जिहादी जो अपने शूरवीरों को पकड़ी गई यजीदी महिलाओं और बच्चों को उपहार के रूप में देकर सम्मानित कर रहे हैं

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Photo Courtesy -dailymail.co.uk


एल. एस. हरदेनिया
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इस समय दुनिया के अनेक मुस्लिम बहुल देशों में बड़े पैमाने पर खूनखराबा हो रहा है। अनेक आतंकवादी समूह जो अपने आप को जिहादी कहते हैं इस्लाम के नाम पर अनेक ऐसी बर्बर हरकतें कर रहे हैं जिनके बारे में देखकर और सुनकर यह नहीं कहा जा सकता कि यह सब 21वीं सदी में हो रहा है।

इसी तरह की दानवी गतिविधियों की श्रंखला में एक ओर दिल दहला देने वाला समाचार आया है। इस समय ईराक में दो मुस्लिम गुटों के बीच में भयंकर खूनखराबा हो रहा है। इन दो गुटों में से एक है इस्लामिक स्टेट जिहादी गुट। इस गुट ने अपने विरोधियों की अनेक महिलाओं और बच्चों पर कब्जा किया है। इस्लामिक स्टेट जिहादियों ने यह फैसला किया है कि वे ईराक की धरती से यजीदियों का नामोनिशान मिटा देंगे। अपने इस इरादे को अमलीजामा पहनाने के लिए ये हर प्रकार की हदों को पार कर रहे हैं। यजीदी ईराक में रहने वाली ऐसी कौम है जो विभिन्न धर्मों पर आधारित आस्थाओं में विश्वास करती है और मूर्ति पूजा में भी विश्वास करती है। इन जिहादियों का यजीदियों के अतिरिक्त कुर्दों  से भी संघर्ष हो रहा है। जिहादियों का कहना है कि यजीदी जैसा धार्मिक समूह ईराक में कैसे रह सकता है। यजीदियों पर लगातार पिछले दिनों से हिंसक हमले हो रहे हैं। वे इस हद तक आतंकित हैं कि उनमें से अनेक दूरदराज के जंगलों और पहाड़ों में छिपे हुए हैं।

जिहादियों ने अपने खूनी अभियान के अंतर्गत अनेक यजीदी माताओं, बहनों और बच्चों का अपहरण किया है। उनकी मान्यता है कि अपनी लूट के दौरान उन्होंने जो कुछ भी पाया है उस पर उनका कब्जा है चाहे वह पैसे हों, अन्य प्रकार की संपत्ति हो उस सब पर उनके बहादुर योद्धाओं का अधिकार है। वे लूट में पायी गई अन्य चीजों का बंटवारा कर रहे हैं वहीं वे उनके हाथ लगी महिलाओं और बच्चों का भी बंटवारा कर रहे हैं। जितना बहादुर जिहादी है उसे उतनी ही बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे दिए जा रहे हैं। इन तथाकथित बहादुरों को यह अधिकार है कि वे इन महिलाओं के साथ जैसा चाहे व्यवहार करें। वे उन्हें गुलामों की तरह भी रख सकते हैं। इस तरह जो गुलामीप्रथा कई वर्षों पहले समाप्त हो चुकी थी उसे पुनः जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है।

इस्लामिक स्टेट की अधिकृत पत्रिका जिसका नाम है दबिक। पिछले रविवार को प्रकाशित दबिक के संस्करण में यह स्पष्ट रूप से छापा गया है कि ये जिहादी न सिर्फ विजयी लोगों को बतौर इनाम के महिलाएं और बच्चे सौंप रहे हैं बल्कि वे उन्हें बेच भी रहे हैं। यजीदी ईराक के उत्तरी भाग में रहते हैं। परंतु पिछले चार महीनों से लगातार उनके ऊपर हमले हो रहे हैं। जिहादियों द्वारा किए गए इन हमलों में बड़ी संख्या में यजीदी मारे गए हैं। इसके साथ ही हजारों की संख्या में उन्हें उन स्थानों से भगा दिया गया है जहां वे वर्षों से रह रहे हैं। इन्हें बहुत पहले जिहादियों ने चेतावनी दे दी थी कि वे उनका कत्लेआम करेंगे और उनमें से एक को भी जिंदा नहीं छोड़ेंगे।
इस पत्रिका में एक लेख छपा है जिसका शीर्षक है गुलामी प्रथा की पुनस्र्थापना। पत्रिका में यह तर्क दिया गया है कि उनकी कार्यवाही के दौरान वे एक ऐसी प्रथा की पुनस्र्थापना कर रहे हैं जिसे शरिया -इस्लामिक कानून) में मान्यता प्राप्त है। पत्रिका में बताया गया है कि शरिया के अनुसार पकड़ी गई महिलाओं और बच्चों का बंटवारा हो रहा है। जो जितना बड़ा बहादुर है और जिसने ज्यादा से ज्यादा यजीदियों को मारा है उसे पकड़ी गई महिलाओं और बच्चों का बड़ा हिस्सा दिया जाएगा।

वर्षों पहले शरिया में व्याप्त यह पद्धति समाप्त कर दी गई थी परंतु अब उसे फिर से जिंदा किया जा रहा है। लिखित इतिहास में इस तरह के बंटवारे का उदाहरण फिलीपाइन और नाइजीरिया में पाया जाता था जहां ईसाई महिलाओं और बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार किया गया था। इस नरसंहार और दानवी हरकत को कोई भी प्रतिबंधित नहीं कर पा रहा है।

