सआदत हसन मंटो



भारतीय उपमहाद्वीप के ही नहीं,  दुनिया के महानतम आधुनिक कथाकारों में से एक सआदत हसन मंटो का जन्मशती वर्ष शुरू हो रहा है। मंटो 11 मई 1912 को पैदा हुए थे और 18 जनवरी 1955 को उनका असामयिक निधन हो गया था
सआदत हसन मंटो का शुमार ऐसे साहित्यकारों में किया जाता है जिनकी कलम ने अपने वक्त से आगे के ऐसे अफसाने लिख डाले जिनकी गहराई को समझने की दुनिया आज भी कोशिश कर रही है।

जौकी के मुताबिक शुरुआत में मंटो को दंगों, फिरकावाराना वारदात और वेश्याओं पर कहानियाँ लिखने वाला सामान्य सा साहित्यकार माना गया था लेकिन दरअसल मंटो की कहानियाँ अपने अंत के साथ खत्म नहीं होती हैं। वे अपने पीछे इंसान को झकझोर देने वाली सचाइयाँ छोड़ जाती हैं। उनकी सपाट बयानी वाली कहानियाँ फिक्र के आसमान को छू लेती हैं।जैसा कि राजेंद्र यादव कहते हैं चेख़व के बाद मंटो ही थे जिन्होंने अपनी कहानियों के दम पर अपनी जगह बना ली यानी उन्होंने कोई उपन्यास नहीं लिखा.


कमलेश्वर उन्हें दुनिया का सर्वश्रेष्ठ कहानीकार बताते हैं.


अपनी कहानियों में विभाजन, दंगों और सांप्रदायिकता पर जितने तीखे कटाक्ष मंटो ने किए उसे देखकर एक ओर तो आश्चर्य होता है कि कोई कहानीकार इतना साहसी और सच को सामने लाने के लिए इतना निर्मम भी हो सकता है लेकिन दूसरी ओर यह तथ्य भी चकित करता है कि अपनी इस कोशिश में मानवीय संवेदनाओं का सूत्र लेखक के हाथों से एक क्षण के लिए भी नहीं छूटता.

बकौल सआदत हसन मंटो ज़माने के जिस दौर से इस वक्त हम गुज़र रहे हैं, अगर आप उससे नावाकिफ हैं तो मेरे अफ़साने पढिये. और अगर आप इन अफ्सानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब ये है कि ये ज़माना नाकाबिल-ए -बर्दाश्त है. मुझमें जो बुराइयाँ हैं वो इस एहद कि बुराइयाँ हैं. मेरी तहरीर में कोई नुक्स नहीं. जिस नुक्स को मेरी तहरीर से मनसूब किया जाता है, दरअसल मौजूदा निजाम का नुक्स है. मैं हंगामा पसंद नहीं. मैं लोगों के खयालात-ओ-जज्बात में हिजान पैदा करना नहीं चाहता. मैं तहजीब-ओ-तमद्दुन कि चोली क्या उतारूंगा जो है ही नंगी. मैं इसे कपड़े भी नहीं पहनाना चाहता, इसलिए कि ये मेरा काम नहीं.

मैं तख्त-ए-सियाह पर काली चाक से नहीं लिखता, सफ़ेद चाक का इस्तेमाल करता हूँ. ताकि तख्त-ए-सियाह कि स्याही और ज्यादा नुमाया हो जाए. लोग मुझे तरक्की पसंद, फहश्निगार और खुदा जाने क्या क्या कुछ कहते हैं. लानत हो सआदत हसन मंटो पर, कमबख्त को गाली भी सलीके से नहीं दी जाती.
पेश है उनकी कुछ छोटी कहानियाँ  

तकसीम

एक आदमी ने अपने लिए लकड़ी का एक बड़ा संदूक मुंतखब किया, जब उसे उठाने लगा तो संदूक अपनी जगह से एक इंच भी न हिला। एक शख्स ने जिसे शायद अपने मतलब की कोई चीज मिल ही नहीं रही थी, संदूक उठाने की कोशिश करने वाले से कहा :‘‘मैं तुम्हारी मदद करूँ।’’
संदूक उठाने की कोशिश करने वाला इम्दाद लेने पर राजी हो गया। उस शख्स ने जिसे अपने मतलब की कोई चीज मिल नहीं रही थी, अपने मजबूत हाथों से संदूक को जुंबिश दी ओर संदूक उठाकर अपनी पीठ पर धर लिया - दूसरे ने सहारा दिया, और दोनों बाहर निकले।
संदूक बहुत बोझिल था। उसके वजन के नीचे उठानेवाले की पीठ चटख रही थी और टाँगे दोहरी होती जा रही थीं, मगर इनाम की तवक्को ने उस जिस्मानी मशक्कत का एहसास नीम मुर्दा कर दिया था।
संदूक उठाने वाले के मुकाबले में संदूक को मुंतखब करने वाला बहुत कमजोर थासारा रास्ता वह सिर्फ एक हाथ से संदूक को सहारा देकर अपना हक कायम रखता रहा।
जब दोनों महफूज मुकाम पर पहुँच गए तो संदूक को एक तरफ रख कर सारी मशक्कत बर्दाश्त करने वाले ने कहा : ‘‘बोलो, इस संदूक के माल में से मुझे कितना मिलेगा?’’
संदूक पर पहली नजर डालने वाले ने जवाब दिया : ‘‘एक चौथाई।’’
‘‘
यह तो बहुत कम है।’’ 
‘‘
कम बिलकुल नहीं, ज्यादा है.. इसलिए कि सबसे पहले मैंने ही इस माल पर हाथ डाला था।’’ 
‘‘
ठीक है, लेकिन यहां तक इस कमरतोड़ बोझ को उठा के लाया कौन है?’’  
‘‘
अच्छा, आधे-आधे पर राजी होते हो?’’  
‘‘
ठीक है .. खोलो संदूक।’’
संदूक खोला गया तो उसमें से एक आदमी बाहर निकला। उसके हाथ में तलवार थी -उसने दोनों हिस्सेदारों को चार हिस्सों में तकसीम कर दिया।  
(तकसीम : बंटवारा)

