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Saturday, May 18, 2019

अंशु मालवीय की कविता - हत्यारे बहुत मार्मिक होते हैं

May 18, 2019 0
अंशु मालवीय  की कविता - हत्यारे बहुत मार्मिक होते हैं



अंशु मालवीय




फ्लड लाइट लगाकर
माँओं पर तोड़े गए बलात्कार के
अपराध बोध में
वे माँ से बेहद प्यार करते हैं

और इससे ,ज़्यादा वे प्यार करते हैं
भारत माँ से

बस्तियाँ जलाकर लौटते हुए
विव्हल किलकारियों में
जब वे "भारत माता की जय " बोलते हैं
तो श्रद्धा से
मक़तूलों की घिघ्घियाँ बँध जाती हैं

हत्यारे बहुत पारिवारिक होते हैं
वे अपनी पत्नी से बेहद प्यार करते हैं
इसलिए
हर बिस्तर पर
सहवास के चरम क्षणों में
वे अपनी पत्नी को याद कर फफक पड़ते हैं

वे जानवरों के बेहद करीब होते हैं
सिंह को पालतू बनाते हैं और
उनकी दया के कुछ छीटें
कुत्ते के पिल्लों पर भी पहुँच जाते हैं

खंज़रों को साफ करते
या आस्तीन से ख़ून के धब्बे मिटाते वक़्त
वे पुराने फिल्मी गाने गुनगुनाते
या कविताएँ लिखते हैं

उन्होंने हत्या के कलात्मक विकल्प तैयार किये हैं
जी ! यक़ीन मानिये
इतना बड़ा है उनकी करुणा का दायरा
कि कभी --कभी वे हत्या भी नहीं करते
अपनी पैनी आँखों में सनातन सम्मोहन साधकर
वे हमें ख़ुदकुशी के फ़ायदे समझाते हैं
और हम ......
ख़ुद अपनी गर्दन उतार कर
उनके क़दमों में रख देते हैं

Friday, April 12, 2019

चुनावी माहौल में छापेमारी - टायमिंग और इरादे को लेकर सवाल

April 12, 2019 0
चुनावी माहौल में छापेमारी - टायमिंग और इरादे को लेकर सवाल


जावेद अनीस


आयकर विभाग द्वारा मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ के करीबियों पर छापे के बाद से प्रदेश के सियासी माहौल में उबाल आ गया है. लोकसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग से 4 दिन पहले की गयी इस कारवाई को लेकर सवाल उठ रहे हैं और इसके राजनीतिक मायने भी तलाशे जा रहे हैं, जहां एक तरफ भाजपा इसे “काले धन” पर प्रहार बता रही है तो वहीँ कांग्रेस इसको भाजपा द्वारा आगामी चुनाव में लाभ लेने की कवायद बता रही है.

आयकर विभाग के इस छापे के दायरे में मुख्यमंत्री कमलनाथ के पूर्व निजी सचिव प्रवीण कक्कड़, ओएसडी राजेंद्र कुमार मिगलानी, भांजे रतुल पुरी, अश्विनी शर्मा, प्रदीप जोशी शामिल हैं जिनके 50 से अधिक ठिकानों पर छापे मारे गये हैं.  दावा किया जा रहा है इस छापेमारी के दौरान करोड़ों की संपत्ति और नगदी मिली है.

पश्चिम बंगाल की तरह यहां भी आयकर विभाग की टीम द्वारा प्रदेश की ऐजेंसियों बाताये बिना ही यह कार्रवाई की गयी है यहां तक कि राज्य चुनाव आयोग तक को इसके बारे में जानकारी नहीं दी गई थी. आईटी टीम अपने साथ सीआरपीएफ जवानों की टुकड़ी भी लाई थी जिसकी वजह से छापेमारी के दौरान केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ़) और मध्य प्रदेश पुलिस के बीच टकराव जैसी स्थिति बन गयी थी.  

आयकर विभाग की इस कारवाई के बाद भाजपा हमलावर नजर आ रही है पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि पिछले 100 दिनों में मध्यप्रदेश में जो खेल चला था  यह सब उसी का नतीजा है. नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने आरोप लगाया है कि प्रदेश में कमलनाथ सरकार में जो ट्रांसफ़र उद्योग चलाया गया उसके नतीजे अब जनता के सामने आ रहे हैं उन्होंने कहा है कि “मुख्यमंत्री के ओएसडी के यहाँ से छापे में कालेधन का मिलना गंभीर मामला है, नैतिकता के आधार पर मुख्यमंत्री को अपना इस्तीफ़ा दे देना चाहिये.”

