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Saturday, March 31, 2018

सभ्यताएं खुद अपना विनाश कर लेती हैं :- स्टीफन हॉकिंग

March 31, 2018 0
सभ्यताएं खुद अपना विनाश कर लेती हैं :- स्टीफन हॉकिंग

सभ्यताएं खुद अपना विनाश कर लेती हैं - स्टीफन हॉकिंग


    अनुवाद – अशोक पांडे




"स ब्रह्माण्ड से अधिक बड़ा या पुराना कुछ नहीं है. मैं जिन प्रश्नों की बाबत बात करना चाहूँगा वे हैं: पहला, हम कहाँ से आये? ब्रह्माण्ड अस्तित्व में कैसे आया? क्या हम इस ब्रह्माण्ड में अकेले हैं? क्या कहीं और भी एलियनजीवन है? मानव जाति का भविष्य क्या है?

1920 के दशक तक हर कोई सोचता था कि ब्रह्माण्ड मूलतः स्थिर और समय के सापेक्ष अपरिवर्तनशील है. फिर यह खोज हुई कि ब्रह्माण्ड फैल रहा था. सुदूर तारामंडल हमसे और दूर जा रहे थे. इसका अर्थ यह हुआ कि पहले वे एक दूसरे के नज़दीक रहे होंगे. यदि हम पीछे इसके विस्तार में जाएं तो पाएंगे कि आज से करीब १५ बिलियन वर्ष पहले हम सब एक दूसरे के ऊपर रहे होंगे. यही बिग बैंगथा, ब्रह्माण्ड की शुरुआत.

लेकिन क्या बिग बैंग से पहले भी कुछ था? अगर नहीं था तो ब्रह्माण्ड की रचना किसने की? बिग बैंग के बाद ब्रह्माण्ड उस तरह अस्तित्व में क्यों आया जैसा वह है? हम सोचा करते थे कि ब्रह्माण्ड के सिद्धांत को दो भागों में बांटा जा सकता है. पहला यह कि कुछ नियम थे जैसे मैक्सवेल की समीकरण वगैरह और यह देखते हुए कि एक दिए गए समय में समूचे स्पेस में उसकी जो अवस्था थी उसमें सामान्य सापेक्षता ने ब्रह्माण्ड के विकास को निर्धारित किया. और दूसरा यह कि ब्रह्माण्ड की प्रारंभिक अवस्था का कोई प्रश्न ही नहीं था.

हले हिस्से में हमने अच्छी तरक्की की है, और अब हमें केवल सबसे चरम परिस्थितियों के अलावा अन्य सभी परिस्थितियों में विकास के नियमों का ज्ञान है. लेकिन अभी हाल के समय तक हमें ब्रह्माण्ड के लिए प्रारम्भिक परिस्थितियों की बाबत बहुत कम ज्ञान था. यह और बात है कि विकास के नियमों में इस तरह का वर्गीकरण और प्रारम्भिक परिस्थितियां अलग और विशिष्ट होने के साथ ही समय और स्पेस पर निर्भर होती हैं. चरम परिस्थितियों में, सामान्य सापेक्षता और क्वांटम थ्योरी समय को स्पेस में एक अलग आयाम की तरह व्यवहार करने देती हैं. इस से समय और स्पेस के बीच का अंतर मिट जाता है, और इसका यह अर्थ हुआ कि विकास के नियम प्रारम्भिक परिस्थितियों को भी निर्धारित कर सकते हैं. ब्रह्माण्ड अपने आप को शून्य में से स्वतःस्फूर्त तरीके से रच सकता है.

सके अलावा, हम एक प्रायिकता की गणना कर सकते हैं कि ब्रह्माण्ड अलग-अलग परिस्थितियों में अस्तित्व में आया था. ये भविष्यवाणियाँ कॉस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड के WMAP उपग्रह के पर्यवेक्षणों, जो कि बहुत शुरुआत के ब्रह्माण्ड की एक छाप है, से बहुत ज्यादा मेल खाती हैं. हम समझते हैं कि हमने सृष्टि के रहस्य की गुत्थी को सुलझा लिया है. संभवतः हमने ब्रह्माण्ड का पेटेंट करवाकर हर किसी से उसके अस्तित्व के एवज़ में रॉयल्टी वसूलनी चाहिए.

