फासीवाद का मर्ज

अपूर्वानंद

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 क्या फासिस्ट का हृदय परिवर्तन नहीं हो सकता? क्या उसे इसका मौका नहीं दिया जाना चाहिए? पिछले कुछ दिनों से ये सवाल अंगरेजी के कुछ बौद्धिक अलग-अलग तरीकों से पूछ रहे हैं। बल्कि कहना चाहिए, 2002 के बाद से ही उस व्यक्ति को, जिसे 2002 के दस साल पहले प्रख्यात सामाजिक मनोवैज्ञानिक आशीष नंदी ने खांटी फासिस्टकहा था, बार-बार सलाह दी जा रही है कि 2002 की प्रेत-बाधा से वे मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं, अगर सिर्फ एक बार सच्चे दिल से माफी मांग लें। क्या यह ताज्जुब की बात है कि यह सलाह या प्रार्थना अब तक मानी नहीं गई है? सबसे ताजा बातचीत में भी, जो फासिस्ट के मानवीकरण की एक और कोशिश थी, माफी मांगने से इनकार किया गया। कहा गया कि अपराध सिद्ध हो तो बीच चौराहे पर फांसी पर लटका दो, पर माफी की बात न करो।

माफी पर कभी और बात की जाएगी। माफी हवा में तो नहीं मांगी जाती। कौन माफी मांग सकता है? उसके पहले यह सवाल किया जाना जरूरी है: माफी किससे? माफी मांगने के पहले माफ करने वाले का होना और उसका इसके लिए तैयार होना जरूरी है। क्या माफ करने वाला माफी मांगने वाले की बराबर की हैसियत का है? या माफ करना उसकी मजबूरी है? माफी सच्चे दिल से मांगी जा रही है, इसका प्रमाण यह है कि वह निष्प्रयोजन हो। अगर वह सजा से बचने या किसी लाभ के लिए है या सौदा है, यानी माफी के बदले कुछ तुरत मिलने की उम्मीद है, तो वह धोखा है। यह प्रकरण इतना सरल नहीं।

पर सबसे दिलचस्प है कि इस पूरे प्रसंग में माफी में दिलचस्पी अपराधीसे ज्यादा दूसरों की है। वे जो उससे या उसके बल पर धंधाकरने को व्यग्र हैं। यह व्यग्रता अब इतनी बढ़ गई है कि वे माफी को भी गैर-जरूरी कह रहे हैं। वे माफी की बात करने वाले नरमपंथी धर्मनिरपेक्षतावादियों को जिद्दी और अयथार्थवादी कह रहे हैं। उनका कहना है कि राष्ट्रहित के समक्ष इस तरह के भावुकतापूर्ण दुराग्रह की कोई जगह नहीं। देश का एक ही धर्म है, आर्थिक वृद्धि और उसके लिए एक दृढ़निश्चयी नायक अनिवार्य है।

परेशानी लेकिन फासिस्ट शब्द से है। कहा जा रहा है कि इस शब्द का प्रयोग नए नायक के लिए न किया जाए। इस शब्द से परेशानी इसे लेकर अंतरराष्ट्रीय दुविधा से है। संसार में अगर किसी एक चिह्न का प्रयोग असभ्य माना जाता है तो वह स्वस्तिक का है। इसलिए अंगरेजी दुनिया के हमारे बौद्धिक मित्र दरअसल उस भाषा के जरिए हमसे ज्यादा बाहरी विश्व को बताना चाहते हैं कि यह नायक फासिस्ट नहीं है और कुछ पुराणपंथी, जो इतिहास में कहीं अटक गए हैं, इस शब्द का असंगत प्रयोग कर रहे हैं। यह यूरोपीय इतिहास के एक खास दौर की परिघटना है, न तो पूंजीवाद उस दौर में है और न भारतीय लोकतंत्र। संजय श्रीवास्तव ने ठीक कहा है कि इस तर्क से लोकतंत्र जैसा सार्वभौम शब्द भी भारतीय संदर्भ में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह भी ठेठ यूरोपीय इतिहास की उपज है।

आशीष नंदी ने कहा कि फासिस्ट शब्द का इस्तेमाल गाली की तरह नहीं, बल्कि एक विशेष प्रकार के व्यक्तित्व की पहचान करते हुए उसमें कतिपय लक्षणों के पाए जाने पर चिकित्सकीय, निदानात्मक अर्थ में किया जाना चाहिए। उसमें विचारधारात्मक झुकाव की ही नहीं, उस झुकाव को संदर्भ प्रदान करने वाले उसके अपने व्यक्तित्व की विशेषताओं और उसे अपने निर्णय लेने के लिए प्रेरित करने वाले तत्त्वों की योजना की पहचान शामिल है। आशीष आगे कहते हैं कि पूरी दुनिया में मनोवैज्ञानिकों ने ऐसे व्यक्तित्वों पर जो शोध किया है, उसमें पाया गया है कि इनमें पवित्रतावादी संकीर्णता, भावनात्मक संकुचन, अपने ही आवेगों से इनकार, भय और हिंसा की फैंटेसी का अजीब मिश्रण होता है। यह दरअसल, एक असुरक्षित व्यक्तित्व है और उसकी भरपाई अपने अहं के जबर्दस्त प्रक्षेपण से की जाती है।