इस मामले को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी लातूर के अपने चुनावी रैली में जोर-शोर से उठाया, इसको लेकर कांग्रेस पर हमला बोलते हुये उन्होंने कहा कि “मध्य प्रदेश में सरकार बने अभी छह महीने नहीं हुए, लेकिन इनकी कलाकारी देखिए अरबों-खरबों रुपये की लूट के सबूत मिल रहे हैं.”

वहीँ दूसरी तरफ कांग्रेस ने पलटवार करते हुये आरोप लगाया है कि  यह कार्यवाही चुनाव के ठीक पहले कांग्रेस पार्टी की छवि खराब करने और राजनीतिक दबाव बनाने का यह असफल प्रयास है. मुख्यमंत्री  कमलनाथ ने आरोप लगाया है कि ये सबकुछ मोदी सरकार के इशारे पर हो रहा है, उन्होंने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि पूरा देश जानता है कि पिछले 5 वर्षों से  यह लोग कैसे संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल करते आये हैं, जब इनके पास विकास और अपने काम पर कुछ कहने और बोलने के लिए नहीं बचता है तो ये विरोधियों के खिलाफ इसी तरह के हथकंडे अपनाते हैं.

छापेमारी को लेकर भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय द्वारा की गयी एक ट्वीट भी सवालों के घेरे में है को लेकर सवाल उठ रहे हैं जिसमें उन्होंने बताया था कि  इस छापेमारी के दौरान करीब 281 करोड़ रुपए बरामद किये गये हैं. दिलचस्प बात यह है कि बरामद किये गये इस रकम के बारे में उन्होंने यह जानकारी आयकर विभाग से दस घंटे पहले ही दे दी थी. ऐसे में प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आयकर विभाग आधिकारिक जानकारी से पहले 10 घंटे पहले ही कैलाश विजयवर्गीय को 281 करोड़ के बारे में जानकारी कैसे मिल गयी ?

इस पूरे प्रकरण में चुनाव आयोग का रुख भी गौरतलब है जिसमें उसने जांच एजेंसियों को आगाह करते हुये निर्देश दिया है कि आचार संहिता के दौरान होने वाली कार्रवाई एकतरफा नहीं होनी चाहिये और ऐसी किसी भी कार्रवाई से पहले उसे इसकी सूचना आयोग को दी जाये .

एजेंसियों के बेजा इस्तेमाल को लेकर मोदी सरकार का रिकार्ड पहले से ही खराब रहा है.अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार चुनाव से ठीक पहले पिछले 6 महीनों के दौरान आयकर विभाग विपक्ष के नेताओं या उनसे  लोगों के यहां 15 बार छापामारी की गयी है.

ऐसे में आयकर विभाग द्वारा की गयी इस कारवाई के  टायमिंग और मकसद को लेकर सवाल खड़े किये जा रहे हैं .ठीक ऐसे समय जब लोकसभा चुनाव प्रचार-प्रसार अपने चरम पर है आयकर विभाग की इस छापेमारी में सियासी मकसद ढूंढें जा रहे हैं.  इससे पहले पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में भी आयकर विभाग द्वारा की गयी छापेमारी को लेकर बवाल हो चूका है जिसमें ममता बनर्जी और चंद्रबाबू नायडू धरना भी दे चुके हैं. इस सम्बन्ध में कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी भी प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी पर  चुनाव से पहले विपक्षी पार्टियों को कमजोर करने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का बेजा इस्तेमाल करने का आरोप लगा चुके हैं .

मध्यप्रदेश में सत्ता से बाहर होने के बाद से प्रदेश भाजपा इकाई में  भ्रम और नेतृत्वहीनता की स्थिति बन गयी है जिसकी  वजह से राज्य इकाई  में खेमेबाजी, आपसी घमासान और उथल-पथल अपने चरम पर है. आज स्थिति यह है कि सूबे में लोकसभा चुनाव के लिये कांग्रेस पार्टी का का प्रचार-प्रसार  ज़ोर पकड़ चुका है वहीँ भाजपा में टिकटों के लिये घमासान चल रहा है.

प्रदेश में भाजपा के सबसे बड़े नेता शिवराज सिंह चौहान को भले ही राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया गया हो लेकिन राजनीतिक रूप से वे अभी भी पूरी तरह से सेटल नहीं हो पाये हैं और उनका एक पावं अभी भी मध्यप्रदेश में जमा हुआ है. शिवराज ने वैसे भी अपने सामने किसी और नेता को पनपने नहीं दिया था इधर उनके मध्यप्रदेश में जमे रहने की जिद के कारण नयी टीम भी उभर कर सामने नहीं आ पा रही है.

