अरुणाचल प्रदेश पर मोदी सरकार को सुप्रीम कोर्ट का आईना


 एल.एस. हरदेनिया 

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आज़ाद भारत के इतिहास में पहले कभी भी राज्यपाल की भूमिका की इतने सख्त षब्दों में निंदा नहीं की गई जितनी अरूणाचल प्रदेश  के मामले में की गई है। सर्वोच्च न्यायालय ने अरूणाचल प्रदेष की बर्खास्त कांग्रेस सरकार को पुनः सत्ता सौंपते हुए राज्यपाल की भूमिका के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं जिनका दूरगामी प्रभाव हो सकता है।
 दिनांक 13 जुलाई 2016 को दिए गए अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यपाल की भूमिका के संबंध में जो महत्वपूर्ण मुद्दे उठाए हैं उनमें यह परामर्श शामिल है कि राज्यपाल को राजनीतिक पार्टियों के आंतरिक मतभेद और असंतोष से स्वयं को दूर रखना चाहिए। अरूणाचल प्रदेश में उत्पन्न स्थिति का उल्लेख करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि राज्यपाल को संविधान द्वारा निर्धारित लक्ष्मण रेखा के अंतर्गत ही अपने उत्तरदायित्व निभाना चाहिए।
राज्यपाल को अपने आदेष मुख्यमंत्री के परामर्श से ही जारी करने चाहिए। चूंकि राज्यपाल एक चुना हुआ अधिकारी नहीं है, इसलिए उसे विधायकों को सीधे आदेश देने का अधिकार नहीं है। राज्य की विधानसभा द्वारा लिए गए निर्णयों को निरस्त करने का अधिकार भी राज्यपाल को नहीं है। यदि वह ऐसा करता है तो इससे संविधान में निहित परंपरा को ठेस पहुंचती है। सर्वोच्च न्यायालय ने अरूणाचल प्रदेष के राज्यपाल के उस आदेश की निंदा की है जिसके द्वारा राज्यपाल ने विधानसभा के सत्र की तिथि एक महीना आगे बढ़ा दी थी। राज्यपाल ने यह भी तय कर दिया था कि विधानसभा की कार्यवाही किस ढंग से संपन्न हो। राज्यपाल ने यह भी आदेश दिया था कि विधानसभा स्पीकर को हटाए जाने संबंधी प्रस्ताव पर सबसे पहले विचार हो।
राज्यपाल के आदेश की भाषा संसदीय परंपरा और उत्तरदायी शासन के विपरीत थी। इस तरह यह स्पष्ट है कि विधानसभा के सत्र को आहूत करने संबंधी राज्यपाल का आदेष पूरी तरह असंवैधानिक था। सच पूछा जाए तो राज्यपाल की भूमिका की आलोचना एक तरह से केंद्रीय सरकार की आलोचना है क्योंकि उसका राजनीतिक उपयोग केंद्र सरकार के द्वारा बनाई गई रणनीति के अंतर्गत ही हुआ था।
वर्षों पूर्व बोम्बई मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 356 के दुरूपयोग को रोकने के लिए कुछ दिशा निर्देष जारी किए थे। अरूणाचल प्रदेश के मामले में इन आदेशों  की पूरी तरह अवहेलना की गई थी। धारा 356 के अन्तर्गत ही राज्यों पर राष्ट्रपति शासन लागू किया जाता है। इन दिषा निर्देषों के अंतर्गत, मंत्रिपरिषद को बहुमत का समर्थन है कि नहीं, इस बात का निर्णय विधानसभा के भीतर होना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने यह तय किया था कि यदि यह साफ हो जाता है कि धारा 356 का दुरूपयोग हुआ है तो उस संबंध में निर्णय करने का अधिकार उसका ही होगा और उस संबंध में राहत देने का अधिकार भी उसी का होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि 356 का उपयोग उसी स्थिति में किया जाना चाहिए जबकि संवैधानिक मषीनरी, प्रषासनिक नहीं, पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो गई हो।