ब मैं दूसरे बड़े सवाल से मुख़ातिब होता हूँ क्या हम अकेले हैं या ब्रह्माण्ड में और भी कहीं जीवन है? हम विश्वास करते हैं कि धरती पर जीवन स्वतःस्फूर्त ढंग से उपजा, सो यह संभव होना चाहिए कि जीवन दूसरे उपयुक्त ग्रहों पर भी अस्तित्व में आ सके जिनकी संख्या पूरी आकाशगंगा में काफी अधिक है .

लेकिन हम नहीं जानते कि जीवन सबसे पहले कैसे अस्तित्व में आया. हमारे पास इसके पर्यवेक्षणीय प्रमाणों के तौर पर दो टुकड़े उपलब्ध हैं. पहला तो 3.5 बिलियन वर्ष पुराने एक शैवाल के फॉसिल हैं. धरती 4.6 बिलियन वर्ष पहले बनी थी और शुरू के पहले आधे बिलियन सालों तक संभवतः बहुत अधिक गर्म थी. सो धरती पर जीवन अपने संभव हो सकने के आधे बिलियन वर्षों बाद अस्तित्व में आया जो कि धरती जैसे किसी गृह के दस बिलियन वर्षों के जीवनकाल के सापेक्ष बहुत छोटा कालखंड है. इससे यह संकेत मिलता है कि जीवन के अस्तित्व में आने की प्रायिकता काफी अधिक है. अगर यह बहुत कम होती तो आप उम्मीद कर सकते थे कि ऐसा होने में उपलब्ध पूरे दस बिलियन वर्ष लग सकते थे.

दूसरी तरफ, ऐसा लगता है कि अब तक हमारे गृह पर अजनबी ग्रहों के लोगों का आगमन नहीं हुआ. मैं UFO’s की रपटों को नकार रहा हूँ. वे सनकियों या अजीबोगरीब लोगों तक ही क्यों पहुँचते हैं? अगर ऐसा कोई सरकारी षडयंत्र है जो इन रपटों को दबाता है और अजनबी ग्रहवासियों द्वारा लाये गए वैज्ञानिक ज्ञान को अपने तक सीमित रखना चाहता है, तो ऐसा लगता है कि यह नीति अब तक तो पूरी तरह से असफल रही है. और इसके अलावा SETI प्रोजेक्ट के विषद शोध के बावजूद हमने किसी भी तरह के एलियन टीवी क्विज़ शोज़ के बारे में नहीं सुना है. इससे संभवतः संकेत मिलता है कि हमसे कुछ सौ प्रकाशवर्ष की परिधि में हमारे विकास की अवस्था में कहीं कोई एलियन सभ्यता नहीं है. इसके लिए सबसे मुफ़ीद उपाय यह होगा कि एलियनों द्वारा अपहृत कर लिए जाने की अवस्था के लिए बीमा पालिसी जारी की जाएं.

ब मैं सबसे आख़िरी बड़े प्रश्न पर आ पहुंचा हूँ; मानव सभ्यता का भविष्य. अगर हम पूरी आकाशगंगा में अकेले बुद्धिमान लोग हैं, तो हमें सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारा अस्तित्व बना रहे और चलता रहे. लेकिन हम लोग अपने इतिहास के एक लगातार अधिक खतरनाक होते हुए दौर में प्रवेश कर रहे हैं. हमारी आबादी और हमारी धरती के सीमित संसाधनों का दोहन बहुत अधिक तेज़ी से बढ़ रहे हैं, साथ ही हमारी तकनीकी क्षमता भी बढ़ रही है कि हम पर्यावरण को अच्छे या बुरे दोनों के लिए बदल सकें. लेकिन हमारा आनुवांशिक कोड अब भी उन स्वार्थी और आक्रामक भावनाओं को लिए चल रहा है जो बीते हुए समय में अस्तित्व बचाए रखने के लिए लाभदायक होती थीं. अगले सौ सालों में विनाश से बच पाना मुश्किल होने जा रहा है, अगले हज़ार या दस लाख साल की बात तो छोड़ ही दीजिये.

