदेश दिया था कि विधानसभा स्पीकर को हटाए जाने संबंधी प्रस्ताव पर सबसे पहले विचार हो।
राज्यपाल के आदेश की भाषा संसदीय परंपरा और उत्तरदायी शासन के विपरीत थी। इस तरह यह स्पष्ट है कि विधानसभा के सत्र को आहूत करने संबंधी राज्यपाल का आदेष पूरी तरह असंवैधानिक था। सच पूछा जाए तो राज्यपाल की भूमिका की आलोचना एक तरह से केंद्रीय सरकार की आलोचना है क्योंकि उसका राजनीतिक उपयोग केंद्र सरकार के द्वारा बनाई गई रणनीति के अंतर्गत ही हुआ था।
वर्षों पूर्व बोम्बई मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 356 के दुरूपयोग को रोकने के लिए कुछ दिशा निर्देष जारी किए थे। अरूणाचल प्रदेश के मामले में इन आदेशों  की पूरी तरह अवहेलना की गई थी। धारा 356 के अन्तर्गत ही राज्यों पर राष्ट्रपति शासन लागू किया जाता है। इन दिषा निर्देषों के अंतर्गत, मंत्रिपरिषद को बहुमत का समर्थन है कि नहीं, इस बात का निर्णय विधानसभा के भीतर होना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने यह तय किया था कि यदि यह साफ हो जाता है कि धारा 356 का दुरूपयोग हुआ है तो उस संबंध में निर्णय करने का अधिकार उसका ही होगा और उस संबंध में राहत देने का अधिकार भी उसी का होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि 356 का उपयोग उसी स्थिति में किया जाना चाहिए जबकि संवैधानिक मषीनरी, प्रषासनिक नहीं, पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो गई हो।
केन्द्र को चाहिए कि 356 का उपयोग पूरी संजीदगी से, सोच-समझकर किया जाए। यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो केन्द्र और राज्यों के बीच के संबंधों को ठेस पहुंचेगी। डा. अम्बेडकर ने यहां तक कहा था कि संविधान के इस प्रावधान को मृतप्राय ही समझना चाहिए। अरूणाचल प्रदेश के मामले में पूर्व में जारी इन दिशा निर्देषों का पूरी तरह उल्लंघन हुआ है।
अरूणाचाल प्रदेश में जो कुछ हुआ है वह हद से बढ़कर शर्मनाक है। जब राज्यपाल ने विधानसभा की तिथि एक माह आगे बढ़ा दी थी तब स्पीकर ने विधानसभा सदन में ताला लगा दिया। उसके बाद विधानसभा का सत्र एक कम्युनिटी हाल में हुआ और बाद की बैठकें एक होटल में हुईं। ऐसा हमारे देश में पूर्व में कभी किसी भी राज्य में नहीं हुआ।
वैसे सर्वोच्च न्यायालय ने वहां की कांग्रेस सरकार को बाहर कर दिया है परंतु कांग्रेस के हाथ में सत्ता नहीं आ पाएगी क्योंकि उसके पास इस समय 58 सदस्यीय विधानसभा में सिर्फ 15 विधायकों का समर्थन है। दलबदल होने के पूर्व विधानसभा में कांग्रेस के सदस्यों की संख्या 45 थी, बाद में 30 सदस्यों ने कांग्रेस से स्तीफा देकर एक पृथक दल का गठन किया था।
राज्यपाल की भूमिका पूरी तरह से केंद्र के आदेश पर होती है। इस संदर्भ में राष्ट्रपति की भूमिका पर भी विचार किया जाना आवश्यक है। यद्यपि संविधान के अनुसार राष्ट्रपति को केंद्रीय मंत्रीपरिषद के निर्णय को मानना पड़ता है। परंतु यदि वह चाहे तो केंद्रीय सरकार से स्पष्टीकरण मांग सकता है। स्पष्टीकरण मांगने की प्रक्रिया में भी यह स्पष्ट हो जाता है कि राष्ट्रपति शासन लागू करने का निर्णय संवैधानिक दृष्टि से उचित है कि नहीं।
 इस तरह का एक दिलचस्प उदाहरण उस समय का है जब बिहार की सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था। उस समय के.आर. नारायणन राष्ट्रपति थे। उनने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार से स्पष्टीकरण मांगे। स्पष्टीकरण संतोषपूर्ण नहीं थे इसलिए राष्ट्रपति की सलाह के अनुसार वहां राष्ट्रपति शासन उठा लिया गया था। संयोग से उस समय भी केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में संयुक्त सरकार सत्ता में थी। श्री नारायणन ने केंद्रीय सरकार को भेजे अपने पत्र में स्पष्ट कहा था कि वे केंद्रीय सरकार की इस राय से सहमत नहीं हैं कि बिहार में कानून और व्यवस्था की स्थिति चरमरा गई है। नारायणन केंद्रीय सरकार के रवैये से नाराज़ थे। उन्होंने स्पष्ट लिखा था कि बिहार के राज्यपाल सुंदर सिंह भंडारी ने अत्यधिक पक्षपातपूर्ण निर्णय किया था। नारायणन ने अपने पत्र में धारा 356 के बारे में सरकारिया आयोग की सिफारिशों का भी उल्लेख किया था। राष्ट्रपति के हस्तक्षेप के बाद केंद्रीय सरकार को अपना निर्णय वापिस लेना पड़ा। यदि राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी चाहते तो इस तरह का कदम उठाकर देश को इस शर्मनाक स्थिति से गुज़रने से बचा सकते थे।
