छात्र - कब तक गैर-राजनीतिक रहेंगे?

                        

    घर से सीधे स्कूल- कॉलेज जाओ, वहां से सीधे घर आओ। अपने कैरियर पर ध्यान दो। राजनीति के चक्कर मे मत पडो । राजनीति तो गुण्डों का काम है। ऐसे जाने कितने जुमले हर रोज सुनने को मिलते है। आज समाज के एक बडे हिस्से में राजनीति की यही तस्वीर है और आम छात्र में भी राजनीति की यही समझ है।




 इस प्रकार के विचार तब और मजबूत होते है जब उज्जैन में संघ परिवार से जुडे छात्र् संगठन विधार्थी परिषद द्वारा प्रो. सब्बरवाल की हत्या की जाती है और मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार अपराधी छात्रों  को बचाने के लिए जी जान लगा देती है तथा हत्याकांड को हादसा बताने का प्रयास करती  है। 


 छात्र  राजनीति के अपराधीकरण की यह कोई नई घटना नहीं थी । इस प्रकार की घटनाओं का सिलसिला काफी लम्बा और पुराना है। जब पूरी भारतीय राजनीति में पैसे और बाहूबल का बोलबाला हो तब  छात्र राजनीति उससे कैसे अछूती रह सकती है, तब क्या पूरे भारत में चुनावी प्रक्रिया को बन्द कर दिया जाए। जिस प्रकार भारत के अधिकांश विश्वविधालयों और कालेजों में छात्र संघ चुनावो  पर प्रतिबन्ध लगाया गया है। यदि इसी सोच पर चला जाए तब हमें अपने सारेलोकतान्त्रिक अधिकारों को छोडना पडेगा जो कि लम्बे संघर्ष के बाद हमने हासिल किए हैं। मसला अपने अधिकारों को छोडने का नहीं है बल्कि लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं को ओर व्यापक करने का है तथा उसमें सभी की भागेदारी सुनिश्चत करने का है।   


हम एक और घटना का जिक्र करना चाहेंगे। कुछ साल पहले अपने प्रगतिशील चरित्र् के लिए पहचाने जाने वाले जवाहर लाल नेहरु विश्वविधालय में छात्रों ने वहाँ पर काम करने वाले निर्माण मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी तथा अन्य सुविधाएं दिए जाने की मांग को लेकर आंदोलन शुरु किया तब विश्वविधालय प्रशासन ने कहा कि यह छात्रों का मुद्दा नहीं है और छात्रों  को इससे दूर रहना चाहिऐ लेकिन छात्रों ने प्रशासन की बात नहीं मानी और मजदूरों की मांगों के लिए अपना अंदोलन जारी रखा तो प्रशासन ने बतौर सजा 8 छात्रों को विश्वविधालय से निकाल दिया।


एक तरफ तो विधालयों को देश के भावी नागरिकों के निर्माण की पाठशाला कहा जायेगा वही दूसरी ओर आप यह भी सिखायेंगे कि केवल अपने बारे में सोचो, अपने आस-पास की हकीकत से आँखे बन्द किए रहो। तब आप ही बताईये कि कैसे छात्र  बेहतर नागरिक बनेंगे ? जो अपने आस-पास हो रहे शोषण ओर अन्याय से कोई सरोकार नहीं रखते वे आपकी भाषा में ‘‘समझदार’’ तो हो सकते है लेकिन एक बेहतर नागरिक कभी नहीं हो सकते।


हमारे समय में गैर-राजनीतिक होना बहुत अच्छी बात मानी जाती है लेकिन हम अपने जीवन में क्या पढेंगे, क्या खायेंगे-क्या पहनेंगे, किस प्रकार का रोजगार पायेंगे आदि बाते राजनीति से तय होती है। मसलन कालेजों में लड़कीयों के जीन्स पहनने पर फरमान जारी किए जायेंगे, युवाओं द्वारा प्यार करने तथा दूसरे धर्म या जाति में जीवन साथी चुनने पर धार्मिक उन्माद फैलाया जायेगा, जाति पंचायत बुलाकर सजा सुनाई जायेगी। यह उन लोगो और संगठनों की राजनीति है जो महिलाओं कीस्वंत्रता को नियंत्रित करना चाहते है, धार्मिक जकडन तथा ऊँच-नीच पर टिकी जाति व्यवस्था को बनाये रखना चाहते हैं। इस प्रकार वे प्रत्येक युवा को भारतीय संविधान में मिले निजी स्वतन्त्र्ता व सम्मान के अधिकार पर हमला करते हैं। छात्र  गैर-राजनीतिक बने रहेंगे? आखिर उनका इन सब बातों से क्या लेना-देना?


