"पाश" की एक कविता :- अपनी असुरक्षा से



यदि देश की सुरक्षा यही होती है
कि बिना जमीर होना ज़िन्दगी के लिए शर्त बन जाए
आँख की पुतली में हाँ के सिवाय कोई भी शब्द
अश्लील हो
और मन बदकार पलों के सामने दण्डवत झुका रहे
तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है ।
हम तो देश को समझे थे घर-जैसी पवित्र चीज़
जिसमें उमस नहीं होती
आदमी बरसते मेंह की गूँज की तरह गलियों में बहता है
गेहूँ की बालियों की तरह खेतों में झूमता है
और आसमान की विशालता को अर्थ देता है
हम तो देश को समझे थे आलिंगन-जैसे एक एहसास का नाम
हम तो देश को समझते थे काम-जैसा कोई नशा
हम तो देश को समझते थे कुरबानी-सी वफ़ा
लेकिन गर देश
आत्मा की बेगार का कोई कारख़ाना है
गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है
तो हमें उससे ख़तरा है
गर देश का अमन ऐसा होता है
कि कर्ज़ के पहाड़ों से फिसलते पत्थरों की तरह
टूटता रहे अस्तित्व हमारा
और तनख़्वाहों के मुँह पर थूकती रहे
क़ीमतों की बेशर्म हँसी
कि अपने रक्त में नहाना ही तीर्थ का पुण्य हो
तो हमें अमन से ख़तरा है

गर देश की सुरक्षा को कुचल कर अमन को रंग चढ़ेगा
कि वीरता बस सरहदों पर मर कर परवान चढ़ेगी
कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा
अक़्ल, हुक्म के कुएँ पर रहट की तरह ही धरती सींचेगी
तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है ।
(चमन लाल द्वारा हिंदी अनुवाद )

अवतार सिंह संधू "पाश" 
(September 9, 1950 – March 23, 1988)



Lines to Our Own Insecurity
If there be the terms for the security of a nation
the precondition of life is to have no conscience
any word other than ‘Yes’  be obscene to naked eye
the mind should bow to reverence to unjust moments
Then the security of the nation is a direct threat to us
We had thought of nation as a pious home
where there is no place for gloom
A person is free to flow in the streets like rain and thunder
and give meaning to immensity of the sky
We had thought of the nation as a fond embrace
We had thought of the nation as joyous as work
We had thought of the nation as loyal as sacrifice
But  if the nation becomes a workshop
to strip us of our souls
if it becomes a laboratory to turn us into fools
Then we are threatened indeed
If the peace of the nation be such
that our identity be broken like
stones rolling down a borrowed mountain
The forever rising prices mock brazenly at our wages
Bathing in our own blood be our pilgrimage
Then we are threatened by this peace
If the security of the nation demands
that every protest be extinguished in the name of peace
Courage means only dying at the border
Art should blossom only at the despot’s window
Intellect should be put to use only by order
And labour will only be a sweeper outside the citadel
Then the security of the  nation is direct threat to us
 Paash ( Translated by Nirupma Dutt )

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