11/01/2014 - 12/01/2014 - रूबरू

सरोकारों और बदलाव को समर्पित ब्लॉग

About

test

Thursday, November 13, 2014

नेहरू ही हैं आधुनिक भारत के निर्माता

November 13, 2014 0
नेहरू ही हैं आधुनिक भारत के निर्माता
                                                                                                                                  

Courtesy -http://www.artistaji.com/
   -एल. एस. हरदेनिया
-----------------------------------

                                                                                                                         
हमारे देश के कुछ संगठन, विशेषकर संघ परिवार के सदस्य, जब भी सरदार वल्लभभाई पटेल की चर्चा करते हैं तब उनके बारे में दो बातें अवश्य कहते हैं। पहली यह कि सरदार पटेल आज के भारत के निर्माता हैं और दूसरी यह कि यदि कश्मीर की समस्या सुलझाने का उत्तरदायित्व सरदार पटेल को दे दिया जाता तो आज पूरे कश्मीर पर भारत का कब्जा होता।

संघ परिवार का हमेशा यह प्रयास रहता है कि आजाद भारत के निर्माण में जवाहरलाल नेहरू की भूमिका को कम करके पेश किया जाये और यह भी कि आज यदि पूरा कश्मीर हमारे कब्जे में नहीं है तो उसके लिये सिर्फ और सिर्फ नेहरू को जिम्मेदार ठहराया जाए। संघ परिवार इस बात को भूल जाता है कि आजाद भारत में पंडि़त नेहरू और सरदार पटेल की अपनी-अपनी भूमिकायें थीं। जहां सरदार पटेल ने अपनी सूझबूझ से सभी राजे-रजवाड़ों का भारत में विलय करवाया और भारत को एक राष्ट्र का स्वरूप दिया वहीं नेहरू ने भारत को एक शक्तिशाली आर्थिक नींव देने के लिए आवश्यक योजनायें बनाईं और उनके क्रियान्वयन के लिये उपयुक्त वातावरण भी।

नेहरू जी के योगदान को तीन भागों में बांटा जा सकता है। पहला, ऐसी शक्तिशाली संस्थाओं का निर्माण, जिनसे भारत में प्रजातांत्रिक व्यवस्था स्थायी हो सके। इन संस्थाओं में संसद एवं विधानसभायें व पूर्ण स्वतंत्र न्यायपालिका शामिल हैं।
दूसरा, प्रजातंत्र को जिंदा रखने के लिये निश्चित अवधि के बाद चुनावों की व्यवस्था और ऐसे संवैधानिक प्रावधान जिनसे भारतीय प्रजातंत्र धर्मनिरपेक्ष बना रहे।

तीसरा, मिश्रित अर्थव्यवस्था और उच्च शिक्षण संस्थानों की बड़े पैमाने पर स्थापना। वैसे  नेहरू समाजवादी व्यवस्था के समर्थक नहीं थे परंतु वे भारत को पूंजीवादी  देश भी नहीं बनाना चाहते थे। इसलिये उन्होंने भारत में एक मिश्रित अर्थव्यवस्था की नींव रखी। इस व्यवस्था में उन्होंने जहां उद्योगों में निजी पूँजी की भूमिका बनाये रखी वहीं अधोसंरचनात्मक उद्योगों की स्थापना के लिये सार्वजनिक क्षेत्र का निर्माण किया। उन्होंने कुछ ऐसे उद्योग चुने जिन्हें सार्वजनिक क्षेत्र में ही रखा गया। ये ऐसे उद्योग थे जिनके बिना निजी उद्योग पनप ही नहीं सकते थे। बिजली का उत्पादन पूरी तरह से सार्वजनिक क्षेत्र में रखा गया। इसी तरह इस्पात, बिजली के भारी उपकरणों के कारखाने, रक्षा उद्योग, एल्यूमिनियम एवं परमाणु ऊर्जा भी सार्वजनिक क्षेत्र में रखे गए। देश में तेल की खोज की गई और पेट्रोलियम की रिफाईनिंग व एलपीजी की बाटलिंग का काम भी केवल सार्वजनिक क्षेत्र में रखे गये। औद्योगिकरण की सफलता के लिये तकनीकी ज्ञान में माहिर लोगों की आवश्यकता होती है। उद्योगों के संचालन के लिये प्रशिक्षित प्रबंधक भी चाहिए होते हैं। 

उच्च तकनीकी शिक्षा के लिये आईआईटी स्थापित किये गये। इसी तरह, प्रबंधन के गुर सिखाने के लिए आईआईएम खोले गए। इन उच्चकोटि के संस्थानों के साथ-साथ संपूर्ण देश के पचासों छोटे-बड़े शहरों में इंजीनियरिंग कालेज व देशवासियों के स्वास्थ्य की देखभाल करने के लिये मेडिकल काॅलेज स्थापित किये गये। 