यह संभवतः पहली बार है जब न्यायपालिका ने इतने ज़ोरदार ढंग से विधायिका के मामले में हस्तक्षेप किया है। 1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद राजस्थान, मध्यप्रदेश और हिमाचल प्रदेश की सरकारों को बर्खास्त कर वहां राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था।
उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह द्वारा स्वयं होकर स्तीफा देने के बाद वहां राष्ट्रपति शासन लागू किया गया। मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा ने केंद्रीय शासन के निर्णय के खिलाफ प्रदेश की हाईकोर्ट में अपील की थी। हाईकोर्ट ने पटवा के पक्ष में निर्णय देकर उनकी सरकार को पुनः सत्ता सौंप दी थी। परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने पटवा की बर्खास्तगी को उचित बताया था। इस तरह के कुछ अन्य मामलों में बर्खास्तशुदा राज्य सरकारों को सर्वोच्च न्यायालय ने राहत नहीं दी। परंतु उत्तराखंड के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने विधानसभा में मतदान द्वारा कांग्रेस को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर दिया। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय केंद्रीय सरकार के मुंह पर एक करारा तमाचा था।
अरूणाचाल प्रदेश और उत्तराखंड दोनों हमारे देष की सीमा पर स्थित राज्य हैं। अरूणाचल प्रदेश पर तो चीन की नज़र रहती है। वहां राजनीतिक अस्थिरता पैदा करना जो राज्यपाल के इशारे पर हुई थी, एक आपराधिक कृत्य था, जो जानबूझकर योजनाबद्ध तरीके से किया गया।
पूर्व में बड़े पैमाने पर एक साथ अनेक राज्यों की चुनी हुई सरकारों को बर्खास्त किया गया था। उस समय केंद्र में मोरारजी भाई के नेतृत्व में जो सरकार थी जनसंघ (अब भारतीय जनता पार्टी) उसका एक घटक था। उस समय केंद्रीय सरकार ने कांग्रेस शासित समस्त राज्य सरकारों को बर्खास्त किया था। परंतु जिस भोड़े ढंग से उत्तराखंड और अरूणाचल प्रदेश की सरकारों को हटाकर राष्ट्रपति शासन लागू किया गया है, वैसा इससे पहले कभी नहीं हुआ।
पहले में भी कुछ ऐसे ही तरीकों से आंध्रप्रदेश की एन.टी. रामाराव की सरकार को वहां के राज्यपाल ने बर्खास्त किया था परंतु इससे पहले कि एन.टी. रामाराव न्यायपालिका में अपना मामला ले जाते उनके हाथ में पुनः सत्ता सौंप दी गई। इसी तरह बिहार की सरकार को हटाने का प्रयास किया गया था।
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1984 में कश्मीर की चुनी सरकार को बर्खास्त करवा दिया था। यह काम उस समय कष्मीर के राज्यपाल जगमोहन ने किया था जो बाद में भाजपा में शामिल हो गए थे। यह अनेक लोगों का मानना है कि उसके बाद ही वहां आतंकवाद के बीच अंकुरित हुए। यह एक संयोग ही है कि पिछले दो वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के अनेक निर्णय निरस्त किए हैं।
इनमें उत्तराखंड से संबंधित निर्णय के अतिरिक्त, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति के बारे में प्रस्तावित आयोग को निरस्त करना, केन्द्र सरकार द्वारा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों  की नियुक्ति संबंधी आदेष को वापिस करना एवं सूखे के संबंध में सरकार की लापरवाही की सख्त निंदा करना शामिल है। ताज़ा उदाहरण अरूणाचल प्रदेश संबंधी निर्णय का है।
यहां इस बात पर ज़ोर देना आवश्यक है कि राज्यों के संबंध में निर्णय बहुत सोच समझकर लिए जाने चाहिए। संविधान में हमने राज्यों को स्वायत्तता प्रदान की है। कई मामलों, विशेषकर विधायिका और कार्यपालिका के मामले में राज्य पूरी तरह सार्वभौमिक है। यदि उनकी सार्वभौमिकता को कम करने के प्रयास होते हैं तो इससे देष की एकता पर उसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसलिए केंद्रीय नेतृत्व को राजनीतिक लाभ के लिए ऐसे कदम नहीं उठाने चाहिए जिससे हमारे संघीय ढांचे में दरार पड़े।


