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Sunday, April 24, 2016

अब जरूरत “इंडियन पानी लीग” की है

April 24, 2016 0
अब जरूरत “इंडियन पानी लीग” की है

जावेद अनीस


मानव सभ्यता का विकास पानी के बिना असंभव था, विश्व की सभी प्रमुख सभ्यतायें नदियों और समुद्र तटों पर ही परवान चढ़ी हैं. चाहे महान नील नदी के किनारे प्राचीन मिस्र की सभ्यता  हो या टिगरिस और सिंधु नदी घाटी की मेसोपोटामिया और मोहनजोदड़ो व हड़प्पा की सभ्यतायें. इन सबके बावजूद हम पानी और इसके स्रोतों के महत्व को समझने में नाकाम रहे हैं. हमने अपनी पृथ्वी को “नीले ग्रह” का नाम दिया हुआ हैं क्योंकि इसके दो तिहाई भाग में केवल पानी ही है लेकिन इस पानी का मात्र 2.7 प्रतिशत हिस्सा ही उपयोग के लायक है बाकी 97.3 प्रतिशत लवणयुक्त खारा पानी है. यह 2.7 प्रतिशत पानी भी कम नहीं है फिर भी आज पूरी दुनिया में पानी एक प्रमुख समस्या बन कर उभरी है. यह मुहावरा पुराना पड़ चूका है कि ‘अगला विश्वयुद्ध पानी को लेकर होगा’ और अब संकट अस्तित्व का बन गया है. पूरी दुनिया में अविवेकपूर्ण भूजल दोहन से भूजलस्तर में तेजी से कमी आई है और वे दूषित हो चुके हैं. हमारे देश के कई हिस्सों में भी भू-जल बहुत तेजी से नीचे गिरा रहा है और पानी की समस्या दिनोंदिन गहराती जा रही है. भारत की अधिकतर आबादी पेय जल के गम्भीर संकट से गुज़र रही है. केंद्रीय जल आयोग की ताजा रिपोर्ट के अनुसार देश के 91 बड़े जलाशयों का स्तर खतरनाक हद तक नीचे आ चुका है और यहाँ मात्र 23 प्रतिशत पानी बचा है, यह संकट हमारा खुद का पैदा किया हुआ हैं तभी तो समुद्र से घिरे और नदियों से पटे होने के बावजूद यह स्थिति बन गयी है जो की एक आपात स्थिति है.

मेशा की तरह इस आपात स्थिति के सबसे गंभीर शिकार गरीब और पिछड़े इलाकों के लोग ही हैं, देश के ग्रामीण हिस्सों में हमारी 18.2 फीसदी आबादी पोखरों, तालाबों और झीलों पर निर्भर हैं जो बड़ी तेजी से दूषित हो रहे हैं,इसी तरह से शहरी क्षेत्रों में झुग्गी बस्ती और छोटी कालोनियों में रहने वाली बड़ी आबादी साफ़ पानी से महरूम हैं. शायद यही कारण है कि देश में 59 फीसदी स्वास्थ्य समस्याओं का मूल कारण दूषित जल का सेवन है और भारत उन चंद देशों में शामिल है जहाँ डायरिया जैसी जल जनित बीमारियों से सबसे ज्यादा बच्चों की मौत होती है.

देश के कई हिस्सों में जिस स्तर का जल संकट देखने को मिल रहा है वह परेशान कर देने वाला हैं, महाराष्ट्र के लातूर में पानी की समस्या पूरी दुनिया में सुर्खिया बटोर रही है जहाँ पानी को लेकर हिंसा और विवाद की घटनाएं इतनी गंभीर हो गई हैं कि स्थानीय प्रशासन को धारा 144 लगाना पड़ा है और ट्रेन के जरिये पानी पहुँचाया गया है. बुंदेलखंड से खबरें आ रही हैं कि वहां सूखे के कारण लोग कीचड़ से पानी निकाल कर पीने को मजबूर हैं. पन्ना जिले में काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता युसूफ बेग बताते हैं कि ‘वहां के एक गावं “खजरी कुडार” में जल संकट के कारण पिछले 1 माह में लगभग 100 गायों ने दम तोड़ दिया है, यहाँ ग्राम पंचायत रमखिरिया के राजापुर गावं में लोग नालों और झिरियों के गंदे पानी पीने को मजबूर हैं. दमोह जिले के कारीबरा गांव में लोगों को 10 किमी का सफर तय करके एक दूसरे गावं से पानी लाना पड़ रहा है. मध्यप्रदेश के डिंडौरी जिले के गावं टिकरा टोला भंवरखण्डी में पानी की स्थिति इतनी विकराल है कि यहाँ महिलायें कुएं में उतरकर चम्मच से पानी भरते हुए देखी जा रही हैं, धार जिले के भमोरी गावं में महिलायें एक पुराने कुएं के तल में बचे पानी के लिए 40 फीट नीचे रस्सी के सहारे उतरने को मजबूर हैं.  