द2018 में विधानसभा चुनाव की हार के बाद से केंद्रीय नेतृत्व शिवराज की मर्जी के खिलाफ उन्हें प्रदेश की राजनीति से बेदखल करने को आमादा है दरअसल मोदी और शाह की जोड़ी इस बात को बखूबी समझती है कि अगर पार्टी में उनकी स्थिति थोड़ी भी  कमजोर पड़ती है तो शिवराज सिंह मजबूत विकल्प केर रूप में सामने आ सकते हैं इसलिये शिवराज को उनके मजबूत किले से बाहर निकालना जरूरी है. इसलिये उन्हें राज्य से बाहर नकालने की एक खामोश जद्दोजहद जारी है.

उपाध्यक्ष बना दिये जाने के बावजूद भी शिवराज खुद को प्रदेश की राजनीति में ही सक्रिय बनाये हुये हैं, फिलहाल उनकी सारी जद्दोजहद हिंदी ह्रदय प्रदेश की जमीन पर अपने पकड़ को कमजोर ना होने देने का है और इसके लिये वे  हर संभव प्रयास कर रहे हैं और प्रदेश में अपने दखल का कोई ना कोई बहाना ढूंढ ही लेते हैं. सूबे में  शिवराज के आलावा कोई और चमकदार चेहरा ना होने के कारण लोकसभा चुनाव तक के लिये वे भाजपा आलाकमान के लिये भी मजबूरी है.

इस खींच-तान के कारण शिवराज इस लोकसभा चुनाव के दौरान उदासीन दिखाई पड़ रहे हैं इन सबसे राज्य ईकाई में भी असमंजस्य की स्थिति बनी हुई है. ऐसे में मध्यप्रदेश में अब भाजपा की साड़ी उम्मीदें मोदी- शाह के करिश्मे और रणनीतियों पर निर्भर है. कमलनाथ के करीबियों पर छापेमारी को इसी से जोड़ कर देखा जा रहा है जिससे सक्रिय और तेजी निर्णय लेने वाले मुख्यमंत्री की छवि बना रहे कमलनाथ को कमजोर किया जा सके.

बहरहाल जो भी हो इस छापेमारी की गूंज प्रदेश में लोकसभा चुनाव की पूरी प्रक्रिया के दौरान बनी रहेगी. जैसा की अंदेश था कमलनाथ सरकार द्वारा पलटवार किया गया है जिसके तहत राज्य की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) द्वारा भाजपा की शिवराज सरकार के दौरान हुये बहुचर्चित  ई-टेंडर घोटाले को 8 कंपनियों पर एफआईआर दर्ज किया गया है. करीब 80 हजार करोड़ रूपये का यह घोटाला अपनी तरह का तरह का अनोखा घोटाला था जिसमें भ्रष्टाचार रोकने के लिये बनायी गयी व्यवस्था को ही घोटाले का जरिया बना लिया गया था .

बताया जाता है कि इस घोटाले में अब शिवराज सरकार में मंत्री रहे राज्य तीन भाजपा  नरोत्तम मिश्रा, कुसुम मेहदेले, रामपाल सिंह और कई करीबी नौकरशाह  भी जांच के दायरे में आ गये हैं.

जाहिर है पहले वार फिर पलटवार के बाद अब ऐसा लगता है कि मध्यप्रदेश में लोकसभा का यह चुनाव छापेमारी और घोटाले की जांच के साये में  ही लड़ा जायेगा.


Monday, April 1, 2019

स्वामी असीमानंद का बरी होना- किस दिशा में जा रही है भारतीय न्याय व्यवस्था ?

April 01, 2019 0
स्वामी असीमानंद का बरी होना- किस दिशा में जा रही है भारतीय न्याय व्यवस्था ?