इस बीच यह भी खबर आई है कि ईराक में रहने वाला एक और मुस्लिम समाज जिसे कुर्द कहते हैं इन जिहादियों का बड़ी दमखम से मुकाबला कर रहा है। जिहादियों के विरूद्ध सारी दुनिया में प्रदर्शन हो रहे हैं। प्रभावित समूहों के प्रतिनिधि विश्व के सभी विकसित राष्ट्रों से सहायता की मांग कर रहे हैं।

यह सभी को ज्ञात है कि इस तरह की हिंसा पर दुनिया के सभी देशों की (जिन्हें मुस्लिम राष्ट्र भी शामिल हों) एकता से नियंत्रित किया जा सकता है। इस बीच अमरीका के अनेक युद्ध हवाई जहाज इस्लामिक स्टेट के फौजी अड्डों पर हमला कर रहे हैं। पिछले दो दिनों में अमरीकी हवाई जहाजों ने नौ हमले किए गए हैं। इनसे जिहादियों के हौसले कुछ हद तक पस्त हुए हैं। परंतु अकेले अमरीका द्वारा की गई कार्यवाही से स्थिति नियंत्रण में नहीं आयेगी।

अनेक देशों से यह खबर आ रही है कि वहां के युवक इस्लामिक स्टेट नामक संगठन में शामिल हो रहे हैं। इंग्लैण्ड और अमरीका में रहने वाले नौजवान भी इस खूंखार संगठन में शामिल हो रहे हैं। इस खबर से कि उनके देश के मुस्लिम नागरिक जिहादियों की फौज में शामिल हो गए हैं अमरीका और इंग्लैण्ड में सनसनी फैल गयी है। इस बीच जिहादियों ने कोबाने नाम के एक शहर पर कब्जा कर लिया है। इस शहर से जिहादियों का कब्जा हटाने के लिए बड़े पैमाने पर प्रयास जारी हैं। कोबाने एक ऐसा शहर है जिसमें बड़ी संख्या में कुर्द रहते हैं। अनेक लोगों की यह शिकायत है कि इस शहर को जिहादियों से बचाने के लिए तुर्की को जितनी मदद करनी थी नहीं की।

इस बीच दो ऐसी घटनाएं हुईं हैं जिनसे मुस्लिम बहुल राष्ट्रों का एक दूसरा चेहरा भी सामने आया है। पाकिस्तान की बहादुर बेटी मलाला को नोबल पुरस्कार मिला है। मलाला दुनियाभर में बच्चियों की शिक्षा के अधिकार की प्रतीक बन गई है। उसके ऊपर दो वर्ष पहले तालिबानियों ने कातिलाना हमला किया था। क्योंकि वह सार्वजनिक रूप से यह घोषणा कर रही थी कि बच्चियों को पढ़ने का हक है। परंतु यह दुःख की बात है कि नोबल पुरस्कार मिलने पर सारी दुनिया में जश्न मनाया गया परंतु पाकिस्तान के अनेक लोगों ने मलाला की आलोचना की और यह आरोप लगाया कि वह काफिरों के हाथ का खिलौना बन गई है।

इस बीच खालिद एहमद जो पाकिस्तान के एक जानेमाने प्रतिष्ठित पत्रकार और पाकिस्तान के प्रभावशाली समाचार पत्र न्यूज वीक पाकिस्तान के परामर्शदाता संपादक भी हैं ने इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक लेख में कहा है कि मलाला को भले ही नोबल पुरस्कार मिल गया हो लेकिन वह आज भी पाकिस्तान में प्रवेश नहीं कर सकती।

पाकिस्तान में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो अत्यधिक भद्दी भाषा में मलाला के बारे में बातें कर रहे हैं। खालिद एहमद लिखते हैं कि वैसे तो बड़ी संख्या में पाकिस्तानियों ने मलाला को नोबल पुरस्कार मिलने पर प्रसन्नता जाहिर की परंतु ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जिन्होंने मलाला को अमरीका का पिट्ठू न बताया हो। इस तरह के लोग मानते हैं कि मलाला इस्लाम विरोधी ताकतों के हाथों में खेल रही है।

इस तरह के प्रतिक्रियावादी लोग कुछ भी कहें पर पाकिस्तान के युवकों और युवतियों के लिए मलाला प्रेरणा की स्त्रोत है। अभी हाल की मेरी स्वयं की पाकिस्तान की यात्रा के दौरान मैंने अनुभव किया था कि पाकिस्तान के युवक-युवतियां वैसी ही आजादी चाहते हैं जिसके लिए मलाला ने अपनी जान जोखिम में डाली।


इस्लामिक दुनिया से एक और अच्छी खबर आई है। यह खबर आई है सऊदी अरब से। जहां महिलाओं पर किसी भी प्रकार का वाहन चलाना प्रतिबंधित है। एक खबर में यह दावा किया गया है कि दुनिया में सऊदी अरब ही एक ऐसा देश है जहां औरतें ड्रायविंग सीट पर नहीं बैठ सकतीं। वहां वाहन चलाने के अधिकार को प्राप्त करने के लिए अभियान चलाया जा रहा है। अभी बीच में यह अभियान ठंडा पड़ गया था परंतु अब पुनः बड़े पैमाने पर उसे फिर से चालू किया जा रहा है। सऊदी अरब के सोशल मीडिया पर रोज ऐसे चित्र आ रहे हैं जिनमें महिलाएं किसी न किसी वाहन को चलाते हुए दिखायी जाती हैं। जो लोग अभियान चला रहे हैं उनका दावा है कि किसी को भी यह अधिकार नहीं कि वे आधी आबादी को इस तरह दबाएं। इन लोगों का दावा है कि कम से कम इस्लाम का सहारा लेकर इस तरह का प्रतिबंध लगाना पूरी तरह से अनुचित है। आशा है कि और मुस्लिम बहुल देशों से भी इसी तरह की खबरें सुनने और पढ़ने को मिलेंगीं ।

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