चूँकि अंग्रेजों के शासन के दौरान देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी इसलिये उसे वापिस पटरी पर लाने के लिये अनेक बुनियादी कदम उठाये गये। उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण था देश का योजनाबद्ध विकास। इसके लिये योजना आयोग की स्थापना की गई। स्वयं नेहरू जी योजना आयोग के अध्यक्ष बने। योजना आयोग ने देश के चहुंमुखी विकास के लिये पंचवर्षीय योजनाएं बनाईं। उस समय पंचवर्षीय योजनाएं सोवियत संघ सहित अन्य समाजवादी देशों में लागू थीं परंतु पंचवर्षीय योजना का ढांचा एक ऐसे देश में लागू करना नेहरूजी के ही बूते का था जो पूरी तरह से  समाजवादी नहीं था।

उस समय भारत के सामने एक और समस्या थी और वह थी बुनियादी उद्योगों के लिये वित्तीय साधन उपलब्ध करवाना। पूँजीवादी देश इस तरह के उद्योगों के लिये पूँजी निवेश करने को तैयार नहीं थे। इन देशों का इरादा था कि भारत और भारत जैसे अन्य नव-स्वाधीन देशों की अर्थव्यवस्था कृषि-आधारित बनी रहे। चूँकि पूँजीवादी देश भारत के औद्योगिकरण में हाथ बंटाने को तैयार नहीं थे इसलिये नेहरू जी को सोवियत रूस समेत अन्य समाजवादी देशों से सहायता मांगनी पड़ी और समाजवादी देशों ने दिल खोलकर सहायता दी। समाजवादी देशों ने सहायता देते हुये यह स्पष्ट किया कि वे यह सहायता बिना किसी शर्त के दे रहे हैं।  समाजवादी देशों की इसी नीति के अन्तर्गत हमें सार्वजनिक क्षेत्र के पहले इस्पात संयत्र के लिये सहायता मिली और यह प्लांट भिलाई में स्थापित हुआ।

जब पूँजीवादी देशों को यह महसूस हुआ कि यदि वे अपनी नीति पर चलते रहे तो वे समस्त नव-स्वाधीन देशों का समर्थन खो देंगे और उन्हें भारी नुकसान होगा तब उन्होंने भी भारी उद्योगों के लिये सहायता देना प्रारंभ कर दिया।

इस तरह, धीरे-धीरे हमारा देश भारी उद्योगों के मामले में काफी प्रगति कर गया। आजादी के बाद जब हमें समाजवादी देशों से उदार सहायता मिलने लगी तो हमारे देश के प्रतिक्रियावादी राजनैतिक दलों और अन्य संगठनों ने यह आरोप लगाना प्रारंभ कर दिया कि हम सोवियत कैम्प की गोद में बैठ गये हैं।

द्वितीय महायुद्ध के बाद विश्व दो गुटो में विभाजित हो गया था। एक गुट का नेतृत्व अमरीका कर रहा था और दूसरे गुट का सोवियत संघ। भारत ने यह फैसला किया कि वह दोनों में से किसी गुट में शामिल नहीं होगा।

इसी निर्णय के अन्तर्गत हमने अपनी विदेशी नीति का आधार गुटनिरपेक्षता को बनाया। भारत द्वारा की गई इस पहल को भारी समर्थन मिला और अनेक नव-स्वाधीन देशों ने गुटनिरपेक्षता को अपनाया। गुटनिरपेक्षता की नीति की अमेरिका द्वारा सख्त निंदा की गई। तत्कालीन अमरीकी विदेश मंत्री जाॅन फास्टर डलेस ने कहा कि जो हमारे साथ नहीं है वह हमारे  विरूद्ध है।

हमारे देश के अंदर भी जनसंघ ने भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति की आलोचना की और कहा कि हम समाजवादी देशों के पिछलग्गू बन गये हंै। परंतु हमारी गुटनिरपेक्षता की नीति के कारण सारी दुनिया में भारत की प्रतिष्ठा बढ़ी और जवाहरलाल नेहरू गुटनिरपेक्ष देशों के सर्वाधिक शक्तिशाली नेता बन गये। नेहरूजी के बाद इंदिरा गांधी भी इस नीति पर चलीं परंतु अब भारत ने इस नीति को पूरी तरह से भुला दिया है।

आर्थिक और विदेश नीति के निर्धारण में मौलिक योगदान के साथ-साथ नेहरू ने हमारे देश में प्रजातंत्र की जड़ंे मजबूत कीं और उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि नेहरू ने भारत को पूरी ताकत लगाकर एक धर्मनिरपेक्ष देश बनाया।

चूँकि हमने धर्मनिरपेक्षता को अपनाया इसलिए हमारे देश में प्रजातंत्र की जड़ें गहरी होती गईं। जहां अनेक नव-स्वाधीन देशों में प्रजातंत्र समाप्त हो गया है और तानाशाही कायम हो गई है वहीं भारत में प्रजातंत्र का कोई बाल बांका तक नहीं कर सका।