राम पुनियानी

Image Courtesy- truthofgujarat.com

भारतीय न्याय प्रणाली इन दिनों जिस ढंग से काम कर रही है, उससे न्याय पाना और दोषियों को सजा दिलवाना बहुत कठिन हो गया है. न्यायिक निर्णय, कार्यपालिका (पुलिस व अभियोजन) द्वारा न्यायाधीशों के समक्ष प्रस्तुत सबूतों पर आधारित होते हैं. ऐसे में, सत्ताधारी दल की विचारधारा और उसकी सोच की आपराधिक मुकदमों में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है. कई मौकों पर, वर्चस्वशाली विचारधारा - भले ही उसके पैरोकार सत्ता में न हों - भी अदालती फैसलों को प्रभावित करती है. यह दुर्भाग्यपूर्ण परन्तु सच है. सन 1992-93 में मुंबई में भड़की सांप्रदायिक हिंसा में 1,000 से अधिक लोग मारे गए थे. परन्तु इस खूनखराबे के दौरान घटित गंभीर अपराधों के बहुत कम दोषियों को सजा मिल सकी. इस हिंसा के बाद, पाकिस्तान की आईएसआई के सहयोग से, मुंबई के अंडरवर्ल्ड ने मुंबई में अनेक बम विस्फोट किए, जिनमें करीब 200 व्यक्ति मारे गए. बम विस्फोटों से सम्बंधित प्रकरणों में कई लोगों को फांसी की सजा सुनायी गयी, अनेक को आजीवन कारावास से दण्डित किया गया और बड़ी संख्या में अन्यों को अलग-अलग अवधि की सजाएं दी गईं. इसमें कुछ भी गलत नहीं है और प्रजातंत्र में यही होना भी चाहिए. परन्तु क्या हम रुबीना मेमन और साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के साथ हुए अलग-अलग व्यवहार को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं? रुबीना मेमन, उस कार की मालिक थीं, जिसका इस्तेमाल मुंबई बम धमाकों में किया गया और प्रज्ञा, उस मोटरसाइकिल की, जिसका प्रयोग मालेगांव धमाकों में हुआ. परन्तु रुबीना को आजीवन कारावास मिला और प्रज्ञा को बरी कर दिया गया ! 

यह सन्दर्भ इसलिए क्योंकि हाल में, एक एनआईए अदालत ने समझौता एक्सप्रेस बम धमाके, जिसमें 68 लोग मारे गए थे (इनमें से 43 पाकिस्तानी नागरिक थे), से सम्बंधित मामले में स्वामी असीमानंद को बरी कर दिया है. इसके पहले, असीमानंद को मक्का मस्जिद बम धमाका प्रकरण में भी ज़मानत मिल गई थी. इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया को किस तरह प्रभावित किया गया यह इससे साफ़ है कि अदालत से प्रकरण की वह मुख्य फाइल ही गायब हो गयी, जिसमें असीमानंद द्वारा किये गए खुलासे दर्ज थे. 
  
स्वामी असीमानंद पक्के संघी हैं और गुजरात के डांग जिले में, वनवासी कल्याण आश्रम के लिए काम करते थे. उन्होंने डांग में शबरी कुम्भ के आयोजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी. उनका नाम कई बम धमाकों के सन्दर्भ में सामने आया था, जिनमें मालेगांव, मक्का मस्जिद, अजमेर दरगाह और समझौता एक्सप्रेस धमाके शामिल थे. ये सभी, सन 2006 से 2008 के बीच हुए थे. इन धमाकों का सिलसिला तब रुका जब महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद निरोधक दस्ते के तत्कालीन प्रमुख हेमंत करकरे के अथक प्रयासों से यह उजागर हुआ कि मालेगांव धमाके में प्रयुक्त मोटरसाइकिल, पूर्व एबीवीपी कार्यकर्ता साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की थी. सघन जांच से यह भी सामने आया कि इन धमाकों के तार, हिंदुत्व की विचारधारा से प्रेरित कई लोगों से जुड़े थे और ये सभी लोग या तो आरएसएस या उससे सम्बद्ध संस्थाओं से सीधे जुड़े थे या उनसे प्रभावित थे. शिवसेना के मुखपत्र सामना  ने करकरे के मुंह पर थूकने की बात कही और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें देशद्रोही बताया. यद्यपि, करकरे अपना काम पूरी ईमानदारी से और पेशेवराना ढंग से कर रहे थे परन्तु राजनीतिज्ञों द्वारा उन पर हमले ने उन्हें हिला दिया. उन्होंने अपनी व्यथा, अपने वरिष्ठ अफसर जुलिओ रिबेरो से साँझा की. बाद में, जब एनआईए ने करकरे पर कीचड़ उछालना शुरू किया, तब रिबेरो ने उनका पूरा साथ दिया और खुलकर कहा कि करकरे सत्यनिष्ठा से अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं. 