Tuesday, July 5, 2016

स्मार्ट सिटी और बच्चे

July 05, 2016 0
स्मार्ट सिटी और बच्चे

जावेद अनीस



पिछले साल केंद्र सरकार द्वारा शहरी विकास के लिए 3 नये मिशन "अटल नवीकरण और शहरी परिवर्तन मिशन (अमृत), “सभी के लिए आवास मिशन और बहुचर्चित स्मार्ट सिटी मिशन की शुरुआत करते हुए इन्हें शहरी भारत का कायाकल्प करने वाली परियोजनाओं तौर पर पेश किया गया था. इनके तहत 500 नए शहर विकसित करने, 100 स्मार्ट शहर और 2022 तक शहरी क्षेत्रों में सभी आवास उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा गया है. इन परियोजनाओं की शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि ‘शहरीकरण को एक अवसर और शहरी केंद्रों को विकास के इंजन के तौर पर देखना चाहिए’. बहुचर्चित स्मार्ट सिटी परियोजना के लिए एक लाख करोड़ रूपए के बजट का आवंटन और एफडीआई की शर्तों में ढील दी जा चुकी है. लेकिन इनको लेकर सवाल पूछे जा रहे हैं कि आखिरकार स्मार्ट सिटीकिसके लिए हैं, यहाँ कौन रहेगा और इससे सबसे ज्यादा किसे फायदा होने जा रहा है? हमारे शहर में अव्यवस्था और अभावों के शिकार एक बड़ी आबादी झुग्गी बस्तियों में बहुत ही अमानवीय स्थिति रहती है ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि इन बुनियादी समस्याओं को दूर किये बिना शहरों को स्मार्ट कैसे बनाया जा सकता है? इसको लेकर विरोध भी देखने को मिल रहे हैं मध्यप्रदेश की राजधानी  भोपाल में तो नागरिक संगठनों, आम जनता, विपक्षी पार्टियों के साथ खुद भाजपा के कई नेता इसके विरोध में सामने खड़े दिखाई दिए. दरअसल भोपाल शहर के तुलसी नगर और शिवाजी नगर क्षेत्र को स्मार्ट सिटी के चुना गया था ये इलाके पॉश और हरे-भरे हैं. परियोजना की वजह से करीब चालीस हजार पेड़ों के काटे जाने का खतरा मंडरा रहा था. इसलिए तुलसी नगर और शिवाजी नगर क्षेत्र में स्मार्ट सिटी बनाये जाने को लेकर भोपाल के जागरूक नागरिकों द्वारा जोरदार विरोध किया जा रहा था उनकी मांग थी कि स्मार्ट सिटी का स्थान बदला जाए. जनदबाव के चलते कांग्रेस और भाजपा के कई स्थानीय नेता भी इस विरोध में शामिल हो गये अंत में मध्य प्रदेश सरकार को  मजबूर होकर इस  परियोजना को शिवाजी नगर और तुलसी नगर से स्थानांतरित करके नॉर्थ तात्या टोपे नगर ले जाने का फैसला लेने को मजबूर होना पड़ा.