इस तरह कहा जा सकता है कि जहां सरदार पटेल ने भारत को भौगोलिक दृष्टि से एक राष्ट्र बनाया वहीं नेहरू ने ऐसा राजनीतिक-आर्थिक एवं सामाजिक आधार निर्मित किया जिससे भारत की एकता, अखण्डता व प्रजातंत्र को कोई ताकत खत्म नहीं कर सकी। इस तरह आधुनिक भारत के निर्माण में पटेल और नेहरू दोनों का महत्वपूर्ण योगदान है।

Friday, November 7, 2014

मुस्लिम दुनिया का संकट और भारतीय मुसलमान

November 07, 2014 0
मुस्लिम दुनिया का संकट और भारतीय मुसलमान


जावेद अनीस
--------------------------

"उठो ! अहमद शाह अब्दाली, मुहम्मद बिन कासिम, शहीद सईद अहमद और पैगम्बर व उनके साथियों की तरह...एक हाथ में कुरआन और दूसरे हाथ में तलवार लो और जिहाद के क्षेत्र की ओर निकलो।".... इराक़ और सीरिया की रेगिस्तान की मिटटी से उठनेवाली पुकार सुनो,ढाढस बाँधो और जिहाद की मातृभूमि अफगानिस्तान की ओर निकलो।" यह पुकार अंसार-उल-तौहीद द्वारा अपने ट्विटर अकाउंट में जारी किये गये विडियो में है। एक अंग्रेजी अखबार में प्रकाशित खबर के अनुसार विडियो में दिखाई दे रहा नकाबपोश 39 वर्ष का सुलतान अब्दुल कादिर आरमार है जो कर्नाटक के भटकल गाँव के एक छोटे व्यापारी का बेटा है। अगर यह खबर सही है तो यह पहली बार है जब एक भारतीय द्वारा सार्वजनिक  रूप देश के मुसलमानों को वैश्विक जिहाद के लिए आह्वान किया गया है। पिछले दिनों कश्मीर में भी आईएसआईएस के झंडे लहराने कि घटनायें सामने आई है 

बिन लादेन की मौत के बाद सुर्खियों से दूर रहे अलकायदा का जिन्न भी बोतल के बाहर आ गया है। अलकायदा की तरफ से जारी एक विडियो में अल जवाहिरी ने एलान किया है कि अब उसका  इरादा भारतीय उपमहाद्वीप में अलकायदा का झंडा लहराने का हैजवाहिरी के मुताबिक उसका संगठन अब "बर्मा, बांग्लादेश, असम,गुजरात और कश्मीर में" मुसलमानों को जुल्म से बचने के लिए लड़ाई लड़ेंगा उसने भारत में तथाकथित “इस्लामिक राज” के वापसी की भी बात की है।

उपरोक्त घटनायें इस ओर इशारा करती हैं कि ग्लोबल जिहादियों के निशाने पर अब भारत और यहाँ के मुसलमान हैं, भारत के मुसलमानों ने अलकायदा के सरगना के आह्वाहन का सख़्त अल्फाज़ो में मुजम्मत  की है, लेकिन इस मुल्क के वहाबी इस्लाम के पैरोकार भी हैं जिनका सब से पहला टकराव उदार और सूफी इस्लाम के भारतीय सवरूप से ही है

इस्लामिक स्टेट भी उसी पोलिटिकल इस्लाम की पैदाइश है जिसकी जडें वहाबियत में है, इनका दर्शन चौदहवी सदी के ऐसे सामाजिक-राजनीतिक प्रारुप को फिर से लागू करने की वकालत करता है, जहाँ असहमतियों की कोई जगह नहीं है, उनकी सोच है कि या तो आप उनकी तरह बन जाओ नहीं तो आप का सफाया कर दिया जायेगा

पाकिस्तान के मशहूर कार्टूनिस्ट साबिर नज़र ने तथाकथित “अरब स्प्रिंग” को लेकर एक कार्टून बनाया है जिसमें दिखाया गया है कि विभिन्न अरब मुल्कों में बसंत के पौधे थोड़े बड़े होने के बाद जिहादियों के रूप में फलते–फूलते दिखाई पड़ने लगते हैं, शायद अरब स्प्रिंग की यही सचाई है अपने आप को दुनिया भर में लोकतंत्र के सबसे बड़े रखवाले के तौर पर पेश करने वाले पश्चिमी मुल्कों ने अपने हितों के खातिर एक के बाद एक सिलसिलेवार तरीके से इराक में सद्दाम हुसैन, इजिप्ट में हुस्नी मुबारक और लीबिया में कर्नल गद्दाफी आदि को उनकी सत्ता से बेदखल किया है, इन हुक्मरानों का आचरण परम्परागत तौर पर सेक्यूलर रहा है। आज ये सभी मुमालिक भयानक खून-खराबे और अस्थिरता के दौर से गुजर रहे हैं, अब वहां धार्मिक चरमपंथियों का बोल बाला हैइस्लामिक स्टेट” कुछ और नहीं बल्कि तथाकथित अरब स्प्रिंग की देन है।  

