शिक्षक होने का भार


फैज़ 

"चिल्लाओ मत, ओए उठ इधर आ- तेरे को कित्ती बार बोला मस्ती मत कर, चल मुर्गा बन जा"। ये संवाद मेरे जैसे कितने ही बेक बन्चेर्स में सिरहन पैदा कर देते थे। लगता था फिर पड़ेगी, ये कमीना मारता बहुत बुरा है। ऐसा और ना जाने क्या क्या सोंचकर  शिक्षकों की ड्राक्यूला वाली छवी मन में बनती रही। 

लकिन सरकारी विद्यालयों में  शिक्षकों  के साथ काम करते हुए जब  मैने 3-4 साल बिताये। तब मैंने  कई मायनों में  शिक्षकों की दयनीय स्थिति मेरे समझ आई। मुझे लगता था कि जिन व्यक्तियों को कहीं काम नहीं मिला उन सबके लिये  शिक्षक बनना सहज उपक्रम है। वर्तमान समय में आज जब में  शिक्षकों कि स्थितियों का विष्लेषण करता हूँ , तो पाता हूं कि शिक्षक  शिक्षण की नौकरियों में मात्र इसलिये नहीं आते कि उन्हें पैसा कमाने के अन्य साधनों की उपलब्धता नहीं हुई। वे पढ़ाने में रुचि और क्षमता होने के कारण भी इस व्यवसाय में आते हैं। वे उन विपरीत परिस्थितियों में काम करने का प्रयास करते हैं जिनका जिक्र आगे किया है। 

वैसे यदि ऐसा देखें कि एक स्कूल में  शिक्षण के साथ क्या क्या काम करना होते हैं तो हम पाएंगे कि मध्याद्द भोजन, गणवेश वितरण या उसका पैसा वितरण, पत्रिका निकालना, किताबें वितरण (आठवीं तक), नवीं से बारहवीं तक के विद्यार्थियों में किताबों के लिए पैसे वितरण, ज्योमेट्री बाक्स  , काॅपियां और अलग-अलग तरह के वजीफे वितरण, बाल मेले लगवाना, समय-समय पर प्रगति पत्रक भरना और इन सब कार्यक्रमों के लिए आने वाले अनुदानों का लेखा बनाना शामिल है।साथ ही साथ  चुनाव, जनगणना, दाखिला अभियान, सर्व शिक्षा अभियान रैलियां, स्कूलों के भवन में बैंक और अन्य पब्लिक परीक्षाएं करवाना, रिजल्ट ऑनलाइन  भेजना और लगातार सूचना के अधिकार के सवालों का जवाब देना भी उनके कामों मैं शामिल है  

विद्यालय भवन  में कक्षा लगाने के लिए कमरे कम और छोटे हैं। शिक्षकों का कहना है कि शिक्षा का स्तर गिरा है क्योंकि पढ़ाने के घण्टे लगातार घट रहे हैं और अन्य ताम-झाम व कागजी कार्यवाही कई गुना बढ़ी है। उपलब्धियों को मापने का एकमात्रा तरीका परीक्षा परिणाम है। इस पर शिक्षक का अस्तित्व यानी नौकरी में प्रमोशन, नौकरी का पक्का होना या अपमान झेलना निर्भर है। इन सबके साथ परिणाम की प्रमुखता के माहौल में शिक्षक कई बार झूठ बोलने को बाध्य होते हैं।

शिक्षा का अधिकार कानून में साफ साफ लिखा है कि  शिक्षकों को गैर  शिक्षकीय कार्यों में नहीं लगाया जाएगा किन्तु उसमें कुछ खास प्रकार के कामों के लिये छूट रखी गई है। सिर्फ चुनाव या जनगणना में ड्यूटी लगाना बंद कर देने भर से ही काम नहीं चल सकता क्योंकि उपरोक्त कार्यों के अतिरिक्त तरह-तरह के फार्म भरने जैसे, नामांकन और ड्रॉप-आउट के आंकड़े जुटाने; परीक्षा परिणाम, बैंकों के फार्म, इत्यादि भरने में भी काफी समय चला जाता है। 

