मोदी सरकार का “मुद्रा प्रयोग” :- असर - बेअसर


जावेद अनीस


बीते साल 8 नवम्बर 2016 को रात आठ बजे प्रधानमंत्री ने अचानक 500 और 1000 के नोटों को बंद करने की घोषणा की थी तो यह भारतीयों के लिए सबसे बड़ी घटना बन गयी जिसकी दुनियाभर में चर्चा हुई. इस फैसले की वजह से देश की 86 प्रतिशत मुद्रा एक ही झटके में चलन से बाहर हो गयी, पूरा देश अपने हजार-पांच सौ के नोट बदलवाने के लिए बैंकों की तरह टूट सा पड़ा और एटीएम भारतीयों के लाईन में खड़े होने के धैर्य की परीक्षा लेने लगे. प्रधानमंत्री द्वारा अपने इस फैसले को भ्रष्टाचार,काले धन,जाली नोट और आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक कदम की तरह पेश किया गया वहीँ विरोधी इसकी तुलना तुगलकी फरमान से करने लगे.

नोटबंदी से जनता की परेशानी को देखते हुए प्रधानमंत्री ने पचास दिन की मोहलत मांगते हुए कहा था कि इसके बाद आम लोगों के लिए हालात बेहतर हो जायेंगें. यह समय सीमा जो की 30 दिसंबर 2016 तक पूरी हो चुकी है इसके बाद पूरे देश नए साल की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री के देश के नाम संबोधन का इंतजार था. प्रधानमंत्री ने अपने बहुप्रतीक्षित भाषण में जनता के त्याग की पराकाष्ठ की तारीफ करते हुए इसे ऐतिहासिक शुद्धि यज्ञ और ईमानदारी का आन्दोलन बताते हुए कुछ नयी–पुरानी योजानाओं की घोषणायें भी की जिसमें आवास कर्ज,किसानों को ब्याज में राहत,छोटे कारोबारियों ऋण की क्रेडिट गारंटी और गर्भवती महिलाओं के लिए छह हजार की आर्थिक सहायता प्रमुख थीं. लेकिन प्रधानमंत्री इस पर खामोश रहे कि इन पचास दिनों में सरकार को क्या कामयाबी मिली, कितना काला धन वापस आया और आतंकवाद पर कितना लगाम लगाया जा सका है, ना ही उन्होंने यह बताया कि नोटबंदी के बाद सरकार का अगला क़दम क्या होगा और हालत सुधरने में और कितना समय लगेगा. उन्होंने बेनामी संपत्ति के खिलाफ भी कोई घोषणा नहीं की है. प्रधानमंत्री का टोन भी बदला हुआ नजर आया.

साल 2014 में बाबा रामदेव ने देश की अर्थनीति में बदलाव को लेकर कई सुझाव दिए थे जिसमें पूरे देश में एकल टैक्स व्यवस्था लागू करने और बडे नोटों को वापस लेने जैसी मांगें थीं. दरअसल मूल विचार "अर्थक्रांति संस्थान" नामक संस्था का है जो वर्तमान टैक्स व्यवस्था बंद करने, बैंक ट्रांजैक्शन टैक्स (बीटीटी) द्वारा इकलौता टैक्स व्यवस्था लागू करने, बड़े नोट बंद करने, कैश लेन-देन की सीमा तय  करने और बड़े ट्रांजैक्शन सिर्फ बैंकिंग सिस्टम द्वारा करने की वकालत करती रही है. मोदी सरकार द्वारा हालिया उठाये गये क़दमों में "अर्थक्रांति संस्थान" के सुझावों की झलक देखी जा सकती है. जीएसटी, हजार और पांच सौ जैसे बड़े नोटों की बंदी और कैशलेस अर्थव्यवस्था पर जोर इसी सिलसिले के एक कड़ी है.

लेकिन पिछले पचास दिनों में नोटबंदी को लेकर मोदी सरकार बहुत सहज नहीं नजर आई है. हड़बड़ी,दुविधा और पर्याप्त तैयारी की कमी साफ़ नजर आई. इन पचास दिनों में सरकार और रिजर्व बैंक द्वारा 75 अधिसूचनायें जारी की गयीं और 11 बार आदेश वापस लिए गये, इस दौरान रिजर्व बैंक का रुतबा कमजोर हुआ. नोटबंदी के लक्ष्य को लेकर भी यही दुविधा रही अचानक कैशलेस अर्थव्यवस्थाका लक्ष्य पेश किया जाने लगा. ब्लैक मनी से कैशलेस की ओर शिफ्ट के दौरान यह ध्यान भी नहीं रखा गया कि देश में बड़ी संख्या में लोगों के पास बैंक खाते तक नहीं हैं. भारत में प्रति दस लाख आबादी पर 108 बैंक शाखायें और 149 एटीएम मशीनें ही हैं. इस मुल्क में 98 प्रतिशत लेनदेन नगदी में होता है, देश की एक बड़ी आबादी है जिसका डिजिटल दुनिया से संपर्क नहीं है, डेबिट-क्रेडिट कार्ड की पहुंच भी सीमित है. ट्राई के अनुसार वर्तमान में देश के बीस करोड़ लोगों के पास ही स्मार्टफोन है, इन्टरनेट की पहुँच भी सभी भारतीयों तक नहीं हो पायी है. इन्टरनेट की रफ्तार कछुए की तरह है और इस मामले में हम पूरी दुनिया में 114वें नंबर पर हैं. डिजिटल साक्षरता भी एक समस्या है दरअसल देश की एक चौथाई आबादी आज भी निरक्षर हैं ऐसे में डिजिटल साक्षरता दूर की कौड़ी लगती है. ऑनलाइन फ्राड भी एक समस्या है, साइबर सुरक्षा को लेकर कानून लचर है इसलिए डिजिटल पेमेंट असुरक्षित है. इन हालत हो देखते हुए “कैशलेस इंडिया” का नारा ध्यान बंटाने की एक तरकीब ही नजर आती है.