न सबके बीच हमारी सरकारें और नेता वही कर रहे हैं जिसके लिए वे जाने जाते हैं, मध्यप्रदेश की पीएचई मंत्री कुसुम महदेले विधानसभा में पानी के मुद्दे पर हुई चर्चा के दौरान जवाब देती हैं कि “ तीन साल से बारिश नहीं हो रही है तो पानी कहां से आएगा,पानी बरसाना तो सरकार का काम नहीं है”. ऐसा लगता है कि मध्यप्रदेश सरकार की प्राथमिकता में लोक नहीं धर्म की सेवा है और इन सबसे आँखे मूँद कर पूरा अमला सिंहस्थ के आयोजन में व्यस्त है, जानकार बताते है कि यहाँ 5000 करोड़ रूपये खर्च हो रहा है, सबसे दुखद स्थिति यह है कि क्षिप्रा नदी सूख चुकी है और सिंहस्थ के लिए इसमें नर्मदा जल को उंडेल दिया है.सूखाग्रस्त महाराष्ट्र में तथाकथित जनप्रतिनिधियों का क्रूरतम आचरण देखने को मिल रहा है. वहां आईपीएल विवाद के बाद सूखाग्रस्‍त मराठवाड़ा इलाके में दौरे पर गये कृषिमंत्री के लिए बनाये अस्‍थाई हेलिपैड पर 10 हजार लीटर पानी इसलिए बहा दिया गया ताकि हैलीकॉप्टर से उतरते समय मंत्री जी पर धुल ना पड़ सके. इसके बाद बारी महाराष्‍ट्र की ग्रामीण विकास और जल संरक्षण मंत्री पंकजा मुंडे की थी जो लातूर जिले के सूखा प्रभावित इलाकों में अपने दौरे के दौरान सेल्‍फी लेती हुई नजर आयीं.

रअसल हमारे देश में पानी की तिहरी समस्या है, एक तरफ भूजलस्तर तेजी से नीचे जा रहा है और जल संरक्षण की व्यवस्था बहुत कमजोर है, वही उदारीकरण के बाद से पानी को एक कमोडटी यानी खरीदने-बेचने की एक वस्तु बना दिया गया है जिसके साथ मुनाफे का गणित नत्थी है. तीसरा पक्ष सामाजिक है जहाँ एक बड़ी आबादी को परंपरागत रूप से पानी से अलग रखा गया है.