केन्द्र को चाहिए कि 356 का उपयोग पूरी संजीदगी से, सोच-समझकर किया जाए। यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो केन्द्र और राज्यों के बीच के संबंधों को ठेस पहुंचेगी। डा. अम्बेडकर ने यहां तक कहा था कि संविधान के इस प्रावधान को मृतप्राय ही समझना चाहिए। अरूणाचल प्रदेश के मामले में पूर्व में जारी इन दिशा निर्देषों का पूरी तरह उल्लंघन हुआ है।
अरूणाचाल प्रदेश में जो कुछ हुआ है वह हद से बढ़कर शर्मनाक है। जब राज्यपाल ने विधानसभा की तिथि एक माह आगे बढ़ा दी थी तब स्पीकर ने विधानसभा सदन में ताला लगा दिया। उसके बाद विधानसभा का सत्र एक कम्युनिटी हाल में हुआ और बाद की बैठकें एक होटल में हुईं। ऐसा हमारे देश में पूर्व में कभी किसी भी राज्य में नहीं हुआ।
वैसे सर्वोच्च न्यायालय ने वहां की कांग्रेस सरकार को बाहर कर दिया है परंतु कांग्रेस के हाथ में सत्ता नहीं आ पाएगी क्योंकि उसके पास इस समय 58 सदस्यीय विधानसभा में सिर्फ 15 विधायकों का समर्थन है। दलबदल होने के पूर्व विधानसभा में कांग्रेस के सदस्यों की संख्या 45 थी, बाद में 30 सदस्यों ने कांग्रेस से स्तीफा देकर एक पृथक दल का गठन किया था।
राज्यपाल की भूमिका पूरी तरह से केंद्र के आदेश पर होती है। इस संदर्भ में राष्ट्रपति की भूमिका पर भी विचार किया जाना आवश्यक है। यद्यपि संविधान के अनुसार राष्ट्रपति को केंद्रीय मंत्रीपरिषद के निर्णय को मानना पड़ता है। परंतु यदि वह चाहे तो केंद्रीय सरकार से स्पष्टीकरण मांग सकता है। स्पष्टीकरण मांगने की प्रक्रिया में भी यह स्पष्ट हो जाता है कि राष्ट्रपति शासन लागू करने का निर्णय संवैधानिक दृष्टि से उचित है कि नहीं।
 इस तरह का एक दिलचस्प उदाहरण उस समय का है जब बिहार की सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था। उस समय के.आर. नारायणन राष्ट्रपति थे। उनने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार से स्पष्टीकरण मांगे। स्पष्टीकरण संतोषपूर्ण नहीं थे इसलिए राष्ट्रपति की सलाह के अनुसार वहां राष्ट्रपति शासन उठा लिया गया था। संयोग से उस समय भी केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में संयुक्त सरकार सत्ता में थी। श्री नारायणन ने केंद्रीय सरकार को भेजे अपने पत्र में स्पष्ट कहा था कि वे केंद्रीय सरकार की इस राय से सहमत नहीं हैं कि बिहार में कानून और व्यवस्था की स्थिति चरमरा गई है। नारायणन केंद्रीय सरकार के रवैये से नाराज़ थे। उन्होंने स्पष्ट लिखा था कि बिहार के राज्यपाल सुंदर सिंह भंडारी ने अत्यधिक पक्षपातपूर्ण निर्णय किया था। नारायणन ने अपने पत्र में धारा 356 के बारे में सरकारिया आयोग की सिफारिशों का भी उल्लेख किया था। राष्ट्रपति के हस्तक्षेप के बाद केंद्रीय सरकार को अपना निर्णय वापिस लेना पड़ा। यदि राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी चाहते तो इस तरह का कदम उठाकर देश को इस शर्मनाक स्थिति से गुज़रने से बचा सकते थे।
यह संभवतः पहली बार है जब न्यायपालिका ने इतने ज़ोरदार ढंग से विधायिका के मामले में हस्तक्षेप किया है। 1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद राजस्थान, मध्यप्रदेश और हिमाचल प्रदेश की सरकारों को बर्खास्त कर वहां राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था।
उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह द्वारा स्वयं होकर स्तीफा देने के बाद वहां राष्ट्रपति शासन लागू किया गया। मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा ने केंद्रीय शासन के निर्णय के खिलाफ प्रदेश की हाईकोर्ट में अपील की थी। हाईकोर्ट ने पटवा के पक्ष में निर्णय देकर उनकी सरकार को पुनः सत्ता सौंप दी थी। परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने पटवा की बर्खास्तगी को उचित बताया था। इस तरह के कुछ अन्य मामलों में बर्खास्तशुदा राज्य सरकारों को सर्वोच्च न्यायालय ने राहत नहीं दी। परंतु उत्तराखंड के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने विधानसभा में मतदान द्वारा कांग्रेस को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर दिया। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय केंद्रीय सरकार के मुंह पर एक करारा तमाचा था।
अरूणाचाल प्रदेश और उत्तराखंड दोनों हमारे देष की सीमा पर स्थित राज्य हैं। अरूणाचल प्रदेश पर तो चीन की नज़र रहती है। वहां राजनीतिक अस्थिरता पैदा करना जो राज्यपाल के इशारे पर हुई थी, एक आपराधिक कृत्य था, जो जानबूझकर योजनाबद्ध तरीके से किया गया।
पूर्व में बड़े पैमाने पर एक साथ अनेक राज्यों की चुनी हुई सरकारों को बर्खास्त किया गया था। उस समय केंद्र में मोरारजी भाई के नेतृत्व में जो सरकार थी जनसंघ (अब भारतीय जनता पार्टी) उसका एक घटक था। उस समय केंद्रीय सरकार ने कांग्रेस शासित समस्त राज्य सरकारों को बर्खास्त किया था। परंतु जिस भोड़े ढंग से उत्तराखंड और अरूणाचल प्रदेश की सरकारों को हटाकर राष्ट्रपति शासन लागू किया गया है, वैसा इससे पहले कभी नहीं हुआ।
पहले में भी कुछ ऐसे ही तरीकों से आंध्रप्रदेश की एन.टी. रामाराव की सरकार को वहां के राज्यपाल ने बर्खास्त किया था परंतु इससे पहले कि एन.टी. रामाराव न्यायपालिका में अपना मामला ले जाते उनके हाथ में पुनः सत्ता सौंप दी गई। इसी तरह बिहार की सरकार को हटाने का प्रयास किया गया था।
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1984 में कश्मीर की चुनी सरकार को बर्खास्त करवा दिया था। यह काम उस समय कष्मीर के राज्यपाल जगमोहन ने किया था जो बाद में भाजपा में शामिल हो गए थे। यह अनेक लोगों का मानना है कि उसके बाद ही वहां आतंकवाद के बीच अंकुरित हुए। यह एक संयोग ही है कि पिछले दो वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के अनेक निर्णय निरस्त किए हैं।
इनमें उत्तराखंड से संबंधित निर्णय के अतिरिक्त, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति के बारे में प्रस्तावित आयोग को निरस्त करना, केन्द्र सरकार द्वारा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों  की नियुक्ति संबंधी आदेष को वापिस करना एवं सूखे के संबंध में सरकार की लापरवाही की सख्त निंदा करना शामिल है। ताज़ा उदाहरण अरूणाचल प्रदेश संबंधी निर्णय का है।
यहां इस बात पर ज़ोर देना आवश्यक है कि राज्यों के संबंध में निर्णय बहुत सोच समझकर लिए जाने चाहिए। संविधान में हमने राज्यों को स्वायत्तता प्रदान की है। कई मामलों, विशेषकर विधायिका और कार्यपालिका के मामले में राज्य पूरी तरह सार्वभौमिक है। यदि उनकी सार्वभौमिकता को कम करने के प्रयास होते हैं तो इससे देष की एकता पर उसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसलिए केंद्रीय नेतृत्व को राजनीतिक लाभ के लिए ऐसे कदम नहीं उठाने चाहिए जिससे हमारे संघीय ढांचे में दरार पड़े।


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