08/01/2018 - 09/01/2018 - रूबरू

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Tuesday, August 28, 2018

शिवराज सरकार की हिटलरशाही

August 28, 2018 0
शिवराज सरकार की हिटलरशाही


जावेद अनीस

Chauthi Dunia ( 30 July to 5 August 2018 )


ध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को आम तौर पर भाजपा का नरम चेहरा माना जाता रहा है लेकिन उनकी सरकार द्वारा लगातार ऐसे कदम उठाये गये हैं जो कुछ अलग ही तस्वीर पेश करते हैं. इस दौरान कई ऐसे कानून लाने और पाबंदियां लगाने की कोशिशें की गयी  हैं जो नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन तो करते ही हैं साथ ही लोकतंत्र का गला घोंटने वाले हैं. पूरी कोशिश की गयी है कि सरकार की जवाबदेही कम हो, नागरिकों के अधिकारों में कटौती की जा सके. कुछ ऐसे कानून लाने के प्रयास भी किये गये हैं जो पुलिस प्रशासन को निरंकुश बनाने वाले हैं और इससे उनकी जवाबदेहिता कम होती है. इन सबके बीच मध्यप्रदेश में लोकतान्त्रिक ढंग से होने वाले धरने, प्रदर्शनों पर भी रोक लगाया जा रहा है. राजधानी भोपाल में धरनास्थल के लिये कुछ चुनिन्दा स्थानों का निर्धारण कर दिया गया है जो बंद पार्क या शहर से कटे हुये इलाके है. इसी तरह से पूरे प्रदेश में जलूस निकालने, धरना देने, प्रदर्शन,आमसभाएं करने में भांति भांति की अड़चने पैदा की जा रही हैं. 

भाजपा शासन के दौरान मध्यप्रदेश में विधानसभा की महत्ता और प्रासंगिकता कम होती गयी है, विधानसभा सत्रों की अवधि लगातार कम हुई है,सरकार द्वारा मनमाने तरीके से बीच में ही सत्र को खत्म कर दिया जाता रहा है और विधानसभा में पूछे गये मुश्किल सवालों को “जानकारी एकत्रित की जा रही है” जैसे जुमलों से टाले जाने का चलन बढ़ा है. पिछले दिनों मौजूदा विधानसभा का आखिरी सत्र मात्र पांच दिन के लिए तय किया गया था और इसे मात्र दो दिन में ही स्थगित कर दिया गया.
 ऐसा लगता है शिवराज सिंह की सरकार विधायिका के इस बुनियादी विकल्प को ही खत्म कर देना चाहती है कि कोई उससे सवाल पूछे और उसे इसका जवाब देना पड़े. विपक्ष द्वारा सदन में सवाल पूछने,अविश्वास प्रस्ताव रखने जैसे प्रावधान हमारे लोकतंत्र के आधार है लेकिन मध्यप्रदेश में विधानसभा की ताकत को कम करने और जन-प्रतिनिधियों के विशेषाधिकारों को सीमित  करने के दो बड़े प्रयास हो चुके हैं जो लोकतंत्र की मूलभावना के खिलाफ है.

हला मामला बीते 21 मार्च 2018 विधानसभा सत्र खत्म होने के दिन का है जिसमें प्रदेश के संसदीय कार्य विभाग द्वारा सभी विभागों को एक परिपत्र जारी किया गया था जिसमें साफ निर्देश दिया गया था कि सम्बंधित विभाग मंत्रियों से विधानसभा में पूछे गये ऐसे किसी प्रश्न का कोई उत्तर न दिलवायें जिससे उनकी जवाबदेही तय होती हो. परिपत्र का मजमून कुछ इस तरह से है विभागीय अधिकारी प्रश्नों के उत्तरों की संरचना, प्रश्नों की अंतर्वस्तु की गहराई से विवेचना करें तो आश्वासनों की व्यापक संख्या में काफी कमी आ सकती है. मंत्रियों को प्रत्येक विषय पर आश्वासन देने में बड़ी सतर्कता बरतना होती है, यदि किसी विषय पर आश्वासन दे दिया जाए तो यथाशीघ्र उसका परिपालन भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए अतः अपेक्षा की जाती है कि नियमावली के अनुबंध डी में आश्वासनों के वाक्य तथा रूप की सूची दी गई है, यह शब्दावली उदाहरण स्वरूप है, विधानसभा सचिवालय सदन की दैनिक कार्यवाही में से इसके आधार पर आश्वासनों का निःस्सारण करता है अतः विधानसभा सचिवालय को भेजे जाने वाले उत्तर/जानकारी को तैयार करते समय इस शब्दावली को ध्यान में रखा जाए तो अनावश्यक आश्वासन नहीं बनेंगे. जवाब देते समय जिन 34 शब्दावलियों से बचने की हिदायत दी गयी है उनमें “मैं उसकी छानबीन करूंगा”, “मैं इस पर विचार करूंगा”, “सुझाव पर विचार किया जाएगा”, “रियायतें दे दी जायेंगी”, “विधिवत कार्यवाही की जाएगी” आदि शब्दावली शामिल हैं. नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने इसे सरकार द्वारा लोकतंत्र का गला घोंटने, विपक्ष की आवाज दबाने और विधानसभा का महत्व खत्म करने की साजिश बताया है और मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान से इस परिपत्र को वापस लेने की मांग की है.   