भारत में काले धन का मुद्दा बहुत पुराना है, 2012 में यूपीए सरकार भी काले धन पर श्वेत पत्र जारी कर चुकी है जिसमें बताया गया था कि काले धन के मामले में विश्व में भारत 15वें स्थान पर है. सत्तारूढ़ बीजेपी के चुनावी अभियान में काले धन की वापसी एक बड़ा मुद्दा था जिसकी जड़ अन्ना आन्दोलन में है. मोदी सरकार के आने के बाद लंबे समय तक इस पर कोई सुगबुगाहट नहीं देखी गयी और ना ही कोई ठोस कदम उठाया गया. पिछले साल अमित शाह ने चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी के काला धन वापस लाने के बाद हर परिवार के खाते में 15-15 लाख रूपए जमा करने की बात को “चुनावी जुमला” बता दिया था. अब नोट बंदी लाया गया है जो भारत की आम जनता के लिए नोट बदली की कवायद साबित होती जा रही है. जब नोटबंदी की घोषणा की गयी थी उस समय देश में 500 1000 रुपये के नोट चलन में थे, उसका मूल्य 15.50 लाख करोड़ रूपयों था. जिसमें से लगभग 14 लाख करोड़ की राशि के नोट बैंकों में जमा किया जा चुके हैं इसका मतलब है काला धन किसी और रूप में है या इसे दूसरे तरीकों से सफेद किया जा चुका है.

दरसअसल जानकार बताते हैं कि भारत में मौजूद कालाधन पूरी तरह से कैश में नहीं बल्कि सोना, रियल एस्टेट, बेनामी वित्तीय निवेश, भूमि के पट्टे, कारोबारी परिसंपत्तियों और विदेशी बैंकों के जमा खातों में मौजूद है. इसका सीधा जुड़ाव टैक्स चोरी से भी हैं. पिछले साल अप्रैल में “पनामा पेपर्स लीक” से टैक्स चोरी का बड़ा खुलासा हुआ था जिसमें भारत ही नहीं दुनिया भर के नामचीन और प्रभावशाली लोगों के नामों का खुलासा हुआ था. इस सूची में 500 से ज्यादा भारतीयों का नाम शामिल था जिसमें अमिताभ बच्चन,ऐश्वर्या राय बच्चन,डीएलफ के मालिक केपी सिंह और गौतम अडानी के बड़े भाई विनोद अडानी जैसे नाम शामिल हैं. पनामा पेपर्स में जिन भारतीयों के नाम का खुलासा हुआ है उन पर किसी तरह की कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुई है लेकिन पिछले दिनों उन नामों में से एक ऐश्वर्या राय बच्चन का प्रधानमंत्री मोदी के नाम सन्देश जरूर आया था जिसमें उन्होंने कहा है कि “एक नागरिक होने के नाते मैं ईमानदारी से प्रधानमंत्री को बधाई दूंगी. आप बेहद मजबूत कदम के साथ देश से भ्रष्‍टाचार मिटाने की अपनी योजना पर आगे बढ़े हैं.” राजनैतिक दलों को दिए जा रहे धन की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी नहीं है.चुनाव लड़ने में बेपनाह खर्च किया जाता है,खुद प्रधानमंत्री इस नोटबंदी के दौर में भी करोड़ों की रैलियां कर रहे हैं. मोदी सरकार ने अपने इस तथाकथित “शुद्धि यज्ञ” के दायरे से सियासी दलों को भी बाहर रखा हुआ है.उन्हें चंदा देने वालों की जानकारी सावर्जनिक नहीं करने की छूट दी हुई है. भारतीय राजनीति में ज्यादातर कालाधन इसी छूट की वजह से आता है. इंडिया टुडे के अनुसार 2005 से 2013 के बीच देश के पांच प्रमुख सियासी दलों को मिले कुल 5000 करोड़ रूपये चंदे का 73 फीसिदी हिस्सा अज्ञात स्रोतों से आया था. अगर मोदी सरकार की मंशा साफ होती तो वह सियासी दलों को मिले इस छूट वाली इनकम टैक्स की धारा को भी बदल सकती थी.
तो क्या नोटबंदी एक लक्ष्यहीन सनसनीखेज कवायद है जिसकी वजह से आम जनता परेशान हुई और अर्थवयवस्था हिल गयी? धरातल पर तो यही नजर आ रहा है. नोटबंदी की वजह से केवल आम आदमी ही परेशान नहीं नजर हुआ, उद्द्योग जगत भी इससे हलकान है और बाजार बेनूर हैं. इसका असर खरीददारी, उत्पादन और नौकरी तीनों पर पड़ा है. सर्राफा कारोबार,ऑटोमोबाइल,रिटेल कारोबार, इलेक्ट्रॉनिक्स के बड़े उद्योगों, प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन आदि पर खासा असर देखने को मिल रहा है. कई कंपनियों द्वारा घटती मांग के चलते उत्पादन में कटौती और कुछ दिनों के लिए प्लांट बंद किये जाने की भी ख़बरें आई हैं.  