भारत में झुग्गी बस्तियों में रहने वालों की आबादी लगातार बढ़ रही है. 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में साढ़े छह करोड़ से ज्यादा लोग स्लम शहरी झुग्गी बस्तियों में रहते हैं.  जिसमें से 32 प्रतिशत आबादी 18 साल से कम है. करीब 36.5 मिलियन बच्चे 6 साल से कम उम्र के है जिसमें से लगभग 8 मिलियन बच्चे स्लम में रहते हैं. हाल ही में जारी यू.एन. हैबिटैट की  रिपोर्ट वर्ल्ड सिटीज रिपोर्ट-2016 के अनुसार 2050 तक भारत के शहरों में और 30 करोड़ तक की आबादी का अनुमान लगाया गया है.वर्तमान में भी बड़ी संख्या में ग्रामीण क्षेत्रों से लोग शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं.भारत सरकार इसका कारण शहरीकरण के प्रति बढ़ता आकर्षण को मानती है जबकि यह सर्वादित है कि गांवों से शहर की तरफ पलायन का प्रमुख कारण ग्रामीण भारत में रोजगार के अवसरों में कमी का होना है. इधर शहरों में लगातार बढ़ रही आबादी के अनुपात में तैयारी देखने को नहीं मिल रही है. हमारे शहर बिना किसी नियोजन के तेजी से फैलते जा रहा हैं क्योंकि उन्हें बिल्डरों के हवाले कर दिया गया है. आज शहरों में जगह की कमी एक बड़ी समस्या है. यहाँ ऐसी बस्तियां बड़ी संख्या में हैं जहाँ जीने के लिए बुनियादी सुविधाएं मौजूद नहीं हैं.तमाम चमक-दमक के बावजूद अभी भी शहरी में करीब 12.6 फीसदी लोग खुले में शौच जाते हैं,झुग्गी बस्तियों में तो यह दर 18.9 फीसदी है.इसी तरह से केवल 71.2 प्रतिशत परिवारों को अपने घर के परिसर में पीने के पानी की सुविधा उपलब्ध है.शहरी भारत में अभी भी सीवेज के गंदे पानी का केवल 30 प्रतिशत हिस्सा ही परिशोधित किया जाता है बाकी का 70 फीसदी गंदा पानी नदियों, समुद्र,झीलों आदि में बहा दिया जाता है.

शहरी बस्तियों में रहने वाले बच्चों के सन्दर्भ में बात करें तो पीडब्ल्यूसी इंडिया और सेव दि चिल्ड्रन द्वारा 2015 में जारी रिर्पोट ‘‘फॉरगॉटेन वॉयसेसः दि वर्ल्ड ऑफ अर्बन चिल्ड्रन इंडिया’’ के अनुसार शहरी बस्तियों में रहने वाले बच्चे देश के सबसे वंचित लोगों में शामिल हैं. कई मामलों में तो शहरी बस्तियों में रह रहे बच्चों की स्थिति ग्रामीण इलाकों के बच्चों से भी अधिक खराब है.रिपोर्ट के अनुसार शहरी क्षेत्रों में जिन स्कूलों में ज्यादातर गरीब एंव निम्न मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चे शिक्षा के लिए जाते हैं उन स्कूलों की संख्या बच्चों के अनुपात में कम है, इस कारण 11.05 प्रतिशत स्कूल डबल शिफ्ट में लगते हैं, जहाँ शहरी क्षेत्रों में एक स्कूल में बच्चों की औसत संख्या 229 है वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में यह संख्या 118 है. शहरी क्षेत्रों के इन स्कूलों में बच्चों के ड्रॉप आउट दर भी अधिक हैं. इसी तरह से 5 साल से कम उम्र के 32.7 प्रतिशत शहरी बच्चें कम वजन के हैं. बढ़ते शहर बाल सुरक्षा के बढ़ते मुद्दों को भी सामने ला रहे हैं, वर्ष 2010-11 के बीच बच्चों के प्रति अपराध की दर में 24 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी जबकि 2012-13 में 52.5 प्रतिशत तक बढ़ी है.चाइल्ड राइटस एंड यू (क्राई) के अनुसार 2001 से 2011 के बीच देश के शहरी इलाकों में बाल श्रम में 53 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है.उपरोक्त सन्दर्भों में बात करें तो शहरी भारत में बड़ी संख्या में बच्चे बदहाल वातारण में रहने को मजबूर हैं और उनके लिए जीवन संघर्षपूर्ण एवं चुनौती भरा है.