ससे पहले मध्यप्रदेश विधानसभा का 2018 के बजट सत्र में ही शिवराज सरकार द्वारा विधानसभा की प्रक्रिया तथा कार्य संचालन संबंधी नियमावली में संशोधन किया गया था जो सीधे तौर पर सदन में विधायको के सवाल पूछने के अधिकार को सीमित करने की कोशिश तो थी ही साथ ही इसमें पहली बार सत्तापक्ष को सदन में “विश्वास प्रस्ताव” लाने का प्रावधान किया गया था  जिसके अनुसार अगर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही प्रस्ताव लाते हैं तो इसमें वरीयता सत्तापक्ष द्वारा लाए जाने वाले “विश्वास प्रस्ताव” को ही दी जाएगी और उसके बाद में विपक्ष के “अविश्वास प्रस्ताव” पर विचार किया जाएगा. इसी तरह किये गये संशोधनों के तहत ये प्रावधान किया गया था कि विधयाक किसी अति विशिष्ट और संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों की सुरक्षा के संबंध में हुये खर्च और ऐसे किसी भी मसले पर जिसकी जांच किसी समिति में चल रही हो और प्रतिवेदन पटल पर नही रखा गया हो, के बारे में सवाल नही पूछ सकते हैं. प्रदेश में विघटनकारी, अलगाववादी संगठनों की गतिविधियों के संबंध में भी विधायकों द्वारा जानकारियां मांगने पर पाबंदी लगायी गयी थी. कुल मिलाकर यह एक ऐसा काला कानून था जिससे विपक्ष की भूमिका बहुत सीमित हो जाती. इन नियमों को विपक्ष, मीडिया और सिविल सोसाइटी के दबाव में अंततः शिवराज सरकार को स्थगित करने को मजबूर होना पड़ा है.
ध्यप्रदेश में लम्बे समय से पुलिस कमिश्नर प्रणाली को लागू करने की बात की जाती रही है और अब इसी क्रम में शिवराज सरकार एकबार फिर भोपाल और इंदौर में पुलिस कमिश्नर प्रणाली लाने का कवायद कर रही है. बीते मार्च महीने में राज्य के गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह ने बयान दिया था कि उनकी सरकार पुलिस कमिश्नर सिस्टम को लागू करने पर विचार कर रही है. इसके पीछे दलील दी जा रही है कि इस व्यवस्था के लागू होने से अपराध में कमी आयेगी और अपराधियों को सजा मिलने में जो देरी होती है उससे निजात मिल सकेगी. खुद मुख्यमंत्री भी कह चुके हैं कि “जो हालात हैं उस पर अंकुश लगाने के लिए पुलिस को और अधिकार देना जरूरी दिख रहा है”. अगर यह व्यवस्था लागू होती है तो कलेक्टर की जगह पुलिस को मजिस्ट्रियल पावर मिल जाएगा और उसे धारा 144 लागू करने या लाठीचार्ज जैसे कामों के लिए कलेक्टर के आदेश की जरूरत नहीं रह जाएगा.

शिवराज सरकार द्वारा पुलिस कमिश्रर सिस्टम को लागू कराने के लिए भी काफी जोर लगाया गया  है. इस व्यवस्था के तहत धरना, प्रदर्शन की अनुमति देने का अधिकार कलेक्टर की बजाय पुलिस कमिश्नर के पास आ जायेगा और इससे सरकार को अपने खिलाफ होने वाले धरना-प्रदर्शन और आंदोलनों को काबू करने में भी आसानी हो जायेगी. वरिष्ठ भाजपा नेता और पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने 2014 में बतौर गृहमंत्री इस व्यवस्था की मुखालफत करते हुये कहा था कि यह अंग्रेजों का बनाया कानून है यह ठीक नहीं होगा कि जो आरोपी को पकड़ रहा है वही उसे सजा भी सुनाए, इससे स्थितियां सुधरने के बजाय और बिगड़ जाएंगी. मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यसचिव केएस शर्मा का भी कहना है कि ‘पुलिस कमिश्रर प्रणाली लोगों का ध्यान बांटने का एक तरीका है और इससे अपराधों पर नियंत्रिण नहीं होगा.’

पुलिस कमिश्नर प्रणाली के साथ ही मध्यप्रदेश सरकार “जन सुरक्षा एवं संरक्षा विनियमन विधेयक” लाने की तैयारी में है. मध्यप्रदेश पुलिस के वेबसाईट पर प्रस्तावित मध्यप्रदेश जन सुरक्षा एवं संरक्षा विनियमन विधेयक का प्रारूप अपलोड करते हुये इसके बारे में बताया गया है कि, “इस विधेयक का उद्देश्य यह है कि आम जन की सुरक्षा में उन सार्वजनिक स्थलों पर सुरक्षा के मौजूदा प्रबंध के स्तर में वृद्धि हो जहां कि आम जनता का आवागमन होता है. सामान्य जीवन में ऐसी अनेक परिस्थितियां एवं हरकतें प्राय: होती हैं जो कि जन सामान्य विशेषकर महिलाओं, बच्चों एवं बुजुर्गों को अनहोनी के लिये सशंकित करती हैं. उन व्यक्तियों जिनकी हरकतों से जन सामान्य संशकित हो, के विरूद्ध पुलिस विधि मान्य तरीके से हस्तक्षेप कर सके वह तभी संभव हो पाता है जबकि संज्ञेय अपराध हो गया हो, प्रस्तावित अधिनियम में ऐसे प्रावधान हैं जहां कि जनता विशेषकर महिलाओं, बच्चों एवं बुजुर्गों को सशंकित कर रहे ऐसे व्यक्तियों की हरकतों अथवा उनके द्वारा उत्पन्न परिस्थितियों में पुलिस हस्तक्षेप कर सके.” जाहिर है इस विधयेक को लाने के पीछे महिलाओं, बच्चों एवं बुजुर्गों की सुरक्षा का आड़ लिया जा रहा है और अपराध होने के पहले ही शंका के आधार पुलिस के हस्तक्षेप की बात की जा रही है.