प्रज्ञा ठाकुर, असीमानंद और उनके साथियों का आतंकी हमलों में हाथ होने के खुलासे ने देश में सनसनी पैदा कर दी और तत्कालीन यूपीए सरकार के कई मंत्रियों ने इन मामलों को “हिन्दू आतंकवाद” या “भगवा आतंकवाद” का नमूना बताया. यह एक दम गलत था और इसकी तुलना केवल इस्लामिक आतंकवाद शब्द के कुछ समय से प्रचलित प्रयोग से की जा सकती है. हेमंत करकरे मुंबई पर 26/11 2008 को हुए आतंकी हमले में मारे गए और जो लोग उन्हें कल तक देशद्रोही बता रहे थे, वे ही उन्हें शहीद का दर्जा देने लगे. बाद में, राजस्थान पुलिस के आतंकवाद-निरोधक दस्ते ने इस जांच को आगे बढ़ाया और यह सामने आया कि कई आतंकी हमलों में संघ परिवार से जुड़े लोगों का हाथ था. इस सबका संपूर्ण विवरण सुभाष गाताडे की पुस्तक गोडसेस चिल्ड्रेन  में उपलब्ध है.
सन 2014 में, एनडीए के शासन में आते ही, जांच की दिशा बदल गयी. मुंबई की रोहिणी सालियान, जो इन मामलों में लोक अभियोजक थीं, से कहा गया कि वे आरोपियों को सजा दिलवाने के लिए ज्यादा प्रयास न करें और नरमी बरतें. हेमंत करकरे के सनसनीखेज खुलासे के एक दशक बाद, उनकी जांच और उसके नतीजों को ठन्डे बस्ते में डाल दिया गया है और उलटे, उन पर तरह-तरह के आरोप लगाये जा रहे हैं. इसके साथ ही, न्यायिक प्रक्रिया और दोषियों को सजा दिलवाने की उसकी क्षमता भी संदेह के घेरे में आ गयी है.

असीमानंद ने अपनी गिरफ़्तारी के बाद, मजिस्ट्रेट के समक्ष इकबालिया बयान दिया था. तब वे पुलिस की हिरासत में नहीं थे और दो दिन से, न्यायिक हिरासत में जेल में थे. अपने इकबालिया बयान, जो क़ानूनी दृष्टि से वैध है, में उन्होंने इन धमाकों की योजना बनाने और उन्हें अंजाम देने में अपनी केंद्रीय भूमिका का विस्तार से वर्णन किया था. उन्होंने इस आशय के संकेत भी दिए थे कि इस घटनाक्रम की जानकारी आरएसएस के शीर्ष नेतृत्व को भी थी. लगभग दो साल की अवधि में, केरेवेन  पत्रिका की लीना रघुनाथ को दिए अपने लम्बे साक्षात्कार में भी उन्होंने लगभग वही बातें कहीं थीं, जो उन्होंने मजिस्ट्रेट को बताईं थीं. बाद में, उन्होंने यह कहते हुए अपना इकबालिया बयान वापस ले लिया कि उन पर दबाव डालकर उनसे यह बयान दिलवाया गया था.   


असीमानंद के बरी होने से यह साफ़ है कि न्याय प्रणाली किस हद तक कार्यपालिका पर निर्भर है. काफी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि पुलिस, सम्बंधित मजिस्ट्रेट के सामने कोई प्रकरण किस तरह प्रस्तुत करती हैं. विकास नारायण राय, जो कि समझौता एक्सप्रेस प्रकरण की जांच करने वाले विशेष जांच दल (एसआईटी) के मुखिया थे, ने एनआईए की भूमिका पर प्रश्नचिन्ह लगाये हैं. “एनआईए को बताना चाहिए कि गवाह अपनी कही बातों से पीछे कैसे और क्यों हट गए. दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत अपना बयान दर्ज करवाने के बाद गवाह अदालत में पलटे हैं. जांच एजेंसी को उनके विरुद्ध झूठी गवाही देने के आरोप में मुक़दमा चलाना चाहिए. सामान्य धारणा यह है कि एनआईए ने इस मामले में नरमी बरती है. पूरा निर्णय पढ़ने के बाद ही मैं इस विषय में कुछ और कह सकूंगा.”

इस निर्णय से यह प्रश्न भी खड़ा हो गया है कि आखिर 68 लोगों की मौत के लिए कौन ज़िम्मेदार है. क्या समझौता एक्सप्रेस में अपने आप धमाका हो गया था? दरअसल, सांप्रदायिक राष्ट्रवाद के एजेंडे के तहत, न्याय प्रक्रिया को योजनाबद्ध ढंग से कमज़ोर किया जा रहा है. 

(अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) (लेखक आईआईटी, मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)

Thursday, March 28, 2019

भारत में स्कूली शिक्षा का विकास - बदलाव और चुनौतियां

March 28, 2019 0
भारत में स्कूली शिक्षा का विकास - बदलाव और चुनौतियां

जावेद अनीस


सार्वजनिक शिक्षा एक आधुनिक विचार है,जिसमें सभी बच्चों को चाहे वे किसी भी लिंग, जाति, वर्ग, भाषा आदि के हों, शिक्षा उपलब्ध कराना शासन का कर्तव्य माना जाता है. भारत में वर्तमान आधुनिक शिक्षा का राष्ट्रीय ढांचा और  प्रबन्ध औपनिवेशिक काल और आजादी के बाद के दौर में ही खड़ा हुआ है. 1757 में जब ईस्ट इंडिया कम्पनी के हुकूमत की  शुरुआत हुई तब यहां राज्य द्वारा समर्थित एवं संचालित कोई ठोस शिक्षा व्यवस्था नहीं थी. हिन्दुओं और मुसलमानों  दोनों की अपनी निजी शिक्षा व्यवस्थाएं थीं.प्रारंभ में  अंग्रेजों की नीति भारत में पहले से चली आ रही शिक्षा व्यवस्था का सहयोग करने की थी और जोर जोर इस पर था कि देश का शासन चलाने में उनकी मदद करने के लिए भारतीय अधिकारियों को संस्कृत,फारसी और अरबी में अच्छी तरह निपुण किया जाये और परंपरागत हिन्दू और मुस्लिम अभिजात वर्ग में  अपनी साख बनायीं जा सके. इसी को ध्यान में रखत हुए 1781 में इस्लामी अध्ययन मुहैया कराने के  लिए कलकत्ता मदरसा, 1792 में बनारस में बनारस संस्कृत कालेज आदि की स्थापना की गयी.

कालांतर में इस नीति में बदलाव हुआ अंग्रेजी शासन के लिए आधुनिक शिक्षा प्राप्त वर्ग की जरूरत महसूस की गयी. भाव भी था कि कैसे अज्ञानी भारतियों को अंधकार से दूर करके उन्हें सभ्य बनाया जाये जिसमें यूरोप के विज्ञान, कला, अंग्रेजी शिक्षा इसे  ईसाइयत के प्रचार को साधन भी माना गया. मैकाले के अनुसार -अंग्रेजी शिक्षा का उद्देश्य व्यक्तिओं के एक ऐसे वर्ग का निर्माण करना था जो रंग और रक्त में   भारतीय हो लेकिन रुचियों, विचारों, नैतिकता और बुद्धि में अंग्रेज हो. एक ऐसा वर्ग जो सरकार और लाखों लोगों के बीच मध्यस्थ के तौर पर सेवा दे सके.

इसके बाद 1837 में बड़ा बदलाव होता है और राजकाज एवं न्यायालय की भाषा से फारसी को हटाकर अंग्रेजी कर दी जाती है. 1844 इस बात की विधवत घोषणा कर डी जाती है कि सरकारी नियुक्तियों में अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त भारतीयों को ही तरजीह दी जाएगी. इसी के साथ ही कलकत्ता,मद्रास और बम्बई विश्वविद्यालयों जैसे आधुनिक शिक्षा केन्द्रों की स्थापना की जाती है.

इस दौर में एक खास बात यह होती है कि  ईस्ट इंडिया कम्पनी, मिशनरियों और बर्तानी हुकूमत द्वारा स्थापित स्कूल-कालेज सभी भारतीयों के लिए खुले थे. इस दौरान अंग्रेजो द्वारा एक स्पष्ट नीति अपनाई गई कि किसी अछूत बच्चे के सरकारी स्कूल में प्रवेश से इंकार नहीं किया जाएगा. यह एक बड़ा बदलाव था जिसने सभी भारतीयों के लिए शिक्षा का दरवाजा खोल दिया.

1911 में गोपाल कृष्ण गोखले ने प्राथमिक शिक्षा को नि:शुल्क और अनिवार्य करने का प्रयास किया. पहली बार किसी राष्ट्रीय मंच से अनिवार्य शिक्षा का सवाल उठाया  गया. इसके विरोध में सरकारी पक्ष के सदस्य एवं सामंती तत्व एकजुट हो गये. फलतः गोखले का प्रस्ताव बहुमत से खारिज हो गया लेकिन गोपाल कृष्ण गोखले द्वारा उठायी गयी अनिवार्य शिक्षा की मांग अभी तक बनी हुई है.