इस्लामिक स्टेट द्वारा आज बहुत कम समय में इराक़ और सीरिया के एक बड़े हिस्से पर अपना कब्ज़ा जमा लिया गया है इराक जैसा मुल्क जो पुराने समय में मेसोपोटामिया सभ्यता के नाम से विख्यात रहा है, जो एक समय शिक्षा, व्यापार, तकनीक, सामाजिक विकास, संस्कृति को लेकर काफी समृद्ध रहा है, आज अपने आस्तित्व के संकट से गुजर रहा है अपनी धरती में दफन अकूत तेल के वजह से यह मुल्क समृद्ध तो अभी भी है, लेकिन इसी तेल की वजह से उसे नए जमाने के साम्राज्यवादियों की नज़र लग गयी है और यह मुल्क आईएस जैसे घोर अतिवादी संगठन के चुंगल में फंस कर मध्ययुग के दौर में पहुँच गया दिखाई पड़ता है।

एकांगी इस्लाम में विश्वास करने वाले इस्लामिक स्टेट के सबसे पहले शिकार तो चरमपंथी,सूफी और ग़ैर-सुन्नी मुसलमान ही हैं,वे सूफी और ग़ैर-सुन्नी मुसलामनों के एतिहासिक धार्मिक स्थलों को तबाह कर रहे है क्योंकि उनका शुद्धतावादी वहाबी इस्लाम बताता है कि कब्रों और मक़बरों पर जाना इस्लाम के खिलाफ है। उनकी सोच कितनी संकुचित है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों उन्होंने एक आदेश जारी किया है कि दुकानों पर लगे हुए सभी बुतों के चेहरे ढके हुए होने चाहिए। आईएस के वहशियों द्वारा की जा रही बर्बरता की दास्तानें रोंगटे खड़ी कर देने वाली हैं, पूरी दुनिया यजीदी समुदाय का बड़े पैमाने पर किये जा रहे जनसंहार को लगातार देख और सुन रही है, यजीदी समुदाय की महिलाओं और बच्चों को जिंदा दफन और महिलाओं को गुलाम बनाया जा रहा है। अगवा किया गये अमेरिकी- बिर्टिश पत्रकारों की गर्दन काटते हुई विडियो जारी किये जा रहे हैं ! इस्लामिक स्टेट के लोग गुलामीप्रथा के वापसी की वकालत कर रहे हैं जिसमें औरतों कि गुलामी भी शामिल है , पिछले दिनों इस्लामिक स्टेट की अधिकृत पत्रिका”दबिक” में “गुलामी प्रथा की पुनस्र्थापना” नाम से एक लेख छपा था जिसके अनुसार इस्लामिक स्टेट अपनी कार्यवाहियों  के दौरान ऐसी प्रथा की पुनस्र्थापना कर रहा है जिसे शरिया  में मान्यता प्राप्त है। पत्रिका में बताया गया है कि शरिया के अनुसार ही वे पकड़ी गई महिलाओं और बच्चों का बंटवारा कर रहे हैं । उनका मानना है है कि यह उनका  अधिकार है कि वे इन महिलाओं के साथ जैसा चाहे सुलूक करें,वे उन्हें गुलामों की तरह भी रख सकते हैं। यह सब कुछ मजहब के नाम पर हो रहा है।

इन सब के बीच आईएसआईएस के गठन में सीआईए और मोसाद जैसी खुफिया एजेंसियों की सक्रिय भूमिका की ख़बरें भी आयी हैं। अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के पूर्व अधिकारी एडवर्ड इस्नोडन ने खुलासा किया है कि इस्लामिक स्टेट का मुखिया अबू बकर अलबगदादी अमेरिका और इसराइल का एजेंट है और उसे इसराइल में प्रशिक्षण प्रदान किया गया है एडवर्ड के अनुसार सीआईए ने ब्रिटेन और इजरायल के खुफिया एजेंसियों के साथ मिल कर इस्लामिक स्टेट जैसा जिहादी संगठन बनाया है जो दुनिया भर के चरमपंथियों को आकर्षित कर सके, इस नीति को 'द हारनीटज़ नीसट' का नाम दिया गया, अमरीका के पुराने इतिहास को देखते हुए एडवर्ड इस्नोडन के इस खुलासे को झुठलाया भी नहीं जा सकता है,आखिरकार यह अमरीका ही तो था जिसने अफ़ग़ानिस्तान में मुजाहिदीनों की मदद की थी, जिससे आगे चल कर अल-क़ायदा का जन्म हुआ था। अमरीका के सहयोगी खाड़ी देशों पर आईएस की मदद करने के आरोप हैं, साथ ही इस संगठन के पास इतने आधुनिक हथियार कहां से आये इसको लेकर भी सवाल है ?