न सुरक्षा एवं संरक्षा विनियमन विधेयक पुलिस को असीमित अधिकार देता है. इसमें कई ऐसे प्रावधान हैं जो एक नागरिक के तौर पर किसी भी व्यक्ति और समाज की निजता व गरीमा पर प्रहार करते हैं. अगर यह कानून के रूप में अस्तित्व में आ जाता है तो एक तरह से पुलिसिया राज कायम हो जायेगा. इससे पुलिस को आम लोगों की जिंदगी में दखल देने का बेहिसाब अधिकार मिल जाएगा और किसी व्यक्ति पर पुलिस द्वारा की गयी कारवाई को अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी. जानकार बताते हैं कि इस नये कानून की तो जरुरत ही नहीं है इससे तो पुलिस को दुरुपयोग के लिए एक और नया हथियार मिलेगा. ये भी जगजाहिर है कि पुलिस को राजनीतिक दबाव में काम करना पड़ता है ऐसे में इस बात की पूरी सम्भावना है कि सरकारें अपने विरोधियों को निशाना बनाने के लिए इसका दुरुपयोग कर सकती हैं. फिलहाल इस विधयेक का मसौदा समीक्षा के लिये विधि विभाग के पास है जहाँ इसे मंजूरी मिलने के बाद इसे अध्यादेश के रूप में लाया जा सकता है.

साल 2015 में शिवराज सरकार द्वारा एक ऐसा विधेयक पास कराया गया था जो कोर्ट में याचिका लगाने पर बंदिशें लगाती है, इस विधयेक का नाम है “‘तंग करने वाला मुकदमेबाजी (निवारण) विधेयक 2015”( Madhya Pradesh Vexatious Litigation (Prevention) Bill, 2015). मध्यप्रदेश सरकार ने इस विधेयक को विधानसभा में बिना किसी बहस के ही पारित करवाया लिया था और फिर राज्यपाल से अनुमति प्राप्त होने के बाद इसे राजपत्र में प्रकाशित किया जा चूका है. अदालत का समय बचाने और फिजूल की याचिकाएं दायर होने के नाम पर लाया गया यह एक ऐसा कानून है जो नागरिकों के जनहित याचिका लगाने के अधिकार को नियंत्रित करता है और ऐसा लगता है कि इसका मकसद सत्ताधारी नेताओं और अन्य प्रभावशाली लोगों के भ्रष्टाचार और गैरकानूनी कार्यों के खिलाफ नागरिकों को कोर्ट जाने से रोकना है. इस कानून के अनुसार न्यायपालिका राज्य सरकार के महाधिवक्ता के द्वारा दी गई राय के आधार पर तय करेगी कि किसी व्यक्ति को जनहित याचिका या अन्य मामले लगाने का अधिकार है या नहीं. यदि यह पाया जाता है कि कोई व्यक्ति बार-बार इस तरह की जनहित याचिका लगाता है तो उसकी इस प्रवृत्ति पर प्रतिबंध लगाया जा सकेगा. एक बार न्यायपालिका ने ऐसा प्रतिबंध लगा दिया तो उसे उस निर्णय के विरूद्ध अपील करने का अधिकार भी नहीं होगा. न्यायालय में मामला दायर करने के लिए पक्षकार को यह साबित करना अनिवार्य होगा कि उसने यह प्रकरण तंग या परेशान करने की भावना से नहीं लगाया है और उसके पास इस मामले से संबंधित पुख्ता दस्तावेज मौजूद हैं. 2015 में कानून लाते समय प्रदेश के वकीलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं  और संविधान के जानकारों ने शिवराज सरकार के इस कदम को तानाशाही करार दिया था. वरिष्ठ पत्रकार एल.एस. हरदेनिया कहते हैं कि “इस कानून के माध्यम से सरकार को यह अधिकार मिल गया है कि वह ऐसे लोगों को नियंत्रित करे जो जनहित में न्यायपालिका के सामने बार-बार याचिका लगाते हैं.”

प्रशासन व कानून व्यवस्था चलाने वाली मशीनरी पर राजनीतिक हस्तेक्षप बहुत घातक हो सकती है लेकिन दुर्भाग्य से इधर मध्यप्रदेश में पुलिस और प्रशासन के कामों में राजनेताओं, उनसे जुड़े लोगों, संगठनों का दखल का नया चलन बढ़ा है. पिछले साल मध्यप्रदेश में कटनी जिले के तत्कालीन एसपी गौरव तिवारी के साथ भी यही दोहराया गया जिन्होंने 500 करोड़ रुपए के बहुचर्चित हवाला कारोबार का पर्दाफाश किया था जिसमें शिवराज सरकार के सबसे अमीर मंत्री संजय पाठक और आरएसएस के एक वरिष्ठ नेता की संलिप्तता सामने आ रही थी. लेकिन इससे पहले कि गौरव तिवारी किसी निष्कर्ष पर पहुँचते उनका तबादला कर दिया गया. इस पूरे घटनाक्रम की सबसे खास बात यह रही है कि अपने चहेते एसपी के तबादले के विरोध में बड़ी संख्या में कटनी की जनता सड़कों पर उतर आयी थी. मध्यप्रदेश के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ जब किसी पुलिस अधिकारी के तबादले के विरोध में इतना बड़ा जनाक्रोश देखने को मिला हो. इन सबके बीच मुख्यमंत्री शिवराज सिंह पूरी तरह से संजय पाठक के पक्ष में खड़े नजर आये. उन्होंने एसपी गौरव तिवारी को कटनी वापस बुलाने की मांग को खारिज करते हुए कहा था कि महज आरोपों के आधार पर किसी के भी खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाएगी.

