टयूनिशिया ने करवट ली है



उम्मीदों से भरी अरब जनता और आतंकित हुक्मरान

@-सुभाष गाताडे
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यूनिशिया के सबसे चर्चित कवि अबू अल कासेम एचेबी, जिनका चेहरा मुल्क की 30 दीनार की नोट पर विराजमान है, वह व्यापक अरब जगत में उन तमाम कविताओं के लिए जाने जाते हैं जो तानाशाहों को चेतावनी देती है कि उन्हें जनता के विद्रोहों को सामना करना पड़ेगा। अपनी एक कविता में वह लिखते हैं कि ‘‘जो कांटे बोते हैं, वहीं जख्मों को सहलाने के लिए अभिशप्त होते हैं।’’ मुमकिन है जनविद्रोह के चलते अपने पद से बेदखल किए वहां के तानाशाह राष्ट्रपति बेन अली, फिलवक्त रियाद में अपने निष्कासन में शायद इसी कविता पर सोच रहे हों।

इस वक्त अरब जगत की सबसे चर्चित ख़बर अफ्रीका के उत्तरतम छोर पर बसे एक करोड़ से अधिक आबादी वाले टयूनिशिया में हुआ यह सत्तापरिवर्तन ही है, जिसे अरब जगत का पहला वास्तविक इन्कलाब कहा जा रहा है, जिसने भ्रष्टाचार, आर्थिक तंगी एवं राष्ट्रपति परिवार के ऐयाशियों का खुला चरागाह बनी हुकूमत को धराशायी किया है। अभी वहां राष्ट्रीय सरकार के गठन की प्रक्रिया चल रही है। और इस बात को मद्देनज़र रखते हुए कि तानाशाह बेन अली के लोग अभीभी सत्ता में दखल रखने की कोशिश में हैं, लोगों ने प्रदर्शनों का सिलसिला रोका नहीं है।

स्पष्ट है कि सबकुछ इस कदर तेजी से घटित हुआ कि पश्चिमी जगत के तमाम चौधरियों का खुला समर्थन, अरब जगत के शाहों-शेखों का एवम उनके जैसे ही लम्बे समय से अपने पद पर कायम हुक्मरानों का खुला समर्थन कुछ भी काम नहीं आ सका। समूचे अरब जगत में ऐतिहासिक घटना के तौर पर दर्ज किए जा रहे इस घटनाक्रम को लेकर जहां बेन अली की तरह लम्बे समय से अपने अपने पदों पर काबिज राजे रजवाड़े या तानाशाह आतंकित हैं और जनता पूरी तरह आशान्वित हैं।
अरब अवाम में फैले उत्साह को जानना हो तो अल जजीरा या मध्यपूर्व को फोकस करनेवाले किसी भी चैनल को देखा जा सकता है या समाचारपत्रा को पढ़ा जा सकता है। यह महज इत्तेफाक नहीं कि मिस्त्रा, अल्जीरिया, जार्डन जैसे कई मुल्कों मे आर्थिक नीतियों की बदइन्तजामी और अपने यहां के हुक्मरानों की मनमानी के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे है। रविवार 16 जनवरी को येमेन की राजधानी सना की सड़कों पर हजारों छात्रों-युवाओं ने एक जोरदार प्रदर्शन कर टयूनिशिया की अवाम को अपना सलाम भेजा। यह महज प्रतीकात्मक नहंी था कि उनका यह प्रदर्शन टयूनिशिया के दूतावास पर जाकर खतम हुआ। अपने यहां के हुक्मरानों का नाम लिए बगैर उन्होंने आवाज़ बुलन्द की कि वहभी टयूनिशिया से सबक लेकर अपना पद छोड़ें।  

दूसरी तरफ अरब हुक्मरानों की बेचैनी को जुबां देती हुई तकरीर लीबिया के शासक मुहम्मद गद्दाफी ने थी, जो खुद 1968 से वहां सत्ता पर कुण्डली मार कर बैठे हैं। अपने भाषण में उन्होंने टयूनिशिया की जनता की निन्दा की और उसे सलाह दी कि उन्हें बेन अली की यह सलाह मान लेनी चाहिए थी कि वह अगले साल चुनाव करने को तैयार हैं। वही हाल मिस्त्रा के होस्नी मुबारक का है जो विगत तीस साल से वहां के शासक हैं, और आनेवाले दिनों में अपने बेटे को सत्ता सौंपनेवाले हैं। 