इस्लामिक स्टेट का मंसूबा है कि 15वीं सदी में दुनिया के जितने हिस्से पर मुसलमानों का राज था, वहां  दोबारा इस्लामी हुकूमत कायम की जाये, शायद इसी वजह से इस्लामिक स्टेट ने खिलाफत का ऐलान करते हुए अपने नेता अबु अल बगदादी को पूरी दुनिया के मुसलमानों का खलीफा घोषित कर दिया है, यह स्वयम्भू खलीफा दुनिया भर के मुसलमानों से एकजुट हो कर इस्लामी खिलाफत के लिए जिहाद छेड़ने की अपील जारी कर रहा है

तो इन सब का असर भारत पर क्या हो रहा है ? पिछले दिनों नदवा जैसी विश्वविख्यत इस्लामी शिक्षा केंद्र के एक अध्यापक सलमान नदवी द्वारा आई एस आई एस के सरग़ना अबूबकर बग़दादी को एक ख़त लिख कर उसकी हुकूमत को बधाई दी गयी है, ख़त का मजमून कुछ यूँ है– “आप जो भूमिका निभा रहे हैं उसको सभी ने स्वीकार किया है और आप को अमीर उल मोमेनीन (खलीफा) मान लिया है”। इसी तरह से महाराष्ट्र के चार युवा जो की पढ़े लिखे प्रोफेशनल है जिहादियीं का साथ देने इराक चले गये है तमिलनाडु में मुस्लिम युवाओं द्वारा इस्लामिक स्टेट के चिन्हो वाली टीशर्ट बांटे जाने की खबर भी सामने आई है, सोशल मीडिया पर भी पर इस्लामिक स्टेट के तारीफ में पोस्ट और फोटो शेयर किये जा रहे हैं, इन्हें इस्लामिक स्टेट, अल क़ायदा और तालिबान के खूंखार हत्यारों में अपना मसीहा और इराक के क़त्लेआम में एक इस्लामी देश की स्थापना के लिए लड़ा जाने वाला धर्मयुद्ध नज़र आता है।

बेशक यह सब घटनायें चिंता का सबब हैलेकिन इसके बरअक्स आज भी भारत ज्यादातर मुसलमान  सूफी और उदार इस्लाम में यकीन करते हैं और ख्वाजा मुईन-उद-द्दीन चिश्ती, कुतबुद्दीन बख्तियार खुरमा, निजाम-उद-द्दीन औलिया, अमीर खुसरो, वारिस शाह, बुल्लेशाह, बाबा फरीद जैसे सूफियों के तालीम को  मानते है, इस्लाम का भारतीय संस्करण उदार है, इसमें भारत के स्थानियता (लोकेलिटी) समाहित है भारत में सूफी-संतों की वजह से इस्लाम की एक रहस्यमयी और सहनशील धारा सामने आई जो एकांकी नहीं है सूफियों-संतों ने दोनों धर्मों की कट्टरता को नकारा और सभी मतों, पंथों से परम्पराओं और विचारों को ग्रहण किया। उन्होंने हिन्दू और मुसलमानों को सहनशीलता, एक दूसरे के धर्म का आदर करना और साथ रहना, तमाम कोशिशों के बावजूद एक दुसरे के भावनाओं को इज्ज़त करने और साथ मिल कर रहने की तालीम दी जिसका असर अभी भी बाकी हैभारत में ऑल इंडिया उलमा एंड मशाइख़ बोर्ड जैसे संगठन वहाबी (सलफ़ी) विचारधारा का जमकर विरोध कर रहे हैं, करीब चार साल पहले ही इस संगठन द्वारा भारत में वहाबियत के प्रसार के खिलाफ एक रैली कि गयी थी  जिसमें लाखों लोग शरीक हुए और नारा दिया गया वहाबी की ना इमामत कुबूल है, ना कयादत कुबूल

इधर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीएनएन को दिए एक इंटरव्यू कहा है कि,“यह अल क़ायदा की ग़लतफ़हमी है कि भारतीय मुसलमान उसके इशारों पर नाचेंगे....भारतीय मुसलमान देश के लिए ही जिएंगे और भारत के लिए ही जान देंगे,” मोदी ने ये बात अलकायदा द्वारा कुछ दिनों पहले जारी की गयी उस विडियो को लेकर पूछे गये प्रश्न के उत्तर में कही हैं जिसमें अलकायदा ने भारत में अपनी शाखा खोलने और भारतीय मुसलमानों की मदद करने कि बात की है।

लगभग इसी दौरान में देश के प्रख्यात न्यायविद फली एस. नरीमन ने मोदी सरकार को बहुसंख्यकवादी बताते हुए चिंता जाहिर की है कि बीजेपी-संघ परिवार के संगठनों के नेता खुलेआम अल्पसंख्यकों के खिलाफ बयान दे रहे हैं लेकिन सीनियर लीडर इस पर कुछ नहीं कहते। जिस प्रकार से नयी सरकार बनने के बाद से संघ परिवार आक्रमक तरीके से लगातार यह सुरसुरी छोड़ रहा है कि भारत हिन्दू राष्ट्र है,यहाँ के रहने वाले सभी लोग हिन्दू है, उससे फली एस. नरीमन जी कि चिंता सही जान पड़ती है, और प्रधानमंत्री कि कथनी और करनी में फर्क साफ़ दिखाई दे रहा है