सी तरह से 2016 की एक घटना है जिसमें बालाघाट जिले के बैहर में आरएसएस प्रचारक सुरेश यादव के साथ पुलिस की तथाकथित मारपीट के मामले में भी शिवराज सरकार द्वारा की गयी कारवाही पर यह सवाल उठे थे कि राज्य सरकार ने संघ के दबाव में बिना जाँच किये ही पुलिस अधिकारियों के खिलाफ ही मामला दर्ज करा दिया. दरअसल भड़काऊ सन्देश फैलाने के आरोप में सुरेश यादव को गिरफ्तार करने के लिए जब पुलिसकर्मी स्थानीय संघ कार्यालय गए तो उन्हें धमकी दी गयी थी कि आप नहीं जानते कि आपने किसे छूने की हिम्मत की है, हम मुख्यमंत्री और यहाँ तक की प्रधानमंत्री को हटा सकते हैं, हम सरकारें बना और गिरा सकते हैं, तुम्हारी कोई हैसीयत नहीं, थोड़ा इंतजार करो अगर हम तुम्हारी वर्दी नहीं उतरवा सके तो संघ छोड़ देंगे.भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का भी एक धमकी भरा ट्वीट सामने आया था जिसमें उन्होंने इसे अक्षम्य अपराधकरार देते हुए सवाल पूछा था कि ‘क्या हमारी सरकार में नौकरशाही की इतनी हिम्मत भी हो सकती है?बाद में धमकियां सच भी साबित हुईं और शिवराज सरकार ने संघ प्रचारक को गिरफ्तार करने गये पुलिसकर्मीयों पर ही हत्या के प्रयास, लूटपाट जैसे गंभीर चार्ज लगा दिए थे जिसकी वजह से उन्हें खुद की गिरफ्तारी से बचने के लिए फरार होना पड़ा. इस पूरे मामला में संघ प्रचारक पर सोशल मीडिया में भड़काने वाले मेसेज पोस्ट करने का आरोप था जिसके बाद स्थानीय स्तर पर माहौल गर्माने लगा था और इसकी शिकायत थाने में की गयी जिसके बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया गया. इस दौरान संघ ने आरोप लगाया कि हिरासत के दौरान पुलिस ने संघ प्रचारक के साथ मारपीट की है जिसमें उसे गंभीर चोट आयीं हैं. संघ द्वारा इस पूरे मामले को कुछ इस तरह पेश किया गया कि मानो टीआई ने मुसलमान होने के कारण संघ कार्यालय पर हमला किया था. इस मामले को लेकर संघ ने पूरे प्रदेश में विरोध प्रदर्शन किया था जिसके बाद सरकार ने बिना किसी जांच के बालाघाट के एडिशनल एसपी, बैहर के थाना प्रभारी तथा 6 अन्य पुलिस कर्मियों के ऊपर धारा 307 सहित कई मामलों में केस दर्ज करते हुये उन्हें सस्पेंड कर दिया था. इस दौरान जिन पुलिसकर्मीयों पर कार्यवाही की गयी थी उनके परिजनों का कहना था कि बालाघाट में पुलिस वालों को नक्सलियों से ज्यादा आरएसएस, बजरंग दल, गोरक्षा समिति और भाजपा कार्यकर्ताओं से डर लगता है अब ऐसी परिस्थिति में कानून व्यवस्था कैसे लागू की जाएगी.

  
2016 में ही झाबुआ जिले के पेटलाबाद में मोहर्रम जुलूस रोके जाने को लेकर हुए झड़प के मामले में वहाँ के प्रशासन पर भाजपा सांसदों और संघ के नेताओं द्वारा दबाव डालने का मामला सामने आया था. यहां पुलिस ने कारवाई करते हुये आरएसएस के करीब आधा दर्जन स्थानीय पदाधिकारियों पर मुकदमा दर्ज करते हुये उन्हें गिरिफ्तार कर लिया था जिसके बाद पुलिस द्वारा की गयी इस कारवाई पर आरएसएस की नाराजगी सामने आई थी जिसे देखते हुये तत्कालीन पुलिस अधीक्षक को हटा दिया गया था और तत्कालीन उप पुलिस अधीक्षक व थाना प्रभारी को निलंबित कर दिया गया था क्योंकि इन लोगों ने दंगा और आगजनी करने के आरोप में संघ परिवार से जुड़े संगठनों के कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करने की गुस्ताखी की थी. इस मामले में संघ की नाराजगी को दूर करने के लिये शिवराज सरकार ने सेवानिवृत्त जज आरके पांडे की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित किया था. आयोग ने अक्टूबर 2017 में अपनी जो रिपोर्ट मध्यप्रदेश सरकार को सौंपी है उसमें आरएसएस पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं को क्लीनचिट देते हुये आरएसएस कार्यकर्ताओं पर पुलिस द्वारा की गयी कार्रवाई को द्वेषपूर्ण और बदला लेने वाला बताया गया है.