जब कोई व्यक्ति कहे कि उसकी जिंदगी काम के अलावा और कुछ नहीं। वह अकेला है और उसे कोई आत्मीयता दूषित नहीं कर सकती। वह राष्ट्र, धर्म या विचारधारा के प्रति पूर्णत: समर्पित है। उसे कोई सांसारिक आकर्षण अपने पथ से विचलित नहीं कर सकता, तो मानना चाहिए कि वह चिकित्सीय या निदानात्मक अर्थ में फासिस्ट है।
मसला इसलिए सिर्फ विचारधारा का नहीं है, जैसा कुछ लोग समझते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी उस विचारधारा के बावजूद आशीष की निदानात्मक कोटियों में सच्चे फासिस्ट की कसौटी पर खरे नहीं उतरते और न सुषमा स्वराज ही फासिस्ट की सारी शर्तों को पूरा करती हैं। आशीष अपने साक्षात्कार से अगर पूरी तरह सदमे में बाहर आए तो इसलिए कि उनका ज्ञान और विद्या यह बता रही थी कि अभी-अभी उन्होंने एक खालिस फासिस्ट का सामना किया है। तब वह व्यक्ति एक साधारण संघ प्रचारक था। उन्होंने विचलित अवस्था में अच्युत याज्ञिक को कहा कि वे एक भावी हत्यारे, यहां तक कि भावी जनसंहारक से मिल कर आए हैं।

थियोडोर अडोर्नो और उनके साथियों ने यूरोप में फासीवादी अनुभव को समझने के लिए अधिनायकवादी व्यक्तित्व की बनावट पर शोध किया। उसके साथ उन्होंने एक मैनिप्यूलेटिवव्यक्तित्व की एक दूसरी कोटि भी प्रस्तावित की। वह अतीव यथार्थवादी होता है, अतिसक्रियता को महत्त्व देता और वस्तुओं के आकर्षण से ग्रस्त रहता है। उसे टेक्नोलॉजी अपनी ओर खींचती है।

अधिनायकवादी और मैनिप्यूलेटिव व्यक्तित्व मिल कर फासिस्ट व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। एरिक फ्रॉम जैसे मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि इनमें प्रेम की क्षमता का अभाव होता है और उसकी भरपाई वे उस प्रेम का अमूर्त सत्ता में निवेश करते हैं। प्रेम के जरिए संबंधों या नए जीवन का सृजन करने की जगह वह टेक्नोलॉजी के जरिए अधिकाधिक वस्तुओं के उत्पादन का नारा देता और लोगों को कुशलता तथा निपुणता के नारे के बल पर अपनी ओर खींचने की कोशिश करता है। इसे लेकर बहस है कि क्या ऐसे व्यक्तित्व प्रेम के वास्तविक अनुभव से बचपन में वंचित रह जाने के कारण बनते हैं? प्रेम की कमी या उसकी असमर्थता क्या उस व्यक्ति में है या उसके सामाजिक स्रोत में?

चूंकि फासिस्ट व्यक्तित्व प्रेम या कोमलता की भावना से वंचित या उसके लिए नितांत असमर्थ होते हैं, उनके इर्द-गिर्द एक प्रगीतात्मक, मोहक वातावरण बनाने का प्रचारात्मक कार्य करना पड़ता है। इसीलिए फासिज्म के बारे में यह भी कहा गया है कि वह बाहरी तौर पर प्रेमिलहोता है। हाथ पर कबूतर बैठा कर उसे उड़ाना, पतंग उड़ाना या उसके बचपन को लेकर मिथकों का निर्माण आवश्यक होता है। वह या तो वायलिन बजाता है या कविता लिखता है। लेकिन यह सब कुछ कलात्मकता से बिल्कुल खाली होता है और लोगों को यह भरोसा दिलाने के लिए होता है कि यह व्यक्ति मानवीय संवेदनशीलता से युक्त है।

फासिस्ट व्यक्तित्व को इसलिए भारी प्रचारतंत्र के सहारे जनमानस में प्रतिष्ठित किया और स्वीकार्य बनाया जाता है। वह किले की तरह अभेद्य दीखना चाहता है। उसका हंसना, उसे आंसू आना, सब सार्वजनिक और राष्ट्रीय घटनाएं होती हैं, प्राय: अपवाद, जो उसे उसके अनुयायियों के करीब लाती हैं और इनके लिए उसकी जनता कृतज्ञ और धन्य महसूस करती है। अतिरेक उसके स्वभाव को परिभाषित करता है। वह चारों ओर से आईनों से घिरा हुआ ही जी सकता है।

ऐसे व्यक्तित्व हमारे आसपास होते हैं और अक्सर अत्यंत मामूली मालूम पड़ते हैं। एक बार ताकत के हाथ लग जाने पर या सत्ता के करीब आ जाने पर उनकी घातक प्रवृत्ति उजागर होती है। अपनी कठोरता और शुष्कता के कारण वे लोगों को अपनी ओर खींचते हैं और फिर उनकी पूरी वफादारी लेकर उनके जीवन पर अधिकार कर लेते हैं। एक बार ऐसे लोगों के हाथ खुद को सौंप देने के बाद उनसे मुक्ति असंभव हो जाती है। फिर वे उसके अनुरूप ढलने की प्रतियोगिता में लग जाते हैं। आशीष नंदी ने कोई बीस साल पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक साधारण प्रचारक में इन सभी लक्षणों को देखा था और डर गए थे। 2002 में उनकी आशंका सच निकली। अत्यंत व्यथित स्वर में उन्होंने कहा था कि वह व्यक्ति एक राज्य का मुख्यमंत्री हो सकता है, यह देख कर अपनी राजनीति के स्वास्थ्य को लेकर चिंता होती है।

अब वह संघ-प्रचारक प्रधानमंत्री बनने की कगार पर है। हमें कहा जा रहा है कि न डरो, न उसके अतीत को लेकर औरों को उसे अपनाने से रोको। क्या न डरना बुद्धिमत्तापूर्ण विकल्प है?
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साभार – जनसत्ता 20 अप्रैल, 2014

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