प्रधानमंत्री को  मुसलमानों को देशभक्ति का प्रमाणपत्र देने कि जगह संघ परिवार और अपने पार्टी के उन नेताओं पर लगाम लगाना चाहिए जो भारत के बहुलतावादी सवरूप को नष्ट करके इसे हिन्दू राष्ट्र बनाने का मंसूबा पाले हुए हैं, दरअसल इनकी ये  हरकतें  परोक्ष रूप से जिहादी संगठनों और मुल्क मैं मौजूद उनके तलबगारों को मदद ही पहुचायेगी , मुसलमानों को दोयम दर्जे  का नागरिक बना देने कि इनकी जिद वहाबियत का रास्ता आसान करेगी, क्यूंकि इसी बहाने वे नवजवानों को जुल्म और भेद-भाव  का हवाला  देकर  उन्हें अपने साथ खड़ा करने कि कोशिश कर सकते हैं

अगर भारत को इस्लामिक स्टेट या अलकायदा जैसे संगठनों से कोई खतरा है तो इसका सबसे ज्यादा असर यहाँ के मुसलमानों पर पड़ेगा, इस मुल्क के एक- आध फीसीदी मुसलमान भी अगर इस्लामिक स्टेट और अलकायदा जैसे जिहादी संगठनों कि इमामत स्वीकार कर लेते हैं तो भारत के मुसलमान भी भी उसी आग का शिकार हो सकते हैं जिसमें  पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान जल रहे हैं


लेकिन ऐसा होना उतना आसान नहीं है, दक्षिण एशिया में इस्लाम का इतिहास करीब हजार साल पुराना है ,इस दौरान यहाँ सूफियों का ही वर्चस्व रहा हैं, भारत में इंडोनेशिया के बाद दूसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी रहती है, पूरी दुनिया में कट्टरवाद के उभार के बावजूद भारतीय मुसलमान अपने आप को  रेडिकल होने से बचाये हुए है, लेकिन अब वे आईएसआईएस और अलकायदा जैसे जिहादी संगठनों के निशाने पर है, भारत में इस खतरे का सबसे ज्यादा मुकाबला यहाँ के मुसलमानों को ही करना पड़ेगा. ठीक उसी तह से जैसे उन्होंने 26/11 के मुंबई हमले में मारे गये नौ आतंकियों के लाशो को यह कहते हुए लेने से इनकार कर दिया था कि, “वे भले ही खुद को इस्लाम का शहीद कहते हुए मरे हों लेकिन हमारे लिए वे इंसानियत के  हत्यारे हैं” यही नहीं इनको लाशों को मुंबई के “बड़े कब्रिस्तान” में दफनाने के लिए जगह देने लायक भी नहीं समझा था . उम्मीद है कि इस बार भी भारतीय मुसलमान आईएसआईएस और अलकायदा जैसे मानवता विरोधी संगठनों को उनकी ठीक जगह दिखाने में  कामयाब   होंगें

....................................................... 
समयांतर के अक्टूबर 2014 में प्रकाशित 

Monday, November 3, 2014

रेहाना जेब्बारी :- फांसी से पहले एक बेटी की चिठ्ठी अपने मां के नाम

November 03, 2014 0
रेहाना जेब्बारी :-  फांसी से पहले एक बेटी की चिठ्ठी अपने मां के नाम


मौत से जिन्दगी खत्म नहीं हुआ करती 

Courtesy -behance.net

--------------------
 ईरान की एक युवा इंटीरियर डिज़ाइनर रेहाना जेब्बारी के हाथों 2007 में  ईरान के एक खुफिया अफसर का कत्ल हो गया । इस अफसर ने उनसे बलात्कार करने को कोशिश की थी ।वह तभी से जेल में  थी । पिछले दिनों उसे फांसी पर चढ़ा दिया गया । छब्बीस साल की रेहाना जेब्बारी के पक्ष कहीं नहीं सुना गया । दुनिया भर के मानवअधिकार संगठनों ने उसके लिए आवाज उठाई, लकिन सब बेकार साबित हुए । मौत से कुछ अरसा पहले रेहाना ने अपने मां को एक चिट्ठी लिखी थी । यह चिट्ठी उस लड़की हे हौसले की मिसाल है – इस बात की भी की कैसे एक अनमोल जिन्दगी खत्म कर दी गयी । यह पूरी यह चिट्ठी यहाँ प्रस्तुत है ।
----------------------------------------------------------------------


प्यारी शोलेह, आज मुझे पता चला कि अब क़िसास’ (ईरानी न्यायतंत्र में प्रतिकार का कानून) का सामना करने की बारी मेरी है। मुझे इस बात से चोट पहुंची है कि तुमने ख़ुद मुझे क्यों नहीं बताया कि मैं अपनी ज़िंदगी की किताब के आख़िरी पन्ने पर पहुंच चुकी हूं। तुम्हें नहीं लगता कि मुझे जानना चाहिए था? तुम्हें पता है कि मैं इस बात से कितनी शर्मिंदा हूं कि तुम उदास हो। तुमने मेरे लिए ये मौक़ा क्यों नहीं निकाला कि मैं तुम्हारे और अब्बा के हाथ चूम सकूं? 