दूसरी तरफ नई नीतियों जैसे, सतत एवं समग्र मूल्यांकन ने पहले से प्रशासनिक कामों की मार झेल रहे शिक्षकों के बोझ को और बढ़ा दिया है। मामला केवल ढेरों कॉलम  भरने, प्रतिशत निकालने, ग्रेड तय करने इत्यादि तक सीमित नहीं है। दिक्कतें ग्रेड करने के मुद्दे की प्रकृति से भी संबंधित है। सवाल यह भी है कि दो-दो टर्म में हर विद्यार्थी को शिक्षकों’, ‘अन्य विद्यार्थियों’, ‘स्कूली कार्यक्रमों’, ‘माहौलऔर मूल्योंके प्रति दृष्टिकोणपर ग्रेड कैसे दिए जा सकते हैं ? क्या दृष्टिकोणछह महिनों के अन्तराल में बदल जाते हैं ? उसी प्रकार क्या सोचने के कौशल’, ‘सामाजिक कौशलऔर भावनात्मक कौशलग्रेडों में मापे जा सकते हैं ? शिक्षकों को निर्देश हैं कि जो विद्यार्थी विषयों में यानी शैक्षिक क्षेत्रोंमें अंक नहीं पाते हैं उन्हें अन्य सह-शैक्षिक क्षेत्रोंके ग्रेड के आधार पर पास किया जाए। यानी 10वीं तक कोई परीक्षा ऐसी नहीं होगी जिसमें कोई फेल होगा। किसी ने सोचा है या करके देखा है कि ऐसा एक कार्ड भरना कितना समय और शक्ति खाता है और वास्तव में क्या दिखाता है ? परीक्षा में इस प्रकार का परिवर्तन, सबको पास करना, शिक्षकों की दृष्टि से विवादास्पद है क्योंकि, उनके अनुसार, इसका सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ने में मेहनत करने की प्रेरणा पर पड़ा है। शिक्षकों का मानना है कि परीक्षा की पद्धति बदलने की जरूरत थी, उसे रटन्त पद्धति से हटाकर तार्किकता का आधार मिलना जरूरी था। शिक्षकों से इतने बड़े परिवर्तन पर कोई व्यापक विचार विमर्श/संवाद नहीं हुआ। उन्हें तो बस ऊपर से आए हर आदेश को लागू करना है। 
कस्बा और गांव के स्तर के शिक्षकों का बहुत-सा समय किताबें, यूनीफार्म, स्टेशनरी, साईकिलों इत्यादि, की खरीद फरोख्त की कार्यवाही में बीत जाता है और वे स्कूल में अनुपस्थित रहते हैं। स्कूलों के स्तर पर शिक्षकों की स्वायतत्ता कभी रही नहीं, परन्तु अब बेहतर परिणाम लाने का दबाव दोनों सरकारी और निजी स्कूलों पर इतना है कि इसके लिए शासन और निजी स्कूलों के प्रशासक शिक्षकों पर तानाशाही की किसी भी हद तक जा सकते हैं। 

इस संदर्भ में नीजि विद्यालयों का प्रशासन की तानाशाही की एक बानगी देता है। कई बड़े निजी स्कूलों की कक्षाओं में शिक्षक के बैठने के लिए कुर्सी नहीं होती और कैमरों की मदद से उन पर निगरानी की जाती है। अब तो केन्द्रीय विद्यालयों में भी कैमरे लग गए हैं। गनीमत है कि इनमें शिक्षक के लिए कक्षा में कुर्सियां उपलब्ध हैं लेकिन वे उन पर बैठ नहीं सकते ! परन्तु यदि शिक्षक पांच मिनट के लिए भी बैठ जाएं तो प्रधानाचार्य विद्यार्थियों के सामने ही उन्हें डपट जाते हैं। 

अनुभवों पर बात करते हुए मुझे एक पढ़ा हुआ अनुभव याद आता है वो बताता है कि - दिल्ली के एक उच्च माध्यमिक स्कूल की प्रधानाचार्या वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के साथ प्रधानाचार्यों की बैठक में इतना भर कह बैठी थीं कि स्कूलों में प्रशासनिक कार्यों का बोझ बढ़ गया है। शिक्षक या तो बैंक के फार्म भरते/भरवाते रहते हैं या यूनीफार्म और छात्रावृत्तियां बांटते रहते हैं, ऐसे में पढ़ाई का नुकसान होता है। इसलिए प्रशासनिक कामों के लिए कुछ और पद स्कूलों को दिए जाएं। प्रधानाचार्या के इस दुस्साहसपर वरिष्ठ अधिकारी को बहुत गुस्सा आ गया। भरी सभा में उन्होंने प्रधानाचार्या को डपट दिया और कहा कि शिक्षक काम नहीं करना चाहते, इसलिए ऐसे बहाने करते हैं। उन्होंने आगे कहा कि ऐसे शिक्षकों के नाम बताए जाएं ताकि उन पर विभागीय कार्यवाही की जा सके। प्रधानाचार्या अवाक् रह गईं। 