आजादी के बाद भारतीय राज्य का फोकस प्राथमिक शिक्षा पर नहीं था इसलिए शुरुवाती वर्षों में इसको लेकर कोई विशेष प्रयास नहीं किये गए, पूरा जोर उघोगिकी विकास और उच्च शिक्षा पर  था. इसलिए 1948 में उच्च शिक्षा के लिए राधाकृष्णन आयोग का गठन किया गया. इसी तरह 1952 में दूसरा आयोग गठित किया गया जिसका संबंध माध्यमिक शिक्षा से था. प्राथमिक शिक्षा पर आते आते लगभग 17 साल लग गए और 1964 में कोठारी आयोग का गठन किया गया.  प्रो. दौलत सिंह कोठारी अध्यक्षता में गठित यह भारत का ऐसा पहला शिक्षा आयोग था जिसने प्राथमिक शिक्षा पर विचार किया और इसको लेकर कुछ ठोस सुझाव दिए.

पहला आयोग था जिसने सामंती एवं परंपरागत ढांचे  पर आधारित औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली का पुरजोर विरोध् किया.उन्होंने कहा अब देश को ऐसे शिक्षा प्रणाली की जरूरत है जो अपने में बुनियादी मानवीय मूल्यों को   समाहित करते हुए आधुनिक लोकतांत्रिक समाजवादी समाज के जरूरतों  के अनुरूप हो.कोठारी आयोग ने विस्तार से भारतीय-शिक्षा पद्धति का अध्ययन किया. इसके परिणामस्वरूप ही वर्ष 1968 में भारत की पहली राष्ट्रीय शिक्षा-नीतिअस्तित्व में आ सकी.

कोठारी आयोग ने भारतीय शिक्षा के निम्न उद्देश्य निर्धारित किये

·        सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकता का विकास,
·        जनतंत्र के सुद्रढ़ बनाना, 
·        देश का आधुनिकीकरण करना,
·        सामाजिक, नैतिक तथा अध्यात्मिक मूल्यों का विकास करना उत्पादन में वृद्धि करना,

कोठारी आयोग के कई ऐसे महत्वपूर्ण सुझाव दिये थे जो आज भी लक्ष्य बने हुए हैं. आयोग या सुझाव था कि समाज के अन्दर व्याप्त जड़ता सामाजिक भेद-भाव को समूल नष्ट करने  के लिए समान स्कूल प्रणाली एक कारगर  औजार होगा. समान स्कूल वयवस्था के आधार पर ही सभी वर्गों और समुदायों  के बच्चे एक साथ सामान शिक्षा पा सकते हैं अगर ऐसा नहीं हुआ तो समाज के उच्च वर्गों के लोग सरकारी स्कूल से भागकर प्राइवेट स्कूलों का रुख़ करेंगे और पूरी प्रणाली ही छिन्न-भिन्न हो जाएगी.

आयोग ने कई और महत्वपूर्ण सुझाव दिये थे जिसमें कुछ प्रमुख सुझाव निम्नानुसार हैं .

·        शिक्षा के बजट पर कुल घरेलू उत्पाद का 6% खर्च करना  चाहिए.
·        देश की शिक्षा स्नातकोत्तर स्तर तक अपनी भाषाओं में दी जानी चाहिए.  
·        आयोग शिक्षा की बुनियादी इकाइयों-विधार्थी,शिक्षक और  स्कूल को स्वायत्तता दिए जाने का समर्थक था.  
·        आयोग परीक्षा की सबसे बड़ी कमी इसके लिखित स्वरूप को देखता है और अवलोकन,मौखिक परीक्षण तथा व्यवहारिक अभ्यासों को इसके साथ जोड़ने की अनुशंसा करता है.
·        परीक्षा के परिणाम में उत्तीर्ण-अनुत्तीर्ण की टिप्पणी को प्रयुक्त  न करने की सलाह दी  थी।
·        बस्ते के बोझ को कम करने,मूल्यांकन पद्धति को भयमुक्त इत्यादि अनेक सिफारिशें की हैं.
·        शिक्षा को काम से जोड़ा जाना चाहिए.

1968 में भारत की पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति लायी गयी जिसमें 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चो को अनिवार्य शिक्षा ,शिक्षको के बेहतर क्षमतावर्धन के लिए उचित प्रशिक्षण जैसे प्रावधान किये गये और मातृभाषा मे शिक्षण पर विशेष ज़ोर दिया गया था.