बीते दो दशकों में नीजिकरण व व्यवसायीकरण को सरकार द्वारा हर समस्या के समाधान के मूलमंत्र की तरह पेश किया जा रहा है। षिक्षा के क्षेत्र में भी बाजार का बोलबाला है। निजी शिक्षण संस्थाओं ( Management, IT इत्यादि) की बाढ़ आयी हुई है। यदि आपके पास पैसा है तो आपको हर प्रकार की शिक्षा की डिग्रीयां उपलब्ध हो सकती है और कहीं नही तो BPO ( कॉल सेन्टर) में नौकरी मिल जायेगी, हो सकता है बहोत सारों को वहां भी नौकरी ना मिले। इन कॉल सेन्टर में कोई कर्मचारी अधिकार नही है। इनमें काम करने वाली पीढ़ी मानसिक अवसादों से गुजर रही है, जिन्हें लेकर अधिकांश छात्र रोजगार के बाजार में बेरोजगार घूम सकते हैं।


वैसे तो हमारे देश में सब के लिए एक समान शिक्षा कभी भी हासिल नही थी! सरकारी और प्रायवेट स्कूल की दोहरी शिक्षा प्रणाली पहले से ही मौजूद थी। अब तो शिक्षा को घोषित रुप से मुनाफे का धंधा मान लिया गया है। यह पैसे वालों की राजनीति है जिनके लिए हर चीज व्यवसाय है, शिक्षा भी। उघोगपतियों की ओर से सरकार को सौपी गई बिरला-अम्बानी रिपोर्ट इसका नायाब उदाहरण है। सरकार इनको मुफत में जमीन उपलब्ध कराती है, सुविधाऐं देती है और ये लोगों की जेबों से लाखों की उगाही करती है।


म.प्र. में सरकारी विश्वविध्यालयो से संबंधित प्रायवेट कॉलेज तो पहले से ही चल रहे हैं। अब सरकार ने म.प्र. के देवास शहर में प्रदेश का पहला प्रायवेट विष्वविधालय खोलने की इजाजत दी है। यह तो अभी शुरुवात है। आगे-आगे देखिए होता है क्या ? अगर आपके घर में इनकी फीस जमा कराने के लिए पैसे नही हैं तो बैंकों से कर्ज लेने की व्यवस्था भी कर दी गई है। यानि कि शिक्षा के इन दुकानदारों के मुनाफे में कोई कमी नही की गई है। क्या शिक्षा अमीरों के लिए पैसे कमाने का व्यवसाय बनी रहेगी या यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वो सबको निःषुल्क एक समान एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध करायें । हम जो भी सामान खरीदते है उस पर कर चुकाते हैं, उसी पैसे से सरकार चलती है। हमारा ही पैसा सरकार हम पर खर्च नही करना चाहती! लेकिन हमारा ही पैसा सरकार इन उद्योगपतियों को छूट देने पर खर्च करती है क्यों ? अगर छात्र ये सवाल खड़ा करने लगे तो यह राजनीति हो जायेगी। यदि सही सवाल खड़ा करना राजनीति है तो यह राजनीति की जानी चाहिए। 


वर्तमान में, म .प्र. में छात्र  राजनीति का माहौल अधंकारमय है। कभी-कभी छात्रों की अपनी किसी स्थानीय मांग के लिए छोटी-छोटी आवाज उठती है लेकिन कोई संगठित प्रतिरोध दिखाई नही देता है। छात्र राजनीति के नाम पर भाजपा-कांग्रेस से जुड़े AVBP-NSUI  जैसे व्यवस्था पोषक छात्र संगठन ही दिखायी पड़ते है। इन्ही छात्र संगठनों ने ही छात्र राजनीति को पैसे और गुण्ड़ों का पर्याय बना दिया है ताकि आम छात्र राजनीति से दूर रहे और जिससे सही सवाल खड़े ना हो सके। आम छात्रों का गैरराजनीतिक बने रहना ही इनकी ताकत है। जब छात्र अपने अधिकारों के प्रति जागरुक होगें और सक्रिय हस्तक्षेप करेगे तब छात्र राजनीति पैसे और गुण्ड़ों का नही सामाजिक परिर्वतन का पर्याय बनेगी। 


युवाओं - छात्रों  ने हमेशा समाज परिर्वतन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। चाहे वो आजादी का आदोंलन हो या आजादी के बाद 70 केदशक में नक्सलबाड़ी और जे.पी. का आदोंलन हो। शहीद भगतसिह ने जब आजादी के आदोलन में कदम रखा तब वो भी एक कॉलेज के छात्र ही थे। उन्होनें आजादी के आदोंलन में एक नये विचार, एक नये विकल्प और राजनीति को स्थापित किया। छात्रों को ज्ञान के अवसर उपलब्ध होते हैं। उनमें नये विचारों को पैदा करने और ग्रहण करने की क्षमता होती है। जो समाज को नई दिषा दे सकती है। आपको अपनी भूमिका तय करनी है।




प्रदीप सिंह

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