हमारे वक्त में अलग अलग इन्कलाबों का नाम दिए जाते हैं। इस तरह इस सत्तापरिवर्तन को जस्मीन क्रांति कहा जा रहा है। 

समूचे अरब जगत में ऐतिहासिक घटना के तौर पर दर्ज किए जा रहे इस घटनाक्रम की शुरूआत, तमाम इन्कलाबों की तरह एक मामूली सी लगनेवाली घटना से हुई थी। 17 दिसम्बर को टयूनिस के पास स्थित एक शहर में स्नातक तक शिक्षित युवक मोहम्मद बुआजीजी ने तब खुदकुशी की, जब पुलिस ने उसके फलों की गाड़ी को जब्त किया और उसे दण्डित किया। बेरोजगारी की समस्या से जूझ रहे मोहम्मद ने पुलिसिया व्यवहार से क्षुब्ध्ध होकर आत्मदाह किया, जो इसीके सहारे अपने परिवार को पाल रहा था। इस आत्महत्या की ख़बर सुनते ही गोया तमाम बेरोजगार युवकों का, भ्रष्टाचार एवम नवउदारवादी आर्थिक नीतियों से परेशान जनता का गुस्सा फूट पड़ा और तमाम शहरों में प्रदर्शन होने लगे। 

दो दशक से अधिक समय तक हुकूमत पर अपनी मजबूत पकड़ जमाए बेन अली के सुरक्षा बलों एवम व्यापक गुप्तचर तंत्रा के सहारे इन उग्र प्रदर्शनों को दबाने की कोशिश की। अपने पश्चिमी जगत के आंकाओं को खुश करने के लिए और उनका समर्थन जुटाने के लिए शुरूआत में उसने उन्हें ‘‘आतंकवादी’’ के तौर पर भी सम्बोधित किया। मगर जनता माननेवाली नहीं थी। सुरक्षाबलों की गोलियों का डर गोया खतम हो गया था और हर जगह जनता आगे आ रही थी। फिर बेन अली ने अपने राष्ट्रीय सम्बोधन में समझौते की पेशकश की। 2014 के सम्भावित चुनावों के बजाय कुछ माह के अन्दर नए चुनाव कराने का आश्वासन दिया। मालूम हो कि वर्ष 2009 में ही बेन अली पांचवी बार टयूनिशिया के राष्ट्रपति के तौर पर निर्वाचित हुए थे।

एक क्षेपक के तौर पर यहां बताया जा सकता है कि टयूनिशिया एक मुस्लिम बहुल अरब देश होने के बावजूद कभी भी वहां पर इस्लाम का वह रूप स्थापित नहीं हो सका, जिसकी हिमायत सउदी अरब करता रहा है। वहां की संसद में 20 फीसदी महिलाएं सदस्य रही हैं, वे सभी कारोबारों में पुरूषों की तरह ही हिस्सा ले सकती हैं। बुरका पहनने को  कभी भी सरकारी समर्थन नहीं दिया गया है, उल्टे आम तौर पर स्त्रिायों को उससे निरूत्साहित ही किया जाता रहा है। मुस्लिम बहुल मुल्कों में जिस तरह टर्की ने केमाल पाशा की अगुआई में अपने मुल्क को आधुनिक रास्तों पर डालने की कोशिश की थी, उसी किस्म की पहल बेन अली के पहले सत्तासीन रहे बुरगुइबा ने की थी, जिन्हें एक रक्तहीन क्रान्ति के जरिए अपदस्थ करके बेन अली ने हुकूमत सम्भाली थी। वे लोग जिन्होंने अखबारों में या अन्य मीडिया में जस्मिन इन्कलाब की तस्वीरें देखी  होगी  वह इस बात की ताईद कर सकते हैं कि प्रदर्शनों में महिलाओं की भी अच्छी खासी सहभागिता थी।
   


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