मौत के सौदागरों का बचाव कर रहे हैं प्रदेश के मंत्री

 इंदौर में ड्रग ट्रायल का मामला 


एल.एस.हरदेनिया

भाजपा-शासित मध्यप्रदेश में अजीबोगरीब घटनाएं होती रहती हैं। एक ओर भाजपा सरकार पूरे प्रदेश को हिन्दू राज्य बनाने पर आमादा है वहीं दूसरी ओर एक के बाद एक भ्रष्टाचार में लिप्त करोड़पति अदने सरकारी कर्मचारी सामने रहे हैं। प्रदेश में भ्रष्टाचार की गंगा में सभी डुबकी लगा रहे हैं।


 राज्य में पिछले दिनों तक ऐसा मामला सामने आया है जिसने संपूर्ण देश में सनसनी पैदा कर दी। यह मामला है ड्रग ट्रायल का। दवाई का उत्पादन करने वाली अनेक कंपनियां, जिनमें बहुराष्ट्रीय कंपनियां शामिल हैं, उनके द्वारा उत्पादित दवाईयों की प्रभावशीलता का मूल्यांकन करवाती हैं। इस काम के लिए डाक्टरों की सेवाएं ली जाती हैं। ये डाक्टर  अपने मरीजों को ये दवायें देते हैं और फिर उनके असर पर नजर रखते हैं। दवा के मानव शरीर पर प्रभाव से संबंधित जानकारी फिर संबंधित कंपनी को पहुंचाई जाती है। इसे ड्रग ट्रायल कहते हैं।

नियमों के अनुसार जिस रोगी पर ड्रग ट्रायल किया जाता है, उससे लिखित में सहमति प्राप्त करना आवश्यक है। यह सहमति ''इन्फारम्ड कन्सेन्ट''होना चाहिए अर्थात सहमति देने वाले को इस बात की पूर्ण जानकारी होनी चाहिए की वह किस चीज की सहमति दे रहा है और उसके क्या परिणाम हो सकते हैं।


 इस प्रयोग के ऐवज में ये कंपनियां डॉक्टरों को भारी भरकम रकम देती हैं। इन डॉक्टरों को विदेश यात्राओं पर भेजा जाता है और अन्य प्रकार के लाभ पहॅुचाए जाते हैं। मध्यप्रदेश के अनेक सरकारी डॉक्टरों ने अपने रोगियों पर ऐसे प्रयोग किए। इस संदर्भ में यह आरोपित है कि जिन रोगियों पर इनका प्रयोग किया गया उनमें से कुछ की मृत्यु हो गई। इन आरोपों की जांच की गई और अनेक आरोप सच पाये गये। आरोपी डॉक्टरों में से कुछ को दंड भी दिया गया और इस के बाद भी संभावना है कि इन्हें और सख्त दंड दिया जा सकता है। परंतु इस बीच आरोपी डॉक्टरों के बचाव में मध्यप्रदेश के दो मंत्रियों ने सार्वजनिक रूप से बयान दिए। इन बयानों के बाद प्रदेश में यह प्रश्न उठाया जा रहा हैं कि क्या किन्हीं आरोपियों के पक्ष में किसी मंत्री द्वारा सार्वजनिक बयान देना कानूनी और नैतिक रूप से उचित है? ये दो मंत्री हैं उद्योग मंत्री श्री कैलाश विजयवर्गीय और चिकित्सा  शिक्षा मंत्री श्री महेन्द्र हार्डिया शामिल है। 


दोनों ने कहा कि ड्रग ट्रायल मामले में जो कार्यवाही होना थी, वह हो चुकी है। अब डॉक्टरों पर कोई कार्यवाही नहीं होगी। अनैतिक तरीके से ड्रग ट्रायल किए जाने के मामले में जिन डॉक्टरों के नाम रहे हैं वे प्रतिष्ठित डॉक्टर हैं। अगर इन पर गलत कार्रवाई होती है, तो हम इनके साथ खड़े रहेंगे।  

 इंदौर मेडिकल कॉलेज से संबध्द एमवाय हास्पिटल के नवनिर्मित एनआईसीयू (न्यू बोर्न बेबी इंटेन्सिव केयर यूनिट)का उद्धाटन करते हुएमहेन्द्र हार्डिया ने ड्रग ट्रायल में लिप्त डॉक्टरों का बचाव करते हुए कहा कि बस बहुत हो चुका, ड्रग ट्रायल मामले में जो कार्यवाही होना था, वो हो चुकी है। अब डॉक्टरों पर राज्य सरकार कोई कार्यवाही नहीं करेगी। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री कैलाश विजयवर्गीय भी खुलकर डॉक्टरों के बचाव में सामने आए। उन्होंने कहा कि ड्रग ट्रायल मामले में जिन डॉक्टरों के नाम रहे हैं, वे शहर ही नहीं देश के प्रतिष्ठित डॉक्टर हैं। इनके खिलाफ अगर कोई गलत कार्यवाही की जाएगी तो मैं इन डॉक्टरों के साथ खड़ा रहूंगा। 


 जहां ये दोनों मंत्री आरोपी डाक्टरों के बचाव में सामने आए हैं वहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि यदि विशेषज्ञों की राय में कुछ कमियां पाई जाती हैं तो ड्रग ट्रायल मामले की जांच सी.बी.आई को सौंपी जा सकती है।  