परोक्त घटनायें बताती हैं कि मध्यप्रदेश में प्रतिरोध की आवाज दबाने और विरोध एवं असहमति दर्ज कराने के रास्ते बंद करने की हर मुमकिन कोशिश की गयी है, विधानसभा जैसे लोकतंत्र की बुनियादी संस्थाओं को लगातार कमजोर किया गया है और जन-प्रतिनिधियों के विशेषाधिकारों को सीमित करने और नागरिकों से उन्हें संविधान द्वारा प्राप्त बुनियादी अधिकारों को कानून व प्रशासनिक आदेशों के जरिये छीनने को कोशिशें की गयी हैं. इन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता है इससे लोकतंत्र कमजोर होगा और सरकारी निरंकुशता बढ़ेगी. इसलिये शिवराज सरकार को चाहिए कि वो हिटलरशाही का रास्ता छोड़े और प्रदेश में लोकतांत्रिक वातावरण का बहल करें और संवैधानिक भावना के अनुसार काम करे.  

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27 August 2018 Prayukti


Thursday, August 16, 2018

जनता के पैसे से जन आशीर्वाद यात्रा

August 16, 2018 0
जनता के पैसे से जन आशीर्वाद यात्रा


जावेद अनीस

Chauthi Duniya  (6 to 12 August 2018 )

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान अपने लम्बे कार्यकाल के दौरान बेहिसाब घोषणाओं, विकास के लम्बे-चौड़े  दावों और विज्ञापनबाजी में बहुत आगे साबित हुये है, वे हमेशा घोषणा मोड में रहते हैं और उनकी सरकार के चमचमाते विज्ञापन प्रदेश के साथ राष्ट्रीय स्तर पर भी खुले जेब के साथ प्रसारित होते हैं जिसमें मुख्य रूप से शिवराज और उनकी सरकार की ब्रांडिंग की जाती है. अब विधान सभा चुनाव से ठीक पहले सीएम शिवराज सिंह द्वारा 'जन आशीर्वाद यात्रा' निकली जा रही है यह पूरी तरह से एक चुनावी यात्रा है जिसे सरकारी खर्च पर आयोजित किया जा रहा है. हालांकि बीच में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष द्वारा कहा गया था कि ‘इस यात्रा का खर्चा भाजपा उठाएगी’ लेकिन अंततः इसका बोझ प्रदेश की जनता को ही उठाना पड़ रहा है. इस यात्रा में संसाधनों के साथ-साथ सरकारी मशीनरी को झोंक दिया गया है. जन आर्शीवाद यात्रा के लिए जिस रथ का उपयोग किया जा रहा है उसकी कीमत करीब ढाई करोड़ रुपए से अधिक बताई जा रही है. 55 दिनों तक चलने वाली यह यात्रा मध्यप्रदेश की सभी 230 विधानसभाओं में जाएगी.इससे पूर्व के दो विधानसभा चुनाव से पहले भी शिवराजसिंह इसी तरह की 'जन आशीर्वाद यात्रा’ निकाल चुके हैं.

'जन आशीर्वाद यात्रा' शुरू होने के साथ ही मध्यप्रदेश की राजनीति में कुछ दिलचस्प लटके-झटके और प्रतिक्रियायें देखने को मिल रही हैं एक तरफ यात्रा के दौरान शिवराजसिंह चौहान  'मध्य प्रदेश के शहरों को अमेरिका और ब्रिटेन के शहरों से भी अच्छा’ बना देने का शगुफा फेंक रहे हैं वहीँ दूसरी तरफ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने भगवान महाकाल को एक चिट्ठी लिखी है जिसमें उन्होंने लिखा है कि जनता को ठगने वाले फिर से आपके दरबार में आ रहे हैं,छल प्रपंच की तैयारी है लेकिन अब उन्हें आशीर्वाद नहीं, उनके कर्मों और धोख़े का फल दो,आप जनता को आशीर्वाद देकर जनता को शिवराज के कुशासन से मुक्ति दिलाओ.कमलनाथ ने इसे जन आशीर्वाद नहीं, ज़बरन का आशीर्वाद बताया है वहीँ पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने बयान दिया है कि भगवान राम के युद्ध के समय रावण रथ पर सवार था, जबकि भगवान राम की सेना पैदल थी, अब शिवराज सिंह ढाई करोड़ के रथ पर सवार हैं और कांग्रेस की सेना पैदल है. जनआशीर्वाद यात्रा के जवाब में कांग्रेस ‘जन जागरण यात्रा’ निकाल रही है जिसे प्रदेश कांग्रेस उपाध्यक्ष जीतू पटवारी शिवराज सिंह चौहान के पीछे-पीछे चलकर शिवराज सरकार के दावों की पोल खोलेंगें.

लेकिन इन सबके बीच जनआर्शीवाद यात्रा शुरू होने का दिन मध्यप्रदेश भाजपा के अंदरूनी राजनीति के लिये बड़ा दिलचस्प साबित हुआ है. 14 जुलाई को मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जनआर्शीवाद यात्रा की शुरुआत धार्मिक नगरी उज्जैन से हुयी थी जिसे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इस यात्रा को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया, इस दौरान अमित शाह ने ऐलान किया कि विधानसभा चुनाव शिवराज सिंह चौहान के चेहरे पर ही लड़ा जाएगा और सत्ता में आने पर सरकार भी उनके ही नेतृत्व में बनेगी. इसके बाद अगले ही दिन इंदौर में शिवराज सिंह चौहान ने भी खुले तौर पर ऐलान किया कि, मेरे ही नेतृत्व में चुनाव लड़ा जायगा और मैं ही फिर मुख्यमंत्री बनूँगा गौरतलब है कि बीते 4 मई को अमित शाह ने भोपाल में आयोजित कार्यकर्ता सम्मेलन में ऐलान किया था कि अगला चुनाव चेहरा नहीं संगठन लड़ेगा इसके बाद से यह लगभग तय माना जा रहा था कि चुनाव बाद अगर भाजपा सत्ता में लौटती है तो भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री बदलना तय है.