नोटबंदी का सबसे ज्यादा असर असंगठित क्षेत्र में देखने को मिल रहा है जिसका देश की अर्थव्यवस्था में 45 प्रतिशत योगदान है और 80 प्रतिशत रोजगार भी इसी क्षेत्र में है. नगदी ना होने की वजह से यहाँ बड़ी संख्या में मजदूरों को या तो निकाला जा रहा है या अवकाश पर भेज दिया गया है. पीएचडी चैंबर द्वारा दिसंबर में किए गए हालिया सर्वेक्षण के अनुसार 73 फीसदी कारोबारियों  ने माना है कि नोटबंदी की वजह से वे संविदा कर्मियों को दैनिक मजदूरी का भुगतान तक नहीं कर पा रहे हैं. ऑल इंडिया मैन्युफैक्चरर्स ऑर्गनाइजेशन ( एआईएमओ) के अनुसार नोटबंदी के चलते  सभी उद्योग प्रभावित हुए हैं लेकिन इसका सबसे ज्यादा प्रभाव सूक्ष्म-लघु स्तर के उद्योगों जहाँ राजस्व 50 फीसदी की गिरावट और 35 फीसदी नौकरियां चली गईं हैं. खबरें आ रही हैं कि फिरोजाबाद की 90 प्रतिशत चूड़ी फैक्ट्रियां बंद हो चुकी है इसी तरह से टेक्सटाइल सेक्टर में लगभग सत्तर लाख दिहाड़ी मजदूर काम करते है जिसमें से बड़ी संख्या में मजदूर प्रभावित हुए हैं. इन सबका सीधा असर यह हुआ  है कि बड़ी संख्या में दैनिक मजदूर  मजदूर लोग शहर से भाग कर गांव लौटने को मजबूर हुए हैं. देशभर में महात्मा गाँधी रोजगार गारंटी योजना के तहत काम मांगने वालों की संख्या में जोरदार बढ़ोतरी भी इस बात की तस्दीक करते हैं .

इस स्थिति से उद्योग जगत में भी निराशा छाई हुई है सोसायटी ऑफ इंडियन आटोमोबाइल मैन्यूफेक्चरर के आकड़ों के अनुसार इस सेक्टर में 18.7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई है और स्थिति सोलह साल पहले जैसी ही रही है. एचडीएफसी के चेयरमैन दीपक पारेख कह रहे हैं कि “नोटबंदी के फैसले से देश की अर्थव्यवस्था पूरी तरह पटरी से उतर गई है. एसोचैम के अध्यक्ष सुनील कनोरिया नोटबंदी को लागू करने के तरीके पर अफसोस जता रहे हैं, उनके मुताबिक इसकी गंभीरता और चुनौतियों का ठीक से आकलन नहीं किया जा सका और इसकी वजह से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) प्रभावित होगी. फोर्ब्स ने मोदी सरकार के नोटबंदी के कदम को देश की इकोनॉमी को तगड़ा झटका देने वाला बताया है.

एक लोकतान्त्रिक सरकार द्वारा बिना किसी पर्याप्त तैयारी के इस तरह से व्यापक रूप से जनता और देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला फैसला लेना दुर्भाग्यपूर्ण है. तथाकथित ईमानदारी का यह आन्दोलन में अभी तक सौ से ज्यादा भारतीयों के जीवन की आहुति ले चूका है. मोदी सरकार के लिए नोटबंदी के नाकामियों से पीछा छुड़ाना आसान नहीं है.उन्हें राजनीतिक और आर्थिक दोनों मोर्चो पर सरकार को जवाब देना पड़ेगा. 2017 चुनाव का साल है जहाँ सात राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगें. इस बीच चुनाव आयोग पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की तारीखें घोषित कर चूका है जिसमें  उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे महत्वपूर्ण राज्य शामिल हैं. यह तय है कि इन चुनावों के केंद्र में नोटबंदी और इससे होने वाला नफा-नुक्सान जैसी बातें ही रहने वाली हैं. सबसे ज्यादा परेशान जनता हुई हैं अब उसके पास तय करने का मौका है कि यह शुद्धि यज्ञ है या मनोज तिवारी के शब्दों में भोली-भाली जनता को देशभक्ति के नाम पर बड़ी आसानी से फुसलाया गया है.  




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