सरकारों द्वारा शहरों के नियोजन के लिए पंचवर्षीय योजनाओं में प्रावधान किये जाते रहे हैं. केन्द्र एवं राज्य सरकारों द्वारा समय समय पर आवास नीतियाँ भी बनायी गई हैं. पिछले दशकों में “जवाहर लाल नेहरू राष्ट्रीय शहरी नवीनिकरण मिशन” और “राजीव गांधी आवास योजना” में शहरी नियोजन,विकास से लेकर शहरी गरीबों की स्थिति सुधारने, मूलभूत सुविधाएं देने के लम्बे चौड़े दावे किये गये थे लेकिन इन सब के बावजूद आज भी ना तो शहरों का व्यवस्थित नियोजन हो सका है और ना ही झुग्गी बस्तियों में जीवन जीने के लायक न्यूनतम नागरिक सुविधाएं उपलब्ध हो सकी हैं, आवास का मसला अभी भी बना हुआ है.जेएनयूआरएम के तहत शहरी गरीबों को जो मकान बना कर दिये गये थे वे टूटने-चटकने लगे हैं.

इन सब नीतियों और योजनाओं में बच्चों की भागीदारी और सुरक्षा के सवाल नदारद रहे हैं. वर्ष 2012 में एक सामाजिक संगठन द्वारा भोपाल में किये गये एक अध्ययन में पाया गया कि जे.एन.एन.यू.आर.एम. के तहत बनाये गये मकान बच्चों के सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक है. इन आवासीय इकाईयों में छत पर आने जाने के लिए सीढ़ी नही बनायी गई है साथ ही साथ इन छतों पर बाउंड्रीवाल भी नही बनाया गया है जिसके कारण कई बच्चे दुर्घटना के शिकार हो चुके थे.

स्मार्ट सिटी परियोजना में  भी बच्चों से संबंधित मुद्दों एवं उनके हितों को लेकर बातें सिरे से गायब हैं. स्मार्ट सिटी बनाने की प्रक्रिया में बच्चों की भागीदारी के नाम पर क्विज, सद्भावना मैराथन दौड़ और निबंध व पेंटिंग कॉम्पिटिशन जैसे कार्यक्रम का आयोजन करके खानापूर्ति भी की गयी है लेकिन इसमें भी झुग्गियों में रहने वाले बच्चों की भागीदारी नही के बराबर है.
कोई भी शहर तब तक स्मार्ट सिटी नहीं बन सकता, जब तक वहां बच्चे सुरक्षित न हो, उनके लिए खेलने की जगह एवं जीवन जीने के लिए बुनियादी नागरिक सुविधाओं का अभाव हो. हमें स्मार्ट शहर के साथ साथ चाइल्ड फ्रेंडली और बच्चे के प्रति संवेदनशील शहर बनाने की जरुरत है. शहर के प्लानिंग करते समय बच्चों की समस्याओं को दूर करने के उपाय किये जाने चाहिए और उनसे राय भी लेना चाहिए और यह सिर्फ कहने के लिए ना हो बल्कि एक ऐसी औपचारिक  व्यवस्था बनायी जाये जिसमें बच्चे शामिल हो सकें. ऐसा प्रयोग केरल और कर्नाटक में किया जा चुका है.


सबसे बड़ी चुनौती बिना झुग्गी बस्तियों में रहने वाले शहरी गरीबों और बच्चों की है. बिना उनके समस्याओं  को दूर किये स्मार्ट सिटी नही बन सकती है. लेकिन फिलहाल सारा जोर तो बढ़ते मध्यवर्ग, इन्वेस्टरस् के अभिलाषाओं की पूर्ति पर ही लगा है. जरुरत इस बात की है कि सरकार, कारर्पोरेट, और खाये अघाये मध्य वर्ग को मिल कर शहरी गरीबों और बच्चों की समस्याओं,उनके मुद्दों को दूर करने के लिए आगे आना चाहिए तभी वास्तविक रुप से ऐसा शहर बन सकेगा जो स्मार्ट भी हो और जहाँ बच्चों के हित भी सुरक्षित रह सकें.