यह अनुभव सुनाते हुए प्रधानाचार्या ने कहा कि संस्था प्रमुख होते हुए भी वे न तो सवाल पूछ सकती हैं, न स्पष्टीकरण मांग सकती हैं, न असहमति जाहिर कर सकती हैं और न अनुभव ही बांट सकती हैं। उन्हें बैठकों में मात्रा अधिकारियों के निर्देश/आदेश या धमकियां सुनने के लिए जाना होता है। मुंह खोलने का अर्थ है, अपमानित होना। प्रधानाचार्या ने कहा कोई ऐसा मंच नहीं है जहां वे अपने अनुभव और पेरशानियां अनुकूल माहौल में रख सकें। यह मात्र एक प्रधानाचार्या के साथ घटित हुआ एक अनुभव है, इस घटना पर उन्होंने क्या महसूस क्या होगा इसका वर्णन भी शब्दों में करना उक्त महिला के साथ अन्याय होगा।

यह महज इत्तफाक नहीं है कि मध्य प्रदेश में 1993 से संविदा शिक्षकों की नियुक्तियां हुई हैं। संविदा शिक्षकों के निरंतर चले संघर्षों के फलस्वरूप पिछले कुछ वर्षों से कुछ संविदा शिक्षकों की नौकरियों को नए और बदतर सेवा शर्तों के तहत समायोजित किया गया है। 1993 तक सेवा शर्तों के तहत दी जाने वाली नियमित पक्की नौकरियां खत्म कर दी गईं हैं। इस तरह आज मध्य प्रदेश में शिक्षकों की नौ श्रेणियों मौजूद हैं जिनमें समान पद और कार्य की जिम्मेदारी के बावजूद वेतन/मानदेय की दर 2,500 रुपये से 17-18,000 रुपये मासिक तक है तथा अन्य सेवा शर्तों में भी जमीन आसमान का अन्तर है। एक और बुनियादी अन्तर यह है कि संविदा (ठेके पर) शिक्षक राज्य सरकार की बजाय विकेन्द्रित राजनैतिक संस्थानों यानी पंचायत या जनपद के प्रति जवाबदेह हैं। सरपंच या जनपद अध्यक्ष के हस्ताक्षर के बिना न तो उन्हें छुट्टी मिलती है और न ही मानदेय। 

शिक्षक राजनीति में लिप्त हैं, पढ़ाते नहीं हैं, अनुपस्थित रहते हैं, अत्यधिक वेतन पाते हैं, इत्यादि राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय शोधों के आधार पर गढ़ी गई शिक्षक की छवि के चैखटे के बाहर देखें तो बहुत से ऐसे मुद्दे सामने आते हैं जिन पर शोध नहीं होता। ऐसे मुद्दों पर शोध के लिए आसानी से धनराशि भी उपलब्ध नहीं होती। भारत में कक्षा आठवीं तक की शिक्षा सर्व शिक्षा अभियान के तहत है। शिक्षा के अधिकार कानून के लागू होने के बाद यह तथ्य सामने आए हैं कि मध्य प्रदेश, बिहार और शायद उत्तर के एक-दो अन्य राज्यों को छोड़कर पैरा-टीचरजैसी संविदा नियुक्तियां बहुत सीमित हो गई हैं। माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक स्तर की शिक्षा के लिए अभी भी निजीकरण के कई माॅडल लागू किए जा रहे हैं हैं। पिछले वर्ष प्रधानमंत्री ने  हर ब्लाक   में केन्द्रीय विद्यालयों की तर्ज पर 6,000 माॅडल स्कूल खोलने की घोषणा हुई थी। तुरन्त ही उनमें से 2,500 माॅडल स्कूलों की जिम्मेदारी निजी क्षेत्रा को दे दी गई। इनकी जिम्मेदारी मात्रा 50 प्रतिशत विद्यार्थी सरकारी शर्तों पर लेने की होगी। बाकी 50 प्रतिशत विद्यार्थियों से क्या फीस और अनुदान लिया जाएगा इस पर सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा और न ही शिक्षकों की सेवा शर्तों पर। निजी क्षेत्रा का ही दूसरा माॅडल सार्वजनिक-निजी भागीदारीभी जगह-जगह लागू किया गया है। जिसका सम्बन्ध शिक्षा से कम और मुनाफाखोरी से जयादा लगता  है 

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