जिस दिन इन दोनों मंत्रियों ने विवादग्रस्त बयान दिया ठीक उसी दिन इंदौर की एक महिला ने आरोप लगाया कि उनके पति पर दवाई का प्रयोग किया था और उसके बाद उनकी मृत्यु हो गई। अनवर बी ने औपचारिक रूप से अपनी शिकायत ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंड़िया,मेडिकल कांउसिल ऑफ इंडिया राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से की है। अनवर बी ने उस डॉक्टर का नाम भी दिया है जिसने उनके पति पर प्रयोग किया था। 
               
मध्यप्रदेश के आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने इस मामले की जांच की। महाराजा यशवंत राव होल्कर अस्पताल इंदौर के डॉक्टरों ने वर्ष 2006से 2010के बीच मल्टीनेशनल ड्रग कंपनियों द्वारा प्रायोजित ड्रग ट्रायल में लगभग छह करोड़ रूपये की काली कमाई की। इस ड्रग ट्रायल के बाद 81 मरीजों की मृत्यु हो गई।  डॉ. आनंद सिंह राजे ने महात्मा गांधी स्मृति चिकित्सा महाविद्यालय से सम्बध्द एमवाय अस्पताल में मल्टीनेशनल ड्रग कंपनियों द्वारा प्रायोजित ड्रग ट्रायल, आम गरीब मरीजों पर उनकी जानकारी के बिना संचालित किए जाने की शिकायत राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो  को वर्ष 2010 में की थी। ब्यूरो ने यह शिकायत पंजीबध्द की और जांच प्रारंभ की।
                 
ब्यूरो द्वारा की गई जांच में यह सामने आया कि कितने मरीजों पर ड्रग ट्रायल की गई, डाक्टरों द्वारा कितनी रकम कमाई गई कितने मरीज मारे गए। ब्यूरो ने अपनी जांच रिपोर्ट में लिखा है कि डॉ. अनिल भरानी, जो एमवाय अस्पतालों में पदस्थ थे,ने चार सौ मरीजों पर ड्रग ट्रायल किया जिनमें से 30मरीजों की मृत्यु हो गई। उन्होंने प्रायोजक मल्टीनेशनल कंपनी द्वारा कराई गई विदेश यात्रा बिना विभागीय या शासकीय अनुमति के की। दूसरे डॉक्टर हेमंत जैन, जो चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय इंदौर में पदस्थ थे, के द्वारा 2500 मासूम बच्चों (मरीजों) पर ड्रग ट्रायल किया गया। इस दौरान 18 बच्चों की मौत हो गई।
                
प्रायोजक कंपनी द्वारा इन्हें एक करोड़ सत्तर लाख रूपए दिए गए। इन्होंने भी प्रायोजक कंपनी की मेजबानी में हवाई विदेश यात्रा की किंतु किसी प्रकार की शासकीय या विभागीय अनुमति नहीं ली। डॉ. सलिल भार्गव, जो एमवाय अस्पताल के ज्ञानपुष्प रिसर्च सेंटर  में पदस्थ थे, ने 300 मरीजों पर ड्रगट्रायल किया। इस दौरान 18 मरीजों की मृत्यु हो गई। इनके द्वारा एक करोड़ पांच लाख रूपए कमाए गए। इन्होंने भी बिना अनुमति के विदेश यात्रा का सुख उठाया। डॉ. अपूर्व पौराणिक, जो एमवाय अस्पताल इंदौर में पदस्थ थे, ने 40 मरीजों पर ड्रग ट्रायल किया और 26 लाख रूपए अर्जित किए, आठ मरीजों को मौत के मुंह में धाकेला बिना अनुमति विदेश यात्रा भी की। डॉ. अशोक वाजपेयी, जो एमवाय अस्पताल इंदौर में पदस्थ थे, ने 35 मरीजों पर ड्रग ट्रायल किया, 48 लाख रूपए कमाए, सात मरीजों ने जान गंवाई। बिना अनुमति विदेश यात्रा प्रायोजक मल्टीनेशनल कंपनी की मेजबानी में की। डॉ. पुष्पा वर्मा, जो एमवाय अस्पताल इंदौर में पदस्थ थीं, ने भी 32 मरीजों पर ड्रग ट्रायल किया एवं 8 लाख रूपए कमाए। इनके ट्रायल के दौरान एक भी मरीज नहीं मरा और इन्होंने विदेश यात्रा भी नहीं की। ब्यूरो द्वारा की गई जांच में यह तथ्य आने के बाद भी स्वास्थ्य मंत्री कह रहे हैं कि एक भी मौत ड्रग ट्रायल के दौरान नहीं हुई।


  शर्मनाक तो यह है कि इतनी मौतों के बाद भी मल्टीनेशनल कंपनी के प्रवक्ता द्वारा दिया गया बयान, जो टाइम्स ऑफ इंडिया में 6 जनवरी 2012 को प्रकाशित हुआ  है में कहा गया है कि भारतीय गरीब गंदगी के सुअरों जैसे हैं जिन पर ड्रग ट्रायल जायज है।




मध्य प्रदेश  कच्ची दवाओं के परीक्षण (ड्रग ट्रायल) पर तहलका में छपी  प्रियंका दुबे की रिपोर्ट भी पढें   - यहाँ पर 

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