मने जिस तरह से पानी का दोहन किया है और जल संरक्षण का कोई ध्यान नहीं रखा उसने हमें यहाँ पंहुचा दिया है लेकिन इधर जिस तरह पानी को ख़रीद-फरोख़्त की वस्तु बना दिया गया है उससे मामला और बिगड़ा है. इसके भी दो पहलु हैं पहला यह कि उद्योगपतियों को औने-पौने दामों पर या लगभग मुफ्त पानी के दोहन की आज़ादी मिली हुई है यानी जो पानी सामूहिक मतलब पूरे समाज का है उसे एक या कुछ व्यक्तियों को सौप दिया गया और जो इसका इस्तेमाल बहुत ही निर्मंमता से करते हैं और इससे संकट पैदा हुआ हैं, संकट पैदा करने के बाद कंपनियां पानी बेच कर इसी संकट से मुनाफा कूटती हैं. यानी पहले खुद संकट पैदा करो फिर उसी संकट से मुनाफा कमाओ. हम ऐसे दौर में रह रहे हैं जहाँ पानी का भी बाजारीकरण हो चूका है, गरीब से गरीब इंसान भी पानी खरीद कर पीते हुए देखा जा सकता है. पानी के धंधे ने एक बड़ा साम्रज्य खड़ा हो चूका है, यह अरबों रुपए का खेल है और इस खेल में देश-दुनिया के बड़े ताकतवर लोग शामिल है. इसका कोई कारण नजर नहीं आता है कि आने वाले समय में यह धंधा और ना फूले-फले. पूँजीपति पानी को नीला सोना बता रहे हैं, दुनिया भर की कंपनियां पानी पर टूट पड़ी हैं, अब वे पानी को बोतल में भर कर मात्र बेचना नहीं चाहती हैं अब वे चाहती हैं कि सरकारें सेवाएँ मुहैया कराने की अपनी भूमिका को सीमित करें और जल प्रबंधन और वितरण पर उनका नियंत्रित हो जाए.

सके सामाजिक पक्ष को समझने के लिए कुछ उदाहरण ही काफी होंगें, पिछले दिनों  चाइल्ड राइट आॅब्जर्वेटरी एवं मप्र दलित अभियान संघ द्वारा दस जिलों में किये गये एक सर्वे में पाया गया है कि 92 फीसदी दलित बच्चों स्कूलों में पानी नहीं पी सकते क्योंकि उन्हें हैंडपंप और टंकी छूने की मनाही है. कुछ दिनों पहले ही मध्यप्रदेश के सीहोर जिले में स्थित दुदलाई गांव में एक 13 साल के दलित बच्चे की इसलिए पिटाई की गई क्योंकि उसने एक ऊँची जाति के एक किसान के ट्यूबवेल से पानी पी लिया था, बच्चे को इतना मारा गया कि उसके एक हाथ की हड्डी टूट गई. मध्यप्रदेश के दमोह जिले के तेंदूखेड़ा में जातिगत भेदभाव ने तीसरी कक्षा के छात्र की जान ले ली. बच्चा स्कूल के हैंडपंप से पानी लेने से रोका गया तो वह पास ही के एक कुएं पर पानी लेने चला गया जहां संतुलन बिगड़ने की वजह से कुएं में गिरकर उसकी मौत हो गई. इसी तरह से पिछले साल गर्मियों में अलीराजपुर जिले के घटवानी गांव से खबर आयी थी कि वहां के दलित परिवार एक कुंए से गंदा पानी पीने को मजबूर हैं क्योंकि छुआछुत की वजह से उन्हें गावं के इकलौते सार्वजनिक हैंडपंप से पानी नहीं लेने दिया जाता था जबकि जानवर वहा से पानी पी सकते हैं.

हर साल 22 मार्च को  जल दिवस मानते हैं और गर्मियों में पानी को लेकर चिंतित हो जाते हैं, बीच-बीच में राजश्री पान मसाला जैसे लोग एड बना देते हैं जिसमें अन्नू कपूर यह अपील करते हुए नजर आते हैं कि "जल के बिना जीवन की कल्पना भी बेकार है, अगर जीवन को बचाना है तो जल को भी बचाना होगा स्वाद में सोच है”। लेकिन अब इन सब टोटकों से काम नहीं चलने वाला है. हमें राजश्री पान मसाला से नहीं झारखंड के 84 साल के 'वाटरमैन' साइमन उरांव से प्रेरणा लेनी होगी जिन्होंने 1961 के भयंकर सूखे से व्यथित होकर  इक्यावन गांवों में पानी के संरक्षण और वृक्षारोपण के लिए दशकों तक काम किया, उनके इन  प्रयास के बाद आज इन गांवों में पानी की कोई समस्या नहीं है और इस मामले में ये आत्मनिर्भर बन चुके हैं.