1980 का दशक में भारत सरकार द्वारा द्वार देश में सामाजिक आर्थिक-वैज्ञानिक तथा तकनीकी क्षेत्र में हुए बदलाओं को देखते हुए शिक्षा की चुनौती-नीतिगत परिप्रेक्ष्यनाम से एक वस्तुस्थिति प्रपत्र बनाया गया . 1986 में इसी के आधार पर राष्ट्रीय-शिक्षा-नीतिका निर्माण हुआ.इसमें कमजोर  वर्गो के बच्चो की शिक्षा, 21 वीँ सदी की आवश्यकताओं के अनुरूप बच्चों में आवश्यक कौशल तथा योग्यताओं का विकास ,बाल केन्द्रित शिक्षा और शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों को शिक्षा से जोड़ने के जैसे प्रमुख विचार थीं.

1992 में 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति को संशोधित किया गया . इस बीच 1 अप्रैल, 2010 को शिक्षा अधिकार कानून लागु किया गया. इस अधिनियम के लागू होने से 6 से 14 वर्ष तक के प्रत्येक बच्चे को अपने नजदीकी विद्यालय में निःशुल्क तथा अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा पाने का कानूनी अधिकार मिल गया है. इस अधिनियम में गरीब परिवार के बच्चों के लिए प्राइवेट स्कूलों में में 25 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान रखा गया है.

वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा  नयी शिक्षा नीति तैयार करने की दिशा में काम किया जा रहा है. शिक्षा नीति, 2017 का मसौदा तैयार करने के लिए प्रख्‍यात अंतरिक्ष वैज्ञानिक एवं पद्म विभूषण विजेता डॉ. कस्‍तूरीरंजन के नेतृत्व में एक 9 सदस्यीय समिति का गठन किया गया है.  

बड़े बदलाव

      1951 में साक्षरता दर, 18.43 प्रतिशत थी, जो 2011 में बढ़कर 74.04 प्रतिशत पहुँच गयी है।
      1950 में देश के प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में 42.60 प्रतिशत बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, आज शिक्षा प्राप्त करने वाले बच्चों की संख्या 92 प्रतिशत से भी अधिक है।
      प्राथमिक स्तर पर सकल दाखि़ला अनुपात 1950-51 के 42.6 प्रतिशत से बढ़कर 2003-04 में 98.3 प्रतिशत पहुँच गया है। इसी प्रकार उच्च प्राथमिक स्तर के लिए इसी अवधि में यह दर 12.7 प्रतिशत से बढ़कर 62.5 प्रतिशत हो गई है।
      1950 में देश में प्राथमिक विद्यालयों की कुल संख्या 2.10 लाख थी जो साल 2003-04 तक 7.12 लाख हो गई. उच्च प्राथमिक विद्यालयों की संख्या 13600 से 19 गुना बढ़कर लगभग 2.62 लाख हो गई है.
      सन् 1950-51 में कुल प्राथमिक विद्यालय के शिक्षकों की संख्या 6.24 लाख थी जो 2002-03 तक बढ़कर 36.89 लाख हो गई. महिला शिक्षकों की संख्या भी इसी अवधि में बढ़कर 0.95 लाख से 14.88 लाख हो गई.

चुनौतियाँ जो अभी भी कायम हैं

·        आजादी के बाद गठित सभी शिक्षा आयोगों में एक बात पर आम राय रही है कि शिक्षा में समानता और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए समान स्कूली शिक्षा व्यवस्था को स्थापित करना पहला कदम है. लेकिन इन सिफारिशों को हकीकत में बदलने के लिए क्रियान्वयन की कोशिश आज भी एक सपना है.
·        सावर्जनिक शिक्षा लगातार कमजोर हुआ है और अब यहाँ ज्यादातर सबसे कमजोर तबकों के बच्चे ही जाते हैं.
·        जनगणना(2011)के मुताबिक़ 8.4 करोड़ बच्चे स्कूल ही नहीं जाते है जबकि 78 लाख बच्चे ऐसे हैं जो स्कूल तो जाते हैं लेकिन इसके साथ काम पर भी जाते हैं.
·        अनिवार्य शिक्षा का प्रश्न गोखले के सौ बरसों के बाद मुंह  बाये खड़ा है.इतना अवश्य हुआ कि 6-14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा को अनिवार्य कर दिया  गया।