मारे अस्तित्व के दीर्घतर होने का इकलौता अवसर इस बात में निहित है कि हम अपनी पृथ्वी ग्रह पर ही न बने रहें, बल्कि हमें अन्तरिक्ष में फैलना चाहिए. इन बड़े सवालों के उत्तर दिखलाते हैं कि पिछले सौ सालों में हमने उल्लेखनीय तरक्की की है. लेकिन यदि हम अगले सौ वर्षों से आगे भी बने, बचे रहना चाहते हैं तो हमारा भविष्य अन्तरिक्ष में है. इसीलिये मैं हमेशा ऐसी अन्तरिक्ष यात्राओं का पक्षधर रहा हूँ जिसमें मनुष्य भी जाएँ.

पनी पूरी ज़िन्दगी मैंने ब्रह्माण्ड को समझने और इन सवालों के उत्तर खोजने की कोशिश की है. मैं भाग्यशाली रहा हूँ कि मेरी विकलांगता गंभीर अड़चन नहीं बनी. वास्तव में इसके कारण मुझे उससे अधिक समय मिल सका जितना अधिकतर लोग ज्ञान की खोज में लगाते हैं. सबसे आधारभूत लक्ष्य है ब्रह्माण्ड के लिए एक सम्पूर्ण सिद्धांत, और हम अच्छी तरक्की कर रहे हैं.

मैं समझता हूँ कि यह बहुत संभव है कि कुछ सौ प्रकाशवर्षों के दायरे में हम इकलौती सभ्यता हों; ऐसा न होता तो हमने रेडियो तरंगें सुनी होतीं. इसका विकल्प यह है कि सभ्यताएं बहुत लम्बे समय तक नहीं बनी रह पातीं, वे खुद अपना विनाश कर लेती हैं."





Friday, March 30, 2018

भगवा वर्चस्व

March 30, 2018 0
भगवा वर्चस्व

जावेद अनीस

Courtesy-indiatoday


पूर्वोत्तर भारत के तीनों राज्यों , मेघालय और नागालैण्ड के विधानसभा चुनाव में जीत के साथ ही  भाजपा को उत्तरी-पूर्वी राज्यों में निर्णायक बढ़त हासिल हो गयी है. पिछले कुछ सालों के दौरान  भाजपा ने एक के बाद राज्यों को जीतकर या गठबंधन में भागीदारी करके भारतीय राजनीति में वो मुकाम हासिल कर लिया है जो कभी कांग्रेस का हुआ करता था. लेकिन इन सब में भगवा खेमे के लिये सबसे खास त्रिपुरा की जीत है जहाँ उसने अपने वैचारिक प्रतिद्वंद्वी वाममोर्चे के सबसे मजबूत माने जाने वाले गढ़ को भेद दिया है. त्रिपुरा भले ही एक छोटा राज्य हो लेकिन इस जीत का बड़ा प्रतीकात्मक महत्त्व है, एक तरफ जहाँ भारत का लेफ्ट, लिबरल और सेक्यूलर खेमा भगवा खेमे की इस अभूतपूर्व बढ़त से हतप्रभ है वहीँ भगवा खेमा अपनी इस उपलब्धि से संतुलन खोता नजर आया जिसकी परिणीति त्रिपुरा में हिंसा और लेनिन की मूर्ति टूटने में नजर आयी. यह जीत भाजपा के लिए बहुत मायने रखने वाली है और इसमें दोनों वैचारिक खेमों के लिये गहरे सन्देश छिपे हैं .

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने त्रिपुरा में भाजपा की जीत को विचारधारा की जीत बताया है, नतीजे आने के बाद  भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि जिस तरह से वास्तुशास्त्र में घर का उत्तर-पूर्वी कोना सबसे महत्वपूर्ण होता है, भाजपा के लिए भी वहां के राज्यों में मिल रही जीत काफी मायने रखती है. यह जीत इस लिये भी महत्वपूर्ण है कि भाजपा के सामने मोर्चे पर मानिक सरकार जैसा मुख्यमंत्री था जिसकी इमानदारी और सादगी के सामने विरोधी भी नतमस्तक हो जाते हैं वे भारतीय राजनीति में विलुप्त होते जा रहे सादगी और नैतिकता की ऐसी दुर्लभ मिसाल हैं जो आज के दौर की राजनीति में अब देखने को नहीं मिलती है.

त्रिपुरा में भाजपा को मिली जीत जादुई है, जीरो से सत्ता हासिल करने के उसके इस सफ़र की मिसालें भारतीय राजनीति में लम्बे समय तक दी जाती रहेंगीं. त्रिपुरा के  पिछले विधानसभा चुनावों में भाजपा को कोई भी सीट नहीं मिली थी और उसे मात्र केवल डेढ़ प्रतिशत वोट हासिल हुये थे यहां तक कि उसके ज्यादातर उम्मीदवारों की जमानत तक जब्त हो गई थी. लेकिन इसके बाद के सालों में उसका सफर असाधारण है अब 2018 के विधानसभा चुनाव में तस्वीर पूरी तरह से बदल चुकी है जहां भाजपा को दो तिहाई बहुमत के साथ जीत हासिल हुयी है.

रअसल पिछले कुछ वर्षों के दौरान भाजपा ने पूर्वोत्तर में बहुत ही सधी हुयी रणनीति के तहत काम किया है संघ का पहले से ही वहां काम था ही साल 2014 में संघ प्रचारसुनील देवधर को त्रिपुरा की जिम्मेदारी दी गयी जो 25 सालों से त्रिपुरा के आंचलिक इलाकों में काम कर रहे थे, फिर राम माधव को उत्तरपूर्व भेजा गया, लेकिन हेमंत सरमा कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होना  भाजपा के लिये पूर्वोत्तर में गेमचेंजर साबित हुआ, इसी वजह से 2016 में भाजपा को असम में सरकार बनाने में कामयाब होती है और अब तीन राज्य और उसके खाते में जुड़ चुके हैं .

तीन राज्यों के मतगणना के समय कांग्रेस मुखिया राहुल गांधी विदेश में थे और चुनाव नतीजे पर भी उनका बयान दो दिनों के बाद आता है इसपर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने राहुल को निशाने पर लेते हुये कहा कि कोई भी जिम्मेदार नेता अपने कार्यकर्ताओं को इस तरह से छोड़कर नहीं भाग सकता है. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी चुटकी लेते हुये कहा कि,वॉट्सएप पर मैसेज आया है कि इटली में भी चुनाव है.जाहिर है पार्टी अध्यक्ष बनने के बावजूद अभी भी उनकी टायमिंग नहीं सुधरी है और अहम मौकों पर उनके गैर-मौजूद रहने का सिलसिला बना हुआ है.कांग्रेस पार्टी को अपना नया अध्यक्ष मिलने के बाद भी उसके सिमटने का सिलसिला बना ही हुआ है पहले गुजरात, हिमाचल प्रदेश और अब पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के नतीजों ने कांग्रेस एक बार फिर से सदमा दे दिया है हालांकि इस दौरान कांग्रेस पार्टी को कुछ उपचुनावों भले ही सफलता मिली हो लेकिन उसमें राहुल गाँधी का योग्यदान नहीं माना जाएगा. जाहिर है राहुल के लिये मोदी को चुनौती देने से पहले अपनी  पार्टी को पटरी पर लाने की चुनौती बनी हुयी है .

धर लेफ्ट के लिये त्रिपुरा गवाने के बाद  अब केरल ही इकलौता ऐसा राज्य रह गया है जहां उनकी सरकार है. त्रिपुरा में वाम दलों लगातार पच्चीस सालों से सत्ता में थे बंगाल हारने के बाद एक तरह से त्रिपुरा वामपंथी दलों का बचा हुआ आखिरी किला था. चूंकि केरल में हर पांच साल बाद सरकार बदल जाने का रिवाज है इसलिये वहां के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है. आज अगर भारत का संसदीय वामपंथ अपने आप को सबसे कमजोर स्थिति में पा रहा है तो इसमें खुद उसका भी कम योग्यदान नहीं है सच्चाई तो यह है कि पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में इतने लम्बे समय तक सत्ता में रहने के बावजूद देश के सामने वे अपना कोई  मॉडल पेश करने में विफल रहे.   