दुनिया ने मुझे 19 साल जीने की मोहलत दी। उस बदक़िस्मत रात, यह मैं थी जिसे मारा जाना चाहिए था। मेरा जिस्म शहर के किसी कोने में फेंक दिया गया होता, और कुछ दिन बाद, पुलिस तुम्हें कोरोनर के ऑफिस ले जाकर मेरे जिस्म की शिनाख्त करवा रही होती और वहां तुम्हें यह भी पता चलता कि मेरे साथ बलात्कार भी हुआ था। क़ातिल का कभी पता नहीं चलता क्योंकि हमारे पास उतनी दौलत और ताक़त नहीं है। फिर तुम अपनी ज़िंदगी यातना और शर्मिंदगी के बीच जारी रखती और कुछ साल बाद उसी यातना से मर गई होती और यह सब निबट गया होता। 

बहरहाल, उस नामुराद वार के साथ कहानी बदल गई। मेरा जिस्म किसी किनारे नहीं, बल्कि ईविन क़ैदख़ाने और उसकी तनहा कोठरियों में फेंक दिया गया और अब शहरे राय की क़ब्र जैसी क़ैद में है। मगर नसीब को क़बूल करो और शिकायत न करो। तुम बेहतर जानती हो कि मौत से ज़िंदगी खत्म नहीं हुआ करती। 

तुमने मुझे सिखाया था कि इस दुनिया में हम एक तजुर्बा हासिल करने और एक सबक सीखने आते हैं और हर जन्म के साथ हमारे कंधों पर एक ज़िम्मेदारी जुड़ जाती है। मैंने जाना कि कभी-कभी हमें लड़ना पड़ता है। मुझे अच्छी तरह याद है जब तुमने कहा था कि एक गाड़ीवान ने उस शख़्स का विरोध किया जो मुझ पर कोड़े बरसा रहा था, लेकिन कोड़े मारने वाले ने उसके सिर और मुंह पर अपना चाबुक बरसाया और आख़िरकार उसकी मौत हो गई। तुमने मुझे बताया कि उसूल के लिए डटे रहना चाहिए भले ही इसके लिए मरना पड़े। 
तुमने हमें सिखाया था कि जैसे हम स्कूल जाते हैं, हमें तमाम झगड़ों और शिकायतों के बीच औरत बने रहना चाहिए। क्या तुम्हें याद है कि तुम हमारे तौर-तरीक़ों पर कितना ज़ोर देती थी? तुम्हारा तज़ुर्बा ग़लत था। जब ये हादसा हुआ, तब मेरे सबक मेरे काम नहीं आए। अदालत में मेरी पेशी इस तरह हुई जैसे मैं कोई बेरहम मुजरिम और सख़्तदिल क़ातिल होऊं। मैंने एक भी आंसू नहीं बहाया। मैं गिड़गिड़ाई नहीं। मैं सिर पीट कर रोई नहीं, क्योंकि मैं क़ानून पर यक़ीन करती थी। 

लेकिन मुझ पर एक जुर्म को लेकर बेपरवाह रहने का इल्ज़ाम लगा। तुम याद करो, मैं कभी मच्छर भी नहीं मारती थी और तिलचट्टों को उनके सिरे पकड़ कर बाहर फेंक आती थी। अब मैं एक शातिर क़ातिल हो चुकी हूं। जानवरों के साथ मेरे सलूक की व्याख्या इस तरह की गई कि मुझमें लड़कों जैसा होने की चाहत के चिह्न हैं और जज ने इस बात पर भी ध्यान देने की जहमत नहीं मोल ली कि हादसे के वक़्त मेरे लंबे और तराशे हुए नाख़ून थे। 

इन जजों से इंसाफ़ की उम्मीद रखने वाला कितना आशावादी था? उसने कभी इस तथ्य पर सवाल नहीं खड़ा किया कि मेरे हाथ खिलाड़ियों जैसे- ख़ासकर किसी मुक्केबाज़ जैसे- सख़्त नहीं हैं। और इस मुल्क ने, जिसके प्रति एक मोहब्बत तुमने मेरे भीतर बोई, मुझे कभी नहीं चाहा और किसी ने मेरी मदद नहीं की जब मैं पूछताछ करने वालों की चोट से रो रही थी और बेहद अश्लील अल्फ़ाज़ सुन रही थी। जब मैंने अपने बाल काट कर अपने-आप से अपनी सुंदरता की आख़िरी निशानी भी हटा दी तो मुझे इनाम मिलाः 11 दिन की तनहाई। 

प्यारी शोलेह, जो तुम सुन रही हो, उस पर रोना मत। जब पुलिस के दफ़्तर में पहले दिन, एक गैरशादीशुदा बूढ़े पुलिसवाले ने मेरे नाख़ूनों के लिए मुझे चोट पहुंचाई, तब मैं समझ गई कि इस ज़माने में ख़ूबसूरती की कोई क़दर नहीं है- चेहरे की, ख़यालों और चाहतों की खूबसूरती की, ख़ूबसूरत हर्फ़ों की, आंखों और नज़र की ख़ूबसरती और एक अच्छी आवाज़ की भी ख़ूबसूरती की भी। 