लेकिन पेंच अभी बाकी है जनआर्शीवाद यात्रा को हरी झंडी दिखाने के बाद अमित शाह अपनी पत्नी के साथ कैलाश विजयवर्गीय से मिलने इंदौर में उनके घर पहुंच गये. कैलाश विजयवर्गीय मध्यप्रदेश में अमित शाह के फेवरेट नेता माने जाते हैं जिनकी शिवराजसिंह से प्रतिद्वंद्विता जग जाहिर है और गाहे-बगाहे उनका नाम मुख्यमंत्री के तौर पर भी उचलता रहता है. पिछले कुछ समय से कैलाश विजयवर्गीय का तेवर भी बदला हुआ नजर आ रहा है, एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान जब उनसे  सीएम पद की दावेदारी के बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था कि 'आपके मुंह का साइज क्या है, मैं लड्डू खिलाउंगा. ऐसे में अमित शाह का अपनी पत्नी के साथ कैलाश विजयवर्गीय के घर जाने के कई अर्थ निकाले जा रहे हैं.
दूसरी तरफ विधानसभा चुनाव को देखते हुए अमित शाह भोपाल में डेरा डालने वाले हैं. भोपाल में उनके लिये एक घर भी ढूंढ लिया गया है जो उनका वॉर रूम बनेगा और जहाँ से वे तीनों राज्यों के लिए रणनीति तैयार करेंगें. जाहिर है विधानसभा चुनाव के दौरान अमित शाह के भोपाल में रहने से शिवराज सिंह चौहान को फ्री हैंड नहीं मिलने वाला है. अब अमित शाह ही सभी रणनीति बनायेंगें बल्कि उनके हर कहे को अंतिम निर्णय माना जायेगा जिसे सबको मिलकर ना केवल मानना है बल्कि लागू भी करना होगा. ऐसे में यह स्पष्ट है कि मध्यप्रदेश में भाजपा पर्याय बन चुके शिवराजसिंह चौहान पहले की तरह इस विधानसभा के दौरान मध्यप्रदेश में भाजपा के सर्वेसर्वा नहीं रहने वाले हैं और ना ही उनकी एकतरफा चलने वाली है.

मध्यप्रदेश में भाजपा के हुकूमत का पंद्रह साल पूरा होने वाला है, सयाने लोग जीवन और राजनीति दोनों में सोलहवें साल संभल कर चलने की सलाह देते हैं. पंद्रह साल के बाद सत्ता विरोधी लहर का होना स्वाभाविक है जिसका इन दिनों सत्ताधारी भाजपा के नेता, मंत्री और विधायक बहुत आसानी से अनुभव कर पा रहे हैं. आक्रोशित जनता द्वरा विधायकों के साथ दिग्गज नेताओं को बैरंग वापस भेज की कई ख़बरें सामने आई हैं. ऐसे पंद्रह साल से सत्ताधारी रही पार्टी के मुख्यमंत्री को जो खुद के 13 सालों से लगातार इस पद पर बना हुआ है अपनी सरकार की उपलब्धियों और किये गये कामों को जनता को अवगत कराने के लिये सरकारी पैसे  से यात्रा निकालनी पड़े तो फिर सवाल तो उठेंगें ही, यह एक तरीके से जनता के पैसे का  दुरुपयोग है. बेहतर होता कि इस यात्रा में खर्च किये जाने वाले राशि का उपयोग जनता के हित में किया जाता और अगर कोई यात्रा निकालनी ही थी तो इसका खर्चा पार्टी उठाती, चुनाव से ठीक पहले सरकारी पैसे से निकली जा रही यात्रा का कोई औचित्य नहीं है.

Chauthi Duniya Urdu (6 to 12 August 2018 )



Saturday, August 4, 2018

मंदसौर से उठी लपटें

August 04, 2018 0
मंदसौर से उठी लपटें


जावेद अनीस

Chauthi Duniya (23 July to 29 July 2018 )


कुछ समय से “मंदसौर” लगातार सुर्खियों में बना हुआ है, इस बार मामला 7 वर्षीय बच्ची के साथ की गयी दरिंदगी का है जिसके बाद शिवराज सरकार प्रदेश में कानून व्यवस्था के सवालों को लेकर घेरे में है. पिछले साल किसानों के खिलाफ पुलिस द्वारा की गयी गोलीकांड की गूंज सियासी हलकों में अभी बनी ही हुयी है, हालांकि इस दौरान मंदसौर गोलीकांड से उठे लपटों को दबाने की हर मुमकिन कोशिश की गयी है. हाल में ही आयी जाँच रिपोर्ट में भी इस पर खूब लीपापोती की गयी है लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद शिवराज सरकार किसानों के इस आक्रोश को दबा पाने में विफल रही है. इधर एक नाबालिग बच्‍ची के साथ हुई दुष्‍कर्म की वारदात के बाद मंदसौर एक बार फिर शिवराज सरकार के खिलाफ आक्रोश के केंद्र के रूप में उभरा है. इस बार मुद्दा कानून व्यवस्था का है और सूबे में मासूम बच्चियों व महिलाओं को सुरक्षित वातावरण ना दे पाने के लिये कटघरे में उन्हीं शिवराजसिंह सिंह चौहान की सरकार है जो खुद को प्रदेश के बच्चियों का मामा कहलवाना पसंद करते है. पिछले कुछ महीनों के दौरान मध्य प्रदेश में एक के बाद एक हुई मासूम बच्चियों से दुष्कर्म की घटनाओं ने कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं. पिछले साल सूबे में बच्चियों के साथ दुष्कर्म पर फांसी का कानून बनाना गया था लेकिन यह उपाय भी बेअसर साबित हुआ है. 