धोखा

दो दोस्तों ने मिलकर दस-बीस लड़कियों में से एक चुनी और बयालीस रुपये देकर उसे ख़रीद लिया।
रात गुज़ारकर एक दोस्त ने उस लड़की से पूछा : तुम्हारा नाम क्या है? 
लड़की ने अपना नाम बताया तो वह भिन्ना गया : हमसे तो कहा गया था कि तुम दूसरे मज़हब की हो....!
लड़की ने जवाब दिया : उसने झूठ बोला था!
यह सुनकर वह दौड़ा-दौड़ा अपने दोस्त के पास गया और कहने लगा : उस हरामज़ादे ने हमारे साथ धोखा किया है.... हमारे ही मज़हब की लड़की थमा दी.... चलो, वापस कर आएँ....!


बेख़बरी का फ़ायदा


लबलबी दबी – पिस्तौल से झुँझलाकर गोली बाहर निकली.
खिड़की में से बाहर झाँकनेवाला आदमी उसी जगह दोहरा हो गया.
लबलबी थोड़ी देर बाद फ़िर दबी – दूसरी गोली भिनभिनाती हुई बाहर निकली.
सड़क पर माशकी की मश्क फटी, वह औंधे मुँह गिरा और उसका लहू मश्क के पानी में हल होकर बहने लगा.
लबलबी तीसरी बार दबी – निशाना चूक गया, गोली एक गीली दीवार में जज़्ब हो गई.
चौथी गोली एक बूढ़ी औरत की पीठ में लगी, वह चीख़ भी न सकी और वहीं ढेर हो गई.
पाँचवी और छठी गोली बेकार गई, कोई हलाक हुआ और न ज़ख़्मी.
गोलियाँ चलाने वाला भिन्ना गया.
दफ़्तन सड़क पर एक छोटा-सा बच्चा दौड़ता हुआ दिखाई दिया.
गोलियाँ चलानेवाले ने पिस्तौल का मुहँ उसकी तरफ़ मोड़ा.
उसके साथी ने कहा : “यह क्या करते हो?”
गोलियां चलानेवाले ने पूछा : “क्यों?”
“गोलियां तो ख़त्म हो चुकी हैं!”
“तुम ख़ामोश रहो....इतने-से बच्चे को क्या मालूम?”


करामात


लूटा हुआ माल बरामद करने के लिए पुलिस ने छापे मारने शुरु किए.
लोग डर के मारे लूटा हुआ माल रात के अंधेरे में बाहर फेंकने लगे,
कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अपना माल भी मौक़ा पाकर अपने से अलहदा कर दिया, ताकि क़ानूनी गिरफ़्त से बचे रहें.
एक आदमी को बहुत दिक़्कत पेश आई. उसके पास शक्कर की दो बोरियाँ थी जो उसने पंसारी की दूकान से लूटी थीं. एक तो वह जूँ-तूँ रात के अंधेरे में पास वाले कुएँ में फेंक आया, लेकिन जब दूसरी उसमें डालने लगा ख़ुद भी साथ चला गया.
शोर सुनकर लोग इकट्ठे हो गये. कुएँ में रस्सियाँ डाली गईं.
जवान नीचे उतरे और उस आदमी को बाहर निकाल लिया गया.
लेकिन वह चंद घंटो के बाद मर गया.
दूसरे दिन जब लोगों ने इस्तेमाल के लिए उस कुएँ में से पानी निकाला तो वह मीठा था.
उसी रात उस आदमी की क़ब्र पर दीए जल रहे थे.


ख़बरदार
बलवाई मालिक मकान को बड़ी मुश्किलों से घसीटकर बाहर लाए.
कपड़े झाड़कर वह उठ खड़ा हुआ और बलवाइयों से कहने लगा :
“तुम मुझे मार डालो, लेकिन ख़बरदार, जो मेरे रुपए-पैसे को हाथ लगाया.........!”


हलाल और झटका

“मैंने उसकी शहरग पर छुरी रखी, हौले-हौले फेरी और उसको हलाल कर दिया.”
“यह तुमने क्या किया?”
“क्यों?”
“इसको हलाल क्यों किया?”
"मज़ा आता है इस तरह."
“मज़ा आता है के बच्चे.....तुझे झटका करना चाहिए था....इस तरह. ”
और हलाल करनेवाले की गर्दन का झटका हो गया.


(शहरग - शरीर का सबसे बड़ा शिरा जो हृदय में मिलता है)


घाटे का सौदा


दो दोस्तों ने मिलकर दस-बीस लड़कियों में से एक चुनी और बयालीस रुपये देकर उसे ख़रीद लिया.
रात गुज़ारकर एक दोस्त ने उस लड़की से पूछा : “तुम्हारा नाम क्या है? ”
लड़की ने अपना नाम बताया तो वह भिन्ना गया : “हमसे तो कहा गया था कि तुम दूसरे मज़हब की हो....!”
लड़की ने जवाब दिया : “उसने झूठ बोला था!”
यह सुनकर वह दौड़ा-दौड़ा अपने दोस्त के पास गया और कहने लगा : “उस हरामज़ादे ने हमारे साथ धोखा किया है.....हमारे ही मज़हब की लड़की थमा दी......चलो, वापस कर आएँ.....!”





1 comment: