ब्रेविक के बहाने दिखा यूरोप का नव नाजीवाद

सुभाष गाताडे 




पिछले दिनों नार्वे की एक अदालत ने आतंकी ब्रेविक को 21 साल कैद बामशक्कत की सजा सुनाई। ब्रेविक ने पिछले साल जुलाई में 77 लोगों को मार डाला था। इस आतंकी का कहना था कि इस तरह वह अपने देश को उस ' मुस्लिम आक्रमण ' से बचाना चाहता था , जो सत्ताधारी लेबर पार्टी की आप्रवासी नीति के चलते संभव हुआ है। ब्रेविक पर चला मुकदमा हत्यारे को सजा दिलाने के लिए निर्मित जनदबाव के लिए जाना जाएगा। इस मुहिम का एक यादगार पल था , राजधानी ओस्लो की सड़कों पर तेज बारिश के बीच 40 हजार से अधिक लोगों द्वारा मिल कर गाया गया बच्चों का एक गीत। अमेरिका के महान जनसंगीतकार पीट सीगर का यह गीत ' इंद्रधनुष की संतानें ' नार्वे में बच्चों के गीत के तौर पर लोकप्रिय है। गाने के बाद वहां एकत्रित तमाम लोगों ने हत्याकांड में मारे गए लोगों की याद में अदालत की सीढि़यों पर फूल चढ़ाए। अदालत में सुनवाई के दौरान ब्रेविक ने इस गाने को अपना निशाना बनाया था और कहा था कि गाने की लोकप्रियता इस बात का सबूत है कि किस तरह ' सांस्कृतिक मार्क्सवादियों ' ने नार्वे के स्कूलों में घुसपैठ की है। 

पागल बताने का दांव 
दूसरी तरफ यह मुकदमा सत्ताधारी तबके के एक प्रभावी हिस्से द्वारा इस मसले पर लगातार अस्पष्टता बनाए रखने के प्रयासों के लिए भी याद किया जाएगा। इस तबके की यही कोशिश रही कि ब्रेविक को ' पागल ' घोषित करवा कर मामले को रफा दफा कर दिया जाए और उन असुविधाजनक सवालों पर कोई बात न हो , जो इस आतंकी कार्रवाई से सामने आ गए हैं। पागल घोषित करवाने का दांव खाली जाता देख उसे तनहा आतंकी घोषित करवाने कोशिश हुई ताकि यूरोप - अमेरिका में आकार ले रही श्वेत आतंकवाद की परिघटना के अन्य सूत्रों तक किसी की नजर न जाए। यह अकारण नहीं था कि उन लोगों से कभी पूछताछ नहीं की गई , जिन्हें ब्रेविक ने अपना 1,500 पेज का घोषणापत्र भेजा था , न ही इंग्लिश डिफेंस लीग के सदस्यों से पूछताछ की गई , जिसकी बैठकों में वह शामिल हुआ करता था। 

मोहम्मद मेरा से अलग 
ब्रेविक के प्रति अपनाया गया यह रवैया अन्य आतंकी कार्रवाइयों को लेकर अपनाए गए रुख से बहुत अलग दिखाई देता है। जिस दिन ब्रेविक को सजा हुई , उसी दिन ' ल मांद ' ने पुलिस के हवाले से बताया कि मोहम्मद मेरा , जिसने फ्रांस के तूलोज शहर में तीन हमलों में सात लोगों को मारा था , कोई अकेला आतंकी नहीं था। पुलिस ने अपने इस निष्कर्ष का आधार मोहम्मद मेरा द्वारा 20 देशों के 180 सम्पर्कों को की गई 1,800 फोन काल्स को बनाया था। मेरा और ब्रेविक में फर्क बस इतना था कि एक इस्लामिक अतिवादी था तो दूसरा ईसाई फासिस्ट। दोनों मामलों में दिखे इस फर्क से यह कड़वी सच्चाई सामने आई कि किस तरह पश्चिमी मुल्कों में नव - नाजी आतंकवाद सिर उठा रहा है , बल्कि दक्षिणपंथी मुख्यधारा का हिस्सा बन रहा है। 

बीते नवंबर में अमेरिका के जार्जिया में एक अतिवादी संगठन के चार सदस्य पकड़े गए थे , जिनकी योजना बंदूकों , बमों और राइसिन नामक जहर से केंद्र व राज्य सरकार के अधिकारियों को मारने और आतंक फैलाने की थी। इस खुलासे के बाद जर्मनी के गृहमंत्री हांस पीटर फ्रेडरिक ने मीडिया को बताया कि इस्लामिक अतिवादियों की तर्ज पर उनकी सरकार अब नव - नाजी समूहों का भी एक राष्ट्रीय रजिस्टर तैयार करने की सोच रही है। ऐसे समूहों ने न वर्ष 2000 से 2007 के बीच टर्की मूल के नौ दुकानदारों और एक जर्मन महिला पुलिसकर्मी को मार डाला तथा कई बैंक डकैतियों और विस्फोटों को अंजाम दिया। ब्रिटेन के थिंकटैंक ' डेमोस ' ग्रुप द्वारा इस मसले पर जारी एक रिपोर्ट ने इस बात को नए सिरे से उजागर किया कि किस तरह समूचे यूरोप में अतिवादी दक्षिणपंथ उभार पर है। इस अध्ययन में पता चला है कि फेसबुक आदि सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सक्रिय नई पीढ़ी के युवा इन समूहों का हिस्सा बन रहे हैं। अपने अध्ययन के लिए डेमोस ने फेसबुक ग्रुप्स के पन्नों पर विज्ञापन देकर 10 देशों में फैले 14 अलग - अलग पार्टियों और संगठनों के 10 हजार अनुयायियों से अपनी एक प्रश्नावली का उत्तर देने को कहा था। 

अध्ययन के मुताबिक समूचे महाद्वीप में उग्र राष्ट्रवादी भावनाएं युवाओं , खासकर पुरुषों में हावी होती दिख रही है। वे अपनी सरकारों और यूरोपीय यूनियन के प्रति काफी आलोचनात्मक राय रखते हैं। उनके डर सांस्कृतिक पहचान , खासकर मुस्लिम आप्रवासियों के प्रभाव विस्तार से जुड़े हैं। जानकारों के मुताबिक अगर बीसवीं सदी की शुरुआत में अति दक्षिणपंथी पार्टियों को एक दूसरे से जोड़ने वाला पहलू था एंटिसेमिटिज्म अर्थात यहूदी विरोध का था तो इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई में इस्लाम का डर यह सूत्र बना है। डेमोस का अध्ययन बताता है कि इन विचारों और संगठनों का प्रभाव फ्रांस , इटली और आस्ट्रिया जैसे पारंपरिक आधार क्षेत्रों के अलावा उदार माने जानेवाले नीदरलैंड और स्कैंडिनेविया में भी फैला है। आठ मुल्कों में उनके अपने संसदीय ब्लाक भी मौजूद हैं। 

बहुसंस्कृतिवाद पर हमला 
जब प्रतिभागियों से पूछा गया कि किन वजहों से वे इन विचारों की आकर्षित हुए तो लोगों ने आर्थिक चिंताओं को कम , इस्लाम और आप्रवास को अधिक जिम्मेदार बताया। कुछ ने बहुत भोंडे जवाब भी दिए -' वे लोग आकर हमारे सुंदर देश को तबाह कर रहे हैं। उनके इतने सारे बच्चे होते हैं जिन्हें वे ठीक से पालते भी नहीं हैं। ' यूरोप में नस्लवाद की राजनीति के विशेषज्ञ और ' द क्राइसिस ऑफ मल्टिकल्चरलिज्म ' के सह - लेखक गावन टिटले कहते हैं कि मुख्यधारा की पार्टियां इन समूहों के उभार की जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं क्योंकि उन्होंने उदारवादी मूल्यों की रक्षा का हवाला देकर इस्लाम को इसकी राह का रोड़ा बताने की कोशिश की है। याद रहे , अदालत को दिए अपने हलफनामे में ब्रेविक ने साफ कहा था कि ' फ्रांस के सर्कोजी , जर्मनी की मर्केल और ब्रिटेन के कैमरून , सभी ने इस बात को स्वीकारा है कि बहुसांस्कृतिकता एक नाकारा चीज है। '


(नवभारत टाइम्स से साभार)







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