स्पष्ट है हमारे देश में जल संकट बहुआयामी है और इसे हल करने के लिए एक “इंडियन पानी लीग की शुरुआत करनी होगी जिसमें समाज और सरकारें मिलजुल खेलें और कुछ तात्कालिक कदम उठाए जैसे सबसे पहले तो आगे की क्षति बंद हो और निजीकरण की सोच को बाहर का रास्ता दिखाया जाए, ग्रामीण इलाकों में पुराने जलाशयों का पुनरोद्धार किया जाए, नये जलाशयों का निर्माण हो और पूरे देश में जल संरक्षण की उचित व्यवस्था की जाए. इन सबके साथ हमें थोड़ा सुधारना भी होगा .



 


जनपक्षधर सिनेमा की चुनौतियाँ और सम्भावनायें

April 24, 2016 0
जनपक्षधर सिनेमा की चुनौतियाँ और सम्भावनायें

स्वदेश सिन्हा


11वें गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल प्रतिरोध के सिनेमा पर विशेष


हिन्दी सिनेमा ने 2013 में अपनी विकास यात्रा के 100 वर्ष पूरे कर लिये हैं। तब से अब तक इसने परिवतर्न के अनेक दौर देखे हैं। मूक फिल्मों से सवाक, श्वेत-श्याम से रंगीन तथा डिजिटल सिनेमा से मल्टीप्लैक्स सिनेमा हालों तक इसने लम्बा सफर तय किया है। बदलते हुए सामाजिक यथार्थ के साथ-साथ फिल्मों के कथ्य तथा अन्तर्वस्तु में भी भारी बदलाव आए हैं। अक्सर लोकप्रिय सिनेमा बनाम जनपक्षधर सिनेमा की बहसें चलती रहती हैं, परन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश के बहुसंख्यक आवाम के सुख-दुःख, उत्साह-विशाद, जय-पराजय का साक्षी यही लोकप्रिय सिनेमा रहा है। कला के सभी प्रारुपों-सिनेमा, रंगमंच, साहित्य, चित्रकला में से अगर किसी विधा ने जनसामान्य तथा समाज पर सबसे अधिक गहरा प्रभाव डाला है, तो वह सिनेमा ही है।

गर दो आँखें बारह हाथ, ‘जागृति, ‘अछूत कन्या, जैसी फिल्मों पर गांधीवाद का प्रभाव था तो राजकपूर की फिल्में बूट पालिस, ‘आवारा, ‘आग, ‘जागते रहो, ‘श्री 420’, आदि पर नेहरुवादी रोमानी समाजवाद का प्रभाव देखने को मिलता है। आजादी के बाद की गुरुदत्त की फिल्में कागज के फूल, ‘प्यासा, में समाज में धन के बढ़ते प्रभाव तथा 80 के दशक में बढ़ते युवा असन्तोष, आक्रोश को सलीम-जावेद की लोकप्रिय जोड़ी ने दीवार, ‘जंजीर, ‘शहंशाह, ‘शराबी, आदि ढेरों अमिताभ बच्चन की हिट फिल्मों में भुनाया, ‘यंग एंग्रीमैन अमिताभ की छवि युवकों का आदर्श बनीं। इन फिल्मों में नायकवाद, व्यक्तिवाद की जबरदस्त अभिव्यक्ति थी, जिसमें आम जनता निरीह है, एक ऐसा सुपरमैन जो सारी समस्याओं का हल खुद ही कर देता है। पूँजीवाद का यह दर्शन आमजन की ताकत को नकारता है। इंकलाब, क्रान्ति जैसी फिल्में भी आमजन के असली मुद्दों से ध्यान हटाकर अंधराष्ट्रवाद, ‘फासीवाद तथा नायकवाद का दर्शन दर्शकों को परोसती है। 80 के दशक की अनेक फिल्में जैसी प्रतिघात, ‘अंधा युद्ध, ‘अंधा कानून, का ट्रीटमेंट और ज्यादा हिंसक तथा क्रूर है, जो जनता में व्यवस्था के प्रति भयानक आतंक पैदा करता है। यह वही दौर था, जब राजनीति, समाज, साहित्य, सिनेमा सभी में नायक और खलनायक का भेद समाप्त हो गया था तथा खलनायक के सारे काम नायक ने सँभाल लिए थे। इसकी जबर्दस्त अभिव्यक्ति उस समय के सिनेमा में थी।
           
