बाल सुरक्षा की चुनौतियां


उपासना बेहार


देश में बच्चों की सुरक्षा एक बहुत गंभीर मसला बन कर उभर रहा है। कमजोर, लाचार और वंचित बच्चों को शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का सामना आये दिन करना पड़ रहा है। आज बच्चे कही भी सुरक्षित नही हैं। पहले माना जाता था कि बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित जगह उनका घर होता है लेकिन अनेक अध्ययनों से निकल कर आया है कि घर भी बच्चों के सुरक्षा की गांरटी नही दे सकता है और यह बात खासकर बलात्कार, छेड़छाड़ इत्यादि यौन उल्पीड़न के केस में ज्यादा दिखायी देती है। सरकार के आंकड़े बताते हैं कि बच्चियों के साथ इस तरह की घटना में ज्यादातर उनके परिवार के सदस्य, रिश्तेदार, जान पहचान के लोग ही शामिल होते हैं। इन घटनाओं में कुछ तो दर्ज हो पाते हैं परन्तुं बहुत सारी घटनाऐं परिवार के मसले होने, लोकलाज और समाज के कारण सामने नही आ पाते हैं। पीडि़त बच्चे को चुप करा दिया जाता है। इन घटनाओं का असर इन बच्चों के मानस पर जिंदगी भर के लिए बैठ जाता है।

भारत के संविधान के अनेक अनुच्छेदों में बच्चों की बात की है जैसे अनुच्छेद 15 सरकार को बच्चों की सुरक्षा, देखभाल और विकास इत्यादि के लिए कोई भी कानून बनाने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 21 में शिक्षा का अधिकार, अनुच्छेद 24 में खतरनाक काम से रोक, अनुच्छेद 39 में किसी भी काम को जबरदस्ती करने से रोक और हर बच्चे को स्वस्थ तथा अनुकूल वातावरण देने की बात की है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी “बच्चों के अधिकार” की घोषणा पत्र में बच्चों को जीवन का, विकास का, संरक्षण का और सहभागिता का अधिकार दिया है। इस घोषणा पत्र में भारत ने भी हस्ताक्षर कर इन अधिकारों को अपने देश के बच्चों को देने का दृढ़ संकल्प लिया है। लेकिन आज बच्चों के इन अधिकारों का उल्लंधन हो रहा है।

नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो 2014 के आकड़ें देश में बच्चों के प्रति हो रहे हिंसा की भयानक तस्वीर पेश करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार 2014 में बच्चों के साथ हिंसा की कुल 89423 घटनायें हुई, जिसमें सबसे ज्यादा हिंसा की घटना मध्यप्रदेश में 15085 हुई है। देश में कुल बच्चों के अपहरण के 37854 और बलात्कार के 13766 मामले दर्ज हुए हैं। वही प्रदेश में बच्चियों के साथ बलात्कार के कुल 2352 केस दर्ज हुए हैं। ये तो वे संख्याऐं हैं जो दर्ज की गई हैं। दूरदराज और आदिवासी क्षेत्रों से तो शिकायत थाने तक पहुँच ही नही पाती है। इसी प्रकार प्रदेश में वर्ष 2007 से 2014 के बीच 66462 बच्चे गुम हुए थे जिसमें से 39225 लड़कियां थी।

बाल अधिकार में जीवन और विकास का अधिकार भी शामिल है, लेकिन यह अधिकार बच्चों से लगातार छिना जा रहा है। देश में भ्रुण हत्याऐं हो रही है जिसमें कन्या भ्रूण हत्या की संख्या ज्यादा है। एन.सी.आर.बी.2014 के अनुसार मध्यप्रदेश में भ्रुण हत्या के 30 केस दर्ज हुए हैं जो कि देश में हुई कुल भ्रुण हत्या का लगभग 30 प्रतिशत है वही कन्या भ्रुण में प्रदेश शीर्ष पर (127 केस दर्ज) है। देश में शिशुहत्या के कुल 121 केस हुए हैं जिसमें सबसे ज्यादा राजस्थान 33 और दूसरे नंबर पर म.प्र. 14 है। लडकियों की संख्या लगातार कम हो रही है, जहाँ वर्ष 2001 में छह वर्ष तक की उम्र के बच्चों में प्रति एक हजार बालक पर बालिकाओं की संख्या 927 थी तो वही 2011 में यह अनुपात कम हो कर 914 हो गया है, मध्यप्रदेश में यह अनुपात 2001 से 2011 के दौरान 14 अंकों की गिरावट के साथ 918 है। प्रदेश में सबसे कम लिंगानुपात जिला रीवा में 883 हो गया है। ग्वालियर और चंबल डिविजन का भी लगभग यही हाल है।