मंदसौर की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है, 26 जून के दिन बहुत हैवानी तरीके से एक 7 वर्षीय बच्ची का अपहरण करके उसके साथ सामूहिक ज्यादती की गयी. इस दौरान  दुष्कर्मियों ने वहशीपन की तमाम हदें पार करते हुये उस बच्ची के साथ जो सलूक किया है वो दहला देने वाला है, दरिंदों द्वारा ना केवल बच्ची के साथ दुष्कर्म किया गया बल्कि उसके गुप्तांग में रॉड या लकड़ी जैसी कोई वस्तु भी डाला गया जिससे उसकी आंतें बाहर निकल गयी थीं.

मध्यप्रदेश सरकार द्वारा अपनी लापरवाहियों के लिये एक अलग पहचान बना चुके इंदौर के एमवाय अस्पताल में बच्ची के इलाज कराये जाने के फैसले को लेकर भी सवाल उठाये गये. इस सम्बन्ध में कांग्रेस नेता विवेक तन्खा का बयान है कि “यदि किसी मंत्री को बुखार भी आ जाए तो एयर ऐंबुलेंस बुलाई जाती है, उस बच्ची के साथ हैवानियत हुई है, इंदौर के एमवाय अस्पताल में उसका इलाज नहीं हो सकता सरकार को उसे एयर ऐंबुलेंस से दिल्ली के किसी अच्छे अस्पताल में इलाज के लिये भेजना चाहिए”. पीड़िता का परिवार भी एमवाय अस्पताल में बच्ची के इलाज से संतुष्ट नहीं था. पीड़िता के पिता द्वारा आरोप लगाया गया कि बच्ची को तकलीफ होने और एक आंख से दिखाई नहीं देने के बावजूद भी अस्पताल प्रशासन द्वारा उसे डिस्चार्ज करने को कहा गया. इस मामले में सत्ताधारी भाजपा के नेताओं की बेशर्मी भी देखने को मिली, पीड़िता का हालचाल जानने के लिये क्षेत्र के भाजपा सांसद सुधीर गुप्ता और विधायक सुदर्शन गुप्ता अस्पताल गये तो इस दौरान विधायक महोदय पीड़िता की मां से यह कहते हुये दिखाई पड़े कि 'सांसद जी को धन्यवाद बोलिए, स्पेशल आपके लिए आए हैं.'

मध्यप्रदेश में इस साल के अंत तक विधानसभा चुनाव होने को हैं ऐसे में विपक्ष इस मामले को लेकर सत्ताधारी भाजपा को घेरने का कोई भी मौका नहीं छोड़ रहा है. कांग्रेस पार्टी ने मंदसौर दुष्कर्म मामले को राष्ट्रीय स्तर पर उठाते हुये कहा कि मध्यप्रदेश महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ हो रहे अपराधों का गढ़ बन गया है. ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सरकार पर हमला करते हुये कहा कि “भाजपा के राज में मध्यप्रदेश 'बलात्कार की राष्ट्रीय राजधानी' बन गया है”. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की तरफ से भी ट्विट किया गया कि “मध्य प्रदेश के मंदसौर में आठ साल की एक लड़की के साथ गैंगरेप हुआ है, जो जिंदगी और मौत से जूझ रही है, इस बर्बर घटना ने मुझे व्यथित कर दिया है”.

कांग्रेस द्वारा यह आरोप भी लगाया गया कि शिवराज सरकार ने 12 साल से कम उम्र की लड़कियों के साथ दुष्कर्म करने वालों को सजा-ए-मौत देने का कानून तो बना दिया है लेकिन इस कानून का डर दिखाई नहीं दे रहा है. दरअसल मध्यप्रदेश देश का पहला राज्य है जहां 12 साल से कम आयु की बच्चियों के साथ बलात्कार करने वालों के लिये कानून पारित किया गया है. पिछले साल मध्यप्रदेश विधानसभा ने बारह साल से कम उम्र की लड़कियों के साथ हुए बलात्कार के मामलों में फांसी की सजा तय करने के लिए “दंड विधि (मध्य प्रदेश संशोधन) विधेयक” पारित किया था जिसके मुताबिक 12 साल या इससे कम उम्र की लड़कियों के साथ बलात्कार या सामूहिक बलात्कार के मामलों में अपराध सिद्ध होने पर दोषियों को कम से कम 14 साल की कैद और अधिकतम फांसी की सजा सुनाई जा सकती है. इससे पहले भारत सरकार ने बच्चों के साथ बढ़ रहे अपराधों को देखते हुए 2012 में एक विशेष कानून पास्को एक्ट तो मौजूद ही था, जो बच्चों को छेड़खानी,बलात्कार और कुकर्म जैसे मामलों से सुरक्षा प्रदान करता है.