ज के सिनेमा में मेहनतकश वर्ग का प्रतिनिधित्व लगभग समाप्त हो गया है। गरीब, मजलूम, दलित आदिवासी, असहाय लोगों की कहानियाँ फिल्मों से लगभग गायब हो गयी हैं। अब 1950-60 के दशकों में बनीं - धरती का लाल, ‘दो बीघा जमीन, ‘बूट पॉलिश, ‘प्यासा, ‘फुटपाथ, ‘दोस्ती’, ‘मदर इण्डिया, ‘सुजाता, ‘पैगाम, ‘दिल्ली दूर नहीं, ‘सीमा, ‘पतिता, ‘रोटी, ‘बन्दिनी, ‘काबुलीवाला, ‘मुन्ना, ‘शहर और सपना जैसी फिल्मों की अब कल्पना भी नहीं की सकती। इसी तरह 90 के दशक में समानान्तर सिनेमा आन्दोलन के दौरान बनीं अंकुर, ‘आक्रोश, ‘अर्द्धसत्य, ‘पार्टी, ‘मृगया, ‘आन्दोलन, ‘भुवन सोम, ‘सारा आकाश, ‘अल्बर्ट पिण्टो को गुस्सा क्यों आता है, ‘सलीम लंगड़े पे मत रो, ‘पार, ‘दामुल, ‘मंथन, ‘भूमिका, ‘सद्गति जैसी फिल्में भी नहीं बन रही हैं।

गान, ‘स्वदेश, ‘स्वराज, ‘दि लिटिल रिपब्लिक 2002’, ‘पिपली (लाइव)आदि कुछ अपवादस्वरूप गिनायी जा सकती हैं, लेकिन ये भी अभिजात्य तथा मध्यवर्ग पर ही केन्द्रित हैं। किसान और मजदूर इस दौर की राजनीति और अर्थव्यवस्था के हाशिए पर हैं, उसी का स्वाभाविक प्रतिबिम्बन हमें आज की हिन्दी फिल्मों मंे दिखाई देता है। प्रतिबिम्बन हमें आज की हिन्दी फिल्मों में दिखाई देता है।

उदारीकरण के दौर में नया सिनेमा

90 के दशक में अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के दौर के फलस्वरूप, जो एक नया उच्च वर्ग तथा मध्य वर्ग पैदा हुआ है, वह मूलतः ग्लोबल है। अपनी तमाम आधुनिकता के बावजूद वह मूल्यों में सामन्ती है। एक समय में बड़े-बड़े सिनेमाहालों के विभिन्न दर्जों में फिल्में देखने वाला मजदूर, किसान तथा निम्न मध्यवर्ग न केवल फिल्मों की कहानियों से गायब हो गया है, बल्कि वह अब तो सिनेमाहालों से भी नदारद है। मल्टीप्लैक्स सिनेमाघरों में 300 से 500 रुपये का टिकट खरीदकर महंगे कोल्ड डिंªक्स तथा कॉफी पीते हुए, पॉपकार्न खाते हुए यह उच्च वर्ग पुराने समय की मधुर गीतों से भरी लम्बी-लम्बी फिल्मों को नहीं देखना चाहता। उसे कुछ थ्रिल, रोमांच और नयापन चाहिए, उसी के लिए आज मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस. (2003), लगे रहो मुन्ना भाई (2006) जब वी मेड (2007), थ्री इडियट्स, तारे जमीं पर जैसी ढेरों फिल्में बनायी जा रही हैं। इनकी भाषा तथा सोच नयी है, परन्तु ये फिल्में किसी बदलाव का संकेत न देकर केवल मध्यवर्गीय भावनाओं की ही तुष्टि करती हैं। कॉरपोरेट, ‘फैशन, ‘अभिनेत्री, सत्या जैसी  आज की ढेरों फिल्में यथार्थवादी तो दिखती हैं, परन्तु ये भी आमजन के लिए नहीं हैं, तथा व्यवस्था आतंक को ही स्थापित करती हैं। इन फिल्मों को ही स्थापित करती हैं। इन फिल्मों के नाम, तकनीक, लोकेशन सभी विदेशी हैं, ये फिल्में हफ्ते भर मंे ही करोड़ों रुपये कमकार पदिदृश्य से गायब हो जाती हैं। यही आज के भूमण्डलीकरण के दौर की फिल्मों का समाजशास्त्र तथा अर्थशास्त्र है।