देश में बड़े पैमाने पर हो रहे बाल विवाह भी बच्चों के पूर्ण विकास को रोकती है। बाल विवाह के कारण बच्चों का स्वास्थ्य, शिक्षा और सम्पूर्ण जीवन पर प्रतिकुल प्रभाव पड़ता है, यह एक सामाजिक कुरुति है। यूनिसेफ द्वारा एंडिग चाइल्ड मैरिजः प्रोग्रेस एंड प्रास्पेक्ट्सशीर्षक से बाल-विवाह से संबंधित एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व की कुल बालिका बधु की एक तिहाई बालिका बधु भारत में पाई जाती है। प्रदेश में लड़कियों के बाल विवाह की दर बढ़ रही है जिसमें सबसे ज्यादा झाबुआ,शाजापुर और राजगढ़ है। शिक्षा बच्चों का मूलभूत अधिकार है लेकिन आज भी देश के हजारों बच्चे स्कूल नही जा पाते हैं और बाल श्रम करने को मजबूर हैं। देश में 5 साल से 14 साल के कुल बच्चों में से 1.01 करोड़ बच्चे श्रम करते हैं जिसमें प्रदेश के 7 लाख बच्चे भी शामिल है।

बच्चे अपने जीवन में इनके अलावा ओर भी समस्याओं का सामना करते है जैसे विस्थापन, पलायन, बाल तस्करी, घरेलू काम, पोर्नग्राफी, भिक्षावृति, बंधुआ मजदूरी, अपराध में संलिप्तता,युद्ध,दंगे। इन सभी समस्याओं को देखते हुए उनके प्रति विशेष ध्यान देने की जरुरत है। इसी के चलते देश में बच्चों को सुरक्षा, संरक्षण और उनके सम्पूर्ण विकास के लिए कई कानून /नीतियां बनायी गये हैं जैसे किशोर न्याय (बालकों की देखभाल एवं संरक्षण) अधिनियम, 2015, बच्चों की सुरक्षा के लिए यौन अपराध अधिनियम 2012, बाल श्रम (निषेध एवं नियमन), बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006, पूर्व गर्भाधान और प्रसव पूर्व निदान तकनीक अधिनियम 2002, अनैतिक मानव व्यापार (रोकथाम) अधिनियम 1986, एकीकृत बाल विकास योजना, राष्ट्रीय प्रारंभिक बाल्यावस्था देखरेख एवं शिक्षा नीति 2013 आदि प्रमुख है। इसके अलावा बच्चों के हक में कई अन्तराष्ट्रीय समझौते जैसे वैकल्पिक प्रोटोकाल बच्चों की बिक्री,बाल वेश्यावृति और बच्चों की पोर्नोग्राफी 2000” और वैकल्पिक प्रोटोकाल हथियारबंद संघर्ष में बच्चों की भागीदारी 2000”, महिलाओं और बच्चों के तस्करी पर रोकथाम के लिएहुई संधि किये गए है,बाल अधिकारों के रक्षा के लिए राष्ट्रीय और राज्य बाल संरक्षण आयोग बनाये गये हैं।


सरकार के इतने प्रयास के बाद भी बच्चों के साथ अपराध और हिंसा के मामले कम होने के बदले साल दर साल बढ़ते जा रहे हैं। बच्चों को बाहर के साथ साथ घर में भी संरक्षण नही मिल रहा है और इसका सबसे बड़ा कारण समाज में बच्चों के सुरक्षा और संरक्षण को लेकर जागरुकता की कमी है। बच्चे वोट बैक नही होते हैं इस कारण इन कानून को लागू करने में भी सरकार और राजनीति इच्छा शक्ति की कमी है। बाल संरक्षण आयोग तो सरकार ने बनाये हैं लेकिन उन्हें दंतहीन बना दिया गया है। इन आयोगों को ओर अधिकार देने की जरुरत है। बच्चों के सुरक्षा पर काम करने के लिए पालिसी एड़वोकेसी, जानकारी, तकनीकी ज्ञान की भी आवश्यकता है। 

इसी कड़ी में सरकार और यूनीसेफ द्वारा एक अच्छी शुरुवात करते हुए बाल सुरक्षा और उससे संबधित विषय को लेकर मध्यप्रदेश में एक रिर्सोस पुल बनाया जा रहा है जिसमें बाल अधिकारों पर कार्यरत् संस्थानों, एकेडमिशियन, मीडि़याकर्मी तथा प्रशासन के लोगों को शामिल किया गया है जो कि प्रशिक्षण के बाद अपने अपने क्षेत्र में इस मुद्दे को मजबूती देने का काम करेगें। हमने अपने संविधान में बच्चों के सुरक्षा, संरक्षण,देखभाल,विकास को लेकर बहुत सारे वादे किये हैं उसे पूरा करना सरकार और समाज की जिम्मेदारी है। बच्चों के अधिकारों को देने की पहल हम बड़ों को ही करनी होगी।

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