स सबसे अलग भाजपा दिल्ली, बिहार और पंजाब जैसे झटकों के बावजूद बहुत ही गंभीरता और शिद्दत के साथ पूरे देश में अपने विस्तार के लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रही है. भगवा खेमे के लिये इससे पहले 2014 और फिर 2017 का साल बहुत खास साबित हुआ था जिसमें उसे  उत्तरप्रदेश जैसे सूबे में भारी  जीत मिली थी जिसके बाद अपने विवादित बयानों के लिये कुख्यात योगी आदित्यनाथ को देश के सबसे बड़े सूबे का सीएम बना दिया गया था .

लेकिन यह महज चुवानी विस्तार और सत्ता की लड़ाई तक सीमित नहीं है नहीं है बल्कि यह विचार और नजरिये की लड़ाई है जिसे विपक्ष को समझना होगा. 2014 के बाद से बहुत ही सजग तरीके से इस देश, समाज और राज्य को पुनर्परिभाषित करने की कोशिशें की गयी हैं. आज देश की राजनीति और समाज में दक्षिणपंथी विचारधारा का दबदबा है और इस मामले में वो अपने स्वाभाविक प्रतिद्वंदी वामपंथी खेमे से बहुत आगे निकल चुके हैं. जानना दिलचस्प होगा कि भारत में में इन दोनों ही विचारधाराओं का उद्भव लगभग एक ही समय पर हुआ था आज हम देखते हैं कि वामपंथी अपने  सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं वहीँ दूसरी तरफ संघ परिवार अपने इतिहास के सबसे सुनहरे वक्त में दाखिल हो चूका है.सत्ता और बदलाव की राजनीति में वही ताकतें कामयाब हो पाती है जो समय रहते जनता की नब्ज और बदलाव को लेकर उसकी आकांक्षाओं को समझ पाती हैं और बदलाव का वाहक बनने के लिये तैयार होती हैं, आज संघ परिवार के बरअक्स देश और समाज में कोई विकल्प दिखाई नहीं पड़ता है.

भारतीय राजनीति के इतिहास में विपक्ष शायद ही कभी इतना हताश और दिशाहीन दिखाई पड़ा हो. पिछले चार सालों के दौरान विपक्ष एकजुट होना और काउंटर नैरेटिव पेश करना तो दूर की बात है वे अभी तक अपने अंदरूनी विरोधाभाषों को भी दूर नहीं कर पाये हैं. भारत की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी सीपीएम अभी तक इस पहेली को ही हल करने में उलझी पड़ी है कि उसके लिए भाजपा बड़ी दुश्मन है या कांग्रेस ?. खुद कांग्रेस भी अपने आपको नेहरु के धर्मनिरपेक्ष विरासत और नरम हिन्दुतत्व के दोराहे पर खड़ा पा रही है.

विपक्ष को समझना होगा कि उनका सामना  हमेशा चुनावी मूड में रहने वाली मोदी-शाह की भाजपा से है जिसके पीछे संघ पूरे ताकत से खड़ा है. भाजपा की शीर्ष जोड़ी चौबीसों घंटे की राजनीति करती है और बहुत ही  निर्ममता के साथ अपने विरोधियों का सफाया करने के प्रति प्रतिबद्ध है आने वाले महीनों में कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव होने है जहाँ भाजपा लम्बे समय से सत्ता में है और इन सभी राज्यों में भाजपा का मुख्य मुकाबला कांग्रेस से है. कांग्रेस के लिए इन चार राज्यों के चुनाव आखिरी मौके की तरह है अगर वो दूसरी छोटी पार्टियों को एकजुट करते हुए सही रणनीति के साथ चुनाव नहीं लड़ती है तो फिर उसे कोई दूसरा मौका शायद ही मिले .

त्रिपुरा की  हार सभी पार्टियों के लिये एक यह  संदेश है कि अगर वे एकजुट नहीं होती हैं तो उनके सामने आस्तित्व का संकट खड़ा हो जाएगा. इसलिये 2019  से पहले उन्हें  साझा कार्यक्रम पेश करते हुए साथ आना होगा. यह ना केवल उनके  बल्कि भारतीय लोकतंत्र के हित में भी होगा .