जनपक्षधर सिनेमा और उसकी चुनौतियाँ

ज डिजिटल तकनीक ने फिल्मों को बनाना तथा दिखाना सस्ता और आसान कर दिया है। अपने देश के तथा दुनिया भर के फासीवादी तथा अतिवादी समूह अपनी विचारधारा के प्रचार-प्रसार के लिए फिल्मों तथा सोशल मीडिया का जमकर प्रयोग कर रहे हैं। वे जनपक्षधर लोग भी जो सच्चे अर्थों में सामाजिक परिवर्तन के संघर्षों में लगे हैं, इसका उपयोग कुशलता से कर सकते हैं।

प्रसिद्ध जनपक्षधर फिल्मकार आनन्द पटवर्धन अपने एक लेख गोरिल्ला सिनेमा (1990)’ में लिखा था कि चिली के वामपंथी राष्ट्रपति आलेन्दे का सी.आई.ए. समर्थित सैनिकों द्वारा तख्ता पलटने, उनकी तथा उनके सैकड़ों समर्थकों के हत्याकाण्ड फिल्मांकन कुछ वामपंथी निर्देशकों के हत्याकांड का फिल्मांकन कुछ वामपंथी निर्देशकों ने किया, फिल्म की रीलों का बहुत ही मुश्किल से चिली के बाहर लाया गया, तभी सारी दुनिया को वहाँ की सच्चाई का पता लगा। इस प्रयास में फिल्म से जुड़े अनेक लोग मारे भी गये, परन्तु आज एक छोटे से पेन ड्राइव में ढेरों फिल्मों को लोड करके कहीं भी भेजा जा सकता है। एक अच्छे मोबाइल फोन कैमरे से भी एक छोटी-मोटी फिल्म बनायी जा सकती है। आज के दौर में ढेरों जनपक्षधर फिल्मकार सीमित संसाधनों के बल पर मजदूर-किसानों पर, आदिवासियों की प्राकृतिक सम्पदा की लूट पर, बड़े-बड़े बांध बनाने, परमाणु बिजली घरों के निर्माण के कारण, विस्थापित हुए लोगों आदि के संघर्षों पर डॉक्यूमेंट्री तथा कथा-प्रधान फिल्में भी बना रहे हैं।


नेक छोटे-बड़े शहरों में अनेक कठिनाइयों के बावजूद फिल्म फेस्टिवल हो रहे हैं तथा नये-नये युवा फिल्मकार भी निकल रहे हैं। आज एक बार फिर सिनेमा एक बड़ी ताकत बनकर उभरा है। इप्टा ने अपने उत्कर्ष काल में अनेक जनपक्षधर फिल्मों का निर्माण किया था। आज के दौर में स्थितियाँ उससे भिन्न हैं, अभी भी सांस्कृतिक संगठनों तथा जनपक्षधर निर्देशकों के लिए आमजन का सिनेमा बनाना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। आज एक ओर दलितों, स्त्रियों, शोषित-दमित तबकों के आन्दोलन खड़े हो रहे हैं तथा इनके दमन के लिए फासीवादी ताकतें भी नये-नये रूपों में उभर रही हैं। इस दौर में ऐसी फिल्मों का निर्माण आवश्यक है, जो इन आन्दोलनों को अपने में समाहित कर सके तथा प्रतिगामी ताकतों व व्यवसायिक सिनेमा को सही मायने में टक्कर दे सकें। आज क्षेत्रीय भाषाओं में भी फिल्म निर्माण की जरूरत है। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि साहित्य, कला, रंगमंच सिनेमा जैसे माध्यमों में मनोरंजन, जनपक्षधरता  तथा कला तीनों का संगम होना चाहिए। आज बहुत से प्रयोगधर्मी जनपक्षधर युवा फिल्म निर्देशक इस दिशा में प्रयासरत हैं। यह हमें आशान्वित करता है कि शीघ्र ही नया सिनेमा सही अर्थों में सर्वहारा-सौन्दर्यशास्त्र की एक मिसाल बनकर उभरेगा।