मेरी प्यारी अम्मी, मेरे ख़यालात बदल गए हैं और तुम इसके लिए ज़िम्मेदार नहीं हो। मेरे लफ़्ज़ बेइंतिहा हैं और ये सब मैंने किसी को दे दिया है ताकि जब मुझे तुम्हारी गैरमौजूदगी और गैरजानकारी में फांसी दे दी जाए, तो इन्हें तुम्हें सौंप दिया जाए। मैंने अपनी विरासत के तौर पर तुम्हारे लिए हाथ से लिखी बहुत सामग्री छोड़ी है। 

बहरहाल, अपनी मौत से पहले मैं तुमसे कुछ चाहती हूं, कि तुम्हें ये मुझे किसी भी तरह, अपनी पूरी ताक़त से देना है। दरअसल ये इकलौती चीज़ है जो मैं इस दुनिया से, इस मुल्क से और तुमसे चाहती हूं। मुझे मालूम है, तुम्हें इसके लिए वक़्त चाहिए। 

इसलिए मैं अपनी वसीयत का एक हिस्सा तुमसे पहले कह रही हूं। रोना मत और सुनो। मैं चाहती हूं कि तुम अदालत जाओ और उनके सामने मेरी अर्ज़ी रखो। मैं जेल के भीतर से ऐसी चिट्ठी नहीं लिख सकती क्योंकि इसे जेल के प्रमुख की मंज़ूरी की दरकार होती है। इसलिए तुम्हें एक बार और मेरी ख़ातिर, यातना झेलनी होगी। यह इकलौती चीज़ है और अगर इसके लिए तुम्हें गिड़गिड़ाना भी पड़े तो मैं इसका बुरा नहीं मानूंगी, हालांकि मैंने तुम्हें कई बार कहा है कि मुझे मौत से बचाने के लिए किसी के आगे गिड़गिड़ाने की ज़रूरत नहीं। 

मेरी रहमदिल अम्मी, प्यारी शोलेह, मेरी अपनी ज़िंदगी से भी प्यारी, मैं मिट्टी में मिलकर सड़ना नहीं चाहती। मैं नहीं चाहती कि मेरी आंखें और मेरा जवान दिल धूल में मिल जाए। तो ये इंतज़ाम करने की इजाज़त मांगो कि जैसे ही मुझे फांसी पर लटकाया जाता है, मेरा दिल, मेरी आंखें, किडनी, हड्डियां और जो कुछ भी किसी को दिया जा सकता है, मेरे जिस्म से निकाल लिया जाए और उसे तोहफ़े के तौर पर दे दिया जाए जिसे इसकी ज़रूरत हो। मैं नहीं चाहती कि ये हासिल करने वाले को मेरा नाम मालूम हो, वह मेरे लिए गुलदस्ते ख़रीदे या दुआ भी करे। 

मैं तुम्हें तहे दिल से यह कह रही हूं कि मैं नहीं चाहती कि मेरी कोई क़ब्र बने और तुम वहां आकर मेरा मातम मनाओ, यातना पाओ। मैं नहीं चाहती कि तुम मेरे लिए काले कपड़े पहनो। मेरे मुश्किल दिनों को भूलने के लिए जो भी हो सकता है, करो। मुझे हवाओं को दे दो ताकि वे मुझे बहा ले जाएं। 

दुनिया हमें प्यार नहीं करती थी। यह हमारी क़िस्मत नहीं चाहती थी। और अब मैं इसके आगे हथियार डाल रही हूं और मौत को गले लगा रही हूं। क्योंकि अल्लाह की अदालत में मैं इंस्पेक्टरों पर इल्ज़ाम लाऊंगी, मैं इंस्पेक्टर शामलोऊ पर इल्ज़ाम लाऊंगी, मैं जज पर और मुल्क की सबसे बड़ी अदालत के जज पर इल्ज़ाम लाऊंगी, जिसने जब मैं जागी हुई थी, तब मुझे तोड़ दिया और मुझे तंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

अल्ला ताला की अदालत में मैं डॉ फरवंदी पर इल्ज़ाम लाऊंगी। मैं क़ासिम शबनी और उन सब पर इल्ज़ाम लाऊंगी जिन्होंने अपने झूठ या अपनी बेख़बरी में मेरे साथ ग़लत किया, मेरे हक़ कुचले और इस बात की परवाह नहीं की कि कभी-कभी हक़ीक़त उससे अलग होती है जो दिखाई पड़ता है। 

प्यारी नरमदिल शोहेल, उस दूसरी दुनिया में, मैं और तुम होंगे जो इल्ज़ाम लगाएंगे और दूसरे होंगे जो कठघरे में होंगे। देखें, ख़ुदा क्या चाहता है। मैं मरने तक तम्हें गले लगाना चाहती थी। मैं तुमसे प्यार करती हूं।

अनुवाद - प्रियदर्शन
साभार - जनसत्ता