लेकिन इन कानूनों का कोई खास असर होता दिखाई नहीं पड़ रहा है. भोपाल स्थित सामाजिक संस्था विकास संवाद द्वारा राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के पिछले 16 साल के आंकड़ों का विश्लेषण किया है जिसके निष्कर्ष भयावह है. रिपोर्ट के अनुसार पिछले 16 सालों (2001 से 2016 तक) के दौरान बच्चों के प्रति अपराध के सबसे ज्यादा मामले (95324 मामले) मध्यप्रदेश में दर्ज हुये हैं और इस दौरान मध्यप्रदेश में बच्चों के प्रति अपराध के मामलों में 865 प्रतिशत वृद्धि हुयी है. इसी तरह से इन 16 वर्षों के दौरान बच्चों से बलात्कार और गंभीर यौन अपराधों के मामले भी सबसे ज्यादा मामले (23659 मामले) मध्यप्रदेश में ही दर्ज किये गये हैं, इस दौरान यहां बच्चों के साथ बलात्कार के मामलों में 1109 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.

विडम्बना ये है कि बच्चों के प्रति अपराध के मामले तो बढ़े ही है लेकिन इसी के साथ ही अदालतों में बच्चों के प्रति अपराध के लंबित मामलों में भी बढ़ोतरी हुई है. रिपोर्ट के अनुसार इन 16 वर्षों में मध्यप्रदेश में बच्चों के प्रति अपराध के लंबित मामलों में 1420 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, इस दौरान जिन 404 मामलों का ट्रायल पूरा हो चूका है उसमें भी केवल 157 मामलों (38.9) मामलों में ही सजा हो सकी है.

उपरोक्त परिस्थितियों को देखते हुये किसी भी संवेदनशील और जवाबदेह सरकार की प्राथमिकताओं में बच्चों की सुरक्षा का सवाल सर्वोच्च होना चाहिये था लेकिन ऐसा लगता है कि शिवराजसिंह चौहान के एजेंडे में बच्चों की सुरक्षा का मसला न्यूनतम है. तभी तो मध्यप्रदेश के 2018-19 के कुल बजट में से केवल 0.044 प्रतिशत (2.05 लाख करोड़ रूपये) ही बच्चों की सुरक्षा के लिये आवंटित किये गये हैं, वहीँ लोगों को मुफ्त तीर्थ यात्रायें कराने के लिये चलायी जा रही “मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना” के लिये 200 करोड़ रूपये का आवंटन किया गया है. प्राथमिकता स्पष्ट है ‘बच्चे वोट बैंक नहीं है’ इसलिये उन्हें असुरक्षा के अँधेरे सुरंग में छोड़ दिया गया है जबकि मुफ्त तीर्थ यात्रा कराके वोटों की फसल उगाया जा सकता है.

बच्चों की सुरक्षा जैसे गंभीर और बुनियादी मसले पर मध्यप्रदेश सरकार लफ्फाजी और डायलागबाजी करती हुयी ही नजर आ रही है जिससे जनभावनाओं के उबाल को संतुष्ट किया जा सके. मंदसौर दुष्कर्म के बाद मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ''ये दरिंदे धरती पर बोझ हैं, ये धरती पर जीवित रहने के लायक नहीं हैं'' और “हम यह सुनिश्चत करेंगें कि आरोपी को शीघ्र फांसी की सजा दिलवायी जा सके” जैसे बयान देते ही नजर आये हैं. वे अच्छी तरह जानते है कि आज के माहौल में फांसी की सजा का एलान एक लोकप्रिय कदम है. लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि अकेले कड़े कानून ही काफी नहीं हैं और कई बार तो कड़े कानूनों से यह खतरा बढ़ जाता है कि कहीं  अपराधियों में  इससे बचने के लिए पीड़ितों की हत्या का चलन न बढ़ जाये, दरअसल यह मसला सिर्फ दोषियों को फांसी दिलाकर हल हो जाने वाला नहीं है बल्कि इसके एक समग्र दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है जिसमें लैंगिक समानता के मूल्यों को बढ़ावा देने ,यौन शिक्षा, दोषियों के सामजिक बहिष्कार और कानून व्यवस्था पर गंभीरता से ध्यान देने जैसी बातें शामिल हैं.

मंदसौर गोलीकांड से मध्यप्रदेश के किसान पहले से ही आक्रोशित थे लेकिन अब दुष्कर्म की घटना के बाद से आम लोगों में भी बिगड़ती कानून-व्यवस्था को लेकर गुस्सा देखने को मिल रहा है. मंदसौर में हुयी इन दोनों घटनाओं ने विपक्ष को हमलावर होने का मौका दे दिया है. पिछले दो सालों के दौरान मंदसौर शिवराज सरकार के खिलाफ जनाक्रोश के केंद्र के रूप में उभरा है और आने वाले विधानसभा चुनाव के दौरान मुख्य अखाड़ा मंदसौर ही होगा. चुनावी साल में मंदसौर से उठी लपटें सत्ताधारी भाजपा के लिये घातक साबित हो सकती हैं जबकि विपक्षी कांग्रेस इसका भरपूर सियासी फायदा उठाना चाहेगी. मंदसौर का मालवा-निमाड़ की लगभग 65 सीटों पर असर देखने को मिल सकता है. जाहिर है इसका नुकसान सत्ताधारी भाजपा को ही उठाना पड़ेगा.